व्यक्तित्व

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व्यक्तित्व (personality) आधुनिक मनोविज्ञान का बहुत ही महत्वपूर्ण एवं प्रमुख विषय है। व्यक्तित्व के अध्ययन के आधार पर व्यक्ति के व्यवहार का पूर्वकथन भी किया जा सकता है।

प्रत्येक व्यक्ति में कुछ विशेष गुण या विशेषताएं होती हो जो दूसरे व्यक्ति में नहीं होतीं। इन्हीं गुणों एवं विशेषताओं के कारण ही प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे से भिन्न होता है। व्यक्ति के इन गुणों का समुच्चय ही व्यक्ति का व्यक्तित्व कहलाता है। व्यक्तित्व एक स्थिर अवस्था न होकर एक गत्यात्मक समष्टि है जिस पर परिवेश का प्रभाव पड़ता है और इसी कारण से उसमें बदलाव आ सकता है। व्यक्ति के आचार-विचार, व्यवहार, क्रियाएं और गतिविधियों में व्यक्ति का व्यक्तित्व झलकता है। व्यक्ति का समस्त व्यवहार उसके वातावरण या परिवेश में समायोजन करने के लिए होता है।

जनसाधारण में व्यक्तित्व का अर्थ व्यक्ति के बाह्य रूप से लिया जाता है, परन्तु मनोविज्ञान में व्यक्तित्व का अर्थ व्यक्ति के रूप गुणों की समष्ठि से है, अर्थात् व्यक्ति के बाह्य आवरण के गुण और आन्तरिक तत्व, दोनों को माना जाता है।

परिभाषाएँ[संपादित करें]

मनोवैज्ञानिकों, दार्शनिकों एवं समाज-शास्त्रियों ने व्यक्ति के विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखते हुए विभिन्न परिभाषाएं दी हैं। इस तरह व्यक्तित्व की सैकड़ों परिभाषाएं दी जा चुकी हैं। सुविधा की दृष्टि से गिलफोर्ड (Guilford] 1959) ने इन परिभाषाओं को चार वर्गों में बांट दिया है जो निम्नलिखित हैं-

1. संग्राही (Ominbus) परिभाषाएं
2. समाकलनात्मक (Integrative) परिभाषाएं
3. सोपानित परिभाषाएं (Hierarchical Definitions)
4. समायोजन (Adjustment) आधारित परिभाषाएं।

उपरोक्त वर्गों को ध्यान में रखते हुए व्यक्तित्व की परिभाषाएं इस प्रकार दी जा सकती हैं-

संग्राही या सर्वांगीण परिभाषाएं[संपादित करें]

इस वर्ग में वे परिभाषाएं आती हो जो व्यक्ति की समस्त अनुक्रियाओं, प्रतिक्रियाओं तथा जैविक गुणों के समुच्चय पर ध्यान देती है। इसमें कैम्फ (Kempf) तथा मार्टन प्रिंस की परिभाषाएं महत्वपूर्ण हैं। कैम्फ (1919) के अनुसार

व्यक्तित्व उन प्राभ्यास संस्थाओं का या उन अभ्यास के रूपों का समन्वय है जो वातावरण में व्यक्ति के विशेष सन्तुलन को प्रस्तुत करता है।

मार्टन प्रिंस (Morton Prince) के अनुसार,

व्यक्तित्व, व्यक्ति की समस्त जैविक, जन्मजात विन्यास, उद्वेग, रुझान, क्षुधाएं, मूल प्रवृत्तियां तथा अर्जित विन्यासों एवं प्रवृत्तियों का समूह है।

समाकलनात्मक परिभाषाएं[संपादित करें]

इस वर्ग की परिभाषाओं में व्यक्तित्व के विभिन्न रूपों, गुणों एवं तत्वों के योग पर बल दिया जाता है। इन गुणों के समाकलन से व्यक्ति में एक विशेषता उत्पन्न हो जाती है। इस वर्ग की परिभाषाओं में वारेन तथा कारमाइकल (1930) तथा मेकर्डी की परिभाषाएं उल्लेखनीय हैं।

वारेन तथा कारमाइकल (Warren and Carmichacl) के अनुसार,

व्यक्ति के विकास की किसी अवस्था पर उसके सम्पूर्ण संगठन को व्यक्तित्व कहते हैं।

मेकर्डी (J.T. Mac Curdy) के शब्दों में,

व्यक्तित्व रूचियों का वह समाकलन है जो जीवन के व्यवहार में एक विशेष प्रकार की प्रवृत्ति उत्पन्न करता है।

सोपानित परिभाषाएँ[संपादित करें]

विलियन जैम्स तथा मैस्लो जैसे कुछ मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तित्व के कई सोपान बताए हैं। इन मनोवैज्ञानिकों ने मुख्य रूप से व्यक्तित्व के चार सोपान माने हैं-

1. भौतिक व्यक्तित्व (Material self)
2. सामाजिक व्यक्तित्व (Social self)
3. आध्यात्मिक व्यक्तित्व (Spiritual self)
4. शुद्ध अहम् (Pure Ego)

प्रथम सोपान के अन्तर्गत व्यक्ति के शरीर की बनावट में आनुवांशिकता से प्राप्त विशेष गुण सम्मिलित है जबकि द्वितीय सोपान में सामाजिक सम्बन्धों और सामाजिक विकास का उल्लेख होता है। व्यक्तित्व का तीसरा सोपान जैम्स ने आध्यात्मिक व्यक्तित्व माना है। उनके अनुसार इस सोपान वाले व्यक्ति की रूचि आध्यात्मिक विषयों में होती है और सामाजिक वह सम्बन्धों की अपेक्षा इसे अधिक महत्व देता है। अब उसके आध्यात्मिक व्यक्तित्व का विकास होने लगता है। चौथे सोपान में व्यक्ति अपने आत्म स्वरूप का पूर्ण ज्ञान कर लेता है और सभी वस्तुओं में अपनी आत्मा का दर्शन करता है और तब वह अपने व्यक्तित्व के अंतिम सोपान पर पहुंचता है। श्री अरविन्द ने भी व्यक्ति विकास के क्रम में करीब-करीब इसी प्रकार के विचार प्रकट किये हैं। उन्होंने भौतिक (Physical), भावात्मक या प्राणिक (Vital), बौद्धिक (Mental), चैत्य (Psyche), आध्यात्मिक (Spiritual) तथा अति मानसिक (Supramental) सोपानों का उल्लेख किया है।

समायोजन आधारित परिभाषाएँ[संपादित करें]

इस वर्ग की परिभाषाओं में मनोवैज्ञानिक व्यक्ति के व्यक्तित्व के अध्ययन तथा व्याख्या में समायोजन (ऐडजस्टमेण्ट) को महत्वपूर्ण मानते हैं। इस वर्ग में वे परिभाषाएं आती हो जिनमें समायोजन पर सबसे अधिक बल दिया जाता है। व्यक्ति में ऐसे गुण जो उसको समायोजित करने में उसकी सहायता करते हों, चाहे वे शारीरिक हों या मानसिक उन सब का गठन इस प्रकार का होता है कि वे निरन्तर गतिशील रहते हैं। इन गुणों की गत्यात्मकता के कारण ही एक विशेष प्रकार की अनन्यता या अपूर्वता व्यक्ति में पैदा हो जाती है। बोरिंग के अनुसार,

व्यक्तित्व व्यक्ति का उसके वातावरण के साथ अपूर्व व स्थायी समायोजन है।

व्यक्ति के व्यक्तित्व को सम्पूर्ण रूप से परिभाषित करने में उपरोक्त परिभाषाएं आंशिक हैं। किसी व्यक्ति का चाहे कितने ही मानसिक या शारीरिक गुणों का योग हो, कितना ही चिन्तनशील या ज्ञानी हो, परन्तु उसके व्यवहार में गतिशीलता न होने पर उसका व्यवहार और समायोजन अधूरा रह जाता है। आलपोर्ट ने इस बात को ध्यान में रखकर अपने विचारों को व्यक्त करके व्यक्तित्व की परिभाषा को सर्वमान्य बनाने का पूर्ण एवं सफल प्रयास किया। उसकी परिभाषाएं अधिकांश मनोवैज्ञानिकों द्वारा पूर्ण परिभाषा के रूप में स्वीकार की गईं हैं। अतः इस वर्ग की परिभाषाओं में आलपोर्ट की परिभाषा महत्वपूर्ण है।

आलपोर्ट (1939) के अनुसार,

व्यक्तित्व व्यक्ति की उन मनोशारीरिक पद्धतियों का वह आन्तरिक गत्यात्मक संगठन है जो कि पर्यावरण में उसके अनन्य समायोजनों को निर्धारित करता है।

व्यक्तित्व के निर्धारक[संपादित करें]

व्यक्तित्व को प्रभावित करने में कुछ विशेष तत्वों का हाथ रहता है उन्हें हम 'व्यक्तित्व के निर्धारक' (Determinants of personality) कहते हैं। ये ही तत्व मिलकर व्यक्तित्व को पूर्ण बनाने में सहयोग देते हैं। इन्हीं तत्वों के अनुरूप व्यक्तित्व का विकास होता है।

कुछ विद्वानों ने व्यक्तित्व के निर्धारण में जैविक (Biological) आधार को प्रमुख माना है तो कुछ ने पर्यावरण संबंधी आधार को प्रधानता दी है, परन्तु व्यक्तित्व के विकास में इन दोनों निर्धारकों का हाथ रहता है।

जैविक निर्धारक निम्न चार हैं:-

1. आनुवांशिकता (Heredity)
2. स्रावी ग्रंथियां (Endocrine Glands)
3. शारीरिक गठन व स्वास्थ्य
4. शारीरिक रसायन (Body Chemistry)

पर्यावरण सम्बन्धी निर्धारक तीन हैं-

1. प्राकृतिक निर्धारक
2. सामाजिक निर्धारक
3. सांस्कृतिक निर्धारक

जैविक निर्धारक[संपादित करें]

आनुवांशिकता[संपादित करें]

व्यक्तित्व में कुछ गुण पैतृक या आनुवांशिक होते हैं। शरीर का रंग, रूप, शरीर की बनावट गुणों से युक्त हो सकते हैं। इसका कारण बालक को प्राप्त हुए अपने माता-पिता के गुणसूत्र (क्रोमोसोम्स) हैं। बालक की आनुवांशिकता में केवल उसके माता-पिता की देन ही नहीं होती। बालक की आनुवांशिकता का आधा भाग माता-पिता से, एक चौथाई भाग दादा-दादी से, नाना-नानी से व आठवां भाग परदादा-दादी और अन्य पुरखों से प्राप्त होता है। अतः बालक के व्यक्तित्व पर पैतृक गुणों का प्रभाव पड़ता है। उसका रंग-रूप या शारीरिक गठन के गुण उसके माता या पिता से या उसके दादा या दादी के गुणों के अनुरूप हो सकते हैं। इसी तरह उसमें बुद्धि एवं मानसिक क्षमताओं के गुण अपने पूर्वजों के अनुरूप हो सकते हैं। कई अध्ययनों में यह देखा गया है कि पूर्वजों की मानसिक व्याधियों के गुण उनकी पीढ़ी के किसी भी व्यक्ति में प्रकट हो सकते हैं। इस तरह हम देखते हो कि पैतृक गुणों का व्यक्ति के व्यक्तित्व गठन पर कम या ज्यादा प्रभाव पड़ता है।

शारीरिक गठन और स्वास्थ्य[संपादित करें]

शारीरिक गठन के अन्तर्गत व्यक्ति की लम्बाई, बनावट, वर्ण, बाल, आंखें व नाक नक्शा आदि अंगों की गणना होती है। ये शारीरिक विशेषताएं इतनी स्पष्ट होती हो कि बहुत से लोग इन्हीं से व्यक्ति का बोध करते हैं। हालांकि यह दृष्टिकोण ठीक नहीं है फिर भी ये विशेषताएं व्यक्तित्व की द्योतक अवश्य हैं। शरीर से हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर व्यक्ति को देखकर लोग प्रभावित होते हैं। वे उसके शरीर के गठन की प्रशंसा करते हैं। इससे उस व्यक्ति के मानसिक पहलू पर प्रशंसा का प्रभाव ऐसा पड़ता है कि दूसरों की अपेक्षा वह अपने को श्रेष्ठ समझने लगता है और उसमें आत्मविश्वास और स्वावलम्बन के भाव पैदा हो जाते हैं।

शारीरिक गठन ठीक न होने और शारीरिक अंगहीनता रहने पर व्यक्ति में हीन भावना पैदा हो जाती है। वह अपने आपको गया-बीता व हीन समझता है और उसमें आत्मविश्वास की कमी हो सकती है, वह अपने कार्य की सफलता में सदा आशंकित रहता है और अभाव की पूर्ति के लिए वह असामाजिक व्यवहार को अपना सकता है।

व्यक्तित्व विकास पर स्वास्थ्य का भी असर पड़ता है। जो व्यक्ति शारीरिक रूप से स्वस्थ रहता है वह अच्छा सामाजिक जीवन व्यतीत करता है और उसमें सामाजिकता विकसित होती है। स्वस्थ व्यक्ति अपने कार्य को सफलता से समय पर पूरा करके अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर लेता है। इसके ठीक विपरीत अस्वस्थ व्यक्ति का व्यक्तित्व अधूरा रह जाता है। अस्वस्थता के कारण अपने कार्यों को समय पर पूरा नहीं कर पाता जिससे वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति समय पर नहीं कर पाता। उसमें कार्य करने की रुचि भी कम रहती है। अस्वस्थ व्यक्ति दूसरों को प्रभावित भी नहीं कर सकता। इस तरह, व्यक्तित्व पर शारीरिक गठन और स्वास्थ्य का काफी प्रभाव पड़ता है।

अंतःस्रावी ग्रंथियाँ[संपादित करें]

व्यक्तितव के विकास में अन्तःस्रावी ग्रंथियों का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। ये प्रत्येक मनुष्य के शरीर में पायी जाती हैं। इन ग्रंथियों को 'नलिकाविहीन ग्रंथियां' भी कहते हैं। ये बिना नलिकाओं के शरीर में स्राव भेजती हैं। इनके स्राव न्यासर या हार्मोन्स कहलाते हैं। विभिन्न ग्रंथियां एक या एक से अधिक हार्मोन्स का स्राव करती हैं। मुख्य रूप से ये ग्रंथियां 8 होती हैं। ये हैं-

1. पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland)
2. पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland)
3. गल ग्रंथि (Thyroid Gland)
4. उपगल ग्रंथि (Parathyroid Gland)
5. थाइमस ग्रंथि (Thymus Gland)
6. अधिवृक्क ग्रंथि (Adrenal Gland)
7. अग्न्याशय ग्रंथि (Pancreas Gland)
8. जनन ग्रंथि (Gonad Gland)

शारीरिक रसायन[संपादित करें]

अन्तःस्रावी ग्रंथियों एवं शरीर रचना के अतिरिक्त व्यक्तित्व के जैविक कारकों में शारीरिक रसायन का उल्लेख भी आवश्यक है। प्राचीन काल से मनुष्य के स्वभाव का कारण उसके शरीर के रसायन के तत्वों को भी माना गया है। ईसा से लगभग 400 वर्ष पूर्व यूनान के प्रसिद्ध चिकित्सक व विचारक हिपोक्रेटीज ने शरीर में पाये जाने वाले रसायनों के आधार पर व्यक्ति के स्वभाव का निरूपण किया है। लगभग इस प्रकार का वर्णन आयुर्वेद में भी किया है। ये शारीरिक रसायन चार प्रकार के होते हैं।

1. रक्त, 2. पित्त, 3. कफ और 4. तित्लीद्रव्य।

रक्त की अधिकता से व्यक्ति आदतन आशावादी और उत्साही (Sanguine) होता है। पित्त की अधिकता वाले व्यक्ति चिड़चिड़े या कोपशील (Choleric) प्रकृति के होते हैं। जिस व्यक्ति में कफ अथवा श्लेष्मा की प्रधानता होती है वे शान्त व आलसी होते हैं। ऐसे व्यक्ति को श्लेष्मिक (Phelgmatic) प्रकृति का कहते हैं। जिस व्यक्ति में तिल्ली द्रव्य या श्याम पित्त की प्रधानता होती है। ऐसे व्यक्ति उदास (Melancholic) रहने वाले होते हो इन्हीं के आधार पर हिप्पोक्रेटीज ने व्यक्तित्व के प्रकारों का वर्णन किया है।

उपरोक्त जैविक कारकों के अतिरिक्त कुछ अन्य जैविक कारक भी हो जो व्यक्तित्व को प्रभावित करते हो, ये कारक हैं- बुद्धि , रंगरूप (Colour) लिंग (Sex) ।

पर्यावरण सम्बन्धी निर्धारक[संपादित करें]

प्राकृतिक निर्धारक[संपादित करें]

मनुष्य प्राकृतिक पर्यावरण में रहता है उसके जीवन तथा व्यक्तित्व पर भौगोलिक परिस्थितियों एवं जलवायु का प्रभाव पड़ता है। भौगोलिक परिस्थितियों और जलवायु का उसके स्वास्थ्य, शरीर की बनावट तथा मानसिक स्थितियों पर प्रभाव पड़ता है। जैसे ठण्डी जलवायु में रहने वाले व्यक्तियों का रंग गोरा होता है जबकि गर्म जलवायु में रहने वाले व्यक्ति सांवले रंग के होते हैं। भौगोलिक परिस्थितियों का भी शारीरिक गठन पर प्रभाव पड़ता है जैसे पहाड़ी लोगों का शारीरिक गठन। जिन जगहों पर भूकम्प या प्राकृतिक आपदाएं ज्यादा होती हो वहां के लोगों में सुरक्षा की भावना कम होती है। यदि व्यक्ति की भौगोलिक परिस्थितियाँ या जलवायु बदल दी जाये तब उनके व्यक्तित्व में भी परिवर्तन आ जाता है। जैसे ऊष्ण प्रदेश में रहने वाले लोगों को शीत प्रदेश में रखा जाए तो उनके कार्य करने की क्षमताएं घट सकती हैं और स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। इसी तरह ठण्डे प्रदेश में रहने वाले व्यक्तियों को यदि ऊष्ण प्रदेश में रखा जाए तो ऐसा ही प्रभाव उन लोगों पर पड़ता है।

सामाजिक निर्धारक[संपादित करें]

व्यक्ति सामाजिक प्राणी है और समाज की इकाई भी। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त वह समाज में रहता है। अतः समाज का, समाज की संरचना का और समाज के लोगों का उस पर बहुत प्रभाव पड़ता है। परिवार के लोगों से लेकर समाज के लोगों तक का व्यक्ति के व्यक्तित्व पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है

परिवार या घर का प्रभाव[संपादित करें]
  • (१) माता-पिता का प्रभाव - सभी मनोवैज्ञानिकों का यह मानना है कि व्यक्तित्व के विकास में घर के परिवेश का बड़ा प्रभाव पड़ता है। परिवार के सदस्यों का भी बालक के व्यक्तित्व के विकास पर प्रभाव पड़ता है। जन्मकाल से ही मनुष्य का व्यक्तित्व का विकास प्रारम्भ हो जाता है। जन्म के समय उसकी माता तक ही उसका परिवार सीमित रहता है। उसे अपने सभी प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी माता पर निर्भर रहना पड़ता है। अतः माता के विवेकशील और व्यवहार कुशल रहने पर तथा बालक को सही ढंग से देखभाल करने से सन्तान या बालक का व्यक्तित्व विकास उचित ढंग से होता है। शिवाजी, महाराणा प्रताप जैसे महापुरुषों के व्यक्तित्व विकास का श्रेय उनकी माताओं को है। माता-पिता द्वारा आवश्यकताओं की उचित पूर्ति होने से बालक आगे चलकर आशावादी, कर्मवीर व परोपकारी बनता है, किन्तु माता-पिता द्वारा आवश्यकताओं की उचित पूर्ति न करने से तथा पर्याप्त स्नेह न देने से बालक कर्महीन व निराशावादी बन जाता है। बाल्यकाल में तिरस्कृत रहने पर वह हीन भाव एवं असुरक्षित भाव से पीड़ित रहता है तथा उसमें आत्मविश्वास की कमी रहती है। आगे चलकर वह परावलम्बी स्वभाव का हो जाता है। वह अपनी छोटी-छोटी आवश्यकताओं को पूर्ति के लिए भी दूसरों का मुंह देखता रहता है। फलस्वरूप उसके व्यक्तित्व का विकास उचित दिशा में नहीं होता।

माता-पिता के प्रेम के अभाव का सभी बालकों पर एक सा प्रभाव पड़ता है क्योंकि इसमें बालक के जन्मजात स्वभाव और प्रवृत्तियों का बड़ा महत्व है। माता-पिता के प्रेम की अवहेलना और ताड़ना से एक बालक दब्बू बन सकता है परन्तु दूसरा बालक दबंग और उद्दंड बन सकता है। आलपोर्ट के अनुसार ‘‘वहीं आग जो मक्खन को पिघलाती है अण्डे को कठोर बनाती है।’’ माता-पिता द्वारा बच्चे को झिड़कना और गोद में न लेना भी उसके व्यक्तित्व को प्रभावित करता है।

  • (२) घर के अन्य सदस्यों का प्रभाव - बालक के व्यक्तित्व पर घर के अन्य सदस्यों का काफी प्रभाव पड़ता है। घर में रहने वाले दादा-दादी या नाना-नानी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची, मामा-मामी, बड़े भाई-बहन या अन्य कोई रिश्तेदार जो उसके परिवार में रहते हो, का प्रभाव बालक के व्यक्तित्व के विकास पर पड़ता है। बालक इनके व्यवहारों को देखता है और सीखता है। कालान्तर में ये व्यवहार उसके व्यक्तित्व का एक भाग बन जाता है। परिवार में बड़े लोग बालक के सामने आदर्श के समान होते हो बालक उन जैसा बनना चाहता है और वह तादाम्य क्रिया अपनाता है। यदि परिवार में बालक इकलौती सन्तान है तो परिवार में उसे आवश्यकता से अधिक लाड़-प्यार मिलता है फलस्वरूप वह जिद्दी व शरारती हो जाता है। बच्चे के लिए शरारती होना एक आवश्यक गुण है और इससे आगे चलकर वह निर्भीक व साहसी बनता है परन्तु आवश्यकता से अधिक शरारती होने से वह नियंत्रण की सीमा तोड़ देता है और वह समाज विरोधी व्यवहारों को सीखकर उसमें रुचि रखने लगता है। अतः उसका व्यक्तित्व विकास उचित रूप से नहीं हो पाता। यदि परिवार बड़ा है, संयुक्त परिवार है, उसके सदस्यों के व्यवहारों में समायोजन नहीं है, घर में कलहपूर्ण स्थिति रहती है तो उसका प्रभाव बालक के व्यक्तित्व के विकास पर पड़ेगा और बालक का समायोजन आगे चलकर गड़बड़ा सकता है।

यदि परिवार के सदस्यों में आपराधिक प्रवृत्तियां हो तो उसका प्रभाव भी बालक के व्यक्तित्व के विकास पर पड़ता है और बालक में भी आपराधिक प्रवृत्तियां जन्म लेती हो और आगे चलकर वह बालक सामाजिक अपराध करने लगता है। इसी प्रकार भग्न परिवार (Broken Family) भी किशोर अपराध का मुख्य कारण है।

  • (३) जन्म क्रम का प्रभाव - प्रायः यह बात आमतौर पर स्पष्ट है कि परिवार के छोटे-बड़े, सबसे बड़े या सबसे छोटे आदि विभिन्न क्रम के बालकों के प्रति एक सा व्यवहार नहीं किया जाता। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एल्फ्रैड एडलर के अनुसार परिवार में बालक के जन्मक्रम का उसके व्यक्तित्व पर बड़ा प्रभाव पड़ता है, उसकी शारीरिक स्थिति तथा उसके कार्यशैली पर भी प्रभाव पड़ता है। सबसे छोटा बालक सभी से लाड़-प्यार पाता है अतः वह दूसरों पर अत्यधिक निर्भर बन जाता है। सबसे बड़ा बालक स्वावलम्बी व निर्दयी बन जाता है, क्योंकि कुछ दिन तक इकलौते रहने के कारण न तो कोई उसकी चीजों में हिस्सा बांटता है और न कोई उसका अधिकार छीनने वाला होता है परन्तु दूसरे बालक के जन्म से पहले बालक के मन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है क्योंकि इससे उसका एकाधिकार छिन जाता है और कभी-कभी तो उसकी अवहेलना होने लगती है। अतः वह छोटे बालक के प्रति ईर्ष्या करने लगता है और अपना अधिकार बनाये रखने की कोशिश करता है। अनुसंधानकर्त्ताओं ने प्रत्येक जन्मक्रम में बालक में एकसी व समान संख्याओं में उलझनें पायी हैं। एडलर के इस कथन में बहुत कुछ सत्यता है कि व्यक्ति अपनी जीवन शैली बहुत कुछ परिवार में प्रारम्भिक जीवन से ही निश्चित कर लेता है, परन्तु यह मानने के निश्चित

प्रमाण नहीं हो कि बचपन की यह शैली आजीवन अपरिवर्तित रहती है।

विद्यालय का प्रभाव[संपादित करें]

बालक के व्यक्तित्व विकास पर विद्यालय, विद्यालय में होने वाले अध्ययन, विद्यालय के शिक्षक, बालक के सहपाठी तथा विद्यालय की भौगोलिक स्थिति का बहुत प्रभाव पड़ता है।

(१) पद्धशिक्षा का प्रभाव - विद्यालय में शिक्षा किस प्रकार की दी जाती है इसका प्रभाव बालक के व्यक्तित्व पर पड़ता है। कई विद्यालयों में धार्मिकता, कट्टरधार्मिकता की शिक्षा दी जाती है इससे बालक के व्यक्तित्व का विकास संकीर्णन और एक निश्चित धर्म की तरफ होता है। इससे बालक दूसरे धर्मों के प्रति ईर्ष्या और द्वेष करने वाला बन जाता है। कई अंग्रेजी भाषा के विद्यालयों में बालक को मातृभाषा या अन्य भाषाएं बोलने नहीं दी जाती, बल्कि केवल अंग्रेजी भाषा ही बोलने को बाध्य किया जाता है, ऐसी स्थिति में बालक पर मानसिक दबाव बढ़ जाता है तथा उसमें निराशा एवं कुण्ठाएं उत्पन्न हो जाती है, जिससे आगे चलकर बालक के व्यक्तित्व विकास में तथा समायोजन में बाधा आती है।

कई विद्यालयों में संतुलित शिक्षा नहीं दी जाती। आज की शिक्षा प्रणाली में यह सबसे बड़ा दोष है। बालक के मानसिक और शारीरिक विकास पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाता बल्कि उसके पाठ्यक्रम की कितनी ज्यादा पुस्तकें बढ़ाई जाये इस पर ध्यान दिया जाता है। बालक के बस्ते का बोझ, गृह कार्य की मार बालक के सर्वांगीण विकास में बाधक बनती है। और उसके सन्तुलित व्यक्तित्व विकास, सर्वांगीण विकास और मूल्यों के विकास के लिए विद्यालय में संतुलित एवं नैतिक शिक्षा दी जानी चाहिए। प्रायोगिक आधारित शिक्षा मूल्य-परक शिक्षा, अनेकान्त धार्मिक शिक्षा तथा शारीरिक विकास की शिक्षा भी बालक के व्यक्तित्व के विकास में बहुत सहायक होती है।

(२) शिक्षकों का प्रभाव - जिस प्रकार बालक परिवार में माता या पिता से तादात्म्य कर लेता है उसी प्रकार विद्यालय में भी शिक्षकों से तादात्म्य कर लेता है। यदि शिक्षक का व्यक्तित्व प्रभावशाली हो तो बालक के व्यक्तित्व विकास पर उसका अनुकूल प्रभाव पड़ता है। कई बार बालक शिक्षकों के नकारात्मक गुणों को सीख जाता है। शिक्षकों द्वारा बालकों से बीड़ी, सिगरेट मंगवाना और उनकी उपस्थिति में उनका प्रयोग करना घातक है क्योंकि इसका तादाम्य कर बालक बीड़ी, सिगरेट पीना सीख जाता है। यदि शिक्षकों में अच्छे गुण हो तो बालक भी उन गुणों का तादात्म्य कर लेता है, फलस्वरूप बालक के व्यक्तित्व विकास में वे गुण जुड़ जाते हैं। संक्षेप में आमतौर से बालक के प्रति व्यवहार में प्रकट होने वाले शिक्षक के व्यक्तित्व के सभी गुण-दोष बालक के व्यक्तित्व विकास पर अच्छा-बुरा प्रभाव डालते हैं।

(३) सहपाठियों का प्रभाव - बालक के व्यक्तित्व विकास पर उसके सहपाठियों या विद्यालय के साथियों का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। विद्यालय में उसको सभी प्रकार के साथियों के साथ रहना पड़ता है। कई सहपाठी आयु में उससे भिन्न होते हो, कई स्नेह करने वाले तो कई निर्दयी विद्यार्थी भी उसके साथ होते हैं। इन सभी साथियों के साथ बालक अपनी विद्यालय की दिनचर्या व्यतीत करता है। छोटी आयु या छोटी कक्षा का विद्यार्थी बड़े विद्यार्थी से दबता है। यह दबना आदर्श सूचक भी हो सकता है और भय सूचक भी। अतः इन कारकों का प्रभाव बालक के व्यक्तित्व पर पड़ता है। कई बार बालक अभद्र बालकों के व्यवहारों को सीख जाता है जिसमें गाली-गलौच, विद्यालय से भागने, शिक्षकों तथा माता-पिता के साथ अभद्र व्यवहार करना सीख जाता है, जो उसके व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित करता है। सहपाठियों का बालक के व्यक्तित्व पर सबसे अधिक प्रभाव खेल-क्रीड़ा समूह के प्रभाव के रूप में पड़ता है। विद्यालय में साथ-साथ खेलने वाले या प्रतियोगिता करने वाले विद्यार्थी अपना-अपना बालक का जिस संस्कृति के परिवेश में विकास होता है उस संस्कृति के खान-पान, रहन-सहन, रीति-रिवाज, धर्म, परम्परा, विवाह, सामाजिक समारोह और सामाजिक संस्थाओं आदि का प्रभाव पड़ता है। जनजातियों की संस्कृति में भी भारी भिन्नताएं हैं। जैसे नागा लोग सिरों के शिकारी (Head Choppers) है तथा भील लड़ाकू है और संथाल सीधे-साधे हैं। इस तरह सांस्कृतिक परिवेश में सामाजिक रचना, सामाजिक स्थितियां, सामाजिक कार्य तथा नियम संहिताएं मनुष्य के व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं।

कहीं-कहीं छात्र दल बना लेते हैं और दल के नेतृत्व के लिए नेता का चुनाव भी करते हैं। इस तरह विभिन्न क्रियाओं का संचालन करने के लिए छात्र दल अलग-अलग ढंग से कार्य करता है जो उसके व्यक्तित्व विकास में सहायक है। अपने साथियों के साथ में प्रतियोगिता और प्रतिद्वन्द्विता रखने से बालक परिश्रम करता है जो उसके व्यक्तित्व विकास में सहायक होता है।

(४) विद्यालय की भौगोलिक स्थिति - विद्यालय की भौगोलिक स्थिति कैसी है, इसका प्रभाव भी बालक के व्यक्तित्व के विकास पर पड़ता है। विद्यालय कहां स्थित है तथा विद्यालय भवन की क्या स्थिति है, इसका भी प्रभाव बालक के व्यक्तित्व विकास पर पड़ता है। यदि विद्यालय प्रदूषण जनित जगह पर स्थित है, जहां वायु प्रदूषण तथा ध्वनि प्रदूषण हो तो ऐसे विद्यालय में अध्ययन करने वाले बालकों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। यदि विद्यालय ऐसे मोहल्ले में स्थित है जहां समाज कंटक जैसे शराबी, जुआरी, वेश्यावृत्ति करने वाले और चोरी करने वाले रहते हो तो ऐसे क्षेत्र के विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों के व्यक्तित्व विकास पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। इसमें बालक समाज विरोधी व्यवहार सीख सकता है।

यदि विद्यालय का भवन स्वच्छ नहीं है और जीर्ण-शीर्ण और खण्डहर अवस्था में है तो उस स्थान पर पढ़ने वाले बालकों के व्यक्तित्व के विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है। उनके मन में हर समय भवन के ढह जाने का भय रहता है तथा उनमें अन्य व्याधियां भी उत्पन्न हो सकती हो जो उनके व्यक्तित्व विकास में बाधक होते हैं।

समाज का प्रभाव[संपादित करें]

जैसा कि पूर्व में लिखा जा चुका है कि व्यक्ति समाज का अंग और इकाई है। अतः समाज का व्यक्तित्व विकास पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। समाज की परम्पराओं रीति-रिवाजों, सामाजिक नियमों का व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति समाज के लोगों के आचरण तथा प्रतिमानों को अपनाता है। जाति, वर्ण तथा व्यवसाय के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति की समाज में स्थिति अलग-अलग होती है। परिवार की सामाजिक स्थिति से बालकों के व्यक्तित्व पर भी प्रभाव पड़ता है। वर्णभेद जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा जातिभेद अर्थात् विभिन्न जातियों की सामाजिक स्थितियां भिन्न-भिन्न हैं। कुछ लोग जाति-प्रथा, पर्दा-प्रथा, बाल विवाह के पक्षधर होते हो तो कुछ घोर विरोधी। कुछ लोग समाज के प्रत्येक नियम को तोड़ने को तत्पर दिखाई देते हो जबकि कुछ लोग उनका कठोरता से पालन करते दिखाई पड़ते हैं। ऊंची जाति के बालकों में बड़प्पन की भावना और नीची जातियों में हीनता की भावना देखी जा सकती है। ऊंचे घरानों के बालकों का व्यक्तित्व संयमित दिखाई पड़ता है परन्तु इसके लिए कोई ठोस मनोवैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

बालक के व्यक्तित्व के विकास पर समाज सुधारकों, सामाजिक कार्यकर्त्ताओं तथा समाज विरोधी व्यक्तियों का भी प्रभाव पड़ता है। समाज सुधारक, समाज सेवी तथा सामाजिक कार्यकर्त्ता समाज के कल्याण तथा समाज के उत्थान के लिए कार्य करते हैं और इनका प्रभाव बालकों के व्यक्तित्व विकास पर पड़ता है। इसी तरह समाज विरोधी कार्य करने वाले और सामाजिक कंटकों का भी प्रभाव व्यक्तित्व विकास पर पड़ता है। समाज विरोधी लोग (या समाज कंटक), समाज विरोधी कार्य जैसे जेबकतरी (पॉकिट मार), चोरी, शराबखोरी, वेश्यावृत्ति आदि कार्यों को करते हो और इनका प्रभाव बालकों के व्यक्तित्व विकास पर पड़ता है। समाज-सेवक समाज के विभिन्न लोगों जैसे वृद्ध, निराश्रित, गरीब की सेवा करते हो और समाज की सुरचना करने का प्रयत्न करते हैं। उनकी परोपकारी सेवा भावनाओं का भी प्रभाव अन्य व्यक्तियों के व्यक्तित्व विकास पर पड़ता है। अन्य व्यक्ति भी परोपकारी भावनाओं को अपनाकर अपने व्यक्तित्व का सकारात्मक विकास कर सकते हैं।

सांस्कृतिक निर्धारक[संपादित करें]

व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास पर संस्कृति की अहम भूमिका है। व्यक्ति का व्यक्तित्व संस्कृति के अनुरूप होता है। जन्मकाल से ही शिशु का पालन-पोषण तथा समाजीकरण उसकी सांस्कृतिक परम्परा के अनुरूप होता है। प्रत्येक संस्कृति में शिशु के सामाजीकरण की एक विधि होती है क्योंकि इसी विधि के द्वारा संस्कृति अपने को सुरक्षित रखती है। संस्कृति और व्यक्तित्व एक दूसरे के पूरक होते हैं। आज के अधिकतर मनोवैज्ञानिकों का यह विचार है कि संस्कृति और व्यक्तित्व दो भिन्न वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि एक ही वस्तु के दो पहलू हैं। जिस संस्कृति में बालक का लालन-पालन होता है उसी संस्कृति के गुण उसके व्यक्तित्व में आ जाते हैं।

मैकाईवर और पेज (Mac Iver and Page) के शब्दों में ‘‘संस्कृति हमारे रहने व सोचने के ढंगों में, दैनिक कार्यकलापों में, कला में, साहित्य में, धर्म में, मनोरंजन और सुखोपभोग में हमारी प्रकृति की अभिव्यक्ति है।’’ इस तरह संस्कृति कार्य करने की शैलियों, मूल्यों, भावात्मक लगावों और बौद्धिक अभियान का क्षेत्र है। एक संस्कृति दूसरी संस्कृति से इन्हीं गुणों के आधार पर भिन्न होती है। अलग-अलग संस्कृतियों के अलग-अलग मूल्य होते हैं। जैसे-प्राचीन काल में भारतीय लोग धर्मपरायण और आध्यात्मिक थे। आधुनिक भारतीय उतने आध्यात्मिक एवं धार्मिक नहीं हैं। फिर भी उनमें आध्यात्मिक एवं धार्मिक मूल्य उच्च स्तर के हैं। इसका कारण भारतीय संस्कृति का प्रभाव ही है। पाश्चात्य लोगों के लिए भौतिक व मानसिक मूल्य उच्च स्तर के हैं। इसी तरह अलग-अलग संस्कृति के समाजों में रहन-सहन, रीति-रिवाज, धर्म, कला, मूल्यों और परम्पराओं में भिन्नताएं देखी जा सकती हैं। कुछ संस्कृतियों की जातियों में मनुष्य हत्या को पाप समझते हैं तो दूसरी ओर नागा संस्कृति में उन लोगों का बड़ा सम्मान होता है जो नर मुण्ड काट के लाते है। जो व्यक्ति जितने ज्यादा नर मुण्ड काटता है उतनी ही समाज में उसकी प्रतिष्ठा बढ़ती है और उतने ही ज्यादा स्त्रियों के विवाह के प्रस्ताव आते हैं। जबकि दूसरी संस्कृति में नर हत्या करने वाले के साथ समाज के लोग अपनी बेटी का विवाह नहीं करना चाहते। भारतीय संस्कृति के कुछ परिवारों में तलाक देना अच्छा नहीं माना जाता परन्तु कुछ जनजातियों में जो स्त्री जितने अधिक तलाक पाती है, उसकी प्रतिष्ठा उतनी ही अधिक बढ़ती है। पाश्चात्य देशों में तलाक को बुरा नहीं माना जाता है। कुछ समाज में कुंआरी कन्या के गर्भवती हो जाने पर कोई उससे विवाह नहीं करता, परन्तु कुछ जन-जातियों में विवाह से पहले संतानोत्पत्ति करना लड़की के विवाह में सहायक होता है। इस तरह की सांस्कृतिक भिन्नताएं बालक के व्यक्तित्व के विकास पर प्रभाव डालती है

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

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