अणुवाद

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अणुवाद दर्शन में प्रकृति के अल्पतम अंश को अणु या परमाणु कहते हैं। अणुवाद का दावा है कि प्रत्येक प्राकृत पदार्थ अणुओं से बना है और पदार्थों का बनना तथा टूटना अणुओं के संयोग वियोग का ही दूसरा नाम है। प्राचीन काल में अणुवाद दार्शनिक विवेचन का एक प्रमुख विषय था, परंतु वैज्ञानिकों ने इसे स्वीकार नहीं किया। इसके विपरीत, आधुनिक काल में दार्शनिक इसकी ओर से उदासीन रहे हैं, परंतु भौतिकी के लिए अणु की बनावट और प्रक्रिया अध्ययन का प्रमुख विषय बन गई है । भारत में वैशेषिक दर्शन ने अणु पर विशेष विचार किया है।

प्राचीन दार्शनिक विचार[संपादित करें]

प्रकृति के विभाजन में अणु परम या अंत है, विभाजन इससे आगे जा नहीं सकता। दिमाक्रीतस (Democritus ) के अनुसार प्रत्येक अणु परिणाम और आकृति रखता है, परंतु इनमें किसी प्रकार का जातिभेद नहीं। यही ल्युसिपस का भी मत था। एंपिदोक्लोज ने पृथिवी, जल और अग्नि के अणुओं में जातिभेद देखा। अणुओं का संयोग वियोग गति पर निर्भर है, और गति शून्य में ही हो सकती है। अभाज्य अणुओं के साथ प्राचीन अणुवाद ने शून्य के अस्तित्व को भी स्वीकार किया।

आधुनिक विज्ञान और अणु[संपादित करें]

19वीं शताब्दी के आरंभ में जॉन डाल्टन ने अणुवाद का सबल समर्थन किया। उसे उचित रूप से आधुनिक अणुवाद का पिता कहा जाता है। अणुवाद की पुष्टि में कई हेतु दिए जाते हैं जिनमें दो ये हैं:

(1) प्रत्येक पदार्थ दबाव के नीचे सिकुड़ जाता है और दबाव दूर होने पर फैल जाता है। गैसों की हालत में यह संकोच और फैलाव स्पष्ट दीखते हैं। किसी वस्तु का संकोच उसके अणुओं का एक-दूसरे के निकट आना है, उसका फैलना अणुओं के अंतर का अधिक होना ही है।

(2) गुणित अनुपात का नियम (लॉ ऑव मल्टिपुत्र प्रोपोर्शस) अणुवाद की पुष्टि करता है। जब दो भिन्न अणु रासायनिक संयोग में आते हैं, तो उनमें एक के अचल मात्रा में रहने पर, दूसरा अणु 2,3,4 . . . इकाइयों में ही उसे मिलता है, 212, 334 आदि मात्राओं में नहीं मिलता। इसका कारण यह प्रतीत होता है कि अणु का 12 या 34 अंश कहीं विद्यमान ही नहीं।

वैशेषिक का अणुवाद[संपादित करें]

वैशेषिक दर्शन का उद्देश्य मौलिक पदार्थों या परतम जातियों का अध्ययन है। इन पदार्थों में प्रथम स्थान द्रव्य को दिया गया है। नौ द्रव्यों में पहले पाँच द्रव्य पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश हैं। इसका अर्थ यह है कि सभी प्राकृत अणु सजातीय नहीं, अपितु उनमें जातिभेद है। इस विचार में वैशेषिक दिमाक्रीतस से नहीं अपितु एंपिदोक्लीज़ से मिलता है। अणुओं में जातिभेद प्रत्यक्ष का विषय तो है नहीं, अनुमान ही हो सकता है। ऐसे अनुमान का आधार क्या है? वैशेषिक के अनुसार, कारण के भाव से ही कार्य का भाव होता है। हमारे संवेदनों (सेंसेशंस) में मौलिक जातिभेद है- देखना, सुनना, सूँघना, चखना, छूना, एक-दूसरे में बदल नहीं सकते। इस भेद का कारण यह है कि इन बोधों के साधक अणुओं में भी जातिभेद है।

अणुओं का संयोग वियोग निरंतर होता रहता है। समता की हालत में संयोग का आरंभ सृष्टि है, पूर्ण वियोग प्रलय है। अणु नित्य है, इसलिए सृष्टि, प्रलय का क्रम भी नित्य है।

सुलभ और धर्मध्वज जनक का शास्त्रार्थ[संपादित करें]

The essence of hindu atomism is seen in sulabhA's discourse , to the king of mithilA, dharmadhvaja jAnaka. sulabhA was a student of he student of pa~nchshika asurAyaNa. Mahabharata shAntiparva 309.113-125 (Pune edition); 321 (Bengal edition)

अव्यक्तं प्रकृतिं त्वासां कलानां कश चिदिच्छति .

व्यक्तं चासां तथैवान्यः स्थूलदर्शी प्रपश्यति .. ११३..

Some believe that all existence emerges solely from the unmanifest prakR^iti, while others believe that it emerges from the always manifest prakR^iti.

अव्यक्तं यदि वा व्यक्तं द्वयीमथ चतुष्टयीम .

प्रकृतिं सर्वभूतानां पश्यन्त्यध्यात्मचिन्तकाः .. ११४..

Whether it emerges from the manifest, or the unmanifest, or a combination of two principles or of four principles, the knowers term the basis of all existence to be prakR^iti

सेयं प्रकृतिरव्यक्ता कलाभिर्व्यक्ततां गता .

अहं च त्वं च राजेन्द्र ये चाप्यन्ये शरीरिणः .. ११५..

Myself and yourself, oh indra of the rajanyas, and other entities that occupy space are as result of prakR^iti.

बिन्दुन्यासादयोऽवस्थाः शुक्रशोनित सम्भवाः .

यासामेव निपातेन कललं नाम जायते .. ११६..

A point formed by the union the spermatic and female principles is beginning of our existence. It then transforms itself into the primary embryonic globule called kalala

कललादर्बुदोत्पत्तिः पेशी चाप्यर्बुदोद्भवा .

पेश्यास्त्वङ्गाभिनिर्वृत्तिर्नखरोमाणि चाङ्गतः .. ११७..

The kalala divides to a state with numerous bubbles called (arbuda), and the the arbuda gives rise to an elongated sheath like form (peshi). From the peshi, emerges the a~NgA, where the rudiments of all the organs are seen, from this form differentiates the external elements like hair and nails.

सम्पूर्णे नवमे मासे जन्तोर्जातस्य मैथिल .

जायते नाम रूपत्वं स्त्री पुमान्वेति लिङ्गतः .. ११८..

Upon the expiration of the 9th month emerges a neonate, Oh Maithila. It is female or male depending on the li~nga it had developed.

जातमात्रं तु तद्रूपं दृष्ट्वा ताम्रनखाङ्गुलि .

कौमार रूपमापन्नं रूपतो न पलभ्यते .. ११९..

When a being issues forth from the womb it has nails and fingers of the hue of blood. The next step is infancy when the form seen at birth changes.

कौमाराद्यौवनं चापि स्थाविर्यं चापि यौवनात .

अनेन क्रमयोगेन पूर्वं पूर्वं न लभ्यते .. १२०..

from infancy, youth is reached and from that old age is reached. As the creature advances from stage to stage irreversibly, there is constant change in the body.

कलानां पृथगर्थानां प्रतिभेदः क्षणे क्षणे .

वर्तते सर्वभूतेषु सौक्ष्म्यात्तु न विभाव्यते .. १२१..

This is because the body is made of minute particles which serve diverse functions and undergo changes, that are hard to perceive from second to second.

न चैषामप्ययो राजँल्लक्ष्यते प्रभवो न च .

अवस्थायामवस्थायां दीपस्येवार्चिषो गतिः .. १२२..

The birth and death of these particles is continous, with one leading to the other, just as the changes in flame of a burning lamp, oh King.

तस्याप्येवं प्रभावस्य सदश्वस्येव धावतः .

अजस्रं सर्वलोकस्य कः कुतो वा न वा कुतः .. १२३..

Thus is the existence of the body of all creatures, with their elements constantly in rapid locomotion like a good horse in run. Ever state comes and goes.

कस्येदं कस्य वा नेदं कुतो वेदं न वा कुतः .

सम्बन्धः कोऽस्ति भूतानां स्वैरप्यवयवैरिह .. १२४..

Who then has come whence? from what? what has it not come from? what is the relationship between the elements and the body of a creature?

यथादित्यान्मणेश्चैव वीरुद्भ्यश्चैव पावकः .

भवेत्येवं समुदयात्कलानामपि जन्तवः .. १२५..

As fire come from the contact of wood pieces or sun's (rays) through bead, some combinations of the fundamental elements gives rise to the constituents of bodies.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]