मैथुन

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मानवों में सम्भोग की 'मिशनरी पोजीशन' नामक सम्भोग-स्थिति जो सबसे अधिक प्रचलित है।[1][2] (विकिमीडिया कॉमन्स से लिया गया चित्र)

मैथुन जीव विज्ञान में आनुवांशिक लक्षणों के संयोजन और मिश्रण की एक प्रक्रिया है जो किसी जीव के नर या मादा (जीव का लिंग) होना निर्धारित करती है। मैथुन में विशेष कोशिकाओं (गैमीट) के मिलने से जिस नये जीव का निर्माण होता है, उसमें माता-पिता दोनों के लक्षण होते हैं। गैमीट रूप व आकार में बराबर हो सकते हैं परन्तु मनुष्यों में नर गैमीट (शुक्राणु) छोटा होता है जबकि मादा गैमीट (अण्डाणु) बड़ा होता है।

जीव का लिंग इस पर निर्भर करता है कि वह कौन सा गैमीट उत्पन्न करता है। नर गैमीट पैदा करने वाला नर तथा मादा गैमीट पैदा करने वाला मादा कहलाता है। कई जीव एक साथ दोनों पैदा करते हैं जैसे कुछ मछलियाँ

यद्यपि सम्भोग के सामान्य समय के बारे में कुछ नहीं बताया गया है तथापि अधिकांश पुरुषों में यह जिज्ञासा रहती ही है कि सामान्य समय क्या है? अथवा क्या वे अपने साथी को सन्तुष्ट भी कर पाते हैं या नहीं और कितनी देर तक सम्भोग किया जा सकता है? आदि-आदि।

मैथुन के कारण[संपादित करें]

कामशास्त्र के अनुसार यद्यपि मैथुन का मुख्य उद्देश्य पुनरुत्पति है, तथापि मनुष्यों तथा वानरों में यह बहुधा यौन सुख प्राप्त करने तथा प्रेम जताने हेतु भी किया जाता है। मैथुन मनुष्य की मूल आवश्यकता है। साधारण भाषा मे मैथुन एक से अधिक काम-क्रियाओं को सम्बोधित करने के लिये भी प्रयोग किया जाता है। योनि मैथुन, हस्तमैथुन, मुख मैथुन, गुदा मैथुन आदि अन्य काम-कलाएँ इसके अन्तर्गत आती हैं। अंग्रेज़ वैज्ञानिकों का मानना है कि पुनरुत्पति के लिये दो लिंगों के बीच मैथुन का विकास जीवधारियों में बहुत पहले से ही जीवाणुओं के दुष्प्रभाव से बचने के लिये हुआ था।[3]

मनुष्यों मे मैथुन[संपादित करें]

प्रेम जताने की क्रिया अक्सर मैथुन से पहले निभायी जाती है। इसके पश्चात् पुरुष के लिंग में उठाव व कठोरता उत्पन्न होती है और स्त्री की योनि में सहज चिकनाहट। मैथुन करने के लिए पुरुष अपने तने हुए लिंग को स्त्री की योनि में प्रविष्ट करता है।[4][5][6][7] इसके पश्चात् दोनो साझेदार अपने कूल्हों को आगे-पीछे कर लिंग को योनि में घर्षण प्रदान करते हैं। इस क्रिया में लिंग किसी भी समय योनि से पूर्णरूप से बाहर नहीं आता। इस क्रिया में दोनों ही साझेदारों को यौनिक आनन्द प्राप्त होता है। यह क्रिया तब तक जारी रहती है जब तक पुरुष और स्त्री दोनों ही एक अत्यधिक आनन्द की स्थिति कामोन्माद नहीं प्राप्त कर लेते। कामोन्माद की स्थिति में पुरुष और स्त्री दोनों ही स्खलन महसूस करते हैं। पुरुष शुक्राणुओं का स्खलन अपने लिंग से वीर्य के रूप में करता है, जबकि स्त्री की योनि से तरल पदार्थों का रज के रूप में स्खलन होता हैं।

कामसूत्र का दृष्टिकोण[संपादित करें]

सम्भोग भारतीय चिन्तन में सिर्फ एक शारीरिक क्रिया ही नहीं है बल्कि काम कला का एक रूप भी है। भारतीय समाज में एक सम्प्रदाय (स्कूल) ऐसा भी था जिसका सम्भोग के प्रति भौतिकवादी रवैया रहा है। सम्भोग को संस्कृति के साथ जोड़कर देखा गया है। संस्कृत साहित्य में कामुक इमेजों का सांस्कृतिक सन्दर्भ में ही विमर्श सामने आता है। कामसूत्र में सम्भोग से लेकर चुम्बन तक के जितने भी प्रकारों का वर्णन है उनके केन्द्र में शरीर से ज्यादा महत्व संस्कृति को दिया गया है। यहाँ तक कि स्त्री-पुरुष के मानकों और गुणों को भी संस्कृति के सन्दर्भ में ही व्याख्यायित किया गया है। कामसूत्र में सम्भोग का स्वप्न के जरिए अथवा मन:स्थिति के रूप में वर्णन नहीं मिलता बल्कि यथार्थ रूप में व्यक्ति की स्वतन्त्र पहचान के रूप में वर्णन मिलता है। सम्भोग वहाँ व्यक्तिगत है। कामसूत्रकार के लिये सम्भोग बीमारी या सामाजिक इल्लत नहीं है। कामसूत्र में स्त्री-पुरुष के एक-एक अंग की बनावट, आकृति, आकार आदि का विवेचन मिलता है। अंगों के रूप आदि की व्याख्या के पीछे मूल लक्ष्य है स्त्री-पुरुष के बीच समान जोड़े बनाना। स्त्री-पुरुष सम्बन्ध तय करते समय गलतियाँ न हों, और सम्भोग के प्रति जागरुकता बनी रहे।

कामसूत्र में सम्भोग धार्मिक नजरिए से मुक्त है। कामसूत्र का केन्द्रीय लक्ष्य है समाज में प्रचलित काम या सम्भोग विरोधी मिथकों और कपोल कल्पनाओं का खण्डन करना व सम्भोग को सामान्यजन का विमर्श बनाना। सम्भोग लम्बे समय से सामान्यजन के विमर्श के दायरे से गायब था। समाज में तरह-तरह की काम सम्बन्धी ऊल-जुलूल बातें प्रचलन में थीं। कामसूत्र की पद्धति संवाद की पद्धति है। जयमंगला टीकाकार ने उसमें अन्य शास्त्रकारों के अनुभवों और व्याख्याओं को शामिल किया। इसके कारण भारत जैसे वैविध्यों से भरे समाज में सम्भोग,चुम्बन,आलिंगन,स्पर्श,मैथुन आदि की क्रियाओं के बारे में जातीय आधार पर रुचि या स्वीकृति,अरुचि या अस्वीकृति के भाव को जान सकते हैं। सम्भोग और शरीर सम्बन्धी जो सूचनाएँ कामसूत्र में हैं और उन सूचनाओं के बारे में अन्यान्य शास्त्रकारों ने क्या लिखा है उसका जितना व्यवस्थित वर्णन जयमंगला टीकाकार ने किया है, वैसा अन्यत्र नहीं मिलता। इनमें सैद्धान्तिक विमर्श के सूत्र छिपे हैं। कामसूत्रकार ने सामान्यत: स्वीकृत एटीट्यूड्स और संस्कारों को महत्व दिया है साथ ही अपने दार्शनिक नजरिये कि उपेक्षा भी नहीं की है। इसके अतिरिक्त वात्स्यायन का दार्शनिक नजरिया भी पाठ में उपलब्ध है।

कामसूत्र की टीका[संपादित करें]

इसके अलावा जयमंगला टीकाकार ने जिस तरह अन्यान्य विचारकों के विचारों को पेश किया है उससे दो बातें निकलती हैं। पहली बात यह कि सम्भोग विमर्श की लम्बी परम्परा रही है। यह ऐसा विषय नहीं था जिस पर सामाजिक स्तर पर संवाद, विमर्श आदि न किया जाये। दूसरी बात यह निकलती है कि सम्भोग विमर्श इकहरा नहीं रहा है बल्कि बहुरंगी रहा है। स्त्री और पुरुष की एक कोटि नहीं रही है, बल्कि अनेक कोटियाँ रही हैं। इसका अर्थ यह है कि स्त्री और पुरुष इन दो कोटियों की एकायामी व्याख्या हमारे भारतीय विमर्श का हिस्सा कभी नहीं रही। नैतिकता,सांस्कृतिक मान्यताओं के अलग-अलग क्षेत्र या प्रान्तों और जातियों में भिन्न किस्म के रूप रहे हैं। भारत के स्त्री और पुरुष एक से नहीं थे बल्कि बहुरंगी थे। कामसूत्रकार ने सम्भोग से सम्बन्धित जिस किसी भी पहलू को उठाया है उसमें साझा और परम्परागत मान्यताओं को आधार बनाया है। इससे एक तथ्य यह उजागर होता है कि भारत में अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग सम्भोग मान्यताएँ प्रचलन में थीं। काम-क्रिया के विभिन्न रूपों और इनके साथ जुड़े सम्बन्ध का व्यवस्थित वर्णन किया गया है। किसी भी काम-क्रिया और उसके साथ जुड़े सम्बन्ध पर कामसूत्रकार ने नैतिक रूप में मूल्य निर्णय नहीं किया है। नैतिक निर्णय कालान्तर में टीकाकारों के जरिये आये हैं।

कामसूत्र की कलाएँ[संपादित करें]

वात्स्यायन ने कामसूत्र में जिन 64 कलाओं का विवेचन किया है उन्हें वे कामसूत्र की अंगभूत विद्या कहते हैं। कामसूत्र का मूल प्रयोजन है मोक्ष प्राप्त करना। भरत के पहले कला को शिल्प के नाम से जाना जाता था। भरत से पूर्व ब्राह्मण ग्रन्थों और संहिताओं में कला की बजाय शिल्प का इस्तेमाल किया गया है। तत्कालीन आचार्य किसी भी विषय या कृत्य में निहित कौशल को कला मानते थे। वात्स्यायन की कला सूची देखने से स्पष्ट है कि उनकी दृष्टि में कला का साधारण अर्थ स्त्री-प्रसाधन और वशीकरण है। जिस क्रिया से, जिस कौशल से कामिनियाँ प्रसन्न हों, वशीभूत हो जाएँ वही कला है। वात्स्यायन की इस दृष्टि में आनन्द और रसानुभूति ही प्रमुख है। सामान्यत: उपयोगी और ललित दोनों ही प्रकार की कलाएँ कला-कोटि में परिगणित होती थीं। कामसूत्रकार की सबसे प्रमुख विशेषता है कि वह वर्गीकरण की पद्धति का इस्तेमाल नहीं करता अपितु परिगणन की पद्धति का इस्तेमाल करता है। कामसूत्र में विद्यासमुद्देश्य प्रकरणम् नामक अध्याय है जिसके आरम्भ में ही कहा गया है कि धर्मशास्त्र व अर्थशास्त्र के अध्ययन के साथ ही कामशास्त्र का भी अध्ययन करना चाहिए। साथ ही यह भी माना है कि स्त्री और पुरुष में मौलिक भेद है। स्त्री को कामशास्त्र का अध्ययन कराया जाना चाहिए जिससे उसे पुरुष-धारा में मिलाकर मुक्ति की अधिकारिणी बनाया जा सके। कामसूत्रकार स्त्री-पुरुष में भिन्नता को मानता है। इन दोनों की आनन्दानुभूति व क्रिया में भिन्नता को स्वीकार करता है। इसके अतिरिक्त इन दोनों में समान तत्वों की वकालत भी करता है। भेद की चर्चा करते हुए वह अभेद की ओर तो जाता है परन्तु अभेद की चर्चा करते हुए भेद की ओर नहीं जाता।

भेदों का सम्बन्ध शरीर, संस्कृति, राज्य, लिंगावस्था आदि से है। कामसूत्र में सम्भोग की आनन्द के रूप में व्याख्या यथार्थवादी पैमाने से की गयी है स्वप्न के रूप में नहीं। यथार्थ रूप में काम-क्रियाओं, सम्भोग, मैथुन आदि का विवरण स्वयं प्रगति का लक्षण है। प्रत्येक क्रिया का वर्णन और प्रभाव बताने के बाद निष्कर्ष में पूर्वानुमान चले आये हैं। कामसूत्र में मूलत: तीन तरह के सम्भोग का वर्णन मिलता है। पहला सामान्य सम्भोग, दूसरा असामान्य सम्भोग और तीसरा समलैंगिक सम्भोग। सामान्य सम्भोग वह है जो वैध है यानी कानूनी तौर पर मान्यता प्राप्त है। असामान्य सम्भोग वह है जिसमें असामान्य कामुक क्रियाएँ शामिल हैं। संवेशन विधि प्रकरणम् नामक अध्याय में दो तरह की सम्भोग क्रियाओं की चर्चा की गयी है। इनमें एक है संवेशन प्रकार और दूसरी है चित्ररत। संवेशन प्रकार में उन क्रियाओं का वर्णन है जिनका सामान्यतया शिष्ट समाज इस्तेमाल करता है। किन्तु चित्ररत में वर्णित क्रियाओं का निकृष्ट स्वभाव के लोग इस्तेमाल करते हैं। चित्ररत में सम्भोग की अदभुत विधियों को शामिल किया गया है। उल्लेखनीय है कि अधिकांश पोर्न फिल्मों में चित्ररत आसनों का प्रयोग किया जाता है। इसमें 1. स्थिररत, 2. अवलम्बितक, 3. धेनुक, 4. संघाटक, 5. गोयूथिक, 6. सामूहिक सम्भोग, 7. गुदा मैथुन को शामिल किया है।

समीक्षा[संपादित करें]

वात्स्यायन के मुताबिक मैथुन क्रिया सबसे श्रेष्ठ क्रिया है। यही वजह है कि मैथुन कला रूप अब तक के श्रेष्ठ कला रूप माने गये हैं। मैथुन को भारतीय परम्परा परमतत्व मानती है। कहा भी है - "मैथुनं परमं तत्वं सृष्टिस्थित्यन्तकारणम" और यह भी लिखा है - "मैथुनात् जायते सिध्दिर्ब्रह्मज्ञानं सुदुर्लभम्।" इसी परिप्रेक्ष्य में वात्स्यायन ने मैथुन क्रिया को मन्मथ क्रिया या आसन न कहकर योग कहा है। कामसूत्र में सम्भोग के लिये पत्नी या प्रेमिका, रखैल, वेश्या, युवा लड़की आदि की श्रेणियों की भी चर्चा है। असल में कामसूत्रकार ने स्त्री की अवस्था को पुरुष के साथ सम्बन्ध के स्तर को देखकर निर्धारित किया है। मसलन् अपनी पत्नी के साथ किये गये सम्भोग को वह अनुकूल गतिविधि मानता है। उल्लेखनीय है कि स्त्री जाति के प्रति वात्स्यायन, बृहस्पति आदि का स्त्री-विरोधी रवैया रहा है। वात्स्यायन ने धर्मशास्त्र में सुनिश्चित आठ प्रकार के विवाहों- ब्राह्म, प्रजापत्य, आर्ष, दैव, गन्धर्व, असुर, पैशाच और राक्षस- में से पहले चार विवाहों का समर्थन किया है और बाकी चार का विरोध किया है। कामसूत्र में गन्धर्व आदि चार प्रकार के विवाहों में लड़की -लड़के के गुणों और क्रियाओं का सुझाव तीसरे अध्याय के बालोपक्रमणम् नामक उप-अध्याय में दिया है। इन विवाह रूपों में मैत्री सम्बन्ध स्थापित करने पर खास तौर पर जोर है। इस अध्याय में यह बात उभर कर सामने आयी है कि प्रेम-विवाह अवैध नहीं अपितु वैध होता है। इस प्रकरण और अधिकरण के विशेषज्ञ घोटकमुख लड़का-लड़की के बीच बचपन से पनप रहे प्यार को बुरा नहीं मानते। अधर्म नहीं मानते। यहाँ तक कि गन्धर्व, पैशाच,राक्षस और असुर विवाह को भी धर्मानुकूल मानते हैं। कामसूत्रकार का मानना है कि सम्भोग काल की सभी प्रकार की क्रियाएँ हर समय और हर स्त्री में नहीं की जा सकतीं। काम-क्रिया के उन्हीं रूपों का इस्तेमाल किया जाये जो स्त्रियों के अनुकूल हों, जिसे वे पसन्द करती हों और देशाचार के अनुसार हों। इसके अलावा व्यक्तिगत पहल और व्यक्तिवादी प्रयासों को भी कामसूत्रकार ने तरजीह दी है। व्यक्ति की पहल और उसका निर्णय व्यक्ति को निजी हित-अहित के बारे में पहले सोचना चाहिए। समीक्षात्मक दृष्टि से देखा जाये तो ये ऐसे बुनियादी तत्व हैं जो कामसूत्र में व्यक्तिवाद की पहली अभिव्यक्ति हैं। कामसूत्र में व्यक्ति के हित और समाज के हितों में कोई अन्तर्विरोध नहीं है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

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बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]