अनूप संस्कृत लाइब्रेरी

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बीकानेर का 'लालगढ़', महल- जहाँ 'अनूप संस्कृत पुस्तकालय' भी है

वर्तमान में नैणसी की ख्यात की सबसे प्राचीन प्रतिलिपि अनुप संस्कृत पुस्तकालय (बीकानेर ) में उपलब्ध है।


अनूप संस्कृत लाइब्रेरी[संपादित करें]

बीकानेर के तत्कालीन महाराजा अनूपसिंह (1669-1698 ई.) [[1]]द्वारा अपने संकलन की पांडुलिपियों और निजी पुस्तकालय की पुस्तकों से आरम्भ किया गया[[2]] लालगढ़ पेलेस, बीकानेर में अवस्थित एक अनूठा पुस्तक-केंद्र, जिसमें अनेकानेक ग्रंथों और पांडुलिपियों का व्यवस्थित संकलन है।[[3]]

पुस्तकालय के कर्णधार[संपादित करें]

महाराजा अनूपसिंह को औरंगजेब ने औरंगाबाद का शासक नियुक्त किया था।[[4]] वीर होने के साथ-साथ वह स्वयं विद्वान व संगीतज्ञ भी थे और बड़े पुस्तक-प्रेमी थे।[[5]] उन के दरबार में भाव भट्ट जैसे संगीतज्ञ और कई विद्वान आश्रय पाते थे। इनके आश्रय में रहकर तत्कालीन चित्रकारों ने एक मौलिक किंतु स्थानीय परिमार्जित चित्रशैली बीकानेर कलम को जन्म दिया। [[6]] यह पुस्तकालय उन्हीं अनूप सिंह [[7]]के नाम पर है।

अनूपसिंह का योगदान[संपादित करें]

महाराज अनूपसिंह (1669-1698 ई.) के बारे में लिखा गया है [[8]]-..."महाराजा अनूपसिंह वीर, कूटनीतिज्ञ और विद्यानुरागी शासक था। उसने 'अनूपविवेक', 'कामप्रबोध', 'श्राद्धप्रयोग चिन्तामणि' और 'गीतगोविन्द' पर ‘अनूपोदय’ टीका लिखी थी। उसे संगीत से प्रेम था। उसने दक्षिण में रहते हुए अनेक ग्रंथों को नष्ट होने से बचाया और उन्हें खरीदकर अपने पुस्तकालय के लिए ले आया। कुम्भा के संगीत ग्रंथों का पूरा संग्रह भी उसने एकत्र करवाया था। आज अनूप पुस्तकालय (बीकानेर) अलभ्य पुस्तकों का भण्डार है, जिसका श्रेय अनूपसिंह के विद्यानुराग को है। दक्षिण में रहते हुए उसने अनेक मूर्तियों का (भी) संग्रह किया और उन्हें नष्ट होने से बचाया। मूर्तियों का यह संग्रह बीकानेर के ‘‘तैतीस करोड़ देवताओं के मंदिर’’ में सुरक्षित है।..."

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]