लोक साहित्य

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लोक सहित्य का अभिप्राय उस साहित्य से है जिसकी रचना लोक करता है। लोक-साहित्य उतना ही प्राचीन है जितना कि मानव, इसलिए उसमें जन-जीवन की प्रत्येक अवस्था, प्रत्येक वर्ग, प्रत्येक समय और प्रकृति सभी कुछ समाहित है।

डॉ॰ सत्येन्द्र के अनुसार- "लोक मनुष्य समाज का वह वर्ग है जो आभिजात्य संस्कार शास्त्रीयता और पांडित्य की चेतना अथवा अहंकार से शून्य है और जो एक परंपरा के प्रवाह में जीवित रहता है।" (लोक साहित्य विज्ञान, डॉ॰ सत्येन्द्र, पृष्ठ-03)

साधारण जनता से संबंधित साहित्य को लोकसाहित्य कहना चाहिए। साधारण जनजीवन विशिष्ट जीवन से भिन्न होता है अत: जनसाहित्य (लोकसाहित्य) का आदर्श विशिष्ट साहित्य से पृथक् होता है। किसी देश अथवा क्षेत्र का लोकसाहित्य वहाँ की आदिकाल से लेकर अब तक की उन सभी प्रवृत्तियों का प्रतीक होता है जो साधारण जनस्वभाव के अंतर्गत आती हैं। इस साहित्य में जनजीवन की सभी प्रकार की भावनाएँ बिना किसी कृत्रिमता के समाई रहती हैं। अत: यदि कहीं की समूची संस्कृति का अध्ययन करना हो तो वहाँ के लोकसाहित्य का विशेष अवलोकन करना पड़ेगा। यह लिपिबद्ध बहुत कम और मौखिक अधिक होता है। वैसे हिंदी लोकसाहित्य को लिपिबद्ध करने का प्रयास इधर कुछ वर्षों से किया जा रहा है और अनेक ग्रंथ भी संपादित रूप में सामने आए हैं किंतु अब भी मौखिक लोकसाहित्य बहुत बड़ी मात्रा में असंगृहीत है।

लोक जीवन की जैसी सरलतम, नैसर्गिक अनुभूतिमयी अभिव्यंजना का चित्रण लोकगीतों व लोक-कथाओं में मिलता है, वैसा अन्यत्र सर्वथा दुर्लभ है। लोक-साहित्य में लोक-मानव का हृदय बोलता है। प्रकृति स्वयं गाती-गुनगुनाती है। लोक-साहित्य में निहित सौंदर्य का मूल्यांकन सर्वथा अनुभूतिजन्य है।

परिचय[संपादित करें]

आदिकाल से श्रुति एवं स्मृति के सहारे जीवित रहनेवाले लोकसाहित्य के कुछ विशेष सिद्धांत हैं। इस साहित्य में मुख्य रूप से वे रचनाएँ ही स्वीकार की जाती हैं अथवा जीवन पाती हैं जो अनेक कंठों से अनेक रूपों में बन बिगड़कर एक सर्वमान्य रूप धारण कर लेती हैं। यह रचनाक्रम आदिकाल से अबतक जारी है। ऐसी बहुत सी साहित्यक सामग्री आज भी प्रचलित है जो अभी एकरूपता नहीं ग्रहण कर पाई हैं। परंपरागत एवं सामूहिक प्रतिभाओं से निर्मित होने के कारण विद्वानों ने लोकसाहित्य को "अपौरुषेय" की संज्ञा दी है।

निश्चय ही परंपरागत लोकसाहित्य किसी एक व्यक्ति की रचना का परिणाम नहीं है। वैसे तो इसके कई प्रमाण दिए जा सकते हैं कि एक ही गीत, कथा या कहावत एक स्थल पर जिस रूप में होता है दूसरे स्थल पर पहुँचते-पहुँचते उसका वह रूप बदल जाता है किंतु एक अच्छा प्रमाण यह होगा कि सैकड़ों वर्ष से गाए जानेवाले लोकमहाकाव्य आल्ह-खंड को आज तक एकरूपता नहीं प्राप्त हो सकी। इस कार्य में लोकप्रवृत्ति किसी प्रतिबंध को स्वीकार ही नहीं करती। स्फुट गीतों में तो केवल पंक्तियाँ ही इधर उधर होती हैं किंतु प्रबंध गीतों (गाथाओं) एवं कथाओं में घटनाएँ भी बदलती रहती हैं। यह सब होते हुए भी उन प्रबंधों एवं कथाओं के परिणामों में प्राय: कोई परिवर्तन नहीं स्वीकार किया जाता। परिणाम एवं लोकप्रचलित सत्य तथा तथ्य को आधार मानकर घटनाचक्र मनमाने ढंग से चलाए जाते हैं। रामकथा को ही लें। "नाना भाँति राम अवतारा, रामायन सत कोटि अपारा" वाली बात शत प्रतिशत सत्य है। रामकथा संबंधी जितनी विविधताएँ लोकसाहित्य में प्रचलित हैं यदि उन सब को एकत्र किया जाए तो यह विचित्र प्रकार का "लोकरामायण" ग्रंथ तैयार होगा जो अबतक के सभी रामाख्यानों से भिन्न अस्तित्व का होगा। घटनाचक्रों को देखते हुए कभी-कभी तो उनकी संगति बैठाना भी कठिन हो जाएगा। उदाहरणस्वरूप लोकगीतों में भी रामजन्म के कई कारण हैं किंतु एक बहुत ही साधारण कारण यह है कि एक बार जब महाराज दशरथ प्रात: काल सरयू में स्नान करने जा रहे थे तो उनका दर्शन सवेरे ही गली में झाडू देनेवाली हेलिन (भंगिन) को हो गया। उसने ताना मारा कि आज प्रात: काल ही सतानहीन व्यक्ति का दर्शन हुआ, पता नहीं दिन कैसे बीतेगा। दशरथ को यह बात लग गई और तभी वे रानी समेत पुत्रप्राप्ति के लिए वन में तप करने चले गए। इस प्रकार कारण दूसरा दिखाते हुए भी लोककथाकार दशरथ को फिर तपस्यावाले स्थल पर ले आता है जहाँ कथा अन्य रामायणों की कथा से मिल जाती हैं।

ऐसे अनेक उदाहरण मिल सकते हैं जो परिणाम में तो नहीं किंतु घटनाओं के मामले में एक नहीं हैं। ऐसे परिवर्तनों एवं संशोधनों को लोकसाहित्य बहुत ही आसानी से स्वीकार कर लेता है। इस साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अनेक रूपों में होते हुए भी अनेकता में एकता की भावना से युक्त होता है। भाषा के कलेवर को बदलकर भी भावपक्ष में कोई परिवर्तन नहीं दीखता। एक ही रचना जो किसी स्थल पर वहाँ की बोली में पाई जाती है, वही बहुत दूर दूसरी बोली में भी मिल जाती है। स्फुट गीतों के भावों एवं प्रबंधों की कथाओं की यह यात्रा कभी कभी तो इतनी लंबी होती है कि आश्चर्य होता है। क्षेत्रों एवं देशों की सीमा मनुष्य भले ही निर्धारित कर दे पर लोकसाहित्य इसे स्वीकार नहीं करता। ऐसा शायद इसलिए संभव हुआ होगा कि यात्राकाल में प्राचीन मानव जब कभी दूर गया होगा तो अपना साहित्य साथ लेता गया होगा और गंतव्य स्थान पर उसकी छाप छोड़ आया होगा जिसे वहाँ के लोगों ने स्वीकार कर लिया होगा। यह क्रम आज भी जारी है। जब कोई ग्राम्या नैहर से ससुराल जाती है तो स्वभावत: वह नैहर की उन लोकरचनाओं को अपने साथ लेती जाती हैं जो उसे स्मरण रहती हैं। यदि उसका विवाह मायके की बोलीवाले क्षेत्र में हुआ तब तो कोई बात नहीं, किंतु अन्य बोली के क्षेत्र में विवाह होने पर वह नैहर के गीतों को स्थानीय बोली के लहजों में ढाल लेती है। उस इस कार्य में ससुराल की ग्राम्याओं द्वारा भी सहायता मिलती है। इस प्रकार बनाव बिगाड़ बराबर चलते रहते हैं। लोकगायक एवं गायिकाओं का यह स्वभाव बहुत दिनों से चला आ रहा है कि यदि उन्हें किसी कवि की रचना पसंद आ गई तो उसे तोड़ मरोड़कर अपनी बोली के अनुकूल बना लेती हैं। ऐसा करते समय कभी कवि का नाम निकाल दिया जाता है और कभी रहने दिया जाता है। प्रमाण के लिए आज भी ऐसे लोकगीत सुने जा सकते हैं - जो सूर, कबीर, तुलसी एवं मीरा के प्रकाशित ग्रंथों में जिस तरह मिलेंगे लोकगायकों के कंठ पर उनका वह रूप नहीं होगा। कुछ लोकगीतों में तो अनायास ही उनके नाम डाल दिए गए हैं। यह प्रवृत्ति हिंदी ही नहीं अन्य भाषाओं के लोकसाहित्य में भी पाई जाती है। कुछ विद्वानों का कहना है कि ऐसे भजन तथा गीत लोककवियों द्वारा स्वयं बना लिए गए हैं और उनकी उपयोगिता को बढ़ाने के लिए उच्च एवं बहुश्रुत कवियों के नाम जोड़ दिए गए ताकि अधिकांश लोग ऐसे गीतों को याद कर लें। पर यह बात है नहीं। लोककवि इसी स्थल पर तो उदार होता है। ऐसे बहुत से भजन लोकजीवन में न जाने कब से चले आ रहे हैं जिनके रचनाकारों के बारे में पता ही नहीं चलता। सत्य तो यह है कि इस प्रकार के भजनों की संख्या नामयुक्त भजनों की संख्या से कहीं अधिक है और वे सरसता में भी नामधारी भजनों से घटकर नहीं हैं। लोकगायकों की एक प्रवृत्ति यह भी होती है कि वे स्थानीय घटनाओं को तुरंत भावबद्ध कर लेते हैं, जैसा 1934 के बिहार भूकंप के समय हुआ था। बहुत दिनों से चली आ रही आंचलिक कथात्मक सामग्रियाँ इसी प्रवृत्ति की देन हैं। घटनाप्रधान प्रबंध एवं लोककथाएँ इस प्रवृत्ति से जन्म तो पा जाती हैं किंतु दीर्घ जीवन मात्र उनको मिलता है जो जनमानस को अधिक कुशलता के साथ छूती हैं।

विशिष्टताएँ[संपादित करें]

लोक-साहित्य की भाषा शिष्ट और साहित्यिक भाषा न होकर साधारण जन की भाषा है और उसकी वर्ण्य-वस्तु लोक-जीवन में गृहीत चरित्रों, भावों और प्रभावों तक सीमित है। यह तो लोक-साहित्य की पहली मर्यादा हुई। इसकी दूसरी मर्यादा है, उसकी रचना में व्यक्ति का नहीं बल्कि समूचे समाज का समावेत योगदान। यही कारण है कि लोक-साहित्य पर व्यक्ति की छाप न होकर समग्र व्यक्ति-लोक की छाप होती है। शिल्प-विधान की बात करते समय हम जब इन दो मुख्य मर्यादाओं को सामने रखते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इसमें शिल्प-विधान के लिए कोई अभ्यास या कौशल परिलक्षित नहीं हो सकता, क्योंकि शिल्प का विधान यदि हमें दिखाता है तो वह सामाजिक समरसता की विवशता के कारण अपने आप उद्भूत रूप में ही। वैसे प्रचलित अर्थ में शिल्प-विधान की बात यहाँ नहीं उठायी जा सकती है। लोग समझते यही हैं कि शिल्प के पीछे एक पूर्व-चिन्तित व्यापार अवश्य सन्निहित होता है और चूँकि लोक-साहित्य में ऐसा कोई व्यापार होने की सम्भावना नहीं है इसलिए उसके शिल्प-विधान की बात नहीं उठती। पर तात्त्विक दृष्टि से देखने पर शिल्प-विधान का अर्थ है अभिव्यक्ति को अभिव्यज्य से जोड़ना।

लोक-साहित्य में शिल्प-विधान अपने उत्कर्ष पर है, क्योंकि वह, सबसे अधिक यहीं पर निरभिमान, निर्व्याज और निसर्गोद्भूत है।

प्रकार[संपादित करें]

लोक-साहित्य के मुख्यतः चार भेद कहे जाते हैं; लोक-गीत, लोक-गाथा, लोक-कथा और लोक-नाट्य। लोक-गाथा और लोक-कथा में भेद इतना ही है कि लोक-गाथा एक लम्बे आख्यान-गीत के रूप में चलती है और इसमें प्रबन्ध-योजना गाथा-प्रधान न होकर रस-प्रधान होती है, जबकि लोक-कथा गद्यात्मक होने के साथ-साथ कथा प्रधान या दूसरे शब्दों में घटना-प्रधान हुआ करती है। लोक-नाट्य जनसुलभ रंगमंच को दृष्टि में रखकर आंगिक और वाचिक अभिनय पर आधृत स्वांग या लीला तक सीमित रहता है। इसमें सामायिकता का विशेष ध्यान रहने के कारण स्थायी प्रभाव डालने की क्षमता नहीं होती है। लोक-कथाओं और लोक-गाथाओं में कथा-शिल्प ही प्रमुख रहता है, केवल लोक-गान ऐसा प्रकार है, जिसमें अपने समग्र रूप में शिल्प-विधान विकसित हो सकता है, इन चारों प्रकार के रूपों में शिल्प-विधान के ये अंग समान रूप से अपेक्षित हैं।

प्रवृत्तियाँ[संपादित करें]

लोकसाहित्य की जो अपनी कुछ विशेष प्रवृत्तियाँ हैं वे उतनी ही प्राचीन हैं जितना प्राचीन यह साहित्य है। इन प्रवृत्तियों की पुष्टि को ही विशाल एवं विभिन्न रचना कराने का श्रेय है। सुविधा के लिए इन्हें निम्नलिखित प्रकारों में बाँटा जा सकता है :

देवी देवताओं एवं प्राकृतिक उपलब्धियों पर आधारित साहित्य[संपादित करें]

आदिकालीन मानव के प्रकृतिप्रदत्त विभिन्न कल्याणकारी परिणामों से प्रभावित होने के कारण उनपर जो विश्वास आरोपि किया इससे संबद्ध साहित्य इसके अंतर्गत आता है। इसमें भक्ति एवं भय दोनों प्रकार की भावनाएँ सन्निहित होती हैं। देवी देवताओं की पूजा के लिए रचित तथा अंधविश्वासों से संबद्ध साहित्य (टोना, टोटका, मंत्र एवं जादू इत्यादि) इसी के अंतर्गत है। इनमें कुछ विश्वासों को आंचलिक और कुछ को व्यापक महत्व दिया जाता है। स्थानीय उपलब्धियों पर स्थानीय और व्यापक पर व्यापक रचनाएँ मिलती हैं। धरती, आकाश, कुँआ, तालाब, नदी, नाला, डीह, ड््योहार, मरी मसान, वृक्ष, फसल, पौधा, पशु, दैत्य दानव देवी देवता, कुलदेवता, ब्रह्म एवं तीर्थ आदि पर जो मंत्र या गीत प्रचलित हैं वे इसी के अंग हैं। जब भी ग्रामीण कोई शुभ कार्य (जन्म से लेकर मरण तक के सभी संस्कार तथा खेती बारी, फसल की पूजा, गृहनिर्माण, कूपनिर्माण, मंदिर एवं धर्मशाला का निर्माण और परमार्थ संबंधी अन्य कार्य) प्रारंभ करते हैं तो उससे संबद्ध देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए जिन गीतों अथवा मंत्रों का प्रयोग होता है वे सब इस साहित्य में आते हैं। रोगों के निदान के लिए भी बजाय ओषधि के गीतों एवं मंत्रों का प्रयोग होता है। उदाहरण के लिए शीतला माता के गीतों को लिया जा सकता है। पृथक्-पृथक् देवी देवताओं के लिए पृथक्-पृथक् मंत्र, गीत, पूजन एवं भोग आदि की सामग्रियाँ पता नहीं कब से निर्धारित की जा चुकी हैं। किसी को कुछ पसंद होता है परंतु ब्रह्म को इन सब के स्थान पर जनेऊ चाहिए। इन्हीं के अनुसार गीत एव मंत्र तो बदलते ही हैं, साथ ही पुजारी भी बदलते रहते हैं।

लोकाचार के लिए रचित साहित्य[संपादित करें]

इसके अंतर्गत आचार विचार एवं व्यावहारिकता तथा विभिन्न लोकमान्यताओं से संबद्ध साहित्य आता है। आचार-विचार के लिए रचित साहित्य में भावनाओं और मान्यताओं का प्रवेश है किंतु व्यवहार के लिए रचे गए साहित्य में यह बात कम देखने को मिलती है। व्यवहार की विशेषता लोकसाहित्य में मुख्य रूप से देखने को मिलती है। आपसी व्यवहार की बात तो जाने दें। यहाँ साँप को भी दूध पिलाया जाता है। वृक्ष (बरगद, पीपल) को भी बाबा कहा जाता है और बदली तथा नदियाँ बहन का रूप धारण करती हैं। इसी तरह अनेक अमानवीय तत्वों से तथा हिंसक जंतुओं से संबंध जोड़कर सारी सृष्टि को एक रूप में बाँधा गया है। इस संदर्भ में रचे हुए साहित्य का मूल उद्देश्य व्यावहारिकता के आधार पर सरल एवं सुखी जीवन व्यतीत करना है। यही कारण है कि जनजीवन एक रिश्ते में बँधा हुआ है और जातीय भेदभाव, जो भीषण रूप से व्याप्त हैं, उसकी दीवार को तोड़ नहीं सके हैं। दादी दादा, भाई बहन आदि के रिश्ते पूरे गाँव में बिना किसी जातीय भेदभाव के चला करते हैं। विभिन्न अवसरों के लिए प्रचलित लोकाचार भी इसी विधा के अंग हैं।

वैज्ञानिकता पर आधारित साहित्य[संपादित करें]

इस साहित्य के अंतर्गत ऋतुविद्या, स्वास्थ्यविज्ञान, कृषिविज्ञान, एवं शकुन आदि से संबद्ध साहित्य आता है। लोकजीवन में इस प्रकार के साहित्य को आधुनिक वैज्ञानिक युग में काफी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इनमें पूर्वाचार्यों द्वारा निर्धारित अनुभूमियों, नियमों एवं तत्संबंधी उपदेशात्मक बातों का समावेश होता है। यह मान्यताएँ प्राय: परीक्षा की कसौटी पर खरी उतरती है किंतु साथ ही कुछ अपवाद भी हैं। ऋतुविज्ञान के अंतर्गत अतिवृष्टि, अनावृष्टि एवं अल्पवृष्टि के कारणों तथा तज्जन्य क्षतियों और उनसे बचने के उपायों की ओर संकेत किए गए हैं। इस प्रकार के वैज्ञानिक साहित्य के आधार परंपरागत अनुभव ही होते हैं। चूँकि वह अनुभव बहुत पक्के होते हैं इसलिए लोकगीतों की भाँति इनके बनने बिगड़ने की संभावनाएँ कम हुआ करती हैं। यही दशा कृषिविज्ञान के लिए रचे गए साहित्य की है। इसके अंतर्गत खेती से संबद्ध प्राय: आवश्यक बातें कह दी गई हैं। खेत की जुताई किस तरह हो, किस प्रकार के खेत में किस प्रकार की बुआई की जाए, बीज की मात्रा कितनी हो, सिंचाई कब की जाए, निरवाही एवं गुड़ाई कब की जाए तथा किस समय फसल की कटाई हो, यह सब बातें तो वैज्ञानिक साहित्य के अंतर्गत आती ही हैं, इनके अतिरिक्त फसल संबंधी रोगों तथा उपचारों का भी वर्णन मिलता है। कृषि कार्यों में काम आनेवाले उपकरणों तथा बैलों की पहचान आदि पर भी भारी मात्रा में साहित्यरचना की गई है। बैलों के अतिरिक्त अन्य पालतू पशुपक्षियों के बारे में भी प्रचुर संकेत मिलते हैं। बैलों के बाद सार्वजनिक साहित्य घोड़ों की पहचान के संबंध में प्राप्त होता है। चूँकि आधुनिक वैज्ञानिक वाहनों के कारण अब घोड़े कम रखे जाते हैं इसलिए इस प्रकार के साहित्य का धीरे धीरे अभाव होता जा रहा है। गाँव गाँव में ट्रैक्टरों के पहुँच जाने से बैलों की पहचान के बारे में लिखे गए साहित्य की भी आगे शायद यही दशा होगी। अन्य पालतू पशुओं में गाय, भैंस एवं कुत्तों की चरचा आती है किंतु इनपर नाम मात्र के लिए संकेत किया गया है। पक्षियों में तोता, मैना, कौआ, मुनियाँ, मोर, कोयल तथा कबूतर आदि के बारे में संकेत दिए गए हैं। ग्रामीणों के उपयोग में जितने प्रकार के पशुपक्षी आते हैं उन सबकी पहिचान एवं उनसे होनेवाले लाभहानि के बारे में इस साहित्य के अंतर्गत संकेत प्राप्त होते हैं।

स्वास्थ्यविज्ञान में विभिन्न रोगों के लक्षण और उनसे बचने के उपाय तथा औषधियों की ओर संकेत मिलता है। कौन सा रोग क्यों उत्पन्न होता है तथा किन आचरणों से रोग उत्पन्न नहीं होता या दूर हो जाता है आदि बातें इसे अंतर्गत आती हैं। साथ ही स्वास्थ्यप्रदायिनी दिनचर्यां के लिए कुछ आदेश भी दिए गए हैं। जड़ी बूटियों की पहचान, उनके उपयोग तथा इससे उत्पन्न लाभहानि की चर्चां भी इस विभाग के विषय हैं। इस तरह के संकेत प्राय: आदेश के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं और वे पद्यों में हैं।

यही विधा कृषिविज्ञान एवं शकुनविज्ञान के लिए रचे गए साहित्य में भी अपनाई गई है। शकुनविचार संबंधी साहित्य में मुख्य रूप से यात्रा आरंभ करने के लिए कालक्रमानुसार शुभ लक्षणों को देखते हुए या तो आदेश दिए गए हैं या अपशकुतों के कारण यात्रारंभ के लिए मनाही की गई है। यदि यात्रा बहुत ही आवश्यक हो और दिनों की गणना में उसका समय अनुकूल न पड़ता हो तो उससे वचने के लिए उपाय बताए गए हैं। ऋतुओं, मानव लक्षणों एवं पशुपक्षियों की विभिन्न हरकतों द्वारा भी शकुन अपशकुन की जानकारी इस प्रकार के साहित्य के अंतर्गत कराई जाती है। जैसे वर्षा काल में घर नहीं छोड़ना चाहिए, मुंडेरे पर यदि प्रात: काल काग बोले तो उसे किसी प्रिय जन के आगमन की सूचना समझनी चाहिए, इत्यादि।

जातीय लोकसाहित्य[संपादित करें]

संपूर्ण लोकसाहित्य का एक सर्वमान्य रूप तो होता ही है किंतु साथ ही विभिन्न जातियों की परंपरागत संस्कृति पर आधारित साहित्य भी होता है। इनमें उन जातियों के निजी देवी देवता, कुल देवता के आदेश तथा आचार्यों एवं संत महात्माओं द्वारा बताए गए नियम, उपनियम और उनकी वाणी शामिल होती है। विभिन्न जातियों जैसे - नाई, धोबी, अहीर, चमार, कुर्मी, कोयरी, नोनियाँ, बार, भाट आदि एवं वन्य तथा अन्य जातियों की पृथक् पृथक् संस्कृति जातीय लोकसाहित्य के अंतर्गत आती है। यदि यह कहा जाए कि कहीं का संपूर्ण लोकसाहित्य वहाँ की विभिन्न जातियों की सामूहिक संस्कृति का प्रतीक होता है और अनुपयुक्त नहीं होगा। जातीय साहित्य को निकाल देने पर लोकसाहित्य का जो रूप बच जाएगा वह उसका सच्चा प्रतिनिधित्व नहीं करेगा।

लोकसाहित्य की रचनास्थली[संपादित करें]

इस साहित्य की रचनास्थली विशिष्ट साहित्य की रचनास्थली से भिन्न होती है। यह लोकसाहित्य की ही विशेषता है कि उसके किसी भी प्रकार का निर्माण एकांत में नहीं होता। प्राय: वे सभी स्थल उक्त साहित्य के रचनाकेंद्र होते हैं जहाँ समय समय पर उसे प्रेमी अथवा आवश्यकताओं से प्रेरित ग्राम्य जन जुटा करते हैं। इसीलिए ऐसा कभी नहीं कहा जा सकता कि लोकसाहित्य के अंग का आज जो रूप है वही कल भी था और आगे भी बना रहेगा। यदि हम कहें कि लोकसाहित्य की प्रमुख रचनास्थली चौपाल एवं आँगन है तो बेजा नहीं होगा। चौपालों में प्राय: अवकाश के समय गाँव के लोग एकत्र हो जाते हैं। तरह तरह की बातें चलती हैं। रीतिरिवाजों की चर्चा, धर्मचर्चा, कथा-कहानियाँ, खेती बारी की बात तथा लोकगीत आदि समय समय पर चौपालों को मुखरित करते रहते हैं। वर्तमान काल की स्थानीय प्रमुख घटनाएँ भी कुछ दिनों तक वार्ता के लिए आधार बनी रहती हैं। इन सबके निचोड़ रूप में जो सामग्री जीवन पा जाती है वही कुछ दिनों बाद स्थानीय साहित्य में शामिल हो जाती हैं। यदि महत्व अधिक हुआ तो ऐसी रचनाओं का प्रचार बढ़ जाता है और वे एक चौपाल से दूसरी में तथा एक गाँव के दूसरे गाँव में जाकर अपना क्षेत्र व्यापक बनाती रहती हैं। इस प्रकार वे रचनाएँ कुछ वर्षों में विस्तृत लोकसाहित्य के भंडार में सम्मिलित हो जाती हैं। यही बात ऑगन में रचे गए साहित्य पर लागू होती है जहाँ ग्राम्याएँ समय समय पर एकत्र होती हैं। इस तरह पुरुषों एवं स्त्रियों का साहित्य जन्म से ही पृथक्-पृथक् होता है। चौपालों एवं आँगनों के अतिरिक्त भी कुछ ऐसे स्थान हैं जहाँ इस साहित्य की विभिन्न विधाएँ निर्मित होती हैं। खेतों में निरवाही अथवा कटिया करते समय, डाँठ के गट्ठर ढोते समय, अन्य सामूहिक मजदूरी करते समय, तीर्थ अथवा मेला यात्रा में, जाड़े में सायंकाल अलावों के पास, पर्वों एवं सांस्कारिक आयोजनों के समय अथवा संक्षेप में यह कहिए कि जब और जहाँ ग्रामीण स्त्री पुरुषों के जुटाव का अवसर आता है तब और तहाँ लोकसाहित्य का निर्माण होता रहता है।

लोकसाहित्य का जीवन[संपादित करें]

ऐसा नहीं कहा जा सकता कि भूतकाल में रचा गया सभी लोकसाहित्य जीवित है और आज जिनका निर्माण हो रहा है उनका अंत कभी नहीं होगा। सच तो यह है कि इस साहित्य की विधाएँ युगप्रभाव को स्वीकार करके अपना रूप बराबर बदलती रहती हैं। इधर पचास वर्ष के भीतर रचे गए साहित्य को देखने से यह बात स्पष्ट भी हो जाती है। इस अवधि में गाँवों को जितनी वैज्ञानिक उपलब्धियाँ प्राप्त हुई हैं उनमें अधिकांश का समावेश लोकसाहित्य में हो चुका है। प्राचीन लोकसाहित्य में आए जादू के उड़न खटोले को छोड़कर इस युग के लोकसाहित्य ने सीधे सीधे हवाई जहाज को स्वीकार किया है। वैसे लोकसाहित्य में बैलगाड़ी, घोड़ा, ऊँट, हाथी तथा नौका आदि वाहन अब भी जीवित हैं किंतु मोटर एवं रेलगाड़ी ने भी अपना स्थान बना लिया है। वर्तमान काल में होनेवाले नव निर्माणों को भी उक्त साहित्य में स्थान मिलता जा रहा है। इन साहित्यिक रचनाओं के साथ वे सभी लक्षण भी लगे हुए हैं जो उन्हें दीर्घ जीवन प्रदान करते हैं। प्राय: विद्वान् लोग यह कहा करते हैं कि यदि विस्तृत लोकसाहित्य का संग्रह नहीं कर लिया गया तो उनका लोप हो जाएगा। बात सही है क्योंकि युगप्रभाव के कारण प्राचीन रचनाएँ अनुपयुक्त प्रतीत होने लगती हैं और फिर धीरे धीरे लुप्त हो जाती हैं, जैसा कि इस समय हो भी रहा है। सिनेमा के गीतों ने गाँवों में अपना स्थान बना लिया है जिससे लोकगीत क्षीणता को प्राप्त हो रहे हैं। शिक्षा का प्रसार होने के कारण भी गाँवों की बोलियों में गीत गानेवाले पुरुषों एवं स्त्रियों का अभाव होता जा रहा है। ऐसा लग रहा है कि कुछ दिनों में विभिन्न संस्कारों के अवसर पर गाए जानेवाले प्राचीन लोकगीतों का लोप हो जाएगा और उनके स्थान पर नवीन गीत स्थान पाएँगे या यदि इच्छा हुई तो लोकसाहित्य के संग्रहों का देख-देख कर पढ़ी लिखी स्त्रियाँ गीत गाकर काम चलाएँगी। आटा पीसनेवाली कल गाँव में पहुँच चुकी है और भी बहुत से यंत्रों का प्रसार होता जा रहा है इसलिए "ज़ंतसर" (जाँत के गीत) तथा कुछ अन्य श्रम संबंधी गीतों की कमी होती जा रही है।

इसी तरह वर्तमान युग की घटनाएँ भी इसमें स्वीकार की जा रही हैं। झाँसी की रानी, कुँवर सिंह, गांधी जी, सुभाषचंद्र, भगत सिंह, खुदीराम एवं चंद्रशेखर आजाद आदि लोकसाहित्य में प्रतिष्ठा के साथ जीवित हैं। ये वीर सेनानी उसी कड़ी में जोड़े गए हैं जिनमें प्राचीन काल के वीरों के नाम आते हैं।

लोकसाहित्य का स्थान[संपादित करें]

उपर्युक्त विवेन से लोकसाहित्य का स्थान स्पष्ट हो जाता है किंतु धरातल से उठनेवाले इस साहित्य ने अपना एक शीर्षस्थ स्थान भी बनाया है जहाँ उसे वैदिक साहित्य के समकक्ष आसन प्राप्त है। प्रमाण यह है कि हमारे लोकजीवन के बहुत से और विशेषकर सांस्कारिक तथा धार्मिक कार्य वैदिक मंत्रों से पूर्ण होते हैं। जहाँ ये मंत्र संस्कृत में पढ़े जाते हैं वहीं ग्राम्याओं द्वारा गाए जानेवाले लोकगीत तथा लोकाचार पर आधारित अन्य क्रियाकलाप भी चलते रहते हैं। एक और पुरोहित मंत्राच्चार करता है तो दूसरी और ग्रामीण स्त्रियाँ गीत गाती हैं। मुंडन, कर्णवेध, यज्ञोपवीत तथा विवाह आदि संस्कारों पर और मकान, धर्मशाला, कुंआँ तथा तालाब आदि का शुभारंभ करते समय भी मंत्र तथा लोकगीत साथ साथ चलते हैं। ऐसा एक ही सांस्कारिक एवं धार्मिक तथा परमार्थ का कार्य लोकजीवन में नहीं मिलता जिसमें वैदिक साहित्य के साथ लोकसाहित्य को स्थान न प्राप्त हो।

लोक साहित्य की प्रमुख रचनाएँ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]