कुण्डलिनी

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योग सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के मेरुदंड के नीचे एक ऊर्जा संग्रहीत होती है जिसके जाग्रत होने पर स्वयंज्ञान की प्राप्ति होती है। इसका ज़िक्र उपनिषदों और शाक्त विचारधारा के अन्दर कई बार आया है। ऊर्जा का यह रूप (क्वाईल या कुंडली) एक सांप के साढ़े तीन कुंडली (लपेटे हुए) मारकर बैठे हुए रूप से मिलती है।

इसके अनुसार ध्यान और आसन करने से, यह उर्जा मेरु के नीचे से होकर मस्तिष्क तक 7 चक्रों से होकर गुजरती है।