सिकंदर महान
| सिकंदर महान | |
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| बैसिलेयस ऑफ मैसेडोन, हेगेमॉन ऑफ द हैलेनिक लीग, मिस्र का फैरो, फारस का शहंशाह | |
| पेरिस के लोवो संग्रहालय में रखी सिकंदर की प्रतिमा | |
| शासन | 336–323 ई पू |
| पूर्वाधिकारी | फिलिप द्वितीय, मैसेडोन |
| उत्तराधिकारी | सिकंदर चतुर्थ, मैसेडोन |
| जीवनसाथी | रुखसाना, बैक्ट्रिया , स्ट्रैटेयरा द्वितीय |
| संतान | |
| सिकंदर चतुर्थ, मैसेडोन | |
| पिता | फिलिप द्वितीय, मैसेडोन |
| माता | ओलंपियाज़ |
| Born | २० जुलाई, ३२६ ई पू पेला, मैसेडोन , यूनान |
| मृत्यु | १० या ११ जून, ३२३ ई पू बेबीलोन |
सिकंदर (२० जुलाई, ३५६ ईसापूर्व से ११ जून ३२३ ईसा पूर्व) मकदूनियाँ, (मेसेडोनिया) का ग्रीक प्रशासक था। वह एलेक्ज़ेंडर तृतीय तथा एलेक्ज़ेंडर मेसेडोनियन नाम से भी जाना जाता है। इतिहास में वह सबसे कुशल और यशस्वी सेनापति माना गया है। अपनी मृत्यु तक वह उस तमाम भूमि को जीत चुका था जिसकी जानकारी प्राचीन ग्रीक लोगों को थी। इसीलिए उसे विश्वविजेता भी कहा जाता है। उसने अपने कार्यकाल में इरान, सीरिया, मिस्र, मसोपोटेमिया, फिनीशिया, जुदेआ, गाझा, बॅक्ट्रिया और भारत में पंजाब तक के प्रदेश पर विजय हासिल की थी। उल्लेखनीय है कि उपरोक्त क्षेत्र उस समय फ़ारसी साम्राज्य के अंग थे और फ़ारसी साम्राज्य सिकन्दर के अपने साम्राज्य से कोई ४० गुना बड़ा था। फारसी में उसे एस्कंदर-ए-मक्दुनी (मॅसेडोनिया का अलेक्ज़ेंडर) औऱ हिंदी में सिकंदर महान कहा जाता है।
जीवन
सिकन्दर के पिता का नाम फिलीप था। 329 ई. पू. में अपनी पिता की मृत्यु के उपरान्त वह सम्राट बना। वह बड़ा शूरवीर और प्रतापी सम्राट था। वह विश्वविजयी बनना चाहता था। सिकन्दर ने सबसे पहले ग्रीक राज्यों को जीता और फिर वह एशिया माइनर (आधुनिक तुर्की) की तरफ बढ़ा। उस क्षेत्र पर उस समय फ़ारस का शासन था। फ़ारसी साम्राज्य मिस्र से लेकर पश्चिमोत्तर भारत तक फैला था। फ़ारस के शाह दारा तृतीय को उसने तीन अलग-अलग युद्धों में पराजित किया। हँलांकि उसकी तथाकथित "विश्व-विजय" फ़ारस विजय से अधिक नहीं थी पर उसे शाह दारा के अलावा अन्य स्थानीय प्रांतपालों से भी युद्ध करना पड़ा था। मिस्र, बैक्ट्रिया, तथा आधुनिक ताज़िकिस्तान में स्थानीय प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था। सिकन्दर भारतीय अभियान पर ३२७ ई. पू. में निकला। ३२६ ई. पू. में सिन्धु पार कर वह तक्षशिला पहुँचा।[1] वहाँ के राजा आम्भी ने उसकी अधिनता स्वीकार कर ली। पश्चिमोत्तर प्रदेश के अनेक राजाओं ने तक्षशिला की देखा देखी आत्म समर्पण कर दिया। वहाँ से पुरू के राज्य की तरफ बढ़ा जो झेलम और चेनाब नदी के बीच बसा हुआ था। युद्ध में पुरू पराजित हुआ परन्तु उसकी वीरता से प्रभावित होकर सिकन्दर ने उसे अपना मित्र बनाकर उसे उसका राज्य तथा कुछ नए इलाके दिए। यहाँ से वह व्यास नदी तक पहुँचा, परन्तु वहाँ से उसे वापस लौटना पड़ा। उसके सैनिक मगध के नन्द शासक की विशाल सेना का सामना करने को तैयार न थे। वापसी में उसे अनेक राज्यों (शिवि, क्षुद्रक, मालव इत्यादि) का भीषण प्रतिरोध सहना पड़ा। ३२५ ई. पू. में भारतभुमि छोड़कर सिकन्दर बेबीलोन चला गया।
संदर्भ
- ↑ सिंह, सुरेन्द्र प्रताप (जुलाई २००८). नव भारत इतिहास. कोलकाता: नालन्दा साहित्य सदन.