अग्रसेन

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अग्रसेन
सम्राट
अग्रसेन महाराज का प्रतिमा
राजकाल ४२५० BC से ६३७ AD
पूर्वाधिकारी महाराजा वल्लभ सेन
उत्तराधिकारी विभु
पिता वल्लभसेन
माता भगवती देवी

महाराजा अग्रसेन (४२५० BC से ६३७ AD) समाजवाद के प्रर्वतक, युग पुरुष, राम राज्य के समर्थक एवं महादानी थे। वे अग्रोहा गणराज्य के महाराजा थे।[1][2][3]

जीवन परिचय[संपादित करें]

दिल्ली में स्थित अग्रसेन की बावली, जिसका निर्माण महाराजा अग्रसेन ने महाभारत काल में करवाया था।[4] [5][6]

धार्मिक मान्यतानुसार इनका जन्म मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्रीराम की चौंतीसवी पीढ़ी में सूर्यवशीं क्षत्रिय कुल के महाराजा वल्लभ सेन के घर में द्वापर के अन्तिमकाल और कलियुग के प्रारम्भ में आज से ५१८५ वर्ष पूर्व हुआ था। उनके राज में कोई दुखी या लाचार नहीं था। बचपन से ही वे अपनी प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे। वे एक धार्मिक, शांति दूत, प्रजा वत्सल, हिंसा विरोधी, बली प्रथा को बंद करवाने वाले, करुणानिधि, सब जीवों से प्रेम, स्नेह रखने वाले दयालू राजा थे। महाराज अग्रसेन एक क्षत्रिय सूर्यवंशी राजा थे। जिन्होंने प्रजा की भलाई के लिए वणिक धर्म अपना लिया था। इनका जन्म द्वापर युग के अंतिम भाग में महाभारत काल में हुआ था। ये प्रतापनगर के राजा बल्लभ के ज्येष्ठ पुत्र थे।[7]

विवाह[संपादित करें]

समयानुसार युवावस्था में उन्हें राजा नागराज की कन्या राजकुमारी माधवी के स्वयंवर में शामिल होने का न्योता मिला। उस स्वयंवर में दूर-दूर से अनेकों राजा और राजकुमार आए थे। यहां तक कि देवताओं के राजा इंद्र भी राजकुमारी के सौंदर्य के वशीभूत हो वहां पधारे थे। स्वयंवर में राजकुमारी माधवी ने राजकुमार अग्रसेन के गले में जयमाला डाल दी। यह दो अलग-अलग संप्रदायों, जातियों और संस्कृतियों का मेल था। जहां अग्रसेन सूर्यवंशी थे वहीं माधवी नागवंश की कन्या थीं।[8][9]

इंद्र से टकराव[संपादित करें]

इस विवाह से इंद्र जलन और गुस्से से आपे से बाहर हो गये और उन्होंने प्रतापनगर में वर्षा का होना रोक दिया। चारों ओर त्राहि-त्राही मच गयी। लोग अकाल मृत्यु का ग्रास बनने लगे। तब महाराज अग्रसेन ने इंद्र के विरुद्ध युद्ध छेड दिया। चूंकि अग्रसेन धर्म-युद्ध लड रहे थे तो उनका पलडा भारी था जिसे देख देवताओं ने नारद ऋषि को मध्यस्थ बना दोनों के बीच सुलह करवा दी।[10][11]

तपस्या[संपादित करें]

कुछ समय बाद महाराज अग्रसेन ने अपने प्रजा-जनों की खुशहाली के लिए काशी नगरी जा शिवजी की घोर तपस्या की, जिससे भगवान शिव ने प्रसन्न हो उन्हें माँ लक्ष्मी की तपस्या करने की सलाह दी। माँ लक्ष्मी ने परोपकार हेतु की गयी तपस्या से खुश हो उन्हें दर्शन दिए और कहा कि अपना एक नया राज्य बनाएं और वैश्य परम्परा के अनुसार अपना व्यवसाय करें तो उन्हें तथा उनके लोगों या अनुयायियों को कभी भी किसी चीज की कमी नहीं होगी।

अग्रोहा राज्य की स्थापना[संपादित करें]

अपने नये राज्य की स्थापना के लिए महाराज अग्रसेन ने अपनी रानी माधवी के साथ सारे भारतवर्ष का भ्रमण किया। इसी दौरान उन्हें एक जगह शेर तथा भेडिये के बच्चे एक साथ खेलते मिले। उन्हें लगा कि यह दैवीय संदेश है जो इस वीरभूमि पर उन्हें राज्य स्थापित करने का संकेत दे रहा है। ॠषि मुनियों और ज्योतिषियों की सलाह पर नये राज्य का नाम अग्रेयगण रखा गया जिसे अग्रोहा नाम से जाना जाता है। वह जगह आज के हरियाणा के हिसार के पास हैं। आज भी यह स्थान अग्रहरि[12] और अग्रवाल समाज के लिए तीर्थ के समान है। यहां महाराज अग्रसेन और माँ लक्ष्मी देवी का भव्य मंदिर है।

समाजवाद का अग्रदूत[संपादित करें]

महाराजा अग्रसेन को समाजवाद का अग्रदूत कहा जाता है। अपने क्षेत्र में सच्चे समाजवाद की स्थापना हेतु उन्होंने नियम बनाया कि उनके नगर में बाहर से आकर बसने वाले व्यक्ति की सहायता के लिए नगर का प्रत्येक निवासी उसे एक रुपया व एक ईंट देगा, जिससे आसानी से उसके लिए निवास स्थान व व्यापार का प्रबंध हो जाए। महाराजा अग्रसेन ने तंत्रीय शासन प्रणाली के प्रतिकार में एक नयी व्यवस्था को जन्म दिया, उन्होंने पुनः वैदिक सनातन आर्य सस्कृंति की मूल मान्यताओं को लागू कर राज्य की पुनर्गठन में कृषि-व्यापार, उद्योग, गौपालन के विकास के साथ-साथ नैतिक मूल्यों की पुनः प्रतिष्ठा का बीड़ा उठाया।

इस तरह महाराज अग्रसेन के राजकाल में अग्रोहा ने दिन दूनी- रात चौगुनी तरक्की की। कहते हैं कि इसकी चरम स्मृद्धि के समय वहां लाखों व्यापारी रहा करते थे। वहां आने वाले नवागत परिवार को राज्य में बसने वाले परिवार सहायता के तौर पर एक रुपया और एक ईंट भेंट करते थे, इस तरह उस नवागत को लाखों रुपये और ईंटें अपने को स्थापित करने हेतु प्राप्त हो जाती थीं जिससे वह चिंता रहित हो अपना व्यापार शुरु कर लेता था।

अठारह यज्ञ[संपादित करें]

माता लक्ष्मी की कृपा से श्री अग्रसेन के 18 पुत्र हुये। राजकुमार विभु उनमें सबसे बड़े थे। महर्षि गर्ग ने महाराजा अग्रसेन को 18 पुत्र के साथ 18 यज्ञ करने का संकल्प करवाया। माना जाता है कि यज्ञों में बैठे 18 गुरुओं के नाम पर ही अग्रवंश (अग्रवाल समाज) की स्थापना हुई । यज्ञों में पशुबलि दी जाती थी। प्रथम यज्ञ के पुरोहित स्वयं गर्ग ॠषि बने, राजकुमार विभु को दीक्षित कर उन्हें गर्ग गोत्र से मंत्रित किया। इसी प्रकार दूसरा यज्ञ गोभिल ॠषि ने करवाया और द्वितीय पुत्र को गोयल गोत्र दिया। तीसरा यज्ञ गौतम ॠषि ने गोइन गोत्र धारण करवाया, चौथे में वत्स ॠषि ने बंसल गोत्र, पाँचवे में कौशिक ॠषि ने कंसल गोत्र, छठे शांडिल्य ॠषि ने सिंघल गोत्र, सातवे में मंगल ॠषि ने मंगल गोत्र, आठवें में जैमिन ने जिंदल गोत्र, नवें में तांड्य ॠषि ने तिंगल गोत्र, दसवें में और्व ॠषि ने ऐरन गोत्र, ग्यारवें में धौम्य ॠषि ने धारण गोत्र, बारहवें में मुदगल ॠषि ने मन्दल गोत्र, तेरहवें में वसिष्ठ ॠषि ने बिंदल गोत्र, चौदहवें में मैत्रेय ॠषि ने मित्तल गोत्र, पंद्रहवें कश्यप ॠषि ने कुच्छल गोत्र दिया। 17 यज्ञ पूर्ण हो चुके थे। जिस समय 18 वें यज्ञ में जीवित पशुओं की बलि दी जा रही थी, महाराज अग्रसेन को उस दृश्य को देखकर घृणा उत्पन्न हो गई। उन्होंने यज्ञ को बीच में ही रोक दिया और कहा कि भविष्य में मेरे राज्य का कोई भी व्यक्ति यज्ञ में पशुबलि नहीं देगा, न पशु को मारेगा, न माँस खाएगा और राज्य का हर व्यक्ति प्राणीमात्र की रक्षा करेगा। इस घटना से प्रभावित होकर उन्होंने क्षत्रिय धर्म को अपना लिया। अठारवें यज्ञ में नगेन्द्र ॠषि द्वारा नांगल गोत्र से अभिमंत्रित किया।

ॠषियों द्वारा प्रदत्त अठारह गोत्रों को महाराजा अग्रसेन के 18 पुत्रों के साथ महाराजा द्वारा बसायी 18 बस्तियों के निवासियों ने भी धारण कर लिया एक बस्ती के साथ प्रेम भाव बनाये रखने के लिए एक सर्वसम्मत निर्णय हुआ कि अपने पुत्र और पुत्री का विवाह अपनी बस्ती में नहीं दूसरी बस्ती में करेंगे। आगे चलकर यह व्यवस्था गोत्रों में बदल गई जो आज भी अग्रवाल समाज में प्रचलित है।[13]


अठारह गोत्र[संपादित करें]

जय श्री अग्र हरे, स्वामी जय श्री अग्र हरे।
कोटि कोटि नत मस्तक, सादर नमन करें।। जय श्री।

आश्विन शुक्ल एकं, नृप वल्लभ जय।
अग्र वंश संस्थापक, नागवंश ब्याहे।। जय श्री।

केसरिया थ्वज फहरे, छात्र चवंर धारे।
झांझ, नफीरी नौबत बाजत तब द्वारे।। जय श्री।

अग्रोहा राजधानी, इंद्र शरण आये!
गोत्र अट्ठारह अनुपम, चारण गुंड गाये।। जय श्री।

सत्य, अहिंसा पालक, न्याय, नीति, समता!
ईंट, रूपए की रीति, प्रकट करे ममता।। जय श्री।

ब्रहम्मा, विष्णु, शंकर, वर सिंहनी दीन्हा।।
कुल देवी महामाया, वैश्य करम कीन्हा।। जय श्री।

अग्रसेन जी की आरती, जो कोई नर गाये!
कहत त्रिलोक विनय से सुख संम्पति पाए।। जय श्री!

अग्रसेन महाराज आरती

महाराज ने अपने राज्य को १८ गणों में विभाजित कर अपने १८ पुत्रों को सौंप उनके १८ गुरुओं के नाम पर १८ गोत्रों की स्थापना की थी। हर गोत्र अलग होने के बावजूद वे सब एक ही परिवार के अंग बने रहे। इसी कारण अग्रोहा भी सर्वंगिण उन्नति कर सका। राज्य के उन्हीं १८गणों से एक-एक प्रतिनिधि लेकर उन्होंने लोकतांत्रिक राज्य की स्थापना की, जिसका स्वरूप आज भी हमें भारतीय लोकतंत्र के रूप में दिखाई पडता है।[1]

महाराज अग्रसेन के १८ पुत्र हुए, जिनके नाम पर वर्तमान में अग्रवालों के १८ गोत्र हैं। ये गोत्र निम्नलिखित हैं: -

  1. ऐरन
  2. बंसल
  3. बिंदल
  4. भंदल
  5. धारण
  6. गर्ग
  7. गोयल
  8. गोयन
  9. जिंदल
  10. कंसल
  11. कुच्छल
  12. मधुकुल
  13. मंगल
  14. मित्तल
  15. नागल
  16. सिंघल
  17. तायल
  18. तिंगल


उन्होंने परिश्रम और उद्योग से धनोपार्जन के साथ-साथ उसका समान वितरण और आय से कम खर्च करने पर बल दिया। जहां एक ओर वैश्य जाति को व्यवसाय का प्रतीक तराजू प्रदान किया वहीं दूसरी ओर आत्म-रक्षा के लिए शस्त्रों के उपयोग की शिक्षा पर भी बल दिया।

उस समय यज्ञ करना समृद्धि, वैभव और खुशहाली की निशानी माना जाता था। महाराज अग्रसेन ने बहुत सारे यज्ञ किए। एक बार यज्ञ में बली के लिए लाए गये घोडे को बहुत बेचैन और डरा हुआ पा उन्हें विचार आया कि ऐसी समृद्धि का क्या फायदा जो मूक पशुओं के खून से सराबोर हो। उसी समय उन्होंने अपने मंत्रियों के ना चाहने पर भी पशू बली पर रोक लगा दी। इसीलिए आज भी अग्रवंश समाज हिंसा से दूर ही रहता है।

महाराज अग्रसेन के राज की वैभवता से उनके पडोसी राजा बहुत जलते थे। इसलिए वे बार-बार अग्रोहा पर आक्रमण करते रहते थे। बार-बार मुंहकी खाने के बावजूद उनके कारण राज्य में तनाव बना ही रहता था। इन युद्धों के कारण अग्रसेनजी के प्रजा की भलाई के कामों में विघ्न पडता रहता था। लोग भी भयभीत और रोज-रोज की लडाई से त्रस्त हो गये थे। इसी के साथ-साथ एक बार अग्रोहा में बडी भीषण आग लगी। उस पर किसी भी तरह काबू ना पाया जा सका। उस अग्निकांड से हजारों लोग बेघरबार हो गये और जीविका की तलाश में भारत के विभिन्न प्रदेशों में जा बसे। पर उन्होंने अपनी पहचान नहीं छोडी। वे सब आज भी अग्रवाल ही कहलवाना पसंद करते हैं और उसी 18 गोत्रों से अपनी पहचान बनाए हुए हैं। आज भी वे सब महाराज अग्रसेन द्वारा निर्देशित मार्ग का अनुसरण कर समाज की सेवा में लगे हुए हैं।

इस घटना से प्रभावित होकर उन्होंने वैश्य धर्म को अपना लिया। महाराजा अग्रसेन की राजधानी अग्रोहा थी। उनके शासन में अनुशासन का पालन होता था। जनता निष्ठापूर्वक स्वतंत्रता के साथ अपने कर्त्तव्य का निर्वाह करती थी।

सन्यास[संपादित करें]

महाराज अग्रसेन ने १०८ वर्षों तक राज किया। उन्होंने जिन जीवन मूल्यों को ग्रहण किया उनमें परंपरा एवं प्रयोग का संतुलित सामंजस्य दिखाई देता है। उन्होंने एक ओर हिन्दू धर्म ग्रथों में वैश्य वर्ण के लिए निर्देशित कर्मक्षेत्र को स्वीकार किया और दूसरी ओर देशकाल के परिप्रेक्ष्य में नए आदर्श स्थापित किए। उनके जीवन के मूल रूप से तीन आदर्श हैं- लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था, आर्थिक समरूपता एवं सामाजिक समानता। एक निश्‍चित आयु प्राप्त करने के बाद कुलदेवी महालक्ष्मी से परामर्श पर वे आग्रेय गणराज्य का शासन अपने ज्येष्ठ पुत्र विभु के हाथों में सौंपकर तपस्या करने चले गए। अपनी जिंदगी के अंतिम समय में महाराज ने अपने ज्येष्ट पुत्र विभू को सारी जिम्मेदारी सौंप कर वानप्रस्थ आश्रम अपना लिया।

आज भी इतिहास में महाराज अग्रसेन परम प्रतापी, धार्मिक, सहिष्णु, समाजवाद के प्रेरक महापुरुष के रूप में उल्लेखित हैं। देश में जगह-जगह अस्पताल, स्कूल, बावड़ी, धर्मशालाएँ आदि अग्रसेन के जीवन मूल्यों का आधार हैं और ये जीवन मूल्य मानव आस्था के प्रतीक हैं।

अग्रोहा धाम[संपादित करें]

प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित आग्रेय ही अग्रवालों का उद्‍गम स्थान आज का अग्रोहा है। दिल्ली से १९० तथा हिसार से २० किलोमीटर दूर हरियाणा में महाराजा अग्रसेन राष्ट्र मार्ग संख्या - १० हिसार - सिरसा बस मार्ग के किनारे एक खेड़े के रूप में स्थित है। जो कभी महाराजा अग्रसेन की राजधानी रही, यह नगर आज एक साधारण ग्राम के रूप में स्थित है जहाँ पांच सौ परिवारों की आबादी है। इसके समीप ही प्राचीन राजधानी अग्रेह (अग्रोहा) के अवशेष थेह के रूप में ६५० एकड भूमि में फैले हैं। जो अग्रसेन महाराज के अग्रोहा नगर के गौरव पूर्ण इतिहास को दर्शाते हैं।

अग्रसेन महाराज पर पुस्तके[संपादित करें]

वैसे महाराजा अग्रसेन पर अनगिनत पुस्तके लिखी जा चुकी हैं। सुप्रसिद्ध लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र, जो खुद भी वैश्य समुदाय से थे, ने १८७१ में "अग्रवालों की उत्पत्ति" नामक प्रमाणिक ग्रंथ लिखा है[14], जिसमें विस्तार से इनके बारे में बताया गया है।[15]

भारत सरकार द्वारा सम्मान[संपादित करें]

२४ सितंबर १९७६ मे भारत सरकार द्वारा २५ पैसे का डाक टिकट महाराजा अग्रसेन के नाम पर जारी किया गया। सन १९९५ में भारत सरकार ने दक्षिण कोरिया से ३५० करोड़ रूपये मे एक विशेष तेल वाहक पोत (जहाज) खरीदा, जिसका नाम "महाराजा अग्रसेन" रखा गया। जिसकी क्षमता १,८०,०००० टन है। राष्ट्रीय राजमार्ग -१० का आधिकारिक नाम महाराजा अग्रसेन पर है।

अग्रसेन की बावली, जो दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास हैली रोड में स्थित है। यह ६० मीटर लम्बी व १५ मीटर चौड़ी बावड़ी है, जो पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम १९५८ के तहत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की देखरेख में हैं। सन २०१२ में भारतीय डाक अग्रसेन की बावली पर डाक टिकट जारी किया गया।

अन्य[संपादित करें]

  • एक सर्वे के अनुसार, देश की कुल इनकम टैक्स का २४% से अधिक हिस्सा अग्रसेन के वंशजो का हैं। कुल सामाजिक एवं धार्मिक दान में ६२% हिस्सा अग्रवंशियों का है। भारत में कुल ५०,००० मंदिर व तीर्थस्थल तथा कुल १६,००० गौशालाओं में से १२,००० अग्रवंशी वैश्य समुदाय द्वारा संचालित है। भारत के विकास में २५% योगदान महाराजा अग्रसेन के वंशजो का ही हैं, जिनकी जनसंख्या देश की जनसंख्या मे महज १% है। अग्रहरि एवं अग्रवाल समूदाय के लिए तीर्थस्थान अग्रोहा, हिसार जिला में भव्य अग्रसेन मंदिर का उद्घाटन ३१ अक्टूबर सन १९८२ को हरियाणा के मुख्यमंत्री माननीय श्री. भजनलाल के करकमलों द्वारा संपंन हुआ।
  • २९ सितंबर १९७६ को अग्रोहा धाम की नींव रखी गई एवं अग्रसेन मंदिर का निर्माण कार्य जनवरी १९७९ मे वसंत पंचमी को आरंभ हुआ।
  • दिल्ली के निकट सारवान ग्राम में प्राप्त सन १३८४ फाल्गुनी सुदी ५ मंर के शिला लेख में ९९ वाणि जाय निवासिना शब्द अंकित है, जो की नेशनल म्युजियम क्रमांक बी-६ में सुरक्षित रखा हैं।

इन्हें भी देखे[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Singh, Kumar Suresh; B. V. Bhanu (2004). People of India. Popular Prakashan (Mumbai), Anthropological Survey of India (Kolkata). प॰ 46. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 81-7991-100-4. OCLC 58037479. http://books.google.com/books?vid=ISBN8179911004&id=DEAlCTxJowUC&pg=PA46&lpg=PA46&ots=Bvlxact-nQ&dq=agarwal+agroha&sig=3JVJpW3XF2UJXStGcgV-tWgHKlE. अभिगमन तिथि: 2007-04-19. 
  2. History of Ancient India - By J.P. Mittal
  3. "http://www.agrawal-samaj.com/index1.html". http://www.agrawal-samaj.com/index1.html. 
  4. Mittal, J.P. (2006), History of Ancient India (4250 BC to 637 AD) page 675, ISBN 978-81-269-0616-1 (This author considers King Agrasen an actual historical figure)
  5. "Agrasen Ki Baoli, un oasis au coeur de la capitale | Inde Information". Aujourdhuilinde.com. http://www.aujourdhuilinde.com/actualites-inde-agrasen-ki-baoli-un-oasis-au-coeur-de-la-capitale-511.asp. अभिगमन तिथि: 2012-10-01. 
  6. "Monuments - Delhi Monuments - Tourist Information of India - Lakes, Waterfalls, Beaches, Monuments, Museums, Places, Cities - By". Tripsguru.com. http://www.tripsguru.com/Monuments/Delhi%20Monuments.html/. अभिगमन तिथि: 2012-10-01. 
  7. Mittal, J.P. (2006), History of Ancient India (4250 BC to 637 AD) page 675, ISBN 978-81-269-0616-1 (This author considers King Agrasen an actual historical figure)
  8. Kavivar Bulakhichand, Kasturchand Kasliwal, Jaipur, 1983
  9. Bombay Presidency Gazetteer, 1885, pages 262–263
  10. "Agrasen Ki Baoli, un oasis au coeur de la capitale | Inde Information". Aujourdhuilinde.com. http://www.aujourdhuilinde.com/actualites-inde-agrasen-ki-baoli-un-oasis-au-coeur-de-la-capitale-511.asp. अभिगमन तिथि: 2012-10-01. 
  11. "Monuments - Delhi Monuments - Tourist Information of India - Lakes, Waterfalls, Beaches, Monuments, Museums, Places, Cities - By". Tripsguru.com. http://www.tripsguru.com/Monuments/Delhi%20Monuments.html/. अभिगमन तिथि: 2012-10-01. 
  12. Kumar Suresh Singh (2005). People of India: Uttar Pradesh , Voume 42, Part (illustrated ed.). Anthropological Survey of India. प॰ 66. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-73041-14-3. 
  13. "Agrawals". Shri Agrawal Samaj. Archived from the original on 23 April 2007. http://agrawal.aryashaadi.com/. अभिगमन तिथि: 2007-04-19. 
  14. Bharatendu Harishchandra, Agrawalon ki Utpatti, 1871, reprinted in Hemant Sarma, Bharatendu Samgrah, Varanasi, Hindi Pracharak Samsthan, 1989.
  15. "Bhartendu Harish Chandra (1850-1885)". http://rrtd.nic.in/bhartenduharishchandra.htm. अभिगमन तिथि: 2007-04-19. 

वाह्य सूत्र[संपादित करें]