डायलिसिस

मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
यह लेख आज का आलेख के लिए निर्वाचित हुआ है। अधिक जानकारी हेतु क्लिक करें।
हीमोडायलिसिस की एक मशीन

अपोहन या डायलिसिस रक्त शोधन की एक कृत्रिम विधि होती है। इस प्रक्रिया को तब अपनाया जाता है जब किसी व्यक्ति के वृक्क यानि गुर्दे सही से काम नहीं कर रहे होते हैं। गुर्दे से जुड़े रोगों, लंबे समय से मधुमेह के रोगी, उच्च रक्तचाप जैसी स्थितियों में कई बार डायलसिस की आवश्यकता पड़ती है। स्वस्थ व्यक्ति में गुर्दे द्वारा जल और खनिज (सोडियम, पोटेशियम क्लोराइड, फॉस्फोरस सल्फेट[1]) का सामंजस्य रखा जाता है। डायलसिस स्थायी और अस्थाई होती है। यदि डायलिसिस के रोगी के गुर्दे बदल कर नये गुर्दे लगाने हों, तो डायलिसिस की प्रक्रिया अस्थाई होती है। यदि रोगी की गुर्दे इस स्थिति में न हो कि उसे प्रत्यारोपित किया जाए, तो डायलिसिस अस्थायी होती है, जिसे आवधिक किया जाता है। ये आरंभ में एक माह से लेकर बाद में एक दिन और उससे भी कम होती जाती है।

सामान्यतया दो तरह की डायलिसिस की जाती है[2],

पेरीटोनियल डायलिसिस

पेरीटोनियल डायलिसिस घर में रोगी द्वारा अकेले या किसी की मदद से की जा सकती है। इसमें ग्लूकोज आधारित सॉल्यूशन एब्डोमेन में तकरीबन दो घंटे तक रहता है, उसके बाद उसे निकाल दिया जाता है। इस प्रक्रिया में सजर्न रोगी के एब्डोमेन के अंदर टाइटेनियम प्लग लगा देता है। यह प्रक्रिया उनके लिए असरदार साबित नहीं होती, जिनका इम्यून सिस्टम सिकुड़ चुका है।इस प्रक्रिया में डायलिसिस प्रतिदिन नहीं करानी पड़ती। यह हीमोडायलिसिस की तुलना में कम प्रभावी होती है। [3] पेरीटोनियल डायलिसिस घर पर ही किया जा सकता है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रणाली दस वर्ष से अधिक समय से उपलब्ध है, किन्तु महंगी होने के कारण इसका प्रयोग नहीं किया जाता।[4][2]

हीमोडायलिसिस प्रक्रिया का आरेख
हीमोडायलिसिस

हीमोडायलिसिस आम प्रक्रिया है, ज्यादातर रोगी इसी का प्रयोग करते हैं। इसमें रोगी के खून को डायलाइजर द्वारा पंप किया जाता है। इसमें खून साफ करने में तीन से चार घंटे लगते है। इसे सप्ताह में दो-तीन बार कराना पड़ता है। इसमें मशीन से रक्त को शुद्ध किया जाता है।[3] पेरिटोनियल डायलिसिस बेहतर सिद्ध हुआ है। यह निरंतर होने वाला डायलिसिस है, इसलिए इससे गुर्दे बेहतर तरीके से काम करती है। रू बिन ऎट ऑल द्वारा किए गए अघ्ययन से पता लग कि इसका का प्रयोग करने वाले मरीजों का उपचार हीमो करने वालों के मुकाबले अधिक अच्छा हो रहा है। चॉइस [चॉइसेस फॉर हेल्दी आउटकम्स इन केरिंग फॉर एंड स्टेज रीनल डिजीज] कहलाने वाली यह स्टडी जरनल ऑफ अमरीकन मेडिकल एसोसिएशन में प्रकाशित हुई थी। आठ वर्ष से कम आयु के मरीजों के लिए पीडी की सिफारिश की जाती है।[2][3]

भारत में लगभग सभी बड़े शहरों में डायलिसिस की सुविधा पर्याप्त उपलब्ध है। देश का सबसे बड़ा डायलिसिस केन्द्र चंडीगढ़ में संजय गाँधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में खुलने वाला है। इसमें एक्यूट रीनल फेल्योर के वेटिंग के मरीजों के अलावा क्रॉनिक फेल्योर के मरीजों की भी डायलसिस हो सकेगी।[5]

संदर्भ

बाहरी सूत्र

वैयक्तिक औज़ार
नामस्थान

संस्करण
क्रियाएं
परिभ्रमण
योगदान
सहायता
उपकरण
मुद्रण/निर्यात
अन्य भाषाएँ