पाठ्यक्रम

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किसी तरह की शिक्षा अथवा प्रशिक्षण के लिये निर्धारित विषयों, उपविषयों (टॉपिक्स) एवं सम्बन्धित सामग्री की व्यवस्थित एवं साररूप में प्रस्तुति ही पाठ्यविवरण (syllabus) कहलाता है। पाठ्यविवरण प्रायः किसी शिक्षा परिषद (बोर्ड) द्वारा निर्धारित की जाती है या किसी प्राध्यापक द्वारा बनायी जाती है जो उस विषय के शिक्षण की गुणवत्ता के लिये उत्तरदायी होता है। समुचित पाठ्यविवरण का शिक्षा में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है।

उद्देश्य[संपादित करें]

पाठ्यविवरण यह सुनिश्चित करता है कि शिक्षक और छात्र यह अच्छी तरह समझ लें कि क्या और कितना पढ़ाना/पढ़ना है, उस सामग्री को पढ़ने का उद्देश्य क्या है, कक्षा में विद्यार्थी से क्या अपेक्षाएँ हैं आदि। इससे विद्यार्थी को एक दिशा मिलती है और रास्ता भी दिखाई पड़ता है।

प्रकार[संपादित करें]

  • परीक्षा पाठ्यविवरण
  • व्याकरण का पाठ्यविवरण
  • शिक्षार्थी द्वारा निर्मित पाठ्यविवरण
  • मिशित पाठ्यविवरण
  • आनलाइन पाठ्यविवरण
  • कौशल आधारित पाठ्यविवरण
  • कार्य-आधारित पाठ्यविवरण
  • टेक्स्ट-आधारित पाठ्यविवरण, आदि

पाठ्यक्रम का आधार[संपादित करें]

पाठ्यक्रम निर्माण एवं विकास की प्रक्रिया अनेकों तथ्यों व सिद्धान्तों पर निर्भर करती है। शिक्षा के मुख्य आधार ये हैं- दार्शनिक आधार, मनोवैज्ञानिक आधार, ऐतिहासिक आधार, सामाजिक आधार, सांस्कृतिक आधार, वैज्ञानिक आधार, आदि।

दार्शनिक आधार[संपादित करें]

दर्शन शास्त्र की प्रकृति वैज्ञानिक है तथा दर्शन का संबंध मानव जीवन की अनुभूतियों से है। दर्शन व शिक्षा में घनिष्ठ संबंध है। शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम, शिक्षण विधियां व अनुशासन व्यवस्था आदि सभी पक्ष समसामयिक दर्शन से प्रभावित होते हैं। पाठ्यक्रम का तो मेरुदण्ड ही दर्शन है।

ब्राइटमैन के शब्दों में “दर्शन की परिभाषा एक ऐसे प्रयास के रूप में दी जा सकती है, जिसके द्वारा संपूर्ण मानव अनुभूतियों के विषय में सत्यता से विचार किया जाता है अथवा जिसके द्वारा हम अपने अनुभव का वास्तविक सार जानते हैं।” फिक्टे के शब्दों में, “दर्शन ज्ञान का विज्ञान है”।

बालक को क्या पढ़ाना चाहिए और क्या नहीं पढ़ाना चाहिये, इस प्रश्न का उत्तर व्यक्ति व समाज की दार्शनिक मान्यता के अनुरूप ही तय किया जाता है। शिक्षा की पाठ्यचर्या का निर्धारण शिक्षा के उद्देश्यों के अनुरूप किया जाता है। भिन्न भिन्न प्रकार के उद्देश्यों के अनुसार पाठ्यक्रम भी बदलता रहता है। यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि शिक्षा की पाठ्यचर्या पर दर्शन का प्रभाव पड़े। एक समय था जब भारत में शिक्षा का उद्देश्य आत्मानुभूति था। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उस काल के पाठ्यक्रम में धर्म शास्त्र एवं नीति शास्त्र के अध्ययन तथा इंद्रीय निग्रह को अधिक महत्व दिया जाता था। इससे भिन्न आधुनिक युग में, जबकि शिक्षा के भौतिकवादी उद्देश्य अत्यधिक प्रबल हैं, तब हमारे शैक्षिक पाठ्यक्रम में तकनीकी ज्ञान, प्रशिक्षण एवं भौतिक विज्ञान को अधिक महत्व दिया जा रहा है।

दर्शनशास्त्र न केवल शिक्षा के लिए उसके पाठ्यक्रम के निर्धारण में योगदान देता है, अपितु दर्शन ही पाठ्य विषयों की संख्या का भी निर्धारण करता है। इसका कारण यह है कि जब समाज में विभिन्न प्रकार की परिस्थितियां आवश्यकताएं व आदर्श उत्पन्न हो जाते हैं, तो उन्हीं के अनुकूल शिक्षा के उद्देश्यों में भी वृद्धि करनी पड़ती है। शिक्षा के उद्देश्यों में वृद्धि के कारण उनकी पूर्ति के लिए पाठ्य विषयों में भी वृद्धि करनी पड़ती है। आज के भौतिकवादी युग में मानवीयता की उपेक्षा न हो, इसलिए इंजीनियरिंग आदि के प्रशिक्षण में मानवीय विज्ञान को भी स्थान दिया जाने लगा है। यह दर्शनशास्त्र द्वारा ही निश्चित हुआ है।

मनोवैज्ञानिक आधार[संपादित करें]

आधुनिक मनोविज्ञान ही बताता है कि प्रत्येक बालक के विकास की विभिन्न अवस्थाएं होती हैं, जैसे बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था आदि। इन्हीं अवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए बालकों को शिक्षित किया जाना चाहिए। विकास की विभिन्न अवस्थाओं के ज्ञान के अभाव में बालक एक सी‌ व नीरस शिक्षा प्राप्त करते रहते व अपना सर्वांगीण विकास करने में असमर्थ रहते।

शिक्षा में मनोविज्ञान के समावेश के परिणामस्वरूप अब बालकेंद्रित शिक्षा पर बल दिया जाने लगा है। पाठ्यक्रम का निर्धारण भी बालक को केंद्र बनाकर किया जाता है। आधुनिक मनोवैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली का केंद्र बालक को होना चाहिए। प्राचीन दृष्टिकोण के अनुसार शिक्षा प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु शिक्षक को माना जाता था व छात्र को गौण स्थान प्राप्त था। शिक्षा की समस्त प्रक्रिया शिक्षा के चारों ओर घूमती रहती है परंतु वर्तमान शिक्षा प्रक्रिया छात्र के चारों ओर घूमती है व छात्र के अनुकूल कार्य करती है।

ऐतिहासिक आधार[संपादित करें]

शिक्षाशास्त्र समाज की आवश्यकतानुसार शिक्षा की व्यवस्था करने का कार्य करता है। साथ ही वह समाज की शिक्षा संबंधी समस्याओं का निवारण करने का प्रयत्न करता है। परन्तु वह यह कार्य अकेले संपन्न नहीं कर सकता। अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उपाय व साधन ढूंढने और योजनाएं बनाने में उसे इतिहास के अध्ययन से पर्याप्त सहायता मिलती है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के लिए इतिहास का ज्ञान आवश्यक है। इतिहास के द्वारा ही यह जाना जा सकता है कि पूर्व काल में शिक्षा की क्या व्यवस्था थी और तत्कालीन समाज के लिए यह कहां तक उपयोगी थी। इस प्रकार इतिहास के अध्ययन के द्वारा ही यह ज्ञात हो सकता है कि पूर्व कालीन समाज की शैक्षिक समस्याएं क्या क्या थी। समस्याओं के स्वरूप के अतिरिक्त इतिहास के अध्ययन द्वारा यह भी ज्ञात होता है कि उनके निवास के लिए क्या-क्या प्रयत्न किए गए और उन प्रयत्नो को कहां तक सफलता प्राप्त हुई। पूर्वकालीन पाठ्यक्रम में जो दोष या कमियां थीं उन्हें इतिहास के अध्ययन द्वारा वर्तमान में दोहराने से बचने का प्रयास किया जाता है।

सामाजिक आधार[संपादित करें]

शिक्षा व्यक्ति को सामाजिक प्राणी बनाती है और समाज शिक्षा के लिए आधार प्रस्तुत करता है। अन्य शब्दों में, शिक्षा एवं सामाजिक जीवन की धारणा में गहरा संबंध है। एक के अभाव में दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती है। समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है जो कि समाजशास्त्रीया सिद्धांतों को एवं शिक्षा की समग्र प्रक्रिया को व्यावहारिक रूप देता है। इस प्रक्रिया में पाठ्यक्रम, विषय वस्तु, क्रियाएं, शिक्षालय संगठन, विधियां तथा मूल्यांकन सभी सम्मिलित हैं।

ओटावे के मतानुसार, “शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है।” इसकी विधि और इसके लक्ष्य समाज विशेष की मान्यताओं के अनुसार तय होते हैं। जॉन डेवी ने भी सामाजिक चेतना को शैक्षिक विकास का आधार माना है। ब्राउन ने भी इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कहा है कि समूह की सामाजिक चेतना में व्यक्ति का योगदान शिक्षा व समाज के मिले-जुले प्रयासों के कारण ही संभव है। इस प्रकार स्पष्ट है कि शिक्षा एवं समाजशास्त्र के मध्य गहरा संबंध है। समाजशास्त्र शिक्षाशास्त्र को प्रभावित तत्व प्रदान करता है। इसका कारण है कि समाजशास्त्र में शिक्षा के सामाजिक प्रभावों तथा मनुष्य के जीवन में उसकी गतिशीलता का अध्ययन किया जाता है। दूसरी और शिक्षा शास्त्र में समाज में व शिक्षा के स्वरूप तथा व्यक्तित्व विकास में योगदान आदि कारको का अध्ययन किया जाता है।

सांस्कृतिक आधार[संपादित करें]

समाज की जैसी संस्कृति होती है, उसी के अनुरूप शिक्षा की व्यवस्था की जाती है। संस्कृति के द्वारा उसके समाज की शैक्षिक प्रक्रिया पर्याप्त सीमा तक प्रभावित होती है। संस्कृति द्वारा ही शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम, शिक्षण विधियां, विद्यालय एवं अनुशासन के स्वरूप का निर्धारण होता है। जहां की संस्कृति में धर्म तथा आध्यात्मिक भावना प्रधान होती है, वहां पर शिक्षा शाश्वत मूल्यों की प्राप्ति पर बल देती है। यदि समाज की संस्कृति का स्वरूप भौतिक होता है तो शिक्षा द्वारा भौतिक उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रयास किया जाता है। जिस समाज की कोई संस्कृति नहीं होती उसकी शिक्षा का स्वरूप भी अनिश्चित होता है।

शिक्षा के पाठ्यक्रम को भी संस्कृति अत्यंत प्रभावित करती है क्योंकि समाज की संस्कृति शिक्षा के उद्देश्यों का निर्माण करती है और पाठ्यक्रम इन उद्देश्यों की प्राप्ति का साधन है। अतः पाठ्यक्रम समाज की संस्कृति पर ही आधारित होता है। चूंकि विद्यालय समाज का लघु रूप है। इसलिए समाज में फैली हुई संस्कृति विद्यालयों में दिखाई देती है। इस दृष्टि से विद्यालय समाज की संस्कृति के केंद्र होते हैं।

पाठ्यक्रम निर्माण के सिद्धान्त[संपादित करें]

पाठ्यक्रम निर्माण में दार्शनिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक एवं वैज्ञानिक प्रवृत्तियों के महत्व के आधार पर निम्नलिखित सिद्धांतों का अनुसरण किया जाना चाहिए-- [1]

1. जीवन से संबंधित होने का सिद्धांत

2. शैक्षिक उद्देश्यों से अनुरूपता का सिद्धांत

3. उपयोगिता का सिद्धांत

4. बाल-केन्द्रियता का सिद्धांत

5. रचनात्मक एवं सृजनात्मक शक्तियों के उपयोग का सिद्धांत

6. खेल एवं कार्य की क्रियाओं के अन्तःसंबंध का सिद्धांत

7. संस्कृति एवं सभ्यता के ज्ञान का सिद्धांत

8. व्यक्तिगत भिन्नता एवं लचीलेपन का सिद्धांत

9. अग्रदर्शिता का सिद्धांत

10. अनुभवों की पूर्णता का सिद्धांत

11. उत्तम आचरण के आदर्शों की प्राप्ति का सिद्धांत

12. जीवन संबंधी क्रियाओं एवं अनुभवों के समावेश का सिद्धांत

13. विकास की सतत् प्रक्रिया का सिद्धांत

14. सामुदायिक जीवन से संबंध का सिद्धांत

15. अवकाश के लिए प्रशिक्षण का सिद्धांत

16. जनतन्त्रीय भावना के विकास का सिद्धांत

17. सह-संबंध का सिद्धांत

भारत के माध्यमिक विद्यालयों के वर्तमान पाठ्यक्रम के दोष[संपादित करें]

भारत में माध्यमिक विद्यालयों में आजकल जो पाठ्यक्रम प्रचलित है वह दोषपूर्ण है। माध्यमिक शिक्षा आयोग ने वर्तमान पाठ्यक्रम के निम्नलिखित दोषों की ओर ध्यान दिलाया है-

  • वर्तमान पाठ्यक्रम संकुचित दृष्टिकोण से निर्मित किया गया है।
  • इसमें पुस्तकीय एवं सैद्धान्तिक ज्ञान पर अत्यधिक बल दिया गया है।
  • इसमें महत्वपूर्ण एवं सम्पन्न सामग्री का अभाव है।
  • पाठ्यक्रम की अनावश्यक तथ्यों एवं सूक्ष्म विवरणों से लाद दिया गया है और स्मृति पर बहुत भार पड़ता है।
  • इसमें क्रियात्मक एवं व्यावहारिक कार्यों के लिए अपर्याप्त स्थान है।
  • इसमें बालक की आवश्यकताओं एवं क्षमताओं का ध्यान नहीं रखा गया है। व्यक्तिगत विभिन्नता उपेक्षित है।
  • वर्तमान पाठ्यक्रम में परीक्षाओं का सर्वाधिक महत्व है।
  • देश के आर्थिक एवं औद्योगिक विकास के लिए तकनीकी एवं व्यावसायिक विषय आवश्यक हैं। वर्तमान पाठ्यक्रम में इन विषयों का समावेश नहीं है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]