संगठनात्मक विकास

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

संगठनात्मक विकास (OD) किसी संगठन की प्रभावकारिता और व्यावहारिकता को बढ़ाने के लिये एक नियोजित, संगठन-स्तरीय प्रयास होता है। वॉरेन बेनिस (Warren Bennis) ने OD का उल्लेख परिवर्तन के प्रति एक प्रतिक्रिया, एक जटिल शिक्षात्मक रणनीति के रूप में किया है, जिसका उद्देश्य संगठन के विश्वासों, दृष्टिकोणों, मूल्यों और संरचना को बदलना होता है, ताकि उन्हें नई प्रौद्योगिकियों, विपणन और चुनौतियों, तथा स्वतः परिवर्तन की आश्चर्यचकित कर देने वाली दर के साथ बेहतर ढंग से अनुकूलित किया जा सके. OD न तो "किसी संगठन को बेहतर बनाने के लिये की गई कोई गतिविधि है", न ही यह "संगठन का प्रशिक्षण कार्य है"; यह एक विशिष्ट प्रकार का अंतिम परिणाम प्राप्त करने के लिये एक विशिष्ट प्रकार की परिवर्तन प्रक्रिया है। OD में व्यवहारात्मक विज्ञान की जानकारी का प्रयोग करते हुए संगठन की "प्रक्रियाओं" में हस्तक्षेप करना[1] तथा साथ ही संगठनात्मक प्रतिबिंब, प्रणाली सम्मिलन, नियोजन व स्वतः विश्लेषण शामिल हो सकता है।

मुख्यतः कर्ट लेविन (Kurt Lewin) (1898-1947) को OD का संस्थापक जनक माना जाता है, हालांकि 1950 के दशक के मध्य में इस अवधारणा के प्रचलित होने से पूर्व ही उनकी मृत्यु हो चुकी थी। लेविन से समूह-गतिविज्ञान और कार्यवाही-अनुसंधान के विचार प्राप्त हुए जो बुनियादी OD प्रक्रिया को मज़बूती देते हैं और साथ ही इसके लिये सहयोगपूर्ण परामर्श/उपभोक्ता लोकाचार भी प्रदान करते हैं। संस्थागत रूप से, लेविन ने MIT में "रिसर्च सेंटर फॉर ग्रुप डाइनामिक्स (Research Center for Group Dynamics)" की स्थापना की, जो उनकी मृत्यु के बाद मिशिगन स्थानांतरित कर दिया गया। RCGD सहकर्मी उन लोगों में से थे, जिन्होंने नैशनल ट्रेनिंग लैबोरेटरीज़ (National Training Laboratories)(NTL) की स्थापना की, जिससे T-समूह और समूह-आधारित OD का जन्म हुआ। UK में, टैवीस्टॉक इन्स्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन रिलेशन्स (Tavistock Institute of Human Relations) प्रणाली सिद्धांतों को विकसित करने में महत्वपूर्ण था। संयुक्त TIHR पत्रिका ह्यूमन रिलेशन्स (Human Relations) इस क्षेत्र में एक प्रारंभिक पत्रिका थी। अब द जर्नल ऑफ अप्लाइड बिहेवियरल साइंसेज़ (The Journal of Applied Behavioral Sciences) इस क्षेत्र की शीर्ष पत्रिका है।

"संगठन विकास" शब्दावली का प्रयोग अक्सर संगठनात्मक प्रभावकारिता के साथ विनिमेयता के अनुसार किया जाता है, विशेषतः जब इसका प्रयोग एक संगठन के भीतर किसी एक विभाग के नाम के रूप में किया जा रहा हो. संगठन विकास एक प्रगितीशील क्षेत्र है, जो सकारात्मक वयस्क विकास (Positive Adult Development) सहित अनेक नई विचारधाराओं के प्रति प्रतिक्रियाशील है।

परिदृश्य[संपादित करें]

संगठन, जिसे एक अथवा अधिक साझा लक्ष्य (यों) की प्राप्ति के लिये कार्यरत दो या ज्यादा लोगों के रूप में परिभाषित किया जाता है, की अवधारणा OD के मूल में है। इस संदर्भ में विकास यह धारणा है कि समय बीतने पर एक संगठन अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में अधिक प्रभावी बन सकता है।

OD संगठन की समस्या-निवारण और पुनर्नवीनीकरण प्रक्रियाओं को, विशिष्टतः संगठनात्मक संस्कृति के अधिक प्रभावी और सहयोगपूर्ण प्रबंधन के द्वारा, अक्सर किसी परिवर्तन कारक या उत्प्रेरक की सहायता से तथा प्रायोगिक व्यवहारात्मक विज्ञान की प्रौद्योगिकी एवं सिद्धांत का प्रयोग करके, सुधारने के लिये लंबी दूरी का एक प्रयास है। हालांकि व्यवहारात्मक विज्ञान ने संगठनात्मक विकास के अध्ययन और प्रयोग के लिये बुनियादी आधार प्रदान किया है, लेकिन अध्ययन के नए और उभरते हुए क्षेत्रों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज की है। प्रणाली चिंतन, नेतृत्व अध्ययनों, संगठनात्मक नेतृत्व और संगठनात्मक अभ्यास (ये कुछ नाम हैं) के विशेषज्ञ, जिनका दृष्टिकोण केवल व्यवहारात्मक विज्ञान में बंधा नहीं है, बल्कि एक अत्यधिक बहु-अनुशासनिक और अंतः-अनुशासनिक विधि तक फैला हुआ है, OD उत्प्रेरकों के रूप में उभरे हैं। ये नए विशेषज्ञ दृष्टिकोण संगठन को एक अनेक प्रणालियों के एक पूर्णतावादी परस्पर प्रभाव के रूप में देखते हैं, जिसका प्रभाव संपूर्ण संगठन की प्रक्रियाओं और परिणामों पर पड़ता है। अधिक महत्वपूर्ण रूप से, परिवर्तन कारक या उत्प्रेरक शब्दावली किसी ऐसा नेता के विचार के समानार्थी है, जो नेतृत्व, एक रूपांतरणकारी या प्रभावकारिता प्रक्रिया, में सम्मिलित है, प्रबंधन के विपरीत, जो कि एक अधिक वृद्धिशील एवं दक्षता आधारित परिवर्तन क्रियाविधि है।

संगठन विकास "एक परिवर्तन कारक तथा एक प्रायोजक संगठन, जो संगठनात्मक प्रदर्शन में वृद्धि तथा स्वयं को सुधारने की संगठन की क्षमता में सुधार के लिये एक सिस्टम के संदर्भ में प्रायोगिक व्यवहारात्मक विज्ञान का प्रयोग करके तथा या अन्य संगठनात्मक परिवर्तन दृष्टिकोण का प्रयोग करने के उद्देश्य से एक साथ आते हैं, के बीच एक अनुबंधात्मक संबंध " है।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

किसी संगठन में प्रभावी परिवर्तन को क्रियान्वित करने के लिये संगठन विकास एक निरंतर चलनेवाली, व्यवस्थित प्रक्रिया है। संगठन विकास को संगठनात्मक परिवर्तन की समझ और प्रबंधन पर केंद्रित प्रायोगिक व्यवहारात्मक विज्ञान तथा वैज्ञानिक अध्ययन और अन्वेषण दोनों के एक क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। इसका स्वरूप अंतःअनुशासिक होता है और यह समाजशास्र, मनोविज्ञान और प्रेरणा, अभ्यास और व्यक्तित्व के सिद्धांतों को विकसित करता है।

अनुबंधात्मक संबंध[संपादित करें]

हालांकि न तो प्रायोजक संगठन और न ही परिवर्तन कारक सुलझाई जा रही समस्या या समस्याओं के यथार्थ स्वरूप के प्रति शुरु से ही सुनिश्चित हो सकते हैं और न ही इस बात के प्रति सुनिश्चित हो सकते हैं कि परिवर्तन कारकों की सहायता की आवश्यकता कब तक पड़ेगी, लेकिन इन मसलों पर किसी परीक्षणात्मक समझौते पर पहुंचना आवश्यक होता है। सामान्यतः प्रायोजक संगठन को यह जानने की आवश्यकता होती है कि परिवर्तन कारक की प्राथमिक योजना क्या है, कार्यक्रम के उत्तरदायित्व और व्यक्तिगत प्रतिबद्धताओं के संबंध में उसकी स्वयं की प्रतिबद्धताएं क्या हैं और परिवर्तन कारक का शुल्क कितना होगा. परिवर्तन कारक को अनिवार्य रूप से स्वयं यह सुनिश्चित करना चाहिए कि परिवर्तन के प्रति संगठन की और विशिष्टतः वरिष्ठ प्रबंधन की प्रतिबद्धता कार्यक्रम की सफलता के लिये आवश्यक स्व-विश्लेषण और व्यक्तिगत सहभागिता का समर्थन करने हेतु पर्याप्त रूप से मज़बूत है। सामान्यतः दोनों ओर उपस्थित अनिश्चितताओं को देखते हुए, किसी भी पक्ष को किसी भी समय अनुबंध से बाहर निकलने की अनुमति देने वाला एक समापन समझौता भी शामिल किया जाता है।[2]

परिवर्तन कारक[संपादित करें]

यहां परिवर्तन कारक शब्दावली का प्रयोग लेखांकर, उत्पादन या वित्त जैसे किसी कार्यात्मक क्षेत्र के तकनीकी विशेषज्ञ के अर्थ में नहीं किया गया है। वह एक व्यवहारात्मक वैज्ञानिक होता है, जो यह जानता हो कि किसी संगठन में लोगों को उनकी स्वयं की समस्याओं को सुलझाने के लिये किस प्रकार तैयार करना है। उसकी मुख्य शक्ति मानवीय व्यवहार के गहन ज्ञान में निहित होती है, जिसका समर्थन अनेक मध्यवर्ती तकनीकों द्वारा किया जाता है (जिनकी चर्चा बाद में की जाएगी). परिवर्तन कारक संगठन के बाहर या भीतर का कोई व्यक्ति हो सकता है। एक आंतरिक परिवर्तन कारक सामान्यतः कर्मचारियों के समूह में से ही कोई व्यक्ति होता है, जिसे व्यवहारात्मक विज्ञान में तथा OD की मध्यवर्ती प्रौद्योगिकी में विशेषज्ञता प्राप्त हो. बैकहार्ड ने अनेक मामलों का उल्लेख किया है, जिनके अनुसार लोगों को OD का प्रशिक्षण दिया जाता रहा है और वे अपने संगठनों में लौटकर परिवर्तन कार्यों को पूर्ण करने में सफल रहे हैं।[3] संगठन में परिवर्तन क्रियाविधि के स्वाभाविक विकास में, यह एक आदर्श व्यवस्था वाली विधि प्रतीत होगी. निपुण परिवर्तन कारक कुछ विश्वविद्यालयों के संकायों में ढूंढे जा सकते हैं, या वे नैशनल ट्रेनिंग लैबोरेटरीज़ फॉर अप्लाइड बिहेवियरल साइंस (National Training Laboratories Institute for Applied Behavioral Science) (वॉशिंगटन DC) यूनिवर्सिटी एसोसिएट्स (University Associates) (सैन डिएगो, कैलिफोर्निया), डिपार्टमेंट ऑफ अप्लाइड ह्यूमन साइंसेज़ (Department of Applied Human Sciences) (कॉन्कॉर्डिया विश्वविद्यालय, मॉन्ट्रियल, कनाडा) में ह्यूमन सिस्टम्स इंटर्वेंशन (Human systems Intervention) स्नातक कार्यक्रम, नैविटस (प्राइवेट) लिमिटेड (Navitus (Pvt) Limited) (पाकिस्तान) और अन्य समान संगठनों से जुड़े निजी सलाहकार हो सकते हैं।

परिवर्तन कारक संगठन का कोई कर्मचारी या पंक्ति सदस्य हो सकता है, जिसने OD सिद्धांत और तकनीक का अध्ययन किया हो. ऐसी स्थिति में, "अनुबंधात्मक संबंध" एक आंतरिक समझौता होता है, जो संभवतः शुल्क के अतिरिक्त इसमें शामिल अन्य सभी स्थितियों के संदर्भ में स्पष्ट होना चाहिए.

प्रायोजक संगठन[संपादित करें]

OD कार्यक्रम की पहल किसी ऐसे संगठन द्वारा की जाती है, जिसमें कोई समस्या हो. इसका अर्थ यह है कि वरिष्ठ प्रबंधन को या वरिष्ठ प्रबंधन द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति को इस बात की जानकारी है कि कोई समस्या उपस्थित है और उसने इसे सुलझाने के लिये सहायता मांगने का निर्णय लिया है। यह मनोचिकित्सा के प्रयोग का एक प्रत्यक्ष उदाहरण है: उपभोक्ता या मरीज़ को उसकी समस्याओं के हल को ढूंढने में सहायता मांगने के लिये अनिवार्य रूप से एक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए. यह उपभोक्ता संगठन के स्तर पर सहायता को स्वीकार करने की इच्छा की ओर सूचित करता है और संगठन को अश्वासन देता है कि प्रबंधन सक्रिय रूप से चिंतित है।[2]

प्रायोगिक व्यवहारात्मक विज्ञान[संपादित करें]

OD की एक मुख्य विशेषता, जो इसे अधिकांश अन्य सुधारात्मक कार्यक्रमों से अलग करती है, वह यह है कि यह एक "सहायतापूर्ण संबंध" पर आधारित है। कुछ लोग मानते हैं कि परिवर्तन कारक संगठन की बीमारियों का उपचार करनेवाला कोई चिकित्सक नहीं है; वह 'मरीज़' का परीक्षण नहीं करता, किसी रोग का निदान नहीं करता और कोई नुस्खा नहीं लिखता. न ही वह संगठन के सदस्यों को ज्ञान के किसी नए भण्डार की शिक्षा देने का प्रयास करता है, जिसे वे बाद में कार्य-स्थिति पर स्थानांतरित करते हों. परिवर्तन कारक का मुख्य कार्य औद्योगिक/संस्थानात्मक मनोविज्ञान, औद्योगिक समाजशास्र, संवाद, सांस्कृतिक मानव-विज्ञान, प्रशासनिक सिद्धांत, संगठनात्मक व्यवहार, अर्थशास्र और राजनीति विज्ञान जैसे व्यवहारात्मक शास्रों से प्राप्त किये गये सिद्धांतों और विधियों का प्रयोग करके संगठन को उसकी समस्याओं को परिभाषित करने और सुलझाने में सहायता प्रदान करना है। इसमें प्रयुक्त बुनियादी विधि को कार्यवाही अनुसंधान (Action Research) कहा जाता है। यह विधि, जिसका वर्णन बाद में किया गया है, समस्या की एक प्राथमिक पहचान, डेटा संग्रहण, उपभोक्ता को दिये गये डेटा का फीडबैक, उपभोक्ता समूह द्वारा डेटा अन्वेषण, डेटा पर आधारित कार्य नियोजन तथा कार्यवाही से मिलकर बनती है।[4]

सिस्टम संदर्भ[संपादित करें]

OD एक सकल तंत्र- प्रासंगिक वातावरण सहित एक संपूर्ण संगठन- के साथ अथवा एक सकल तंत्र के संदर्भ में एक या अनेक उपतंत्रों- विभागों या कार्यदलों- से संबंधित होता है। तंत्रों के भागों, उदाहरणार्थ, व्यक्तियों, गुटों, संरचनाओं, नियमों, मूल्यों और उत्पादों पर पृथक रूप से विचार नहीं किया जाता; अंतर्निर्भरता के सि्द्धांत, अर्थात् प्रणाली के एक भाग में परिवर्तन अन्य भागों को प्रभावित करता है, की पूरी तरह पहचान की जाती है। इस प्रकार, OD हस्तक्षेप संगठनों की सकल संस्कृति और सांस्कृतिक प्रक्रियाओं पर केंद्रित होते हैं। समूहों पर भी ध्यान केंद्रित किया जाता है क्योंकि संगठनों और समूहों में व्यक्तियों का प्रासंगिक व्यवहार सामान्यतः व्यक्तित्व के बजाय सामूहिक प्रभाव का परिणाम होता है।[2]

उन्नत संगठनात्मक प्रदर्शन[संपादित करें]

अपनी आंतरिक और बाह्य कार्यात्मकता और संबंधों कि संभालने की संगठन की क्षमता को सुधारना OD का उद्देश्य है। इसमें व्यक्तियों व समूहों के बीच उन्नत अंतःप्रक्रियाएं, अधिक प्रभावी संवाद, संगठन की सभी प्रकार की समस्याओं का सामना कर पाने की क्षमता में सुधार, अधिक प्रभावी निर्णय प्रक्रियाएं, अधिक उपयुक्त नेतृत्व शैली, विनाशात्मक विवाद से निपटने में उन्नत कौशल और संगठन के सदस्यों के बीच आपसी विश्वास और सहयोग के उच्च-स्तर आदि जैसी बातें शामिल होती हैं। ये उद्देश्य मनुष्य के स्वभाव के एक आशावादी दृष्टिकोण पर आधारित एक मूल्य-तंत्र से निकलते हैं, जिसके अनुसार- एक समर्थक वातावरण में व्यक्ति विकास और उपलब्धि के उच्चतर स्तरों को प्राप्त कर पाने में सक्षम होता है। वैज्ञानिक विधि- अन्वेषण, कारणों की गहन छानबीन, अनुमानों का प्रयोगात्मक परीक्षण और परिणामों की समीक्षा- संगठन के विकास और प्रभावकारिता के लिये आवश्यक हैं।

संगठनात्मक स्व-नवीनीकरण[संपादित करें]

उपभोक्ता संगठन को उपकरणों, व्यवहारों, दृष्टिकोणों का एक समुच्चय और अपने स्वयं के स्वास्थ्य की निगरानी करने और अपने स्वयं के पुनर्नवीनीकरण और विकास की ओर सुधारात्मक कदम बढ़ाने के लिये एक कार्ययोजना प्रदान करके "उन्हें स्वयं अपना कार्य करने देना" OD पेशेवरों का अंतिम लक्ष्य होता है। यह एक नियामक और सुधारात्मक क्रियाविधि के रूप में फीडबैक का प्रयोग करने की सिस्टम अवधारणा के सुसंगत होता है।[2]

प्रारंभिक विकास[संपादित करें]

कर्ट लेविन ने संगठन विकास को इसका वर्तमान स्वरूप प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. द्वितीय विश्व-युद्ध के दौरन, लेविन ने एक सहयोगपूर्ण परिवर्तन प्रक्रिया (जिसमें एक उपभोक्ता समूह एवं सलाहकार के रूप में वे स्वयं शामिल थे) को लेकर एक प्रयोग किया, जो नियोजन, कार्यवाही तथा परिणामों के मापन की तीन चरणों वाली एक प्रक्रिया पर आधारित था। यह कार्य अनुसंधान, जो कि OD का एक महत्वपूर्ण तत्व है, का पूर्ववर्ती था, जिसकी चर्चा बाद में की जाएगी. इसके बाद लेविन प्रयोगशाला प्रशिक्षण या T-समूहों की स्थापना में शामिल हुए और 1947 में उनकी मृत्यु के बाद उनके निकट सहायकों ने यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन (University of Michigan) में सर्वेक्षण-अनुसंधान विधियों को विकसित करने में सहायता प्रदान की. नैशनल ट्रेनिंग लैबोरेटरीज़ और पूरे देश में बढ़ती हुई संख्या में विश्वविद्यालयों एवं निजी सलाहकार संस्थाओं में इस क्षेत्र का विकास जारी रहने के कारण ये विधियां OD की महत्वपूर्ण भाग बन गई

अपने प्रारंभिक आश्वासनों की पूर्ति कर पाने में ऑफ-साइट प्रयोगशाला प्रशिक्षण की विफलता OD के विकास को प्रोत्साहित करनेवाली महत्वपूर्ण शक्तियों में से एक थी। प्रयोगशाला प्रशिक्षण किसी कार्यरत प्रशिक्षण समूह के सदस्य के रूप में एक व्यक्ति के "यहां और अभी" अनुभव के द्वारा सीखने की प्रक्रिया है। सामान्यतः ऐसे समूह किसी निर्धारित कार्यक्रम के बिना मिलते हैं। किसी अस्पष्ट काल्पनिक स्थिति के प्रति सदस्यों की सहज "यहां और अभी" प्रतिक्रियाओं के द्वारा उन्हें स्वयं के बारे में सिखाना इनका उद्देश्य होता है। ऐसे समूहों में नेतृत्व, संरचना, अवस्था, संवाद और स्व-सेवा व्यवहार की समस्याएं विशिष्ट रूप से उत्पन्न होती हैं। सदस्यों को स्वयं के बारे में कुछ सीखने और श्रवण, दूसरों का अवलोकन करने और समूह के प्रभावी सदस्यों के रूप में कार्य करने का एक अवसर मिलता है।[5]

जैसा कि पहले पालन किया जाता था (और विशेष उद्देश्यों के लिये आज भी कभी-कभी पालन किया जाता है), प्रयोगशाला प्रशिक्षण "अजनबी समूहों" में या विभिन्न संगठनों, परिस्थितियों और पृष्ठभूमियों से आने वाले व्यक्तियों से मिलकर बने समूहों के बीच किया जाता था। हालांकि इन "अजनबी प्रयोगशालाओं" से प्राप्त इस ज्ञान को "घर लौटने पर" वास्तविक स्थितियों में स्थानांतरित करने में एक बड़ी समस्या उत्पन्न हुई. इसके लिये दो विभिन्न संस्कृतियों, T-समूह (या प्रशिक्षण समूह) के एक अपेक्षाकृत सुरक्षित और रक्षात्मक वातावरण और अपने पारंपरिक मूल्यों के साथ संगठनात्मक वातावरण के लेन-देन, के बीच एक स्थानांतरण की आवश्यकता थी। इसने इस प्रकार के प्रशिक्षण के प्रारंभिक प्रवर्तकों को इसे "परिवार समूहों"- अर्थात् एक ही संगठन के भीतर स्थित समूहों- पर लागू करने हेतु प्रेरित किया। प्रशिक्षण स्थल के स्थान में परिवर्तन और इस बात का बोध हो जाने पर कि संस्कृति किसी समूह के सदस्यों को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है, (और साथ ही व्यवहारात्मक शास्रों में कुछ अन्य विकासों के साथ) संगठन विकास की अवधारणा का उदय हुआ।[5]

ऐतिहासिक उदाहरण कैम्ब्रिज क्लिनिक (Cambridge Clinic) ने पाया कि उन्हें अपने आंतरिक कार्य संबंधों में समस्या उत्पन्न हो रही है। मरीजों की देख-रेख में इन समस्याओं के संभावित प्रभाव के प्रति चिंतित चिकित्सा निदेशक ने एक स्थानीय विश्वविद्यालय के एक संगठनात्मक सलाहकार से संपर्क करके सहायता मांगी. निदेशकों, क्लिनिक प्रशासक और सलाहकार के बीच एक प्रारंभिक वार्ता नेतृत्व, विवाद समाधान और निर्णय प्रक्रियाओं में समस्याओं की ओर सूचित करती हुई प्रतीत हुई. सलाहकार ने यह सुझाव दिया कि डेटा एकत्रित किया जाना चाहिये ताकि एक कार्यशील उपचार निर्मित किया जा सके. क्लिनिक के अधिकारियों ने इसे स्वीकार किया और प्रयोगात्मक रूप से कार्यशील समझौते का समापन हुआ।

सलाहकार ने साक्षात्कारों की एक श्रृंखला आयोजित की, जिसमें क्लिनिक के कर्मचारी-दल के सभी सदस्य, चिकित्सा निदेशक और प्रशासक शामिल थे। इसके बाद सलाहकार ने विशिष्ट समस्या क्षेत्रों की पहचान करने के लिये साक्षात्कार डेटा को "प्रासंगीकृत (thematize)" अथवा संक्षेपित किया। लगभग एक सप्ताह बाद एक कार्यशाला के प्रारंभ में, सलाहकार ने क्लिनिक के कर्मचारी-दल को पुनः वह डेटा दिया, जो उसने संग्रहित किया था।

कर्मचारियों ने समस्याओं को निम्न प्राथमिकताओं में व्यवस्थित किया

चिकित्सा कर्मचारी-दल के विशिष्ट सदस्यों के बीच भूमिकाओं के टकरावों के कारण निर्मित हो रहे तनाव मरीजों की देखरेख में सहयोग करने की आवश्यकता के बीच व्यवधान उत्पन्न कर रहे थे। चिकित्सा निदेशक की नेतृत्व शैली के परिणामस्वरूप महत्वपूर्ण कार्यों से जुड़े मसलों पर उनके निर्णयों को निरस्त करना पड़ा. इसके कारण चिकित्सा और प्रशासनिक कर्मचारियों के स्तर पर कभी-कभी निष्क्रियता और भ्रम उत्पन्न हुआ। प्रशासक, चिकित्सा और बाह्य (सामाजिक कार्यकर्ता) कर्मचारियों में आपसी समस्याओं से बचने की प्रवृत्ति थी। नीतियों और विधियों को लेकर खुले विवादों पर इस प्रकार अंकुश लगता रहा, लेकिन दमित भावनाओं का अंतर्वैयक्तिक और अंतर्सामूहिक व्यवहार पर स्पष्ट तौर पर एक नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा था।

भूमिका विश्लेषण और सलाहकार द्वारा सुझाई गई अन्य तकनीकों के प्रयोग द्वारा क्लिनिक के कर्मचारी और चिकित्सा निदेशक भूमिका टकराव और नेतृत्व समस्याओं को उजागर करने और उनसे निपटने के प्रभावी तरीक़ों की योजना बना पाने में सक्षम हो गए। संवाद कौशल को बढ़ाने के लिये निर्मित कार्यक्रमों और टकराव से निपटने के लिये एक कार्यशाला सत्र के परिणामस्वरूप पूरे क्लिनिक में अधिक खुलेपन और विश्वास का विकास हुआ। इस पहली कार्यशाला का एक महत्वपूर्ण परिणाम एक कार्ययोजना के निर्माण के रूप में मिला, जिसने परिणामित काल के दौरान क्लिनिक कर्मचारियों द्वारा क्लिनिक समस्याओं पर लागू किये जाने वाले विशिष्ट चरणों का मार्ग प्रशस्त किया। सलाहकार ने इन प्रयासों का निरीक्षण करने और यथासंभव सहायता प्रदान करने पर सहमति व्यक्त की. निदेशक और चिकित्सा तथा प्रशासनिक कर्मचारी-दलों के साथ अतिरिक्त चर्चाएं और टीम विकास सत्र आयोजित किये गये।

पहली कार्यशाला के लगभग दो माह बाद आयोजित दूसरी कार्यशाला में क्लिनिक के सभी कर्मचारी उपस्थित रहे. दूसरी कार्यशाला में, क्लिनिक के कर्मचारियों ने टकराव और अंतर्वैयक्तिक संवाद से निपटने से जुड़ी समस्याओं पर एक साथ कार्य करना जारी रखा. बैठक के अंतिम अर्ध-दिवस के दौरान कर्मचारियों ने क्लिनिक के कार्यशील संबंधों में सुधार करने के लिये आगामी सप्ताहों और महीनों में की जाने वाली सुधार गतिविधियों को सम्मिलित करने वाली एक संशोधित कार्ययोजना विकसित की.

इस OD कार्यक्रम का एक उल्लेखनीय अतिरिक्त लाभ यह था कि क्लिनिक के कर्मचारियों ने एक संगठन के रूप में क्लिनिक के प्रदर्शन का निरीक्षण करना और इसकी कुछ अन्य समस्याओं से निपटना सीखा. छः माह बाद, जब सलाहकार ने संगठन की एक निरंतरता जांच की, तो कर्मचारियों ने इस बात की पुष्टि की कि अंतर्वैयक्तिक समस्याएं अब बेहतर नियंत्रण के अधीन थीं और OD कार्यक्रम से जुड़ी दो कार्यशालाओं में सीखी गईं कुछ तकनीकों का प्रयोग अभी भी किया जा रहा था।

संगठनात्मक विकास एक प्रणाली-स्तरीय अनुप्रयोग और रणनीतियों, संरचना और प्रक्रिया के नियोजित विकास, सुधार और पुनर्प्रवर्तन की ओर व्यवहारात्मक शास्र के ज्ञान का स्थानांतरण है, जिसका परिणाम संगठन की प्रभावकारिता के रूप में मिलता है। (अब्दुल बैसित (Abdul Basit)- NUST- SEECS)

संगठनों को समझना[संपादित करें]

संगठन को समझने के लिये वेसबोर्ड (Weisbord) ने छः चरणों वाला एक मॉडल प्रस्तुत किया है:

  1. उद्देश्य: संगठन के सदस्य संगठन के मिशन, उद्देश्य और लक्ष्य समझौते के संदर्भ में स्पष्ट हैं और लोग संगठन के उद्देश्यों का समर्थन करते हैं या नहीं.
  2. संरचना: हम कार्य को किस प्रकार विभाजित कर सकते हैं? प्रश्न यह है कि क्या उद्देश्य और आंतरिक संरचना के बीच पर्याप्त अनुरूपता है या नहीं.
  3. संबंध: व्यक्तियों के बीच, विभिन्न कार्य करने वाली इकाइयों या विभागों के बीच और लोगों तथा उनके कार्य की आवश्यकताओं के बीच.
  4. पुरस्कार: सलाहकार को इस बात के बीच समानताओं की पहचान करनी चाहिये कि औपचारिक रूप से संगठन में क्या कार्य करने पर पुरस्कार या दण्ड दिया जाता है।
  5. नेतृत्व: अन्य भागों के बीच लक्ष्यों को ढूंढने और उनके बीच संतुलन बनाए रखने के लिये होता है।
  6. सहायक क्रियाविधि: एक सहायक संगठन है, जिसे नियोजन, नियंत्रण, बजटिंग और संगठन के सदस्यों को प्राप्ति में सहायता प्रदान करने वाले अन्य सूचना तंत्रो के अस्तित्व को बनाए रखने के लिये अनिवार्य रूप से प्राप्त किया जाना चाहिए.[6]

आधुनिक विकास[संपादित करें]

हाल के कुछ वर्षों में, आधुनिक संगठनों में होने वाले परिवर्तनों का प्रबंधन कर पाने में OD की प्रासंगिकता को लेकर गंभीर प्रश्न उत्पन्न हुए हैं। इस क्षेत्र के "पुन:अविष्कार" की आवश्यकता एक ऐसा विषय बन गई है, जिस पर इसके कुछ "संस्थापक जनक" गंभीरतापूर्वक चर्चा कर रहे हैं।[7]

पुनःअविष्कार और परिवर्तन की इस मांग के साथ ही, विद्वानों ने एक भावना-आधारित दृष्टिकोण से संगठनात्मक विकास का अध्ययन प्रारंभ किया है। उदाहरणार्थ, डीक्लर्क (deKlerk) (2007)[8] ने इस बारे में लिखा है कि किस प्रकार भावनात्मक आघात प्रदर्शन को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है। आकार घटाने, आउटसोर्सिंग, विलयों, पुनर्निर्माण, सतत् परिवर्तनों, निजता पर आक्रमण, उत्पीड़न और शक्ति के दुरुपयोग के कारण अनेक कर्मचारी आक्रामकता, बेचैनी, आशंका, निराशावाद और भय की भावनाओं का अनुभव करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनके प्रदर्शन में कमी आ सकती है। डिक्लर्क (2007) का सुझाव है कि आघात का उपचार करने और प्रदर्शन में सुधार लाने के लिये, OD पेशेवरों को आघात के अस्तित्व को स्वीकार करना चाहिए, कर्मचारियों को अपनी भावनाओं पर चर्चा करने के लिये एक सुरक्षित स्थान प्रदान करना चाहिये, आघात को चिह्नित करना चाहिये और उसे दृष्टिकोण में रखना चाहिये और इसके बाद भावनात्मक प्रतिक्रियाएं व्यक्त करने और उनसे निपटने की अनुमति देनी चाहिये. इसे प्राप्त करने की एक विधि यह है कि कर्मचारियों को इस बात को चित्रित करने दिया जाए कि वे परिस्थिति के बारे में क्या सोचते हैं और उसके बाद उन्हें अपने चित्रणों को एक-दूसरे को समझाने दिया जाए. चित्र बनाना लाभदायक होता है क्योंकि यह कर्मचारियों को उन भावनाओं को व्यक्त करने की अनुमति देता है, जिन्हें सामान्यतः वे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकेंगे. साथ ही, चित्र अक्सर गतिविधि में सक्रिय सहभागिता की मांग करते हैं क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को चित्र बनाने और फिर उसके अर्थ के बारे में चर्चा करने की आवश्यकता होती है।

कार्यवाही अनुसंधान[संपादित करें]

वेण्डेल एल फ्रेंच (wendell L French) और सेसिल बेल (Cecil Bell) संगठन विकास (OD) को "कार्यवाही अनुसंधान के माध्यम से संगठन सुधार" के रूप में परिभाषित करते हैं।[4] यदि OD के अंतःस्थ दर्शन को संक्षेपित करने वाले किसी एक विचार का उल्लेख करना हो, तो वह कर्ट लेविन द्वारा कल्पित तथा अन्य व्यवाहारात्मक वैज्ञानिकों द्वारा विस्तारित कार्यवाही अनुसंधान का विचार होगा. सामाजिक परिवर्तनों और अधिक विशिष्ट रूप से प्रभावी, स्थायी परिवर्तन के प्रति चिंतित लेविन का विश्वास था कि परिवर्तन के प्रति प्रेरणा तथा कार्यवाही के बीच एक मज़बूत संबंध था: यदि लोग उन्हें प्रभावित करनेवाले निर्णयों में सक्रिय हैं, तो उनके द्वारा नई विधियों को अपना लिये जाने की अधिक संभावना होती है। उन्होंने कहा कि "तर्कसंगत सामाजिक प्रबंधन चरणों के एक चक्र में आगे बढ़ता है, जिनमें से प्रत्येक चरण नियोजन, कार्यवाही और कार्यवाही के परिणाम के बारे में तथ्यान्वेषण के एक वृत्त से मिलकर बनता है".[9]

चित्र 1: कार्यवाही-अनुसंधान प्रक्रिया का सिस्टम्स मॉडल

इस प्रक्रिया के बारे में लेविन के वर्णन में तीन चरण शामिल हैं:[9]

"नियंत्रण हटाना": दुविधा या असमंजस का सामना कर रहे व्यक्ति या समूह को इस बात का बोध होता है कि परिवर्तन की आवश्यकता है।

"परिवर्तन": समस्या का निदान किया जाता है और व्यवहार के नए मॉडलों की खोज व परीक्षण किया जाता है।

"पुनः नियंत्रण": नए व्यवहार के क्रियान्वयन का मूल्यांकन किया जाता है व यदि यह विचारों को अधिक शक्तिशाली बना रहा हो, तो इसे अपना लिया जाता है।

चित्र 1 कार्यवाही अनुसंधान के माध्यम से नियोजित परिवर्तन में सम्मिलित चरणों और प्रक्रियाओं को संक्षेप में व्यक्त करता है। कार्यवाही अनुसंधान को परिवर्तन की एक चक्रीय प्रक्रिया के रूप में व्यक्त किया जाता है। यह चक्र एक साथ कार्य कर रहे उपभोक्ता और परिवर्तन कारक द्वारा शुरु की गई नियोजन कार्यवाहियों की एक श्रृंखला के साथ शुरु होता है। इस चरण के प्रमुख्र तत्वों में एक प्राथमिक निदान, डेटा संग्रहण, परिणामों का फीडबैक और संयुक्त कार्यवाही योजना शामिल होते हैं। प्रणाली सिद्धांत की भाषा में, यह इनपुट चरण है, जिसमें उपभोक्ता प्रणाली अभी तक न पहचानी गई समस्याओं के बारे में जागरूक होते हैं, इस बात को महसूस करते हैं कि प्रभावी परिवर्तनों के लिये बाहरी सहायता की आवश्यकता हो सकती है और समस्या निदान की प्रक्रिया को सलाहकार के साथ साझा करते हैं।

कार्यवाही अनुसंधान का दूसरा चरण कार्यवाही या रूपांतरण चरण होता है। इस चरण में शिक्षण प्रक्रियाओं से संबंधित कार्यवाहियां (संभवतः भूमिका विश्लेषण के रूप में) और उपभोक्ता संगठन में व्यवहारात्मक परिवर्तनों का नियोजन और क्रियान्वयन शामिल होता है। जैसा की चित्र 1 में दर्शाया गया है, इस चरण में फीडबैक एक फीडबैक लूप A के माध्यम से बढ़ेगा और पिछले नियोजन को परिवर्तित करने में प्रभावी होगा, ताकि उपभोक्ता प्रणाली की शिक्षण गतिविधियों का परिवर्तन के उद्देश्यों के साथ बेहतर ढंग से मिलान किया जा सके. इस चरण में सलाहकार और उपभोक्ता प्रणाली के सदस्यों द्वारा संयुक्त रूप से की जाने वाली कार्यवाही-नियोजन गतिविधियां शामिल होती हैं। कार्याशाला या शिक्षण सत्रों के बाद, ये कार्यवाही चरण रूपांतरण चरण के एक भाग के रूप में कार्य के दौरान पूर्ण किये जाते हैं।[5]

कार्यवाही अनुसंधान का तीसरा चरण आउटपुट या परिणाम चरण होता है। दूसरे चरण के बाद क्रियान्वित किये गये सुधारात्मक कार्यवाही चरणों के कारण व्यवहार होने वाले वास्तविक परिवर्तन (यदि कोई हों) इस चरण में शामिल किये जाते हैं। पुनः उपभोक्ता प्रणाली से डेटा संग्रहित किया जाता है, ताकि प्रगति को निर्धारित किया जा सके और शिक्षण गतिविधियों में आवश्यक समायोजन किये जा सकें. शिक्षण गतिविधियों में इस प्रकार के छोटे समायोजन फीडबैक लूप B के माध्यम से किये जा सकते हैं (चित्र 1 देखें). कार्यक्रम में बुनियादी परिवर्तनों के लिये मुख्य समायोजन और पुनर्मूल्यांकन OD परियोजना को पुनः पहले या नियोजन चरण पर वापस ले आते हैं। चित्र 1 में प्रदर्शित कार्यवाही-अनुसंधान मॉडल लेविन के नियोजन, कार्यवाही और परिणाम मापन के पुनरावृत्तीय चक्र का दृढ़तापूर्वक पालन करता है। यह लेविन के परिवर्तन के सामान्य मॉडल के अन्य पहलूओं को भी प्रदर्शित करता है। जैसा कि चित्र में सूचित किया गया है, नियोजन चरण नियंत्रण हटाने या समस्या जागरूकता का चरण होता है।[9] कार्यवाही चरण परिवर्तन का चरण होता है, अर्थात् प्रणाली की समस्याओं को समझने और उनसे निपटने के एक प्रयास के रूप में नए रूपों और व्यवहार के प्रयोग का प्रयास करना. (इन चरणों के बीच एक अपरिहार्य अतिव्यापन होता है क्योंकि सीमायें स्पष्ट नहीं होतीं और वे एक सतत प्रक्रिया में नहीं हो सकतीं). परिणाम चरण पुनर्नियंत्रण का दौर होता है, जिसमें कार्य के दौरान नए व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है और यदि यह सफल और प्रभावी हो, तो यह सिस्टम के समस्या-समाधान व्यवहार के खज़ाने का एक भाग बन जाता है।

कार्यवाही अनुसंधान समस्या केंद्रित, उपभोक्ता केंद्रित और कार्यवाही उन्मुख होता है। इसमें उपभोक्ता प्रणाली में एक निदान, सक्रिय-शिक्षण, समस्या-की-खोज और समस्या-समाधान प्रक्रिया शामिल होती है। डेटा केवल एक लिखित रिपोर्ट के रूप में सरलता से नहीं लौटाया जाता, बल्कि खुले सत्रों में लौटाया जाता है और उपभोक्ता तथा परिवर्तन कारक विशिष्ट समस्याओं की पहचान करने और उन्हें श्रेणीबद्ध करने में, उनके वास्तविक कारणों को ढूंढने में और उनसे वास्तविक रूप से एवं प्रायोगिक रूप से निपटने के लिये योजनाएं विकसित करने में एक साथ मिलकर कार्य करते हैं। फिर भी डेटा संग्रहण, अनुमानों का निर्माण, अनुमानों का परीक्षण और परिणामों के मापन के रूप में वैज्ञानिक विधि, हालांकि उतने गहन रूप से नहीं, जितना प्रयोगशाला में की जाती है, इस प्रक्रिया का एक एकीकृत भाग नहीं है। कार्यवाही अनुसंधान आत्म-विश्लेषण और आत्म-पुनर्नवीनीकरण के लिये प्रायोगिक व उपयोगी उपकरणों के साथ सिस्टम को छोड़ते हुए उपभोक्ता सिस्टम की प्रभावकारिता के रख-रखाव और वृद्धि के लिये एक लंबी-श्रेणी वाली, चक्रीय, स्व-सुधारात्मक क्रियाविधि को भी सक्रिय रूप से निर्धारित करता है।[5]

महत्वपूर्ण व्यक्तित्व[संपादित करें]

OD हस्तक्षेप[संपादित करें]

"हस्तक्षेप" संगठन विकास के "कार्यवाही" चरण (चित्र 1 देखें) में मुख्य शिक्षण प्रक्रियाएं हैं। हस्तक्षेप संरचित गतिविधियां होती हैं, जिनका प्रयोग एकल रूप से या उपभोक्ता प्रणाली के सदस्यों के साथ संयोजन में किया जाता है, ताकि उनके सामाजिक अथवा कार्य प्रदर्शन में वृद्धि की जा सके. उन्हें एक परिवर्तन कारक के द्वारा एक सुधार कार्यक्रम के एक भाग के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है या उनका प्रयोग उपभोक्ता द्वारा संगठन के स्वास्थ्य की अवस्था की जांच करने या अपने स्वयं के व्यवहार में आवश्यक परिवर्तनों को लागू करने के लिये बनाए गए कार्यक्रम के बाद किया जा सकता है। "संरचित गतिविधियां" अर्थात् ऐसी विविध विधियां जैसे प्रयोगात्मक अभ्यास, प्रश्नावलियां, दृष्टिकोण सर्वेक्षण, साक्षात्कार, प्रासंगिक समूह चर्चाएं और यहां तक कि भोजन-काल के दौरान परिवर्तन कारक और उपभोक्ता संगठन के सदस्य के बीच होने वाली बैठकें. एक परिवर्तन कारक-उपभोक्ता प्रणाली संबंध में संगठन के सुधार कार्यक्रम को प्रभावित करने वाले प्रत्येक कार्य को एक हस्तक्षेप कहा जा सकता है।[10]

अनेक संभावित हस्तक्षेप रणनीतियां हैं, जिनमें से चयन किया जा सकता है। किसी विशिष्ट रणनीति के चयन के दौरान संगठनों के स्वरूप और कार्यप्रणाली के बारे में अनेक अनुमान लगाए जाते हैं। बैकहार्ड (Backhard) ने ऐसे छः अनुमानों को सूचीबद्ध किया है:

  1. समूह (टीमें) किसी भी संगठन के मूल निर्माण खण्ड होते हैं। अतः, परिवर्तन की बुनियादी इकाइयां समूह हैं, व्यक्ति नहीं.
  2. संगठन के विभिन्न भागों के बीच अनुपयुक्त प्रतिस्पर्धा को कम करना और अधिक सहयोगपूर्ण स्थिति का विकास करना एक सदैव प्रभावी परिवर्तन लक्ष्य होता है।
  3. एक स्वस्थ संगठन में निर्णय-प्रक्रिया पदानुक्रम की किसी विशिष्ट भूमिका या स्तर पर नहीं, बल्कि वहां स्थित होती है, जहां सूचना के स्रोत उपस्थित हों.
  4. संगठन, संगठनों की उप-इकाइयां और व्यक्ति लक्ष्यों के समक्ष लगातार अपने प्रकरणों का प्रबंधन करते हैं। नियंत्रण प्रबंधकीय रणनीति का आधार नहीं हैं, बल्कि वे केवल अंतरिम मापन होते हैं।
  5. सामान्यतः किसी भी स्वस्थ संगठन का एक लक्ष्य विभिन्न स्तरों पर और उनके बीच एक मुक्त संवाद, आपसी भरोसे और आत्मविश्वास का विकास करना होता है।
  6. लोग उस बात का समर्थन करते हैं, जिसका निर्माण करने में उन्होंने सहायता प्रदान की हो. किसी परिवर्तन के द्वारा प्रभावित होने वाले लोगों को उस परिवर्तन के नियोजन और क्रियान्वयन में स्वामित्व की भावना महसूस करने और सक्रिय सहभागिता निभाने की अनुमति अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिए.[3]

हस्तक्षेप व्यक्तियों की प्रभावकारिता को बढ़ाने के लिये डिज़ाइन किये गये हस्तक्षेपों से लेकर उन हस्तक्षेपों तक फैले होते हैं, जो टीमों और समूहों, अंतर्सामूहिक संबंधों और सकल संगठन से निपटने के लिये डिज़ाइन किये गये होते हैं। कुछ हस्तक्षेप ऐसे होते हैं, जो कार्य से जुड़े मुद्दों (लोग क्या करते हैं) पर केंद्रित होते हैं और कुछ ऐसे होते हैं, जो प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों (लोग उसे किस प्रकार करते हैं) पर केंद्रित होते हैं। अंततः हस्तक्षेपों को मोटे तौर पर इस आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है कि वे किस परिवर्तन क्रियाविधि को महत्व देते हैं: उदाहरणार्थ, फीडबैक, परिवर्तन के सांस्कृतिक नियमों के प्रति जागरूकता, अंतःक्रिया और संवाद, टकराव और नए ज्ञान या कौशल के अभ्यास द्वारा प्रशिक्षण.[11]

उपभोक्ता प्रणाली में शिक्षण और परिवर्तन के लिये एक सुरक्षित वातावरण के निर्माण में सहायता करना उन सर्वाधिक कठिन कार्यों में से एक है, जिनका सामना परिवर्तन कारक को करना पड़ता है। एक अनुकूल वातावरण में, मानवीय प्रशिक्षण स्वयं पर निर्मित होता है और एक व्यक्ति के जीवन-काल में लगातार जारी रहता है। जब यह चक्र नए स्तरों की ओर बढ़ता जाता है, तो नए व्यवहार से नई दुविधाएं और समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इसके विपरीत, एक प्रतिकूल वातावरण में, प्रशिक्षण बहुत कम निश्चित होता है और एक मनोवैज्ञानिक आतंक के वातावरण में यह अक्सर पूरी तरह रूक जाता है। संगठन में पुरानी पद्धतियों का नियंत्रण हटाने का विरोध किया जा सकता है क्योंकि इस वातावरण में कर्मचारी यह महसूस करते हैं कि अपनी वास्तविक भावनाओं को व्यक्त करना अनुपयुक्त है, हालांकि ऐसे प्रकटीकरण सृजनात्मक हो सकते हैं। अतः एक विरोधपूर्ण वातावरण में आवश्यक फीडबैक उपलब्ध नहीं होता. साथ ही, नई पद्धतियों के प्रयोग का प्रयास करना जोखिमपूर्ण माना जा सकता है क्योंकि यह स्थापित नियमों का उल्लंघन करता है। इस तरह का कोई संगठन अपनी प्रणालियों के नियमों के कारण भी बंधा हुआ हो सकता है: यदि एक भाग परिवर्तित होता है, तो अन्य भाग भी इसमें सम्मिलित हो जाएंगे. इसलिये यथास्थिति बनाए रखना ही अधिक सरल होता है। पदानुक्रमिक प्राधिकार, विशेषज्ञता, नियंत्रण का विस्तार और औपचारिक तंत्र की अन्य विशेषताएं भी प्रयोग को हतोत्साहित करती हैं।[10]

परिवर्तन कारक को अनिवार्य रूप से स्वयं इन सभी खतरों और अवरोधों पर ध्यान देना चाहिये: कुछ ऐसी बातें, जो उसके लिये सहायक हो सकती हैं, वे निम्नलिखित हैं:

  1. उपभोक्ता प्रणाली में परिवर्तन की एक वास्तविक आवश्यकता
  2. प्रबंधन की ओर से सच्चा समर्थन
  3. स्वयं का उदाहरण प्रस्तुत करना: सहयोगपूर्ण, समर्थक व्यवहार
  4. व्यवहारात्मक शास्रों में एक अच्छी पृष्ठभूमि
  5. प्रणाली सिद्धांत की क्रियाशील जानकारी
  6. इस बात पर विश्वास कि मनुष्य एक तार्किक, स्व-प्रशिक्षक जीव है, जो कार्यों को करने के बेहतर तरीकों को सीख पाने में सक्षम होता है।[10]

टीम निर्माण, प्रशिक्षण, बड़े समूह हस्तक्षेप, परामर्श, प्रदर्शन समीक्षा, आकार में कमी, TQM एवं नेतृत्व विकास हस्तक्षेप के कुछ उदाहरण हैं।

यह भी देखें[संपादित करें]

आयुध डिपो विषय
विशेष उपलब्धियां
संदर्भ में ओवर ड्राफ्ट

आगे पढ़ें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. स्मिथ, ए. (1998), प्रशिक्षण और ऑस्ट्रेलिया में विकास . 2nd एड. 261. सिडनी: बटरवर्थ्स.
  2. Richard Arvid Johnson. Management, systems, and society : an introduction. Pacific Palisades, Calif.: Goodyear Pub. Co.. 
  3. Richard Beckhard (1969). Organization development: strategies and models. Reading, Mass.: Addison-Wesley. pp. 114. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0876205406 9780876205402. OCLC 39328. 
  4. Wendell L French; Cecil Bell. Organization development: behavioral science interventions for organization improvement. Englewood Cliffs, N.J.: Prentice-Hall. 
  5. Richard Arvid Johnson (1976). Management, systems, and society : an introduction. Pacific Palisades, Calif.: Goodyear Pub. Co.. pp. 223–229. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0876205406 9780876205402. OCLC 2299496. 
  6. ब्रैडफोर्ड, डी.एल. और बर्क, डब्ल्यू. डब्ल्यू. एड्स, (2005). संगठन विकास. सैन फ्रांसिस्को: प्फ़िफ्फेर.
  7. ब्रैडफोर्ड, डी.एल. और बर्क, डब्ल्यू. डब्ल्यू. (एड्स), 2005, बदलते विकास संगठन. सैन फ्रांसिस्को: प्फ़िफ्फेर.
  8. डेक्लर, एम. (2007). संगठन में भावनात्मक आघात इलाज: एक ओवर ड्राफ्ट फ्रेमवर्क और मामले का अध्ययन. संगठनात्मक विकास जर्नल, 25(2), 49-56.
  9. Kurt Lewin (1958). Group Decision and Social Change. New York: Holt, Rinehart and Winston. pp. 201. 
  10. Richard Arvid Johnson (1976). Management, systems, and society: an introduction. Pacific Palisades, Calif.: Goodyear Pub. Co.. pp. 224–226. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0876205406 9780876205402. OCLC 2299496. 
  11. Wendell L French; Cecil Bell (1973). Organization development: behavioral science interventions for organization improvement. Englewood Cliffs, N.J.: Prentice-Hall. chapter 8. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0136416624 9780136416623 0136416543 9780136416548. OCLC 314258.