शार्पविले नरसंहार

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शार्पविले नरसंहार, 21 मार्च 1960 को ट्रांसवाल प्रांत (जिसे अब गाउटेंग कहा जाता है) के दक्षिण अफ्रीकी उपनगर शार्पविले के पुलिस स्टेशन में हुआ। उस प्रदर्शन के एक दिन बाद, जिसमें अश्वेत प्रदर्शनकारियों की संख्या पुलिस से कहीं ज्यादा थी, दक्षिण अफ्रीकी पुलिस ने भीड़ पर गोलियां चला दीं, जिसमें 69 लोग मारे गए। कुछ सूत्रों का कहना है कि भीड़ शांतिपूर्ण थी।[1] अन्य सूत्रों का कहना है कि भीड़ पुलिस पर पत्थर फेंक रही थी, जिसमें कई पुलिस अधिकारी घायल हो गए और यह भी कहा जाता है कि गोली केवल तभी चलाई गई जब भीड़ पुलिस स्टेशन के चारों तरफ बने बाड़ की तरफ बढ़ने लगी.[2]

पूर्ववर्ती घटनाएं[संपादित करें]

1920 के दशक के बाद से ही, अश्वेत दक्षिण अफ्रीकियों के आंदोलनों को पारित कानूनों (pass laws) द्वारा प्रतिबंधित किया गया था। शार्पविले नरसंहार से पहले, हेंड्रिक वेरवोर्ड के नेतृत्व के तहत रंगभेद का समर्थन करने वाली नेशनल पार्टी की सरकार ने अधिक से अधिक पृथकतावाद[2] फैलाने के लिए इन नियमों का इस्तेमाल किया और, 1959-1960 में इसका विस्तार करते हुए महिलाओं[3] को भी इसमें शामिल कर दिया.:pp.14,528 1960 के दशक से, पारित कानून अपने राजनैतिक विरोधियों को गिरफ्तार करने और उन्हें परेशान करने के प्रमुख साधन थे। उसी के फलस्वरूप, यह उन पारित कानूनों के खिलाफ संगठित होने वाला लोकप्रिय प्रतिरोध ही था, जिसने इस अवधि के दौरान विरोध की राजनीति को जिंदा रखा.[3]:p.163

अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस (एएनसी) ने पारित कानूनों का विरोध करने के लिए अभियान शुरू करने का फैसला कर लिया। इन विरोध प्रदर्शनों को 31 मार्च 1960 को शुरू होना था, लेकिन उनकी प्रतिद्वंद्वी पैन-अफ्रीकी कांग्रेस (पीएसी) ने 21 मार्च को एएनसी के अभियान से दस दिन पहले अपना आंदेलन शुरू कर दिया, क्योंकि वे मानते थे कि एएनसी इस अभियान में जीत नहीं सकता है।[4][5]

नरसंहार[संपादित करें]

21 मार्च को, 5000 से 7000 लोगों का एक जन समूह जोहान्सबर्ग के पास शार्पविले नगर के स्थानीय पुलिस स्टेशन के पास जमा हुआ; वे लोग पासबुक न होने की बात कहकर स्वयं को गिरफ्तार कराना चाहते थे।[6] यह पीएसी द्वारा आयोजित व्यापक अभियान का एक अंग था।

भीड़ में कई लोग विरोध का समर्थन करने आए थे, लेकिन इस बात के भी सबूत मिले हैं कि पीएसी ने विरोध के लिए भीड़ जुटाने हेतु लोगों को डराया भी था, इसमें शार्पविले में टेलीफोन लाइन काटना, लोगों को काम पर ना जाने की बात कहने वाले पर्चे बांटना और बस चालकों और यात्रियों पर दबाव डालना शामिल था।[3]:p.534

सुबह 10:00 बजे तक, एक बड़ी भीड़ जमा हो चुकी थी और माहौल शांतिपूर्ण बना हुआ था। प्रदर्शन शुरू होने के समय 20 से भी कम पुलिस अधिकारी स्टेशन में मौजूद थे। बाद में भीड़ की संख्या बढ़कर 20,000 हो गई और माहौल प्रतिशोधी हो उठा. चार सारासेन बख़्तरबंद गाड़ियों सहित 130 पुलिस वाले वहां पहुंच गए। पुलिस स्टेन सब-मशीनगन सहित आग्नेयास्त्रों से लैस थी। इस बात के कोई सबूत नहीं मिले कि भीड़ में किसी के पास पत्थरों के अलावा कोई हथियार था।[2]

सबर जेट और हार्वर्ड ट्रेनर विमान जमीन से लगभग सौ फीट की ऊंचाई पर भीड़ को तितर बितर करने के लिए उसके ऊपर उड़ान भर रहे थे। भीड़ ने प्रतिक्रियास्वरूप पत्थर फेंके जो तीन पुलिस वालों को लगे और लगभग 1:00 बजे पुलिस ने एक प्रदर्शनकारी को गिरफ्तार करने की कोशिश की. इसपर हाथापाई हो गई और भीड़ वहां लगी बाड़ की तरफ बढ़ने लगी. उसके कुछ देर बाद ही गोलीबारी शुरू हो गई।[2]

मृतकों और घायलों की संख्या[संपादित करें]

सरकारी आकड़ों के अनुसार, 69 लोग मारे गए, जिनमें 8 महिलाएं और 10 बच्चे शामिल थे और 180 से अधिक लोग घायल हुए, इनमें से 31 महिलाएं और 19 बच्चे थे। बहुत लोग बचकर भागने के लिए मुड़े तो उनकी पीठ पर गोली लगी.[7]

गोलीबारी के कारण[संपादित करें]

1960 की पुलिस रिपोर्टों में यह दावा किया गया कि अनुभवहीन पुलिस अधिकारियों ने भयभीत होकर अचानक ही गोलीबारी शुरु कर दी, जो लगभग चालीस सेकंड तक चली. यह संभावना है कि इस घटना से दो महीने पहले हुए एक नरसंहार के कारण पुलिस घबराई हुई थी, जिसमें काटो मनोर में नौ पुलिस अधिकारियों की हत्या कर दी गई थी।[4] शार्पविले मे पुलिस के कमांडिंग अधिकारी, लेफ्टिनेंट कर्नल पाइनार ने अपने बयान में कहा कि “जातीय स्वाभाविक मानसिकता उन्हें शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के लिए इकट्ठा होने की अनुमति नहीं देती. उनके लिए इकट्ठा होने का मतलब हिंसा है।”[7] उन्होंने गोली चलाने के आदेश देने की बात से इनकार किया और कहा कि उन्होनें ऐसा नहीं किया।

1998 में सत्य और सुलह आयोग (Truth and Reconciliation Commission) को दिए गए अन्य सबूत बताते हैं कि “गोली चलाने का निर्णय सोच समझकर कर लिया गया”.[3]:p.537

प्रतिक्रिया[संपादित करें]

चित्र:Murder at Sharpeville 21 मार्च 1960.jpg
नरसंहार के पीड़ितों को दर्शाने वाला चित्र

अश्वेतों ने तुरंत ही अपना आपा खो दिया और अगले हफ्ते में पूरे देश में प्रदर्शन, विरोध मार्च, हड़ताल और दंगे हुए. 30 मार्च 1960 को, सरकार ने आपातकाल की घोषणा कर दी, जिसमें 18,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया।

शार्पविले गोलीबारी के बाद अन्तराष्ट्रीय स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए, इनमें कई देशों[8][9] में हुए सहानुभूति प्रदर्शन और संयुक्त राष्ट्र द्वारा इसकी निंदा किया जाना शामिल हैं। 1 अप्रैल 1960 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव 134 को पारित कर दिया. दक्षिण अफ्रीका के इतिहास में शार्पविले को एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण परिवर्तनकारी घटना माना जाता है जिसके कारण इस देश ने स्वयं को अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अकेला पाया। 1961 में दक्षिण अफ्रीका को राष्ट्रमंडल देशों से बाहर निकालने में भी इस घटना ने प्रमुख भूमिका निभाई.

शार्पविले नरसंहार के कारण पीएसी और एएनसी पर प्रतिबंध लगा दिया गया और यह घटना इन संगठनों के निष्क्रिय प्रतिरोध को सशस्त्र विरोध में बदलने का मुख्य कारक बनी. इसके कुछ दिनों बाद ही पीएसी की सैन्य शाखा पोको और एनएसी की सैन्य शाखा उमखोंटो वी सिज्वे की स्थापना की गई।

परिणाम[संपादित करें]

1994 के बाद से, 21 मार्च को दक्षिण अफ्रीका में मानव अधिकार दिवस के रूप में मनाया जाता है।

राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला द्वारा 10 दिसम्बर 1996 को दक्षिण अफ्रीका के संविधान के कानून पर हस्ताक्षर करने के लिए स्थान के रूप में शार्पविले को चुना गया।

1998 में, सत्य और सुलह आयोग (टीआरसी) ने पाया कि पुलिस कार्रवाई “सकल मानव अधिकारों का उल्लंघन था जिसमें निहत्थे लोगों के हूजूम को रोकने के लिए अनावश्यक रूप से अत्यधिक बल का प्रयोग किया गया।”[3]:p.537

नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस[संपादित करें]

इस नरसंहार की याद में, यूनेस्को ने 21 मार्च को नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन के लिए वार्षिक अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में चिह्नित किया है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

  • शार्पविले छह - 1984 में शार्पविले में प्रदर्शन के लिए छह लोगों को दोषी करार दिया गया जिसने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित किया
  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् प्रस्ताव 610 (यूनाइटेड नेशंस सिक्युरिटी कौंसिल रिजोल्यूशन 610)
  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् प्रस्ताव 615 (यूनाइटेड नेशंस सिक्युरिटी कौंसिल रिजोल्यूशन 615)

संदर्भ[संपादित करें]

  1. मैकके, जॉन पी.; हिल, बेनेट डी.; बकलेर, जॉन, एब्रे, पेट्रीसिया बकली, बेक, रॉजर बी; क्रोस्टन, क्लेर हारू; विज़नर-हैंक्स, मेरी ई. अ हिस्ट्री ऑफ़ वर्ल्ड सोसाइटिज़: फ्रॉम 1775 टू प्रेजेंट. आठवां संस्करण. खंड सी (C) - 1775 से वर्तमान तक. (2009). बेडफोर्ड/सेंट. मार्टिन: बोस्टन/न्यूयॉर्क. ISBN 978-0-312-68298-9. ISBN 0-312-68298-0. "1950 के दशक तक, अश्वेतों - और उनके अश्वेत, गोरे और एशियाई सहयोगियों ने - बड़े पैमाने पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन शुरु किए. 1960 में एक निर्णायक मोड़ आया जब शार्पविले में पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की भीड़ पर गोली चलाई और उनहत्तर अश्वेतों की हत्या कर दी"(1010).
  2. "The Sharpeville Massacre". Time Magazine. 4 अप्रैल 1960. http://www.time.com/time/magazine/article/0,9171,869441-1,00.html. अभिगमन तिथि: 15 दिसम्बर 2006. 
  3. (PDF) Truth and Reconciliation Commission of South Africa Report, Volume 3, Chapter 6. 28 अक्टूबर 1998. pp. 531–537. http://www.doj.gov.za/trc/report/finalreport/TRC%20VOLUME%203.pdf. अभिगमन तिथि: 15 दिसम्बर 2006. 
  4. Boddy-Evans, Alistair. "Sharpeville Massacre, The Origin of South Africa's Human Rights Day". about.com. http://africanhistory.about.com/library/weekly/aa-SharpevilleMassacre-a.htm. अभिगमन तिथि: 15 दिसम्बर 2006. 
  5. http://www.sowetan.co.za/News/Article.aspx?id=1125732
  6. दक्षिण अफ्रीका के इतिहास में रिमेम्बर शार्पविले
  7. Reeves, Rt. Reverend Ambrose. "The Sharpeville Massacre - A watershed in South Africa". sahistory.org.za. http://www.sahistory.org.za/pages/library-resources/articles_papers/1960-sharpeville-massacre-rev-ambrose.html. अभिगमन तिथि: 15 जुलाई 2007. 
  8. " दक्षिण अफ्रीका के बाहर कई देशों में शार्पविले को लेकर बड़े पैमाने पर प्रतिक्रिया दी गई, जिसके कारण कई मामलों ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ सकारात्मक कार्यवाई की गयी".-रीव्स आरटी (Rt) रेव-ए.द शार्पविले मैसकर--अ वॉटरशेड इन साउथ अफ्रीका
  9. जैसे, "दक्षिण अफ्रीका में शार्पविले नरसंहार के तुरंत बाद, सिडनी में रंगभेद प्रणाली के खिलाफ लगभग 1000 छात्रों ने प्रदर्शन किया".-बार्कन ए. हिस्ट्री ऑफ एजुकेशन रिव्यू, 1 जनवरी 2007 में सिडनी विश्वविद्यालय के सक्रियतावादी छात्र 1960-1967