प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
सामान्य शब्दों में किसी एक देश की कंपनी का दूसरे देश में किया गया निवेश प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई कहलाता है। ऐसे निवेश से निवेशकों को दूसरे देश की उस कंपनी के प्रबंधन में कुछ हिस्सा हासिल हो जाता है जिसमें उसका पैसा लगता है। आमतौर पर माना यह जाता है कि किसी निवेश को एफडीआई का दर्जा दिलाने के लिए कम-से-कम कंपनी में विदेशी निवेशक को 10 फीसदी शेयर खरीदना पड़ता है। इसके साथ उसे निवेश वाली कंपनी में मताधिकार भी हासिल करना पड़ता है।
एफडीआई दो तरह के हो सकते हैं-इनवार्ड और आउटवार्ड। इनवार्ड एफडीआई में विदेशी निवेशक भारत में कंपनी शुरू कर यहां के बाजार में प्रवेश कर सकता है। इसके लिए वह किसी भारतीय कंपनी के साथ संयुक्त उद्यम बना सकता है या पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी यानी सब्सिडियरी शुरू कर सकता है। अगर वह ऐसा नहीं करना चाहता तो यहां इकाई का विदेशी कंपनी का दर्जा बरकरार रखते हुए भारत में संपर्क, परियोजना या शाखा कार्यालय खोल सकता है। आमतौर पर यह भी उम्मीद की जाती है कि एफडीआई निवेशक का दीर्घावधि निवेश होगा। इसमें उनका वित्त के अलावा दूसरी तरह का भी योगदान होगा। किसी विदेशी कंपनी द्वारा भारत स्थित किसी कंपनी में अपनी शाखा, प्रतिनिधि कार्यालय या सहायक कंपनी द्वारा निवेश करने को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) कहते हैं।
संयुक राज्य अन्तरराष्ट्रिय प्रत्यक्ष निवेश प्रवाह:[1]
| अवधि | FDI आमद | FDI बहिर्वाह | निवल आमद |
|---|---|---|---|
| 1960–69 | $ 42.18 bn | $ 5.13 bn | + $ 37.04 bn |
| 1970–79 | $ 122.72 bn | $ 40.79 bn | + $ 81.93 bn |
| 1980–89 | $ 206.27 bn | $ 329.23 bn | – $ 122.96 bn |
| 1990–98 | $ 950.47 bn | $ 907.34 bn | + $ 43.13 bn |
| 2000–07 | $ 1,629.05 bn | $ 1,421.31 bn | + $ 207.74 bn |
| Total | $ 2,950.72 bn | $ 2,703.81 bn | + $ 246.88 bn |
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A==संदर्भ==
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