कशेरुकी जन्तु

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कशेरुकी जन्तु
जीवाश्म काल: 525–0 मिलियन वर्ष
Ordovician - Recent
Fossilized skeleton of Diplodocus, showing an extreme example of the backbone that characterizes the vertebrates
Fossilized skeleton of Diplodocus, showing an extreme example of the backbone that characterizes the vertebrates
वैज्ञानिक वर्गीकरण
अधिजगत: Eukarya
जगत: Animalia
संघ: Chordata
(unranked) Craniata
उपसंघ: Vertebrata
Cuvier, 1812
Groups
कशेरुकी जन्तु

कशेरुकी या कशेरुकदंडी (वर्टेब्रेट, Vertebrate) प्राणिसाम्राज्य के कॉरडेटा (Chordata) समुदाय का सबसे बड़ा उपसमुदाय है। जिसके सदस्यों में रीढ़ की हड्डियाँ (backbones) या पृष्ठवंश (spinal comumns) विद्यमान रहते हैं। इस समुदाय में इस समय लगभग 58,000 प्रजातियाँ वर्णित हैं। इसमें बिना जबड़े वाली मछलियां, शार्क, रे, उभयचर, सरीसृप, स्तनपोषी तथा चिड़ियाँ शामिल हैं। ज्ञात जन्तुओं में लगभग 5% कशेरूकी हैं और शेष अकेशेरूकी।

प्रमुख विशेषताएँ[संपादित करें]

निम्नलिखित गुणोंवाले सभी कॉरडेटा इसमें परिगणित होते हैं :

1. जो करोटि (स्कल, Skull) वाले होते हैं।

2. जिनके वयस्क में नोटोकॉर्ड का स्थान कशेरुकाएँ ले लेती हैं।

3. जिनके मस्तिक की रचना जटिल होती है।

4. जिनका हृदय तीन या चार खंडों में बँटा रहता है।

5. जिनमें शाखांगों के दो जोड़े पखों (फ़िन, क़त्द) या हाथ-पैर के रूप में होते हैं।

6. जिनके शरीर में लाल रक्तकण पाए जाते हैं।

प्रकार[संपादित करें]

कशेरुकदंडी दो प्रकार के हैं : ऐग्नेथा (Agnatha) तथा ग्नेथोस्टोमेटा (Gnathostomata)

ऐग्नेथा[संपादित करें]

ऐग्नेथा की एक ही श्रेणी है–चक्रमुखी (साइक्लोस्टोमेटा, Cyclostomata)। चक्रमुखी प्राणी जबड़े रहित और चूषक मुख (सक्टोरियल माउथ, suctorial mouth) वाले होते हैं जिसमें कादर दाँत लगे रहते हैं। ये जलचर होते हैं। इनकी त्वचा चिकनी और शल्करहित होती है। पंख अयुग्म होते हैं। छह ले लेकर 14 जोड़ी तक गलफड़ होते हैं। कंकाल कास्थिजातिक (calcified) होता है। लैंप्रि (Lamprey) तथा हैग (Hag) मछलियाँ इसके उदाहरण हैं।

ग्नेथोस्टोमेटा[संपादित करें]

ग्नेथोस्टोमेटा कशेरुकदंडी जबड़ेवाले प्राणी हैं। ये पाँच वर्गों में विभक्त हैं, जिनका परिचय निम्नोक्त हैं :

मत्स्य (Pisces)[संपादित करें]

इस श्रेणी में सभी प्रकार की मछलियाँ आती हैं। मछलियाँ जलवासी जीव हैं और गलफड़ों द्वारा श्वसन करती हैं।

गलफड़ जीवन पर्यंत उपस्थित रहते हैं। साधारणतया त्वचा शल्कों से ढकी रहती है। प्रचलन के लिए अंस तथा श्रोणि पख (पेक्टोरल ऐंड पेल्विक फ़िन्स, Pectoral and pelvic fins) और अयुग्म पृष्ठीय (dorsal), औदरिक तथा पुच्छ पंख होते हैं। पंखों में कंकालीय पंखरश्मियाँ होती हैं। इनके अतिरिक्त अधिकतर मछलियों में वातवस्ति (एयर ब्लैडर, air bladder) उपस्थित होती है। हृदय एक अलिंद तथा एक निलय, दो खंडों में बँटा रहता है। इस श्रेणी के उदाहरण शार्क, कतला, रोहू, मृगल, टेंगड़ा, सिंघी तथा केवई इत्यादि मछलियाँ हैं।

उभयचर (ऐंफ़ीबिया, Amphibia)[संपादित करें]

ये मछली तथा उरग दोनों श्रेणियों के बीच के प्राणी हैं, जो जल तथा स्थल दोनों ही पर रह सकते हैं। इनकी त्वचा प्राय: कोमल, नम तथा चिकनी होती है और उसपर किसी प्रकार के शल्क नहीं होते। इनमें अधिकांश अपनी बेंगची (tadpole) अवस्था में गलफड़ों द्वारा ओर वयस्क अवस्था में फुफ्फुसों द्वारा श्वसन करते हैं, किंतु कुछ जीवन पर्यंत गलफड़ों द्वारा ही श्वसन करते हैं। शाखांग कभी पख के रूप में नहीं होते। शाखांग जब वर्तमान होते हैं तो उनकी रचना पंचांगुलिक होती है जो चलने फिरने तथा तैरने के लिए होते हैं तथा उनमें किसी प्रकार के नाखून नहीं होते। हृदय में दो अलिंद और एक निलय होता हैं। इनके जीवन में प्राय: रूपांतरण होता रहता है। इस श्रेणी के उदाहरण सैलामैंडर (Salamander), दादुर, मेढक तथा सिसीलियन हैं।

उरग (रेप्टीलिया, Reptilia)[संपादित करें]

इस श्रेणी के प्राणियों के पैर इतने छोटे होते हैं कि चलते समय ऐसा प्रतीत होता है मानो ये पेट के बल रेंग रहे हों। उरग शीतरक्तीय कशेरुकदंडी हैं। इनकी त्वचा श्रृंगी (horny) शल्कों से ढकी रहती है और कुछ में इन शल्कों के स्थान पर श्रृंगी या अस्थि पट्टिकाएँ होती हैं। हृदय में दो अलिंद और अपूर्ण रूप से, दाएँ तथा बाएँ में विभाजित, निलय होता है, किंतु मगरमच्छ में निलय पूर्ण रूप से दो खंडों में बँटा रहता है। इस श्रेणी में छिपकलियाँ, गिरगिट, साँप, कछुए, मगरमच्छ तथा नक्र इत्यादि आते हैं।

पक्षी (एवीज़ Aves)[संपादित करें]

इस श्रेणी में वे जंतु सम्मिलित हैं जिन्हें हम पक्षी कहते हैं। ये उष्णरक्तीय दो पैरोंवाले जंतु होते हैं। इनका शरीर परों से ढँका रहता है। अग्रशाखांग डैनों में परिवर्तित होते हैं। ऊर्ध्व तथा अधोहन्विकाएँ मिलकर चोंच बनाती हैं, जो एक श्रृंगी छाद (Horny sheath) से ढकी रहती है। इन्हें दाँत नहीं होते। हृदय पूर्ण रूप से चतुष्कोष्ठीय (दो अलिंद तथा दो विलय) होता है। इस श्रेणी के अंतर्गत सभी प्रकार की चिड़ियाँ, जैसे कौवे, गौरैवा, चील, बाज, मुर्गा, बत्तख, शुतुरमुर्ग, नीलकंठ, कोयल, मोर, बुलबुल इत्यादि आते हैं।

स्तनधारी (मैमेलिया, Mammalia)[संपादित करें]

इस श्रेणी में वे कशेरुकदंडी जंतु आते हैं जिनकी मादा स्तनोंवाली होती हैं। बच्चों के पोषण के लिए स्तनों से दूध स्रावित होता है। नर में वृषण अंडकोश में स्थित होते हैं। इनके अतिरिक्त स्तनधारियों के शरीर पर बाल पाए जाते हैं; शरीर के मध्य अनुप्रस्थ दिशा में फैला हुआ एक महापट (डायफ्ऱाम, diaphragm) हृदय चतुष्कोठीय तथा कान का बाहरी छिद्र कर्णशुष्कुली से ढका होता है। ये उष्णरक्तीय तथा वायुश्वसनीय प्राणी हैं। इनके लाल रक्तकणों में केंद्रक का अभाव होता है। साधारणतया बच्चे पूर्ण विकसित अवस्था में ही मादा के शरीर से बाहर निकलते हैं। इस श्रेणी के उदाहरण वनचोंचा, चींटोखोर, कंगारू, बकरी, भेड़, गाय, भैंस, कुता, सियार, भालू, शेर, हाथी, ह्वेल, खरगोश, गिलहरी, बंदर तथा मनुष्य इत्यादि हैं।