ख़

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ख़ की ध्वनि सुनिए

ख़ देवनागरी लिपि का एक वर्ण है। हिंदी-उर्दू के कईं शब्दों में इसका प्रयोग होता है, जैसे की ख़रगोश, ख़ुश, ख़बर, ख़ैर और ख़ून। अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला में इसके उच्चारण को x के चिन्ह से लिखा जाता है और उर्दू में इसे خ लिखा जाता है, जिस अक्षर का नाम ख़े है।

अघोष कण्ठ्य संघर्षी[संपादित करें]

ख़ को भाषाविज्ञान के नज़रिए से अघोष कण्ठ्य संघर्षी वर्ण कहा जाता है (अंग्रेजी में इसे वाएस्लेस वेलर फ़्रिकेटिव कहते हैं)।

वैदिक संस्कृत में[संपादित करें]

२०११ के अन्ना हज़ारे आन्दोलन में रामलीला मैदान में प्रयोग हुआ एक चिह्न - अंतिम पंक्ति में 'ख़ून' के 'ख़' में सही जगह लगा बिंदु देखिए

'ख़' की ध्वनि के बारे में एक ग़लत धारणा है के इसे भारत में केवल अरबी-फ़ारसी के शब्दों की वजह से मान्यता प्राप्त है। प्राचीन वैदिक संस्कृत में 'ख़' की ध्वनि पाई जाती थी और इसे जिह्वामूलीय की श्रेणी में डाला जाता था।[1] 'ख़' की ध्वनि को विसर्ग में ही अघोष कण्ठ्य वर्णों से पहले उच्चारित किया जाता था।[2] पाणिनि के समय तक यह ध्वनि संस्कृत से लुप्त हो गयी और केवल एक सरल विसर्ग ही उच्चारित किया जाने लगा। भारत की कुछ आदिवासी भाषाओं में भी यह ध्वनि अभी तक पाई जाती है, जैसे की झारखण्ड और बिहार की उरांव जनजाति की बोली का नाम ही कुड़ुख़ है।

ग़लत उच्चारण[संपादित करें]

'ख़' की ध्वनी का उच्चारण कईं लोग ग़लती से 'ख' से मिलता-जुलता कर देते हैं। इस से कभी-कभी शब्दों का अर्थ बदल कर ग़लत अर्थ निकल आता है। कुछ उदहारण हैं -

  • ख़ाना का अर्थ होता है कोई कमरा या घर (जैसे की ग़ुसलख़ाना, पागलख़ाना, मयख़ाना, चायख़ाना) जबकि खाना का अर्थ है कोई खाने की चीज़ (खाद्य पदार्थ)
  • ख़ुदा का अर्थ है भगवान जबकि खुदा का अर्थ है वो जगह जहां खुदाई करी गई हो. अगर कहें "इधर भी ख़ुदा है, उधर भी ख़ुदा है" तो इसका अर्थ है "इधर भी भगवान है, उधर भी भगवान है" यानी भगवान सर्वत्र है। लेकिन अगर कहें "इधर भी खुदा है, उधर भी खुदा है" तो इसका अर्थ है के "इधर, उधर, हर जगह पर खुदाई हुई है" जिसका मतलब पहले वाक्य से बिलकुल भिन्न है।

इन्हें भी देखिये[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Sir Monier Monier-Williams. "A practical grammar of the Sanskrit language, arranged with reference to the classical languages of Europe, for the use of English students". Clarendon Press, 1864. http://books.google.com/books?id=qRwJAAAAQAAJ. "... An Ardha-visarga ... sometimes employed before k,kh and p,ph. Before the two former letters this symbol is properly called Jihva-muliya, and the organ of its enunciation said to be the root of the tongue ..." 
  2. Charles Albert Ferguson, Thom Huebner. "Sociolinguistic perspectives: papers on language in society, 1959-1994". Oxford University Press US, 1996. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9780195092905. http://books.google.com/books?id=bcuIz1M0AzQC. "... This weakened variant, also spelled with visarga, is described by grammarians as a weak voiceless fricative that varies in place of constriction in accordance with the following consonant: labial before /p, ph/, retroflex before /ṣ, ṭ, ṭh/, palatal before /ś, č, čh/, and velar before /k, kh/ ..."