गेहूँ के जवारे

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चित्र:Wheatgrass.jpg
गेहूँ के जवारे

जब गेहूं के बीज को अच्छी उपजाऊ जमीन में बोया जाता है तो कुछ ही दिनों में वह अंकुरित होकर बढ़ने लगता है और उसमें पत्तियां निकलने लगती है। जब यह अंकुरण पांच-छह पत्तों का हो जाता है तो अंकुरित बीज का यह भाग गेहूं का ज्वारा कहलाता है। औषधीय विज्ञान में गेहूं का यह ज्वारा काफी उपयोगी सिद्ध हुआ है। गेहूं के ज्वारे का रस कैंसर जैसे कई रोगों से लड़ने की क्षमता रखता है।

प्रकृति ने हमें स्वस्थ, ऊर्जावान, निरोगी और आयुष्मान रहने के लिए हमें अनेक प्रकार के पौष्टिक फल, फूल, मेवे, तरकारियां, जड़ी-बूटियां, मसाले, शहद और अन्य खाद्यान्न दिये हैं। ऐसा ही एक संजीवनी का बूटा है गेहूँ का ज्वारा। इसका वानस्पतिक नाम “ट्रिटिकम वेस्टिकम” है। डॉ. एन विग्मोर ज्वारे के रस को “हरित रक्त” कहती है। इसे गेहूँ का ज्वारा या घास कहना ठीक नहीं होगा। यह वास्तव में अंकुरित गेहूँ है।

गेहूँ का ज्वारा एक सजीव, सुपाच्य, पौष्टिक और संपूर्ण आहार है। इसमें भरपूर क्लोरोफिल, किण्वक (एंजाइम्स), अमाइनो एसिड्स, शर्करा, वसा, विटामिन और खनिज होते हैं। क्लोरोफिल सूर्यप्रकाश का पहला उत्पाद है अतः इसमें सबसे ज्यादा सूर्य की ऊर्जा होती है और भरपूर ऑक्सीजन भी।

पोषक तत्व[संपादित करें]

गेहूँ के ज्वारे क्लोरोफिल का सर्वश्रेष्ठ स्रोत हैं। इसमें सभी विटामिन्स प्रचुर मात्रा में होते हैं जैसे विटामिन ए, बी1, 2, 3, 5, 6, 8, 12 और 17 (लेट्रियल); सी, ई तथा के। इसमें केल्शियम, मेग्नीशियम, आयोडीन, सेलेनियम, लौह, जिंक और अन्य कई खनिज होते हैं।

लेट्रियल या विटामिन बी-17 बलवान कैंसररोधी है और मेक्सिको के ओएसिस ऑफ होप चिकित्सालय में पिछले पचास वर्ष से लेट्रियल के इंजेक्शन, गोलियों और आहार चिकित्सा से कैंसर के रोगियों का उपचार होता आ रहा है।

इतिहास[संपादित करें]

प्राचीन काल से ही हिन्दुस्तान के चिकित्सक गेहूँ के ज्वारों को विभिन्न रोगों जैसे अस्थि-संध शोथ, कैंसर, त्वचा रोग, मोटापा, डायबिटीज आदि के उपचार में प्रयोग कर रहे हैं। हमारे कई त्योहारों पर गेहूँ के ज्वारों को उगाने, पूजा करने के रिवाज सदियों से चले आ रहे हैं।

जैसे गणगौर हिन्दुस्तान के कई राज्यों जैसे राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में कुँवारी कन्याओं व सुहागिनों द्वारा मनाया जाने वाला त्योहार है, जो बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।

पहले दिन चैत्र कृष्ण ग्यारस को माताजी की 'मूठ' रखी जाती है। बाँस की छोटी-छोटी टोकरियों में गेहूँ के ज्वारे बोए जाते हैं। ज्वारे वाली परंपरागत जगह को माताजी की 'बाड़ी' कहते हैं। पूरे सप्ताह से बाड़ी की पूजा-अर्चना कर ज्वारों में पानी दिया जाता है और आरती भी की जाती है। ज्वारे लहराने के साथ ग्राम लक्ष्मी गा ने लगती है- 'म्यारा हरिया जवारा हो कि गेहूँआ लहलहे...

...और फिर चैत्र शुक्ल चतुर्थी को गणगौर माता बिदा होती है। सजी-धजी शोभायात्रा के साथ तालाब-बावड़ी पर श्रद्धा के साथ ज्वारे विसर्जित किए जाते हैं।

पश्चिमी देशों में गेहूँ के ज्वारों से उपचार की पद्धति डॉ. एन. विग्मोर ने प्रारम्भ की थी। बचपन में उनकी दादी प्रथम विश्व युद्ध में घायल हुए जवानों का उपचार जड़ी-बूटियों, पैड़-पौधों और विभिन्न प्रकार की घासों से किया करती थी।

तभी से उन्होंने जड़ी-बूटियों और विभिन्न घास के रस द्वारा बीमारियों के उपचार और अनुसंधान करना अपना शौक बना लिया। 50 वर्ष की उम्र में डॉ. एन. विग्मोर को आंत में कैंसर हो गया था। जिसके लिए उन्होंने गेहूँ के ज्वारों का रस और अपक्व आहार लिया और प्रसन्नता की बात थी कि एक वर्ष में वे कैंसर मुक्त हो गई। उन्होंने बोस्टन में एन विगमोर इन्स्टिट्यूट खोला जो आज भी काम कर रहा है। तब से लेकर अपनी मृत्यु तक वह गेहूँ के ज्वारे और अपक्व आहार द्वारा रोगियों का उपचार करती रही। उन्होंने इस विषय पर 35 पुस्तकें भी लिखी हैं।

अमाइनो एसिड और उनके कार्य[संपादित करें]

इसमें 8 आवशयक और बचे हुए 16 मेंसे 13 अमाइनो एसिड्स होते हैं। इनके कार्य संलग्न सारिणी में दर्शाये हैं।

अमाइनो एसिड कार्य

  • लाईसिन- आयुवर्धक
  • ल्यूसिन- ऊर्जा और नाड़ी तंत्र को संवेदनशील बनाये रखना
  • ट्रिप्टोफेन- त्वचा और केश का विकास
  • फिनाइलएलेनीन- थायरॉइड हार्मोन के निर्माण में सहायक
  • थ्रियोनीन- पाचन
  • वेलीन- मस्तिष्क और मांसपेशियों में परस्पर सहयोग और सामंजस्य बनाये रखना
  • मीथियोनीन- यकृत और वृक्क का शोधन
  • एलेनीन- रक्त के निर्माण में सहायक
  • आरजिनीन- वीर्यवर्धक
  • ग्लूटेमिक एसिड- मस्तिष्क को जागरुक रखना
  • एस्पार्टिक एसिड- ऊर्जा का उत्पादन
  • ग्लाइसीन- ऊर्जा का उत्पादन
  • प्रोलीन- ग्लूटेमिक एसिड अवशोषण
  • सेरीन- मस्तिष्क को ऊर्जावान बनाये रखना
  • आइसोल्यूसीन- भ्रूण का विकास
  • हिस्टीडीन- श्रवण और नाड़ी तंत्र की विभिन्न क्रियाओं में सहायक

शक्तिशाली प्रति-ऑक्सीकारक[संपादित करें]

क्या होते हैं मुक्त कण या फ्री रेडिकल्स ?

शरीर में होने वाली विभिन्न चयापचय क्रियाओं में कुछ व्यर्थ और हानिकारक अणु भी बन जाते हैं। इन अणुओं में इलेक्ट्रोन्स की संख्या प्रोटोन्स की अपेक्षा कम होती है जिससे ये अति सक्रिय तथा अस्थिर होते हैं। इन्हें हम “मुक्त कण” कहते हैं और ये मौका मिलते ही हमारे स्वस्थ अणुओं से इलेक्ट्रोन चुरा लेते हैं, इस क्रिया को ऑक्सीडेशन कहते हैं। इलेक्ट्रोन खो कर हमारे स्वस्थ अणु भी मुक्त कणों की भांति व्यवहार करने लगते हैं। और अपने अंतःकरण में बैठे प्रोटोन्स की इलेक्ट्रोन-पिपासा शांत करने हेतु अपना मुख्य काम छोड़ कर इलेक्ट्रोन्स का जुगाड़ करने निकल पड़ते हैं। इस तरह निरंतर इलेक्ट्रोन चुराने का एक श्रंखला-बद्ध सिलसिला शुरू हो जाता है, जिससे हमारी आयुवृद्धि की गति तेज हो जाती है, त्वचा में झुर्रियां बनने लगती हैं और हम विभिन्न बीमारियों जैसे उच्च रक्तचाप, मधुमेह, अस्थि-संध शोथ, पार्किंसन्स, कैंसर आदि का शिकार हो जाते हैं। मुक्त कण हमारे बाह्य वातावरण और भोजन द्वारा भी शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।

प्रति-ऑक्सिकारक या एंटीऑक्सीडेंट

मुक्त कणों से रक्षा करने के लिए हमारे शरीर में अनेक अणु जैसे विटामिन-ई, विटामिन-सी, बीटा-केरोटीन, किण्वक आदि होते हैं, जिनमें कई अतिरिक्त इलेक्ट्रोन्स होते हैं और जो बिना अस्थिर हुए मुक्त कणों को इलेक्ट्रोन्स दान देकर उन्हें निष्क्रिय कर देते हैं। इन्हें हम “प्रति-ऑक्सीकारक” या एंटीऑक्सीडेंट कहते हैं। हमें फलों, सब्जियों युक्त अच्छे आहार से प्रति-ऑक्सिकारक प्राप्त होते हैं तथा हमारे शरीर में भी कई प्रति-ऑक्सीकारक निरंतर बनते रहते हैं। एंटीऑक्सीडेंट आयुवर्धक और आरोग्यवर्धक होते हैं। ये डीएनए की संरचना में विकृति नहीं होने देते हैं, रक्त वाहिकाओं को स्वस्थ रखते हैं और त्वचा को युवा बनाये रखते हैं। गेहूँ के ज्वारे में कई शक्तिशाली प्रति-ऑक्सीकारक होते हैं, परंतु यहां हम चार विशिष्ट प्रति-ऑक्सिकारकों का वर्णन करेंगे।

  1. सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज
  2. पी4डी1
  3. म्यूको-पॉलीसेकराइड्स
  4. क्लोरोफिल
सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज

सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज (एस ओ डी) एक किण्वक है जो कोशिकाओं का जीर्णोद्धार करता है और कोशिकाओं की सुपरऑक्साइड से होने वाली क्षति को कम करता है। सुपरऑक्साइड बहुत ही आम मुक्त कण है। यह त्वचा की दोनों परतों में पाया जाता है और स्वस्थ फाइब्रोब्लास्ट (जो त्वचा बनाने वाली कोशिकाए हैं) के निर्माण में सहायक हैं। एस ओ डी शरीर में जिंक, तांबा और मेंगनीज की उपयोगिता बढ़ाते हैं।

एस ओ डी उत्कृष्ट प्रति-ऑक्सीकारक और शोथ निवारक है, और मुक्त कणों के प्रभाव से बनने वाली झुर्रियों और त्वचा की जीर्णता को कम करता है। अनुसंधानकर्ता कहते हैं कि जैसे जैसे हम प्रौढ़ता की ओर अग्रसर होते हैं शरीर में एस ओ डी की मात्रा कम होती जाती है। सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज उनमें विद्यमान धातुओं के आधार पर तीन वर्गों में बांटे गये हैं।

  1. तांबा जिंक एस ओ डी जो कोशिका के साइटोप्लाज्म की सुरक्षा करते हैं।
  2. मेंगनीज एस ओ डी जो माइटोकोन्ड्रिया की सुरक्षा करते हैं।
  3. निकल एस ओ डी जो कोशिकाओं के बाहर रहते हैं।

एस ओ डी आर्थ्राइटिस, पुरुष ग्रंथि रोग, कैंसर, कोर्नियल अल्सर, जलने से हुए घावों, आइ बी एस और धूम्रपान, विकिरण और कैंसररोधी दवाओं के दुष्प्रभाओं के उपचार में सहायक हैं। इसकी क्रीम चेहरे की झुर्रियों, जलने से हुए घावों , त्वचा के घावों व गहरे दाग धब्बों आदि में बहुत उपयोगी है। यह हानिकारक यू वी किरणों से त्वचा की रक्षा करता हैं।

गेहूँ के ज्वारे, ब्रोकॉली, पत्तागोभी, जौ की घास और हरे पत्तेवाली तरकारियां इसके प्रमुख स्रोत हैं। इसके इंजेक्शन, जीभ के नीचे रखने वाली तथा एंटेरिक कोटेड गोलियां और क्रीम उपलब्ध हैं। आमाशय में बनने वाले अम्ल इसे निष्क्रिय कर देते हैं, इसलिए इसे जीभ के नीचे रखने वाली या एंटेरिक कोटेड गोलियों के रूप में ही दिया जाता है।

म्यूको-पॉलीसेकराइड्स

म्यूको-पॉलीसेकराइड्स सामान्य और जटिल शर्कराओं का मिश्रण होता है जो शरीर के रख-रखाव के लिए महत्वपूर्ण है। शरीर की कोशिकाएं निरंतर क्षतिग्रस्त और नष्ट होती रहती हैं। कोशिकाओं के जीर्णोद्धार तथा नई कोशिकाओं के निर्माण कार्य भी साथ साथ चलता रहता है, जो जितना सुचारु और स्निग्धता से होता रहेगा हम उतना ही युवा व स्वस्थ बने रहेंगे। म्यूको-पॉलीसेकराइड्स खासतौर से हृदय और रक्त वाहिकाओं की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं के रख-रखाव के काम को प्राथमिकता से करते हैं।

पी4डी1

P4D1 एक ग्लूको-प्रोटीन है। यह प्रति-ऑक्सीकारक की भांति कार्य करता है। इसके तीन मुख्य कार्य हैं।

  1. यह डी एन ए और आर एन ए, जो शरीर निर्माण का मुख्य आधार हैं, के जीर्णोद्धार तथा नवीनीकरण को प्रोत्साहित करते है। ये कोशिकाओं की आयुवृद्धि और असामान्य विभाजन में अवरोध पैदा करते हैं। और इस तरह हमें अपकर्षक (डीजनरेटिव) बीमारियों से बचाते हैं।
  2. यह शरीर में शोथ को कम करता है। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार यह कोर्टिजोन से भी ज्यादा शक्तिशाली शोथ निवारक है। कई इन्फ्लेमेट्री रोगों जैसे आर्थ्राइटिस आदि के उपचार में गेहूँ के ज्वारे का रस अत्यंत प्रभावशाली है।
  3. यह कैंसर कोशिकाओं की भित्तियों को कमजोर बनाते हैं, ताकि रक्त के श्वेत कण कैंसर कोशिकाओं में सहजता से प्रवेश कर उन्हें नष्ट कर सकें।
क्लोरोफिल

गेहूँ के ज्वारे का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है क्लोरोफिल। यह क्लोरोप्लास्ट नामक विशेष प्रकार के कोषों में होता है। क्लोरोप्लास्ट सूर्यकिरणों की सहायता से पोषक तत्वों का निर्माण करते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक डॉ. बर्शर क्लोरोफिल को “संकेन्द्रित सूर्यशक्ति” कहते हैं। वैसे तो हरे रंग की सभी वनस्पतियों में क्लोरोफिल होता है, किंतु गेहूँ के ज्वारे का क्लोरोफिल श्रेष्ट है, क्योंकि क्लोरोफिल के अलावा इनमें 100 अन्य पौष्टिक तत्व भी होते हैं।

सभी जानते हैं कि मानव रक्त में हीमोग्लोबिन होता है। इस हीमोग्लोबिन में एक लाल रंग का द्रव्य होता है जिसे हीम कहते हैं। हीम और क्लोरोफिल की रासायनिक संरचना में बहुत समानता होती है। दोनों में कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के परमाणुओं की संख्या तथा उनका विन्यास लगभग एक जैसा होता है। हीम और क्लोरोफिल की संरचना में केवल एक ही अंतर है, क्लोरोफिल के केन्द्र स्थान में मेग्नीशियम होता है, जबकि हीमोग्लोबिन के केन्द्र स्थान में लौहा होता है।

हमारा रक्त हल्का क्षारीय है और उसका हाइड्रोजन अणु गुणांक pH 7.4 है। ज्वारे का रस भी हल्का क्षारीय है और उसका pH भी 7.4 है। इसलिए ज्वारे का रस शीघ्रता से रक्त में अवशोषित हो जाता है और शरीर के उपयोग में आने लगता है।

गेहूँ के ज्वारे से मानव को संपूर्ण पोषण मिल जाता है। सावधानी पूर्वक चुनी हुई 23 किलो तरकारियों जितना पोषण 1 किलो गेहूँ के ज्वारे के रस से प्राप्त हो जाता है। सिर्फ ज्वारे का रस पीकर मानव पूरा जीवन बिता सकता है। 100 ग्राम ताजा रस में 90-100 मि.ग्राम क्लोरोफिल प्राप्त हो जाता है।

क्लोरोफिल से हमें मेग्नीशियम प्राप्त होता है। हमारी प्रत्येक कोशिका में मेग्नीशियम सूक्ष्म मात्रा में होता है। परंतु यह शरीर के लिए है बहुत महत्वपूर्ण। संपूर्ण शरीर में लगभग 50 ग्राम मेग्नीशियम होता है। मेग्नीशियम हमारी अस्थियों के निर्माण के लिए आवश्यक खनिज है। यह नाड़ियों और मांसपेशियों को तनाव रहित अवस्था में रखता है। शरीर में कैल्शियम और विटामिन सी का संचालन, नाड़िओं और मांसपेशियों की उपयुक्त कार्यशीलता के लिये मैग्नेशियम आवश्यक है। कैल्शियम-मैग्नेशियम सन्तुलन में गड़बड़ी आने से स्नायु-तंत्र दुर्बल हो सकता है। मैग्नेशियम शरीर के भीतर लगभग तीन सौ ऍन्जाइम्स की सक्रियता के लिए आवश्यक है। मैग्नेशियम के निम्न स्तरों और उच्च रक्तचाप तथा मधुमेह में स्पष्ट अंतर्संबंध स्थापित हो चुका है। व्यायाम एवं शारीरिक मेहनत करने वाले लोगों को मैग्नेशियम सम्पूरकों की आवश्यकता है। मैग्नेशियम की कमी से महिलाओं में कई समस्याएं दिखाई देती हैं, जैसे पाँवों की मांसपेशियाँ कमजोर होना (जिससे रेस्टलेस लेग सिंड्रोम होता है), पाँवों में बिवाइयां फटना, पेट की गड़बड़ी, एकाग्रता में कमी, रजोनिवृत्ति संबंधी समस्याओं का बढ़ना, मासिक-धर्म पूर्व के तनाव में वृद्धि आदि।

क्लोरोफिल से लाभ

क्लोरोफिल हमें तीन प्रकार से लाभ देता है।

  1. शोधन – घावों के लिए क्लोरोफिल अत्यंत प्रबल कीटाणुनाशक है। यह फंगसरोधी भी है और शरीर से टॉक्सिन्स को विसर्जन करता है। । यह कई रोग पैदा करने वाले जीवाणु को नष्ट करता है और उनके विकास को बाधित करता है। यकृत का शोधन करता है।
  2. एंटी-इन्फ्लेमेट्री – यह शरीर में इन्फ्लेमेशन को कम करता हैं। अतः आर्थ्राइटिस, आमाशय शोथ, आंत्र शोथ, गले की ख़राश आदि में अत्यंत लाभदायक हैं।
  3. पोषण – यह रक्त बनाता है, आंतों के लाभप्रद कीटाणुओं को भी पोषण देते हैं।


रस के औषधीय उपयोग[संपादित करें]

1- कैंसर गेहूँ के ज्वारे कैंसर पर कैसे असर दिखाते है???

ऑक्सीजन को अनुसंधानकर्ता कैंसर कोशिकाओं को नेस्तनाबूत करने वाली 7.62x39 मि.मी. केलीबर की वो गोली मानते हैं, जो गेहूँ के ज्वारे रूपी ए.के. 47 बंदूक से निकल कर कैंसर कोशिकाओं को चुन-चुन कर मारती है। सर्व प्रथम तो इसमें भरपूर क्लोरोफिल होता है, जो शरीर को ऑक्सीजन से सराबोर कर देता है। क्लोरोफिल शरीर में हीमोग्लोबिन का निर्माण करता है, मतलब कैंसर कोशिकाओं को ज्यादा ऑक्सीजन मिलती है और ऑक्सीजन की उपस्थिति में कैंसर का दम घुटने कगता है।

गेहूँ का ज्वारों में विटामिन बी-17 या लेट्रियल और सेलेनियम दोनों होते हैं। ये दोनों ही शक्तिशाली कैंसररोधी है। क्लोरोफिल और सेलेनियम शरीर की रक्षा प्रणाली को शक्तिशाली बनाते हैं। गेहूँ का ज्वारा भी रक्त के समान हल्का क्षारीय द्रव्य है। कैंसर अम्लीय माध्यम में ही फलता फूलता है।

गेहूँ का ज्वारा में विटा-12 को मिला कर 13 विटामिन, कई खनिज जैसे सेलेनियम और 20 अमाइनो एसिड्स होते है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट किण्वक सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज और अन्य 30 किण्वक भी होते हैं। एस ओ डी सबसे खतरनाक फ्री-रेडिकल रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पिसीज को हाइड्रोजन परऑक्साइड (जिसमें कैंसर कोशिका का सफाया करने के लिए एक अतिरिक्त ऑक्सीजन का अणु होता है) और ऑक्सीजन के अणु में बदल देता है।

सन् 1938 में महान अनुसंधानकर्ता डॉ. पॉल गेरहार्ड सीजर, एम.डी. ने बताया था कि कैंसर का वास्तविक कारण श्वसन क्रिया में सहायक एंजाइम साइटोक्रोम ऑक्सीडेज का नष्ट होना है। सरल शब्दों में जब कोशिका में ऑक्सीजन उपलब्ध न हो या सामान्य श्वसन क्रिया बाधित हो जाये तभी कैंसर जन्म लेता है।

ज्वारों में एक हार्मोन एब्सीसिक एसिड (ए बी ए) होता है जो हमें अन्यत्र कहीं नहीं मिलता है। डॉ. लिविंग्स्टन व्हीलर के अनुसार एब्सीसिक एसिड कोरियोनिक गोनेडोट्रोपिन हार्मोन को निष्क्रिय करता है और वे ए बी ए को कैंसर उपचार का महत्वपूर्ण पूरक तत्व मानती थी। डॉ. लिविंग्स्टन ने पता लगाया था कि कैंसर कोशिका कोरियोनिक गोनेडोट्रोपिन से मिलता जुलता हार्मोन बनाती हैं। उन्होंने यह भी पता लगाया था कि गेहूँ के ज्वारे को काटने के 4 घंटे बाद उसमें ए बी ए की मात्रा 40 गुना ज्यादा होती है। अतः उनके मतानुसार ज्वारे के रस को थोड़ा सा तुरंत और बचा हुआ 4 घंटे बाद पीना चाहिये। 2- गेहूँ के ज्वारे में अन्य हरी तरकारियों की तरह भरपूर ऑक्सीजन होती है। मस्तिष्क और संपूर्ण शरीर ऊर्जावान तथा स्वस्थ रखने के लिए भरपूर ऑक्सीजन आवश्यक है। 3- डॉ. बरनार्ड जेन्सन के अनुसार गेहूँ के ज्वारे का रस कुछ ही मिनटों में पच जाता है और इसके पाचन में बहुत कम ऊर्जा खर्च होती है। 4- यह कीटाणुरोधी हैं, उन्हें नष्ट करता है और उनके विकास को बाधित करता है। 5- यह शरीर से हानिकारक पदार्थों (टॉक्सिन्स), भारी धातुओं और शरीर में जमा दवाओं के अवशेष का विसर्जन करता है। 6- यदि इसका सेवन 7-8 महीने तक किया जाये तो यह मुहाँसों और उनसे बने दाग, धब्बे और झाइयां सब साफ हो जाते हैं। 7- यह त्वचा के लिए प्राकृतिक साबुन का कार्य करता हैं और शरीर को दुर्गंध रहित रखता है। 8- यह दांतों को सड़न से बचाते है। 9- यदि 5 मिनिट तक गेहूँ के ज्वारे का रस मुंह में तो दांत का दर्द ठीक करता है। 10- इसके गरारे करने से गले की खारिश ठीक हो जाती है। 11- गेहूँ के ज्वारे का रस नियमित पीने से एग्जीमा और सोरायसिस भी ठीक हो जाते हैं। 12- ज्वारे का रस पीने से बाल समय से पहले सफेद नहीं होते हैं। 13- ज्वारे का रस पीने से शरीर स्वस्थ, ऊर्जावान, सहनशील, आध्यात्मिक और प्रसन्नचित्त बना रहता है। 14- यह पाचन शक्ति को बढ़ाता है। 15- यह समस्त रक्त संबन्धी रोगों के लिए रामबाण औषधि है। 16- ज्वारे का रस का एनीमा लेने से आंतों और पेट के अंगों का शोधन होता है। 17- यह कब्जी ठीक करता है। 18- यह उच्च रक्तचाप कम करता है और केशिकाओं ( Fine blood vessels or capillaries) का विस्तारण करता है। 19- यह स्थूलता या मोटापा कम करता है क्यों कि यह भूख कम करता है, बुनियादी चयापचय दर और शरीर में रक्त के संचार को बढ़ाता है।

उगाने की विधि[संपादित करें]

घर पर गेहूँ के ज्वारे बनाना के लिए इन चीजों की आवश्यकता होगी।


आवश्यक सामान 1-अच्छी किस्म के जैविक गेहूँ के बीज। 2-अच्छी उपजाऊ मिट्टी और उम्दा जैविक या गोबर की खाद। 3-मिट्टी के 10-12” व्यास के 3-4” गहरे सात गोलाकार गमले जिसमें भी नीचे छेद हों। आप अच्छे प्लास्टिक की 20”x10”x2” नाप की गार्डनिंग ट्रे, जिसमें नीचे कुछ छेद हो, भी ले सकते है। गेहूँ भिगोने के लिए कोई पात्र या जग। 4-मिक्सी या ज्यूसर। 5-पानी देने के लिए स्प्रे-बोटल या पौधों को पानी पिलाने वाला झारा व कैंची। विधि 1- हमेशा जैविक बीज ही काम में लें, ताकि आपको हमेशा मधुर व उत्कृष्ट रस प्राप्त हो जो विटामिन और खनिज से भरपूर हो । रात को सोते समय लगभग 100 ग्राम गेहूँ एक जग में भिगो कर रख दें। 2- सभी गमलों के छेद को एक पतले पत्थर के टुकड़े से ढक दें। अब मिट्टी और खाद को अच्छी तरह मिलाएं। गमलों में मिटटी की डेढ़ दो इंच मोटी परत बिछा दें और पानी छिड़क दें। ध्यान रहे मिट्टी में रासायनिक खाद या कीटनाषक के अवशेष न हों और हमेशा जैविक खाद का ही उपयोग करें। पहले गमले पर रविवार, दूसरे गमले पर सोमवार, इस प्रकार सातों गमलो पर सातों दिनों के नाम लिख दें। 3- अगले दिन गेहुंओं को धोकर निथार लें। मानलो आज रविवार है तो उस गमले में, जिस पर आपने रविवार लिखा था, गेहूँ एक परत के रूप में बिछा दें। गेहुंओं के ऊपर थोड़ी मिट्टी डाल दें और पानी से सींच दें। गमले को किसी छायादार स्थान जैसे बरामदे या खिड़की के पास रख दें, जहां पर्याप्त हवा और प्रकाश आता हो पर धूप की सीधी किरणे गमलों पर नहीं पड़ती हो। अगले दिन सोमवार वाले गमले में गेहूँ बो दीजिये और इस तरह रोज एक गमले में गेहूँ बोते रहें। 4- गमलों में रोजाना कम से कम दो बार पानी दें ताकि मिट्टी नम और हल्की गीली बनी रहे। शुरू के दो-तीन दिन गमलों को गीले अखबार से भी ढक सकते हैं। जब गैहूँ के ज्वारे एक इंच से बड़े हो जाये तो एक बार ही पानी देना प्रयाप्त रहता है। पानी देने के लिए स्प्रे बोटल का प्रयोग करे। गर्मी के मौसम में ज्यादा पानी की आवश्यकता रहती है। पर हमेशा ध्यान रखे कि मिट्टी नम और गीली बनी रहे और पानी की मात्रा ज्यादा भी न हो। 5- सात दिन बाद 5-6 पत्तियों वाला 6-8 इन्च लम्बा ज्वारा निकल आयेगा। इस ज्वारे को जड़ सहित उखाड़ ले और पानी से अच्छी तरह धो लीजिए। इस तरह आप रोज एक गमले से ज्वारे तोड़ते जाइये और रोज एक गमले में ज्वारे बोते भी जाइये ताकि आपको निरन्तर ज्वारे मिलते रहे। 6- अब धुले हुए ज्वारों की जड़ काट कर अलग कर दें तथा मिक्सी के छोटे जार में थोड़ा पानी डालकर पीस लें और चलनी से गिलास में छानकर प्रयोग करे। ज्वारों के बचे हुए गुदे को आप त्वचा पर निखार लाने के लिए मल सकते हैं। आप हाथ से घुमाने वाले ज्यूसर से भी ज्यूस निकाल सकते हैं।

सेवन का तरीका[संपादित करें]

ज्वारे का रस सामान्यतः 60-120 एमएल प्रति दिन या प्रति दूसरे दिन खाली पेट सेवन करना चाहिये। यदि आप किसी बीमारी से पीड़ित हैं तो 30-60 एमएल रस दिन मे तीन चार बार तक ले सकते हैं। इसे आप सप्ताह में 5 दिन सेवन करें। कुछ लोगों को शुरू में रस पीने से उबकाई सी आती है, तो कम मात्रा से शुरू करें और धीरे-धीरे मात्रा बढ़ायें। ज्वारे के रस में फलों और सब्जियों के रस जैसे सेब फल, अन्नानास आदि के रस को मिलाया जा सकता है। हां इसे कभी भी खट्टे रसों जैसे नीबू, संतरा आदि के रस में नहीं मिलाएं क्योंकि खटाई ज्वारे के रस में विद्यमान एंजाइम्स को निष्क्रिय कर देती है। इसमें नमक, चीनी या कोई अन्य मसाला भी नहीं मिलाना चाहिये। ज्वारे के रस की 120 एम एल मात्रा बड़ी उपयुक्त मात्रा है और एक सप्ताह में इसके परिणाम दिखने लगते हैं। डॉ. एन विग्मोर ज्वारे के रस के साथ अपक्व आहार लेने की सलाह भी देती थी।

गेहूँ के ज्वारे चबाने से गले की खारिश और मुंह की दुर्गंध दूर होती है। इसके रस के गरारे करने से दांत और मसूड़ों के इन्फेक्शन में लाभ मिलता है। स्त्रियों को ज्वारे के रस का डूश लेने से मूत्राशय और योनि के इन्फेक्शन, दुर्गंध और खुजली में भी आराम मिलता है। त्वचा पर ज्वारे का रस लगाने से त्वचा का ढीलापन कम होता है और त्वचा में चमक आती है।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]