स्वास्थ्य

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विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) ने सन् १९४८ में स्वास्थ्य या आरोग्य की निम्नलिखित परिभाष'दैहिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना (समस्या-विहीन होना) [1]

स्वास्थ्य सिर्फ बीमारियों की अनुपस्थिति का नाम नहीं है। हमें सर्वांगीण स्वास्थ्य के बारे में जानकारी होना बोहोत आवश्यक है। स्वास्थ्य का अर्थ विभिन्न लोगों के लिए अलग-अलग होता है। लेकिन अगर हम एक सार्वभौमिक दृष्टिकोण की बात करें तो अपने आपको स्वस्थ कहने का यह अर्थ होता है कि हम अपने जीवन में आनेवाली सभी सामाजिक, शारीरिक और भावनात्मक चुनौतियों का प्रबंधन करने में सफलतापूर्वक सक्षम हों। वैसे तो आज के समय मे अपने आपको स्वस्थ रखने के ढेर सारी आधुनिक तकनीक मौजूद हो चुकी हैं, लेकिन ये सारी उतनी अधिक कारगर नहीं हैं।

समग्र स्वास्थ्य की परिभाषा[संपादित करें]

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, स्वास्थ्य सिर्फ रोग या दुर्बलता की अनुपस्थिति ही नहीं बल्कि एक पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक खुशहाली की स्थिति है। स्वस्थ लोग रोजमर्रा की गतिविधियों से निपटने के लिए और किसी भी परिवेश के मुताबिक अपना अनुकूलन करने में सक्षम होते हैं। रोग की अनुपस्थिति एक वांछनीय स्थिति है लेकिन यह स्वास्थ्य को पूर्णतया परिभाषित नहीं करता है। यह स्वास्थ्य के लिए एक कसौटी नहीं है और इसे अकेले स्वास्थ्य निर्माण के लिए पर्याप्त भी नहीं माना जा सकता है। लेकिन स्वस्थ होने का वास्तविक अर्थ अपने आप पर ध्यान केंद्रित करते हुए जीवन जीने के स्वस्थ तरीकों को अपनाया जाना है।

यदि हम एक अभिन्न व्यक्तित्व की इच्छा रखते हैं तो हमें हर हमेशा खुश रहना चाहिए और मन में इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि स्वास्थ्य के आयाम अलग अलग टुकड़ों की तरह है। अतः अगर हम अपने जीवन को कोई अर्थ प्रदान करना चाहते है तो हमें स्वास्थ्य के इन विभिन्न आयामों को एक साथ फिट करना पड़ेगा। वास्तव में, अच्छे स्वास्थ्य की कल्पना समग्र स्वास्थ्य का नाम है जिसमें शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य , बौद्धिक स्वास्थ्य, आध्यात्मिक स्वास्थ्य और सामाजिक स्वास्थ्य भी शामिल है।

शारीरिक स्वास्थ्य[संपादित करें]

शारीरिक स्वास्थ्य शरीर की स्थिति को दर्शाता है जिसमें इसकी संरचना, विकास, कार्यप्रणाली और रखरखाव शामिल होता है। यह एक व्यक्ति का सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए एक सामान्य स्थिति है। यह एक जीव के कार्यात्मक और/या चयापचय क्षमता का एक स्तर भी है। अच्छे शारीरिक स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने के कुछ निम्नलिखित तरीके हैं-

  • (1) संतुलित आहार की आदतें, मीठी श्वास व गहरी नींद
  • (2) बड़ी आंत की नियमित गतिविधि व संतुलित शारीरिक गतिविधियां
  • (3) नाड़ी स्पंदन, रक्तदाब, शरीर का भार व व्यायाम सहनशीलता आदि सब कुछ व्यक्ति के आकार, आयु व लिंग के लिए सामान्य मानकों के अनुसार होना चाहिए।
  • (4) शरीर के सभी अंग सामान्य आकार के हों तथा उचित रूप से कार्य कर रहे हों।

मानसिक स्वास्थ्य[संपादित करें]

मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ हमारे भावनात्मक और आध्यात्मिक लचीलेपन से है जो हमें अपने जीवन में दर्द, निराशा और उदासी की स्थितियों में जीवित रहने के लिए सक्षम बनाती है। मानसिक स्वास्थ्य हमारी भावनाओं को व्यक्त करने और जीवन की ढ़ेर सारी माँगों के प्रति अनुकूलन की क्षमता है। इसे अच्छा बनाए रखने के कुछ निम्नलिखित तरीके हैं-

  • (1) प्रसन्नता, शांति व व्यवहार में प्रफुल्लता
  • (2) आत्म-संतुष्टि (आत्म-भर्त्सना या आत्म-दया की स्थिति न हो।)
  • (3) भीतर ही भीतर कोई भावात्मक संघर्ष न हो (सदैव स्वयं से युद्धरत होने का भाव न हो।)
  • (4) मन की संतुलित अवस्था।

बौद्धिक स्वास्थ्य[संपादित करें]

यह किसी के भी जीवन को बढ़ाने के लिए कौशल और ज्ञान को विकसित करने के लिए संज्ञानात्मक क्षमता है। हमारी बौद्धिक क्षमता हमारी रचनात्मकता को प्रोत्साहित और हमारे निर्णय लेने की क्षमता में सुधार करने में मदद करता है।

  • (1) समायोजन करने वाली बुद्धि, आलोचना को स्वीकार कर सके व आसानी से व्यथित न हो।
  • (2) दूसरों की भावात्मक आवश्यकताओं की समझ, सभी प्रकार के व्यवहारों में शिष्ट रहना व दूसरों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखना, नए विचारों के लिए खुलापन, उच्च भावात्मक बुद्धि।
  • (3) आत्म-संयम, भय, क्रोध, मोह, जलन, अपराधबोध या चिंता के वश में न हो। लोभ के वश में न हो तथा समस्याओं का सामना करने व उनका बौद्धिक समाधान तलाशने में निपुण हो।

आध्यात्मिक स्वास्थ्य[संपादित करें]

हमारा अच्छा स्वास्थ्य आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ हुए बिना अधूरा है। जीवन के अर्थ और उद्देश्य की तलाश करना हमें आध्यात्मिक बनाता है। आध्यात्मिक स्वास्थ्य हमारे निजी मान्यताओं और मूल्यों को दर्शाता है। अच्छे आध्यात्मिक स्वास्थ्य को प्राप्त करने का कोई निर्धारित तरीका नहीं है। यह हमारे अस्तित्व की समझ के बारे में अपने अंदर गहराई से देखने का एक तरीका है।

  • (1) समुचित ज्ञान की प्राप्ति तथा स्वयं को एक आत्मा के रूप में जानने का निरंतर बोध। सुप्रीम डॉक्टर के निरंतर संपर्क में रहना। स्वयं को जानने व अनुभव करने वाली आत्मा सदैव शांत व पवित्र होगी।
  • (2) अपने शरीर सहित इस भौतिक जगत की किसी भी वस्तु से मोह न रखना। दूसरी आत्माओं के प्रभाव में आए बिना उनसे भाईचारे का नाता रखना। इस प्रकार एक व्यक्ति के कर्म उन्नत होंगे तथा उच्चस्तरीय व विशिष्ट हो पाएंगे।
  • (3) सुप्रीम डॉक्टर या सर्वोच्च आत्मा से निरंतर बौद्धिक संप्रेषण ताकि सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त कर विशुद्ध कर्म की ओर प्रेषित की जा सके। आत्मा स्वयं को तथा दूसरों को विनीत, अनश्वर तथा दुर्गुणरहित पाएगी। उसे कोई भी सांसारिक बाधा त्रस्त नहीं कर सकती।

सामाजिक स्वास्थ्य[संपादित करें]

चूँकि हम सामाजिक जीव हैं अतः संतोषजनक रिश्ते का निर्माण करना और उसे बनाए रखना हमें स्वाभाविक रूप से आता है। सामाजिक रूप से सबके द्वारा स्वीकार किया जाना हमारे भावनात्मक खुशहाली के लिए अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

  • (1) ऐसी मित्रता करें जो संतोषप्रद व दीर्घकालिक हो।
  • (2) परिवार व समाज से जुड़े संबंधों को हार्दिक व अक्षुण्ण बनाए रखें
  • (3) अपनी व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार समाज के कल्याण के लिए कार्य करना।

अधिकांश लोग अच्छे स्वास्थ्य के महत्त्व को नहीं समझते हैं और अगर समझते भी हैं तो वे अभी तक इसकी उपेक्षा कर रहे हैं। हम जब भी स्वास्थ्य की बात करते हैं तो हमारा ध्यान शारीरिक स्वास्थ्य तक ही सीमित रहता है। हम बाकी आयामों के बारे में नहीं सोचते हैं। अच्छे स्वास्थ्य की आवश्यकता हम सबको है। यह किसी एक विशेष धर्म, जाति, संप्रदाय या लिंग तक सीमित नहीं है। अतः हमें इस आवश्यक वस्तु के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। अधिकांश रोगों का मूल हमारे मन में होता है। एक व्यक्ति को स्वस्थ तब कहा जाता है जब उसका शरीर स्वस्थ और मन साफ और शांत हो। कुछ लोगों के पास भौतिक साधनों की कमी नहीं होती है फिर भी वे दुःखी या मनोवैज्ञानिक स्तर पर उत्तेजित हो सकते।

आयुर्वेद के अनुसार स्वास्थ्य की परिभाषा[संपादित करें]

आयुर्वेद में स्वस्थ व्यक्ति की परिभाषा इस प्रकार बताई है-

समदोषः समाग्निश्च समधातु मलक्रियाः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थः इत्यभिधीयते ॥
( जिस व्यक्ति के दोष (वात, कफ और पित्त) समान हों, अग्नि सम हो, सात धातुयें भी सम हों, तथा मल भी सम हो, शरीर की सभी क्रियायें समान क्रिया करें, इसके अलावा मन, सभी इंद्रियाँ तथा आत्मा प्रसन्न हो, वह मनुष्य स्वस्थ कहलाता है )। यहाँ 'सम' का अर्थ 'संतुलित' ( न बहुत अधिक न बहुत कम) है।

आचार्य चरक के अनुसार स्वास्थ्य की परिभाषा-

सममांसप्रमाणस्तु समसंहननो नरः।
दृढेन्द्रियो विकाराणां न बलेनाभिभूयते॥१८॥
क्षुत्पिपासातपसहः शीतव्यायामसंसहः।
समपक्ता समजरः सममांसचयो मतः॥१९॥
अर्थात जिस व्यक्ति का मांस धातु समप्रमाण में हो, जिसका शारीरिक गठन समप्रमाण में हो, जिसकी इन्द्रियाँ थकान से रहित सुदृढ़ हों, रोगों का बल जिसको पराजित न कर सके, जिसका व्याधिक्ष समत्व बल बढ़ा हुआ हो, जिसका शरीर भूख, प्यास, धूप, शक्ति को सहन कर सके, जिसका शरीर व्यायाम को सहन कर सके , जिसकी पाचनशक्ति (जठराग्नि) सम़ावस्थ़ा में क़ार्य करती हो, निश्चित कालानुसार ही जिसका बुढ़ापा आये, जिसमें मांसादि की चय-उपचय क्रियाएँ सम़ान होती हों - ऐसे १० लक्षणो लक्षणों व़ाले व्यक्ति को आचार्य चरक ने स्वस्थ माना है।

काश्यपसंहिता के अनुसार आरोग्य के लक्षण-

अन्नाभिलाषो भुक्तस्य परिपाकः सुखेन च ।
सृष्टविण्मूत्रवातत्वं शरीरस्य च लाघवम् ॥
सुप्रसन्नेन्द्रियत्वं च सुखस्वप्न प्रबोधनम् ।
बलवर्णायुषां लाभः सौमनस्यं समाग्निता ॥
विद्यात् आरोग्यलिंङ्गानि विपरीते विपर्ययम् । - ( काश्यपसंहिता, खिलस्थान, पञ्चमोध्यायः )
भोजन करने की इच्छा, अर्थात भूख समय पर लगती हो, भोजन ठीक से पचता हो, मलमूत्र और वायु के निष्कासन उचित रूप से होते हों, शरीर में हलकापन एवं स्फूर्ति रहती हो, इन्द्रियाँ प्रसन्न रहतीं हों, मन की सदा प्रसन्न स्थिति हो, सुखपूर्वक रात्रि में शयन करता हो, सुखपूर्वक ब्रह्ममुहूर्त में जागता हो; बल, वर्ण एवं आयु का लाभ मिलता हो, जिसकी पाचक-अग्नि न अधिक हो न कम, उक्त लक्षण हो तो व्यक्ति निरोगी है अन्यथा रोगी है।

स्वास्थ्य की आयुर्वेद सम्मत अवधारणा बहुत व्यापक है। आयुर्वेद में स्वास्थ्य की अवस्था को प्रकृति (प्रकृति अथवा मानवीय गठन में प्राकृतिक सामंजस्य) और अस्वास्थ्य या रोग की अवस्था को विकृति (प्राकृतिक सामंजस्य से बिगाड़) कहा जाता है। चिकित्सक का कार्य रोगात्मक चक्र में हस्तक्षेप करके प्राकृतिक सन्तुलन को कायम करना और उचित आहार और औषधि की सहायता से स्वास्थ्य प्रक्रिया को दुबारा शुरू करना है। औषधि का कार्य खोए हुए सन्तुलन को फिर से प्राप्त करने के लिए प्रकृति की सहायता करना है। आयुर्वेदिक मनीषियों के अनुसार उपचार स्वयं प्रकृति से प्रभावित होता है, चिकित्सक और औषधि इस प्रक्रिया में सहायता-भर करते हैं।

स्वास्थ्य के नियम आधारभूत ब्रह्मांडीय एकता पर निर्भर है। ब्रह्मांड एक सक्रिय इकाई है, जहाँ प्रत्येक वस्तु निरन्तर परिवर्तित होती रहती है; कुछ भी अकारण और अकस्मात् नहीं होता और प्रत्येक कार्य का प्रयोजन और उद्देश्य हुआ करता है। स्वास्थ्य को व्यक्ति के स्व और उसके परिवेश से तालमेल के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। विकृति या रोग होने का कारण व्यक्ति के स्व का ब्रह्मांड के नियमों से ताल-मेल न होना है।

आयुर्वेद का कर्तव्य है, देह का प्राकृतिक सन्तुलन बनाए रखना और शेष विश्व से उसका ताल-मेल बनाना। रोग की अवस्था में, इसका कर्तव्य उपतन्त्रों के विकास को रोकने के लिए शीघ्र हस्तक्षेप करना और देह के सन्तुलन को पुन: संचित करना है। प्रारम्भिक अवस्था में रोग सम्बन्धी तत्त्व अस्थायी होते हैं और साधारण अभ्यास से प्राकृतिक सन्तुलन को फिर से कायम किया जा सकता है।

यह सम्भव है कि आप स्वयं को स्वस्थ समझते हों, क्योंकि आपका शारीरिक रचनातन्त्र ठीक ढंग से कार्य करता है, फिर भी आप विकृति की अवस्था में हो सकते हैं अगर आप असन्तुष्ट हों, शीघ्र क्रोधित हो जाते हों, चिड़चिड़ापन या बेचैनी महसूस करते हों, गहरी नींद न ले पाते हों, आसानी से फारिग न हो पाते हों, उबासियाँ बहुत आती हों, या लगातार हिचकियाँ आती हो, इत्यादि।

स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में पंच महाभूत, आयु, बल एवं प्रकृति के अनुसार योग्य मात्रा में रहते हैं। इससे पाचन क्रिया ठीक प्रकार से कार्य करती है। आहार का पाचन होता है और रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र इन सातों धातुओं का निर्माण ठीक प्रकार से होता है। इससे मल, मूत्र और स्वेद का निर्हरण भी ठीक प्रकार से होता है।

स्वास्थ्य की रक्षा करने के उपाय बताते हुए आयुर्वेद कहता है-

त्रय उपस्तम्भा: आहार: स्वप्नो ब्रह्मचर्यमिति (चरक संहिता सूत्र. 11/35)

अर्थात् शरीर और स्वास्थ्य को स्थिर, सुदृढ़ और उत्तम बनाये रखने के लिए आहार, स्वप्न (निद्रा) और ब्रह्मचर्य - ये तीन उपस्तम्भ हैं। ‘उप’ यानी सहायक और ‘स्तम्भ’ यानी खम्भा। इन तीनों उप स्तम्भों का यथा विधि सेवन करने से ही शरीर और स्वास्थ्य की रक्षा होती है।

इसी के साथ शरीर को बीमार करने वाले कारणों की भी चर्चा की गई है यथा-

धी धृति स्मृति विभ्रष्ट: कर्मयत् कुरुतऽशुभम्।
प्रज्ञापराधं तं विद्यातं सर्वदोष प्रकोपणम्॥ -- (चरक संहिता; शरीर. 1/102)

अर्थात् धी (बुद्धि), धृति (धारण करने की क्रिया, गुण या शक्ति/धैर्य) और स्मृति (स्मरण शक्ति) के भ्रष्ट हो जाने पर मनुष्य जब अशुभ कर्म करता है तब सभी शारीरिक और मानसिक दोष प्रकुपित हो जाते हैं। इन अशुभ कर्मों को प्रज्ञापराध कहा जाता है। जो प्रज्ञापराध करेगा उसके शरीर और स्वास्थ्य की हानि होगी और वह रोगग्रस्त हो ही जाएगा।

आयुर्वेद में पानी के स्वास्थ्य लाभ पानी के बिना मानव अस्तित्व असंभव है। एक आदमी भोजन के बिना जी सकता है लेकिन पानी के बिना नहीं। हम सभी रोजाना पानी पीते हैं, लेकिन क्या हम एक पैटर्न का पालन करते हैं? हां, आयुर्वेद सलाह हमें एक स्वस्थ शरीर को बनाए रखने के लिए एक कठोर पैटर्न है। आमतौर पर एक व्यक्ति पसीने, मूत्र और आंत्र आंदोलनों के माध्यम से 3 से 4 लीटर पानी खो देता है। शरीर के तरल पदार्थों का नुकसान कम रक्त मात्रा और कम रक्तचाप का कारण बनता है। HEALTH TIPS


आयुर्वेद में पानी के स्वास्थ्य लाभ आयुर्वेद में पानी के स्वास्थ्य लाभ AyurvedayogaDecember 7, 2018 पानी के बिना मानव अस्तित्व असंभव है। एक आदमी भोजन के बिना जी सकता है लेकिन पानी के बिना नहीं। हम सभी रोजाना पानी पीते हैं, लेकिन क्या हम एक पैटर्न का पालन करते हैं? हां, आयुर्वेद सलाह हमें एक स्वस्थ शरीर को बनाए रखने के लिए एक कठोर पैटर्न है। आमतौर पर एक व्यक्ति पसीने, मूत्र और आंत्र आंदोलनों के माध्यम से 3 से 4 लीटर पानी खो देता है। शरीर के तरल पदार्थों का नुकसान कम रक्त मात्रा और कम रक्तचाप का कारण बनता है।


निर्जलीकरण: शरीर के तरल पदार्थों का नुकसान निर्जलीकरण का कारण बनता है और हमारे शरीर को कई बीमारियों में अश्लील बनाता है। यह खराब परिसंचरण, खराब पाचन, और थकान का कारण बनता है। दो प्रकार के निर्जलीकरण, बाह्य कोशिकीय और इंट्रासेल्यूलर होते हैं।

एक्स्ट्रासेल्यूलर निर्जलीकरण: एक्स्ट्रासेल्यूलर निर्जलीकरण कुछ स्तर पर शरीर के तरल पदार्थ का नुकसान होता है। इस प्रकार का निर्जलीकरण कोशिकाओं से बाहर और स्वतंत्र रूप से होता है और आमतौर पर तरल पदार्थ के सेवन की कमी के कारण होता है।

इंट्रासेल्यूलर निर्जलीकरण: इंट्रासेल्यूलर निर्जलीकरण रक्त में सोडियम के उच्च स्तर के कारण होता है, ओस्मोटिक दबाव के कारण कोशिकाओं से पानी निकलता है। इलेक्ट्रोलाइट्स का नुकसान भी इस खराब कामकाज का कारण बनता है।

लक्षण: मुंह और आंखों में सूखापन पसीने की कमी कब्ज और कम पेशाब, विशेष रूप से गहरे पीले रंग के रंग में नाराज़गी शारीरिक द्रव के संकेतक के रूप में मूत्र: गहरा पीला मूत्र मूत्र साफ़ करें – अतिरिक्त पानी की मात्रा और गुर्दे फ्लशिंग। हल्का पीला मूत्र – संतुलित पानी और इलेक्ट्रोलाइट सामग्री अच्छा पाचन के लिए पानी: शरीर के खाने के लिए शरीर की कुछ मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है जिसे हम उपभोग करते हैं, यह एंजाइमों के उत्पादन में मदद करता है। खाने से पहले 20-30 मिनट गर्म पानी पीना 24% तक पाचन में सुधार कर सकते हैं। जैसे ही आप उठते हैं, एक गिलास गर्म पानी पीते हैं, आपके शरीर को ताजा रखता है और पाचन अंगों को ताज़ा करता है।

भोजन के दौरान पानी के sips होने से भोजन के बाद पानी पीने के बजाय भोजन को लगातार सॉस में बदलने में मदद मिलती है।

पानी की सही मात्रा: हर व्यक्ति भिन्न होता है। उच्च चीनी सामग्री, वसा और नमक वाले लोगों में दिन में 4-6 गिलास होना चाहिए।

पूर्व के विपरीत जो पतले और कम रक्त वाले लोगों को 8-10 गिलास पानी पीना चाहिए क्योंकि उनके पास लकी किडनी होती है। रक्त को मोटा करने के उपाय के रूप में उन्हें कार्बो, वसा और प्रोटीन युक्त अधिक भोजन का उपभोग करने की आवश्यकता होती है।पिट्टा असंतुलित लोग मूत्र और पसीने के माध्यम से शरीर के द्रव को खो देते हैं।

पानी की अत्यधिक खपत: जैसा कि बताया गया है कि प्रारंभिक स्पष्ट मूत्र हाइड्रेशन पर एक संकेत है। यह पेट सूजन और पाचन तंत्र को अधिभारित करता है। इलेक्ट्रोलाइट्स को संतुलित करने के लिए कोई कुछ घर के बने विचारों का पालन कर सकता है जैसे केला चिकनी और भोजन में नींबू जोड़ना।

पानी के लिए विकल्प: पानी पचाने के लिए प्रयास करता है क्योंकि यह अप्रसन्न है। इसलिए पानी पीने से जल्द ही पाचन की प्रक्रिया होती है क्योंकि यह रक्त की लवणता और पीएच के साथ संतुलित होती है। तो सूप, शोरबा, हर्बल चाय, फलों के रस और चाय का उपभोग करना बेहतर होता है।

गरम पानी: गर्म पाचन अच्छी पाचन और रक्त परिसंचरण के लिए प्रकृति का सबसे शक्तिशाली घरेलू उपचार है। यह पसीने के माध्यम से रंग सुधारने और लिम्फैटिक प्रणाली को भी साफ करता है। इसका महान जादू यह है कि यह किसी भी अदम्य हिचकी को रोक सकता है।

ठंडा पानी: बर्फ के पानी पीने से रक्त वाहिकाओं को पाचन तंत्र को रक्त आपूर्ति को रोक दिया जाता है। तो यह पाचन की प्रक्रिया को प्रभावित करता है।

प्यास की कमी: क्या आप ऐसे व्यक्ति हैं जो प्यास की कमी करते हैं? तब आपके पास कमजोर पाचन और अतिरिक्त तनाव होता है। पचास साल पार करने के बाद भी प्यास की सनसनी कम हो जाती है। यह निश्चित रूप से निर्जलीकरण का कारण बन सकता है। तो, आपको अपने शरीर पर गहरी ध्यान देना होगा और पर्याप्त पानी पीना होगा।

इन तकनीकों के बाद कोई शरीर में अच्छी संतुलन प्राप्त कर सकता है और निर्जलीकरण को रोक सकता है। औऱ पढ़े . . . . . https://www.ayurvedayoga.fit/archives/222

स्वास्थ्य का आधुनिक दृष्टिकोण[संपादित करें]

स्वास्थ्य की देखभाल का आधुनिक दृष्टिकोण आयुर्वेद के समग्र दृष्टिकोण के विपरीत है; अलग-अलग नियमों पर आधारित है और पूरी तरह से विभाजित है। इसमें मानव-शरीर की तुलना एक ऐसी मशीन के रूप में की गई है जिसके अलग-अलग भागों का विश्लेषण किया जा सकता है। रोग को शरीर रूपी मशीन के किसी पुरजे में खराबी के तौर पर देखा जाता है। देह की विभिन्न प्रक्रियाओं को जैविकीय और आणविक स्तरों पर समझा जाता है और उपचार के लिए, देह और मानस को दो अलग-अलग सत्ता के रूप में देखा जाता है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]