ब्रज के जीव जंतु

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जिस भूखंड को जलवायु जीवन के अनुकूल हो और वहाँ पर हरी-भरी वनस्पतियाँ पाई जाती हों, वहाँ पशु-पक्षी और जीव-जन्तुओं का पाया जाना एक नैसर्गिक सत्य है। किसी भी भूखंड में विचरण करने वाले पशु-पक्षी और जीव-जन्तुओं की उपस्थिति से वहाँ की जलवायु का अनुमान लगाया जा सकता है। अत: ब्रज में पाये जाने वाले पशु-पक्षी और जीव-जन्तुओं की उपस्थिति के आधार पर हम ब्रज-भूखंड के समग्र प्रस्तुति कर सकते हैं। ब्रज में दो प्रकार के पशु-पक्षी पाये जाते हैं - १. जंगली और २. पालतू। जंगली जीव-जन्तु और पशु-पक्षी स्वच्छन्द रुप से वनों और जंगलों में विचरण करते हैं, जिनमें से कुछ समय-समय पर मानवजाति को विविध रुपों में कष्ट देते चले आये हैं और आज भी कष्ट देते हैं। किन्तु पालतू पशु-पक्षी सदैव से मानव जाति के उपयोग में आते रहें हैं और वे मनुष्यजाति को सुख, सुविधा और समृद्धि प्रदान करते रहे हैं।

जंगली पशु[संपादित करें]

ब्रज के जंगली पशुओं में मांस आहारी और निरामिष भोजी दोनों ही प्रकार के पाये जाते रहे हैं। मांसाहारी पशुओं में सिंह, बघेर्श, भेड़िया, लोमड़ी, भालू, रीछा, स्यार आदि हैं। गुस्से की स्थिति में सुअर भी मांसाहारी हो जाता है। सिंह, बघेर्श, सुअर आदि मांसाहारी होने के साथ-साथ हिंसक भी हैं। वे अवसर पाते ही मनुष्य और पशुओं पर घात लगाकर आक्रमण कर देते हैं किन्तु वर्तमान समय में जंगलों के अभाव होने से ब्रज में इन हिंसक पशुओं का भी अभाव हो गया है। ब्रज साहित्य में हिंसक पशुओं के उत्पात का विशद वर्णन मिलता है। परमानंद ने बाघ द्वारा गायों और बछड़ों को तथा भेड़ियों द्वारा बछड़ों को काटने का उल्लेख किया है।१ एक वार्तानुसार कुंभनदास का पुत्र कृष्णदास श्रीनाथ जी की गायों की रखवाली करता था। एक दिन गायें जब जंगल से चर कर वापिस आ रहीं थीं तब उनमें से एक गाय झुंड से कुछ पीछे रह गई थी। उस पर एक सिंह ने अचानक आक्रमण कर दिया। कृष्णदास गाय को बचाने पहुँचा तो गाय तो लपक कर अपने खिरक तक पहुँचने में सफल हो गई, किन्तु कृष्णदास को सिंह ने मार डाला।२

ब्रज के निवासी सदैव से हिंसक पशुओं को भी मारना पाप समझते थे, किन्तु राजा-महाराजा और मुसलमान शासक ब्रज के वनों में हिंसक पशुओं का शिकार करते थे। मुगल सम्राटों में बाबर से लेकर जहाँगीर तक ने ब्रज के वनों में शिकार किया था इसके उल्लेख उस काल की तवारीख में उल्लिखित हैं।

निरामिष भोजी जंगली पशुओं में मृग, नील गाय, जंगली गाय और बन्दर आदि उल्लेखनीय हैं। वे मानवों पर घातक आक्रमण तो नहीं करते, किन्तु खेतों और बाग-बगीचों को बहुत हानि पहुँचाते रहे हैं। जब ब्रज में हिंसक पशुओं को भी नहीं मारा जाता है, तब जंगली

इन अहिंसक पशुओं का तो मारने का प्रश्न ही नहीं बनता है। मृग, नीलगाय, जंगली गाय आदि के झुंड ब्रज के वनों में और यमुना के खादिरों में विचरण करते हुए ब्रज किसानों की फसल को हाँनि पहुँचाते आये हैं। नीलगाय और मृग का अँग्रेज़ अधिकारी और सिपाही शिकार करते थे। वास्तव में नील गाय भी मृग की जाति का पशु है। बन्दर ब्रज के वन-उपवन और बस्तियों में बहुतायत में पाये जाते हैं। वे वन-उपवनों के फलों को प्रचुरता से क्षतिग्रस्त करते रहे हैं तथा मानवीय बस्तियों में भी नाना प्रकार के उत्पात करते रहे हैं। फिर भी ब्रज प्रजा ने उन्हें कष्ट देने की बात तक नहीं सोची है। ब्रज में बन्दरों की रक्षा की जाती है तथा उन्हें भोज दिया जाता है, उन्हें हनुमान का प्रतीक माना जाता है। नगरपालिका के द्वारा बन्दरों को पकड़कर जंगल में छोड़ने पर ब्रज प्रजा ने इस कृत्य का विरोध किया था।

पालतू पशु[संपादित करें]

ब्रज के पालतू पशुओं में गाय, घोड़ा, बैल, भैंस, बकरी, भेड़, गधा, कुत्ता, ऊँट, हाथी आदि के नाम लिये जा सकते हैं। उनकों पालतू बनाकर मानव समाज ने अपनी सुख समृद्धि का कारण बना लिया है। ब्रज में इन सभी पालतू पशुओं से काम लिया जाता है, किन्तु गाय को ब्रज में सदैव से ही विशेष महत्व प्राप्त है।

गाय[संपादित करें]

ब्रज के जनजीवन में गाय का जैसा स्थान है, वैसा किसी अन्य पालतू पशु का नहीं है। गाय एक उपयोगी पशु मात्र नहीं है, वरन् ब्रज संस्कृति का एक प्रकार से प्रमुख आधार ही है। भगवान् श्री कृष्ण गायों की सेवा करने के कारण ही गोपाल और गोविंद कहे जाते हैं। ब्रज में इस पशु को जो अनुपम गौरव दिया गया है, उसका कारण वस्तुत: इसका अतिशय उपयोग ही है। ब्रज में बहुत बड़ी संख्या में सदियों से गायों को पाला जाता रहा है। भगवान् कृष्ण के समय में गिरिराज पहाड़ी प्रमुख गौचरण का केन्द्र थी। इसीलिए इस गोवर्धन का विरुद प्राप्त हो सका है। ब्रजवाले गोपों का समस्त जीवन ही गौवंश पर आधारित था। वे इससे दूध, दही, मक्खन जैसे पौष्टिक पदार्थों के प्राप्त करते थे उसके गोबर और मूत्र से जो खाद निर्मित करते थे, वह उनके खेत की उपज के बढ़ाने में उपयोगी होता था। गाय से उत्पन्न बछड़े होकर हल हल खीचतें थे, माल ढोते थे। इस प्रकार गाय ब्रजवासियों के जीवन का आवश्यक अंग ही नहीं, उनके परिवार का प्रमुख सदस्य ही बन गई थी।

प्रागैतिहासिक काल से गाय की उत्तरजीवितता पर प्रकाश प्रस्तुत किया जाय तो भारत की प्राचीनतम हड़प्पा (र्तृन्धव) सभ्यता के नगरीय और महानगरीय पुरास्थलों से मृत्य मूर्तियों के रुप में अनल्प प्रमाण पाये गये हैं। सैन्ध निवासी कूबड़ वाले साँड की पूजा करते थे और बैलों के द्वारा बैलगाड़ी जोतते थे।

भारत की आर्य संस्कृति के संस्थापक ॠग्वैदिक आर्यों के जीवन में तो गाय का अत्याधिक महत्व था। आर्य संस्कृति का 'चरवाहा' संस्कृति के रुप में भी जाना जाता है, क्योंकि आर्य लोग जंगलों में गोचारण करते थे तथा गायों के साथ जंगलों में ही निवास करते थे। जहाँ अच्छे चराहगाह होते थे उस भूमि के लिये आर्य कबीलों में प्राय: संघर्ष होते थे, अधिक से अधिक गाय प्राप्त करने के लिये युद्ध होते थे। वैदिक काल में आर्थिक हैसियत का निर्धारण गायों की संख्या से लगाया जाता था अधिक गायें, जिस कबीले के पास होती थी वह उतना ही सम्पत्ति शाली माना जाता था।

उत्तरवैदिक काल में आते-आते गाय का बहुउद्देशीय उपयोग मनुष्य की समझ में आ गया था। बछड़े को जन्म देनेवाली गाय को पूज्य माना जाता था क्योंकि बछड़ा बड़ा होकर बैल बनकर भूमि को जोतने के काम में आता था। उस समय में भूमि की कोई कमी नहीं थी जनसंख्या कम थी और भूमि की मात्रा अधिक थी किन्तु भूमि का अधिकांश भाग घने जंगलों से आच्छादित था। उत्तर वैदिक काल में लोहे के इस्तमाल से जंगलों को काटा गया और उस भूमि को लोहे के फाल लगे हल से बैलों के माध्यम से जोता गया तथा कृषि उपयोगी बनाया गया। शतपथ ब्राह्मण और पंचविश ब्राह्मण ग्रन्थों में वर्णन है कि एक ही हल को बीस-बीस बैल खींचते थे। वैदिक काल में पृथ्वी के दोहन के लिये अधिकाधिक पुरुषों और बैलों की आवश्यकता महसूस की गई। अत: अधिक से अधिक पुत्र जन्म देने वाली स्री और अधिक से अधिक बछड़ों को जन्म देने वाली गाय को पूज्य घोषित किया गया तथा गाय की हत्या को शक्ति से प्रतिबंधित कर दिया गया।

छठवीं शताब्दी ई० पू० में जैन और बौद्ध धर्म के संस्थापकों ने गौहत्या को पूर्णत: बन्द करा दिया तथा जीवहत्या को धर्म विरुद्ध घोषित करार दिया और गाय को और उसके वंश को पूर्णत: सरक्षण देते हुए मनुष्य जीवन के लिये उपयोगी बताया जिससे गाय के प्रति भारतीय जनमानष में श्रद्धा संचार का सृजन हो सका।

गाय की इस अनुपम उपयोगिता न ही इसे धर्म में स्थान के दिया है। पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार यह समस्त भूमंडल ही गाय के सींग पर टिका हुआ है। इसका बुद्धिगम्य अर्थ यह हुआ कि सांसारिक जीवन का बहुत कुछ आधार गाय पर है। हमारी भारतीय संस्कृति की यह विशेषता है, कि जो नियम और बाते मानव-जीवन के लिये हितकर ज्ञात हुई, उन्हें धार्मिक रुप प्रदान कर संरक्षित कर दिया गया। इससे उनके प्रति श्रद्धा और भक्ति की भावना भी जुड़ गई है।

ब्रज के जन जीवन में गाय का जो महत्वपूर्ण स्थान रहा है, उसके कारण वह यहाँ की धार्मिक भावना में से अत्यन्त निकट का संबंध रखती है। ब्रज के धर्मायार्थ और भक्त जनों ने गाय के प्रति अपनी भक्ति-भावना को बड़े ही मार्मिक शब्दों में व्यक्त किया है। साधारण मुसलमानों में भले ही गाय के प्रति ऐसा दृष्टिकोण न रहा हो, किन्तु जिन सहृदय मुसलमानों ने ब्रज की भक्ति-भावना को स्वीकार कर लिया था, वे गाय के प्रति हिंदुओं से कम श्रद्धावान नहीं थे। भक्तवर रसखान की कामना थी कि यदि आगामी योनि में उन्हें मानव की देह प्राप्त हो, तो ब्रज के गोकुल के ग्वालाओं के साथ रहने का ही उन्हें सुयोग मिले। यदि किसी प्रकार पशु होनो पड़े, तो फिर नंद की गायों के साथ चरने का सौभाग्य प्राप्त हो सके। उन्होंने कहा है-

   मानुष हों तो वही रसखान, बसों मिल गोकुल गाँव के ग्वारन।
   जो पशु हों तो कहा बस मेरौ, चरौ नित नंद की धेनु मँझारन३।।

३. रसखान रत्नावली, पृ० ६५

भगवान् श्रीकृष्ण की बाल क्रीड़ाओं में गौचारण का अतिशय महत्व है और इसका कथन ब्रज के भक्त कवियों ने बड़े उल्लास के साथ किया है, इन्होंने रंगो के अनुसार गायों को धौरी, धर्मार, राती, पिथरी, गोरी, कजरी, भूरी, श्यामा, कपिला आदि अनेक नामें से संबोधित करते हुए उनके प्रति बाल कृष्ण के प्यार-दुलार का मनोहर कथन किया है। उनका कहना है-

   धौरी, धुमरि, राती, रौंछी, बोल बुलाइ चिन्होरी।।
   पिथरी, भौरी, गौरी, गेंनी, खैरी, कजरी, जेती।
   पुलही, फुलही, भौरी, भूरी, हाँकि हिकाई तेती।।४
   गोविन्द गिरि चढ टेरत गाई।
   गांग बुलाई धूमरि, धौरी, टेरत बेनु बजाइ।।५

मांगलिक अवसरों पर ब्रज में गोदान करने का परम्परागत प्रचलन रहा है। श्री कृष्ण के जन्म के समय नंद जी ने अनेक सुन्दर गायों को विवध धातुओं से मंडित कर उनका दान ब्राह्मणों को किया था। इसका उल्लेख करते हुए सूरदास ने कहा है-

   खुर तांबे, रुपे पीहि, सोने सींग मढ़ीं।
   ते दीन्ही द्वजन अनेक, हरषि असीस पढीं।।६

केवल ब्रजवासी हिन्दू ही नहीं, वरन् भारतीय मात्र के लिये गाय सदा से श्रद्धा और भक्ति का भाजन रही है। उसकी सेवा करना, उसकी रक्षा करना और उसे बचाने के क्रम में अपनी जान तक दे देना यहाँ की गौरवपूर्ण परंपरा है। भारत के हिन्दू राजा-महाराज ही नहीं वरन् बुद्धिवान मुसलमान बादशाह भी गौरक्षा की व्यवस्था करते रहे हैं। मुगल सम्राट अकबर गो-मांस से बड़ा परहेज करता था। उसने अपने राज्य में गौ

४. सूरसागर (नागरी प्रचारिणी सभा) पद संख्या - १०६३

५. चतुर्भुजदास (काँकरौली) पदसंख्या २१५

६. सूरसागर (ना. प्र. सभा) पद संख्या ६४२

हत्या का निषेद तक गौमांस की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया था। अंग्रेजों ने जहाँ अकबर की अनेक बातों को अपने प्रशासन में स्थान दिया था, वहाँ गोहत्या करने पर उन्होंने कोई रुकावट नहीं डाली थी, बल्कि अंग्रेजी शासन में गौ-मांस के लिए जैसा गौ-वध किया गया, वैसा मुसलमानी शासन में भी नहीं हुआ था। इधर प्राकृतिक तथा अन्य कारणों से ब्रज में गोचर भूमि और वनों की भी बड़ी कमी हो गई है। फलत: ब्रज में जहाँ अपार संख्या में गाय रहती थी और जिनके दूध-दही की ब्रज में कभी नदियाँ बहती थी, ऐसी कहावत थी, वहाँ गायों की संख्या में बहुत कमी हो गई है। और दूध-दही मक्खन का तो अकाल पड़ गया है। इस प्रकार ब्रज की यह विशेषता अब अतीत की बात बन कर रह गई है। यहाँ की गायों की नस्ल थी परिवर्तित हो गई है और उनके दूध की मात्रा भी घट गई है।

वर्तमान समय में ब्रज में गौ-वंश की पुनर स्थापना के लिए अनेक धर्म सम्प्रदायों ने ब्रज मंडल में अनेकों गौशालाएँ स्थापित कर रखी हैं जिनमें हजार-हजार की संख्या तक गायों का पालन और संरक्षण हो रहा है और गौ-पालन के स्थान पर गौसेवा व गौउपासना नाम दिया गया है। गायों के खान पान के लिए गौउपासना नाम दिया गया है। गायों के खान पान के लिये गौउपासकों द्वारा देश विदेश से अनुदान भेंट किया जा रहा है। गोपाष्ठमी के त्यौहार पर देश और विदेश के गौउपासकों द्वारा ब्रज की गौशालाओं में पहुँच कर गौ-पूजा का उत्सव धूम-धाम के साथ मनाया जाता है तथा आम जनता के लिए स्थान-स्थान पर भोज और भण्डारे किए जाते हैं और गौपालकों को अनल्प दान किया जाता है। अन्य पालतू पशु - ब्रज के अन्य पालतू पशुओं में बैल और भैंस का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। ब्रज में कृषि की कल्पना बैल के बिना आज भी नहीं की जा सकती है, चाहे ट्रैक्टर का कितना भी अधिक प्रचलन बढ़ गया है। गाय का यह बलिष्ठ पुत्र ब्रज में अन्न उत्पादन करने और माल ढोने का काम करते हैं तथा भैंस ब्रज में वर्तमान समय के लिए मुख्य दुग्ध स्रोत है। बकरी, दूध और मांस के लिए, घोड़े सवारी और टाँगे के लिए, कुत्ते घर की रखवाली के लिए, ऊँट माल ढोने के लिए, हाथी उत्सव शौक के लिए, शूकर मांस के लिए, गधे बोझा लादने के लिए पाले जाते हैं। ये सभी पालतू पशु ब्रज के जन-जीवन में आवश्यक और उपयोगी भूमिका प्रस्तुत करते हैं।

पक्षी[संपादित करें]

पशुओं की भाँति पक्षी भी पालतू और जंगली दो प्रकार के होते हैं। पालतू पक्षियों में तोता, मैंना, कबूतर, मुर्गे-मुर्गी, तीतर, बटेर गौरैय्या आदि हैं। जंगली पक्षियों में प्राय: मोर, कोयल, पपीहा, नीलकंठ, चकोर, चकवा, खंजन, बगुला, गौरैया, उल्लू, चील, धौरा, तीतर, बटेर आदि हैं। इनमें से कुछ अपने रुप-रंग और कुछ अपनी बोली-आदत के कारण ब्रज प्रजा में अत्यन्त प्रिय हैं और कुछ इनके अभाव के कारण अप्रिय हैं। प्रिय पक्षियों को ही प्राय: बनाया जाता है, किन्तु कुछ जंगली पक्षी भी अत्यन्त लोकप्रिय होते हैं। इस प्रकार प्रियता और अप्रियता की दृष्टि से भी पक्षियों को दो वर्गों में विभाजित किया सकता है। लोकप्रिय पक्षियों में तोता, मैंना, मोर, कोयल, पपीहा, नीलकंठ, कबूतर, चकोर, चकवा, खंजन, शकुन चिड़िया आदि हैं। अप्रिय पक्षियों में कोवा, चील, उल्लू, गिद्ध आदि हैं। उक्त समस्त पक्षी ब्रज मंडल में बहुतायत में पाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त भी बहुत सारे पक्षी ब्रज में पाये जाते हैं।

पालतू और लोकप्रिय पक्षी[संपादित करें]

ब्रज संस्कृति और ब्रज साहित्य में पालतू और लोकप्रिय पक्षियों का विशेष महत्त्व है। ऐसे पक्षियों में तोता और मैंना विशेष उल्लेखनीय है। ये दोनों पक्षी अपनी बोली अथवा वाणी के कारण ब्रज में सदा से बड़े लोकप्रिय रहे हैं। साधारण घरों से लेकर राजमहलों तक में इन्हें पाले जाने के परंपरागत उल्लेख प्राप्त होते हैं। ये पक्षी सिखाये जाने के बाद मनुष्यों की तरह बोलने लगते हैं तथा मनुष्यों जैसे कर्तब करने लगते हैं। उनकी रही हुई बातें सुनकर बड़ा मनोरंजन होता है। तोता अपने रुप-रंग में भी बड़ा सुन्दर पक्षी है, किन्तु मैंना का रंग काला होता है। इन दोनों पक्षियों से सबंधित अनेक मनोंरंजक बातें और किस्से-कहानियाँ ब्रज में बहुतायत में प्रचलित हैं।

कबूतर अपने सुंदर रुप, प्रेमी स्वभाव और अपनी उड़ान के लिये सदा से लोकप्रिय रहा है। यह पक्षी अपने स्थान को कभी नहीं भूलता है। इसे चाहे जहाँ उड़ा दिया जाय, किन्तु यह अपने स्थान पर ही वापिस पहुँच जाता है। कबूतर और तोता की आदतों में यह बड़ा अन्तर है कि तोता को चाहे जितने दिन पाला जाय, किन्तु उसे उड़ा दिये जाने पर वह अपने स्थान पर प्राय: वापिस नहीं पहुँचाता है। लोकरंजन के अतिरिक्त कबूतरों का सैनिक कार्यों में भी उपयोग होता रहा है। प्राचीन काल से कबूतरों द्वारा महत्वपूर्ण संदेश भेजे जाने की परम्परा रही है। मुर्गा-मुर्गी और तीतर, बटेर पालन के प्रमाण प्राचीन काल में भी पाये जाते हैं।