कुमार सानु
| कुमार सानु | |
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| पृष्ठभूमि की जानकारी | |
| जन्मनाम | केदारनाथ भट्टाचार्य |
| अन्य नाम | कुमार सानु |
| जन्म | 20 अक्टूबर १९५७ कोल्काता, पश्छिम बंगाल , भारत। |
| निवास | कोल्काता, पश्छिम बंगाल , भारत। |
| शैली | Playback singing |
| व्यवसाय | Singer, Music Director |
| वाद्ययंत्र | Tabla |
| सक्रिय वर्ष | 1984–present |
| रिकॉर्ड लेबल | Sony Music, T-Series, Tips, Saregama, Venus Records & Tapes |
| जालपृष्ठ | kumarsanuworld.com |
कुमार सानु (पूरा नाम केदारनाथ भट्टाचार्य) हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध गायक हैं।
पुरस्कार [संपादित करें]
फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार [संपादित करें]
कुमार सानु
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कुमार सानू हिंदी सिनेमा के एक जानेमाने पार्श्व गायक हैं। कोलकता में जन्मे कुमार सानू का मूल नाम केदारनाथ भट्टाचार्य है। उनके पिताजी स्वयं एक अच्छे गायक और संगीतकार थे। उन्होंने ही कुमार सानू को गायकी और तबला वादन सिखाया था। गायक किशोर कुमार को अपना आदर्श मानने वाले सानू ने गायकी में अपना खुद का अलग अंदाज़ बनाये रखा है।
कुमार सानू के घर पर शुरू से ही संगीत की परंपरा थी। पिताजी शास्त्रीय संगीत के टीचर थे। मां भी गाती थीं। बड़ी बहन भी रेडियो में गाती है और आज भी वह पिताजी का संगीत स्कूल चला रही हैं। इस तरह परिवार के माहौल ने सानू को एक अच्छा गायक बना दिया। करीब करीब 350 से अधिक फिल्मों के लिए गा चुके कुमार सानू को सफलता वर्ष 1990 में बनी 'आशिकी' फिल्म से मिली जिसके गीत सुपरहिट हुए और कुमार सानू लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच गए थे। बहरहाल, आशिकी कुमार सानू की पहली फिल्म नहीं थी। उनको पहला ब्रेक जगजीत सिंह ने दिया था। उन्होंने उन्हें कल्याणजी आनंद जी से मिलवाया जिन्होंने 1989 में आई फिल्म 'जादूगर' के लिए कुमार सानू से गीत गवाया।
लगातार पांच बार सर्वश्रेष्ठ पुरूष पाश्र्व गायक का फिल्मफेयर अवॉर्ड जीत चुके कुमार सानू की आवाज़ काफी हद तक किशोर कुमार से मिलती जुलती है। हालांकि उन्होंने मुकेश और मोहम्मद रफी की शैली अपनाने की भी कोशिश की लेकिन बाद में अपनी अलग शैली विकसित की।
एक दिन में 28 गाने रिकॉर्ड करवाने वाले वह एकमात्र गायक हैं। उन्होंने चौदह हज़ार गाने गाये हैं। कुमार सानू का आज के दौर के संगीत के बारे में कहना है कि 'आज के संगीत से मेलोडी, सुर, ताल आदि कहीं गुम होता जा रहा है और उसकी जगह शोर ले रहा है। यही वजह है कि आज के अधिकतर गीत यादगार प्रतीत नहीं होते।' उनकी चाहत हमेशा रही कि काश उन्होंने सचिन देव बर्मन के साथ कोई गाना गाया होता।
बहुत समय से वे बांगला फिल्मों में सक्रिय हैं और हिंदी फिल्मों में कम, बहुत जल्द उनकी होम प्रोडक्शन फिल्म ‘यह संडे क्यूं आता है’ आ रही है, जिसमें उन्होंने संगीत भी दिया है और दो गाने भी गाए है। इसके अलावा सत्तर-अस्सी हिंदी फ़िल्में आ रही हैं जिसमें उनके गाये गाने हैं। सन् 2009 में उन्हें पदम् श्री से नवाज़ा गया था।
अंतर्राष्ट्रीय भारतीय फ़िल्म अकादमी पुरस्कार [संपादित करें]
- 2000 - आई आई एफ ए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक पुरस्कार - हम दिल दे चुके सनम – आँखों की गुस्ताखियाँ
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