सदाशिवराव भाऊ

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सदाशिवराव भाऊ (4 अगस्त 1730 – 20 जनवरी 1761) मराठा सेना के सेनानायक थे। उन्के पिता चिमनाजी अप्पा एवं माता राखमबाई थीं।

वाजीराव पेशवा के भाई चिमनाजी अप्पा के पुत्र सदाशिवाराव भाऊ को देशी राज्यों के विरुद्ध सैनिक सफलताओं के कारण असाधारण सेनानी समझा गया और पानीपत में मराठों की भीषण पराजय का आवश्यकता से अधिक दोषी भी। अनुकूल प्रकृति होते हुए भी महत्वकांक्षी और स्पष्टवादी होने से, वह अधिकतर लालची, घमंडी और हठी ठहराया गया। रामचंद्र बाबा की दीक्षा और प्रेरणा से भाऊ ने शासनप्रबंध में असाधरण दक्षता प्राप्त की; किंतु वही भाऊ और पेशवा में मनोमालिन्य बढ़ाने का भी कारण बना।

भाऊ का प्रथम महत्वपूर्ण कार्य पश्चिमी कर्नाटक में मराठा आधिपत्य स्थापित करना था (1746)। फिर, विद्रोही यामाजी शिवदेव को पराजित कर उसने संगोला का किला हस्तगत किया (1750)। यहाँ, रामचंद्र बाबा की प्रेरणा से नई योजना कार्यान्वित कर, उसने मराठा शासन में वैधानिक क्रांति स्थापित कर दी। किंतु भाऊ के कुछ कार्यो को अपने स्वत्वाधिकारों का अपहरण समझ पेशवा उससे और बाबा से रुष्ट हो गया। तब बाबा से प्रोत्साहित हो भाऊ ने पेशवा से शासनसंचालन का पूर्णाधिकार माँगा, वही पद जो विगत पेशवा के समय से उसके पिता का था। पेशवा की अस्वीकृति पर भाऊ ने कोल्हापुर के राजा के पेशवापद को ग्रहण करने की धमकी दी। किंतु अंतत: महादोवा पुरंदरे के पदत्याग के कारण दोनों में समझौता हो गया, जिससे महाराष्ट्र में गृहयुद्ध की आशंका टल गई। 1751 से 1759 तक, यद्यपि भाऊ ने पेशवा के साथ कुछ सफल सैनिक अभियानों में भाग लिया, किंतु मुख्यत: उसका कार्यक्षेत्र शासनप्रबंध ही रहा, जिसमें उसने पूर्ण योग्यता का परिचय दिया। 1760 भाऊ की ख्याति का चरमोत्कर्ष था, जब ऊदगिर के युद्ध में निजाम को पूर्णरूपेण परास्त कर उसने महाराष्ट्र साम्राज्य का सीमाविस्तार किया। किंतु तभी महाराष्ट्र के भावी अनिष्ट की पूर्वसूचना के रूप में पेशवा को अहमदशाह दुर्रानी के हाथों बरारघाट में दत्ताजी सिंधिया की पराजय और मृत्यु के समाचार प्राप्त हुए। तब पेशवा ने अपने भाई रघुनाथराव की अपेक्षा भाऊ को दुर्रानी का गतिरोध करने के लिए सेनापति नियुक्त किया। 2 अगस्त को भाऊ ने दिल्ली पर अधिकार किया। 10 अक्टूबर को शाह आलम को दिल्ली का सम्राट् घोषित किया। फिर, 17 अक्टूबर को कुंजपुरा विजय कर, 31 अक्टूबर को वह पानीपत पहुँच गया। 4 नवम्बर को विपक्षी सेनाएँ आमने सामने खड़ी हो गईं। प्राय: ढाई महीने की मोर्चाबंदी के बाद, 14 जनवरी 1761 के दिन समूचे भारतीय इतिहास के घोरतम युद्धों में से एक, पानीपत का युद्ध प्रारंभ हुआ। सैनिक योग्यता में दुर्रानी से निम्नतर होने के अतिरिक्त भाऊ निस्संदेह प्रतिकूल परिस्थितियों से विवश हो गया था। इस भीषण युद्ध में नानासाहब पेशवा के पुत्र विश्वासराव तथा भाऊ के अतिरिक्त अनेक मुख्य सामंतों के साथ प्राय: एक लाख मराठा सैनिक तथा असैनिक खेत रहे। कुछ समय पश्चात् एक व्यक्ति ने भाऊ होने का छद्म रचा, किंतु अपराध प्रमाणित होने पर उसे मृत्युदंड दे दिया गया।