गुफ़ा की कथा

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प्लेटो के गुफ़ा कथा पर सन् १६०४ में बनी एक तस्वीर
गुफ़ा कथा का एक और चित्रण

गुफ़ा की सीख (अंग्रेज़ी: Allegory of the Cave), जिसे प्लेटो की गुफ़ा और गुफ़ा की रूपक कथा भी कहा जाता है, एक सिद्धांत दर्शाने वाली रूपक कथा है जिसे यूनानी दार्शनिक प्लेटो (अफ़लातून) ने अपने प्रसिद्ध रिपब्लिक नामक ग्रन्थ में 'हमारे प्राकृतिक ज्ञान और अज्ञान' पर प्रकाश डालने के लिए सम्मिलित किया था। यह कथा प्लेटो के मित्र सुकरात और प्लेटो को भाई ग्लाउकोन के बीच हुई बातचीत के रूप में लिखी गई है।[1]

इस कथा में सुकरात कहता है कि कुछ ऐसे लोगों की कल्पना करो जो जीवन-भर एक अँधेरी गुफ़ा की किसी दीवार से ज़ंजीरों के साथ बंधे हैं। उनके पीछे एक आग जल रही है और वे केवल अपने सामने वाली दीवार पर आग की रौशनी देख सकते हैं। अब यह समझो की उस आग के सामने से कुछ चीज़ें निकलती हैं जिनकी परछाईयाँ उस दीवार पर पड़ती हैं। उन बंदियों के लिए केवल यह परछाईयाँ ही असलियत हैं और वे इन्हें ही विश्व की सच्चाई मानकार जीते हैं। प्लेटो ने कहा कि वास्तव में मनुष्यों के लिए दुनिया कुछ ऐसी ही है और दार्शनिक वह लोग हैं जो उस गुफ़ा की क़ैद से मुक्त होकर परछाईयों के पीछे की सच्चाई देख पाते हैं।

सार[संपादित करें]

गुफ़ा के अन्दर[संपादित करें]

सुकरात ने एक ऐसी स्थिति का वर्णन किया जिसमें लोगों द्वारा सच्ची असलियत समझें जाने वाले तथ्य वास्तव में केवल भ्रम हैं। उसने ग्लाउकोन से कहा कि वह एक गुफ़ा की कल्पना करे जिसमें कुछ बंदी बचपन से क़ैद हैं और उनके पूरे शरीर और सर गुफ़ा की एक दीवार से कुछ ऐसे जकड़े हुए हैं कि वे बिना सर हिलाए केवल अपने आगे की दीवार ही देख सकते हैं। उनके पीछे एक बहुत बड़ी आग जल रही है जिसके आगे एक चलने की जगह है। इसपर कुछ अन्य लोग अपने सिरों पर अलग-अलग आकृतियों वाली वस्तुएँ लेकर आग के आगे चलते हैं। बंदी इन चीज़ों के साए देखते हैं और उसके अलावा जीवन भर कुछ नहीं देखते। उन्हें यह परछाईयाँ ही असली चीज़ें लगती हैं। गुफ़ा में लोगों के चलने से गूंजती हुई आवाज़ भी उन्हें इन परछाईयों की सच्ची ध्वनियाँ लगती हैं। उन बंदियों के लिए वही व्यक्ति समझदार और प्रशंसनीय है जो यह बता सके की अगली आने वाली परछाई कौनसी होगी।

गुफ़ा से मुक्ति[संपादित करें]

अब सुकरात ने कहा कि कल्पना करो की किसी ऐसे बंदी की बेड़ियाँ खोलकर उसे घूमकर असली वस्तुएँ देखने दिया जाए। यह आदमी उन चीज़ों को पहचान नहीं पाएगा और अभी भी यही मानेगा कि परछाईयाँ ही वास्तविकता है और इन चीज़ों से अधिक असली हैं। सुकरात ने कहा, "अब आगे यह सोच कि उस आदमी को आग देखने के लिए विवश किया जाए: क्या वह चौंधिया कर वापस अपने परिचित सायों की तरफ़ नहीं मुँह मोड़ लेगा? अगर उसे कोई घसीटकर गुफ़ा से बाहर ले जाए तो क्या उसे घसीटने वाले पर क्रोध नहीं आएगा? अगर उसे बाहर सूरज के प्रकाश में ले जाया जाए तो क्या वह उत्तेजित होकर परछाईयों को सत्य और इन नए दृश्यों असत्य नहीं ठहराएगा?" लेकिन कुछ देर बाद वह मुक्त होने का आदि हो जाएगा और देखेगा की सूरज से परछाईयाँ पड़ती हैं, और धीरे-धीरे समझने लगेगा कि वह और उसके साथी हमेशा से परछाईयाँ देखते आये हैं जो रौशनी द्वारा वास्तव की चीज़ों से पडतीं हैं।

गुफ़ा में वापसी[संपादित करें]

सुकरात ने अब ग्लाउकोन से इस मुक्त आदमी की मनोदशा के बारे में सोचने को कहा। "जब वह अपने पुराने घर और उस समाज में बुद्धिमानी की परिभाषा के बारे में सोचेगा को क्या वह स्वयं को सुखी और उनकी स्थिति को दयनीय नहीं समझेगा? और उस समाज द्वारा आने वाली परछाईयों की भविष्यवाणी करने के लिए दिए जाने वाले इनामों, आदर और प्रशंसा को क्या वह बेकार नहीं समझेगा? और अगर वह वापस वहाँ जाए तो अंधेरों की आदत न होने से क्या वह उस समाज की नज़रों में तुच्छ नहीं हो जाएगा? क्या वह यह नहीं कहेंगे कि देखो, यह ऊपर गया और अपनी दृष्टि गँवा के लौटा, इसलिए ऊपर जाने की कोशिश करना भी व्यर्थ है? अगर वह किसी ऐसे आदमी को किसी तरह पकड़ लें जो उन्हें मुक्त करके ऊपर ले जाने की चेष्टा कर रहा हो, तो उसे मार न डालेंगे?" अपने पीछे की दुनिया से अनजान यह क़ैदी मुक्त व्यक्ति की दृष्टि को भ्रष्ट पाएँगे और उस हर बात से डरेंगे जिसे वह पहले से नहीं जानते। उन्हें यह मुक्त व्यक्ति मूर्ख और अक्षम लगेगा क्योंकि वह कुछ देर के लिए अंधेरों में लौटने के बाद ठीक से परछाईयाँ नहीं देख पाएगा।

ज्ञान प्राप्ति में कथा का तात्पर्य[संपादित करें]

किसी भी स्थिति में जब कोई शिष्य एक श्रेणी का ज्ञान रखता है और उसे गुरु को उस से उच्च श्रेणी का ज्ञान देना होता है, तो कभी-कभी उस शिष्य का पूरा दृष्टिकोण बदलना होता है। उच्च श्रेणी के दृष्टिकोण से उसे अपना पहले का आभास एक नए प्रकाश में दिखने लगता है और वह एक अधिक गहरी सच्चाई पर पहुँचता है। लेकिन इन ज्ञान के अलग स्तरों से शिष्य और गुरु में समझने-समझाने की कठिनाइयाँ पैदा हो सकती हैं।[2] अक्सर ज्ञान की वर्तमान से अधिक ऊँची श्रेणी पर पहुँचने वाला घबराता है, नए ज्ञान को पहचान नहीं पाता और उस स्तर पर पहुँचना उसके लिए निजी रूप से एक कठिन अनुभव होता है।[3]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. The classical moralists: selections illustrating ethics from Socrates to Martineau, Benjamin Rand (editor), pp. 45, Houghton Mifflin, 1909, ... The allegory of the cave ... Socrates, Glaucon ... And now, I said, let me show in a figure how far our nature is enlightened or unenlightened: Behold! human beings living in an underground den, which has a mouth open towards the light ...
  2. Archetypes of Wisdom: An Introduction to Philosophy, Douglas J. Soccio, Cengage Learning, 2012, ISBN 978-1-111-83779-2, ... The Allegory of the Cave ... One problem common to any hierarchical enlightenment philosophy involves the gap between what the wise master knows and the pupil's initial ignorance. Different levels of experience can create communication and comprehension gaps ...
  3. Mythos and Logos: How to Regain the Love of Wisdom, Rodopi, 2004, ISBN 978-90-420-1020-8, ... we turn to the Allegory of the Cave. There we see what is at stake when the soul fails to turn around. It mistakes shadows for substance. But turning around involves a hard, painful ascent ...