अनुसंधान

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व्यापक अर्थ में अनुसंधान (Research) किसी भी क्षेत्र में 'ज्ञान की खोज करना' या 'विधिवत गवेषणा' करना होता है। वैज्ञानिक अनुसंधान में वैज्ञानिक विधि का सहारा लेते हुए जिज्ञासा का समाधान करने की कोशिश की जाती है। नवीन वस्तुओं की खोज और पुराने वस्तुओं एवं सिधांतों का पुन: परीक्षण करना, जिससे की नए तथ्य प्राप्त हो सके, उसे शोध कहते है।

वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में उच्च शिक्षा की सहज उपलब्धता और उच्च शिक्षा संस्थानों को शोध से अनिवार्य रूप से जोड़ने की नीति ने शोध की महत्ता को बढ़ा दिया है। आज शैक्षिक शोध का क्षेत्र विस्तृत और सघन हुआ है।

परिचय[संपादित करें]

व्यक्ति का शिक्षा से दो रूपों में संबंध बनता है। एक वह शिक्षा से अपने बोध को विस्तृत करता है, दूसरे वह अपने अध्ययन से दीक्षित होकर शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करते हुए शिक्षा में या अपने शैक्षिक विषय में कुछ जोड़ता है। इस प्रकार प्रथम सोपान शिक्षा से ज्ञान प्राप्त करना है, दूसरा ज्ञान में कुछ नया जोड़ना है। शोध का संबंध इस दूसरे सोपान से है। पी-एच.डी./ डी. फिल या डी.लिट्/डी.एस-सी. जैसी शोध उपाधियाँ इसी अपेक्षा से जुड़ी हैं कि इनमें अध्येता अपने शोध से ज्ञान के कुछ नए आयाम उद्घाटित करेगा।

स्नातक-स्नातकोत्तर स्तर का ज्ञान छात्र के बोधात्मक स्तर तक सीमित होता है। वह उस विषय के समस्त सर्वमान्य सिद्धान्तों, अवधारणाओं, मतों, नियमों, उपकरणों से परिचय प्राप्त करता है। प्रकारान्तर से ज्ञान का यह स्तर शिक्षार्थी के बोध का विस्तार है। इससे ऊपर का स्तर मात्र स्वयं के बोध का विस्तार नहीं है अपितु उस ज्ञान की सीमा का विस्तार है। अर्थात् जब हम किसी विषय के शास्त्र से पूर्ण परिचित होकर और अध्ययन-मननशील होते हैं तो हम ज्ञान के आलोक में अपने को विकसित करने के उपरान्त, अब ज्ञान को विकसित करने की प्रक्रिया में होते हैं। शोध के स्तर पर रिसर्च, 'पुनः खोज' नहीं है अपितु 'गहन खोज' है। इसके द्वारा हम कुछ नया अविष्कृत कर उस ज्ञान परंपरा में कुछ नए अध्याय जोड़ते हैं।

शोध समस्यामूलक होते हैं। हमारे सामने कोई आगत बौद्धिक समस्या या जिज्ञासा कुछ अन्वेषित करने को प्रेरित करती है। पफलतः हम अनुसंधान के कार्य में आगे बढ़ते हैं। किसी विशेष ज्ञान क्षेत्र में शोध समस्या का समाधान या जिज्ञासा की पूर्ति में किया गया कार्य उस विशेष ज्ञान क्षेत्र का विस्तार है। शिक्षा की नयी-नयी शाखाओं का जन्म वस्तुतः इसी ज्ञान विस्तार की स्वाभाविक परिणति है। पत्रकारिता, लोक प्रशासन, प्रबंधन आदि कुछ ऐसे विषय हैं जो कार्य क्षेत्र की जरूरतों के आधार पर विकसित हुए हैं। ये सभी अपने-अपने कार्य क्षेत्र या जिज्ञासा क्षेत्र की विषयवस्तु के शास्त्रीय प्रतिपादन हैं। इस प्रकार शोधात्मक गतिविधियों से न केवल विषयों का विस्तार या समृद्ध होती है वरन् नये-नये शैक्षिक अनुशासनों का उद्भव होता है जो अपने विषय क्षेत्र की विशेषज्ञता का प्रतिनिधित्व करते हैं। वैश्वीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार ने पूरी दुनिया के ज्ञान तन्त्र की सीमाओं को खोल दिया है। इससे प्रत्येक शैक्षिक अनुशासन अपने को समृद्ध करने की स्थिति में है। इस वातावरण में शोध के माध्यम से प्रत्येक शैक्षिक अनुशासन परस्पर संवाद की प्रक्रिया में है। पफलतः अन्तरानुशासनात्मक शोध का महत्त्व बढ़ा है। इससे विभिन्न शैक्षिक विषयों का परस्पर आदान-प्रदान संभव हुआ है।

पाश्चात्य शोध परंपरा विशेषज्ञता (Specialization) आधारित है। ज्ञान मार्ग में आगे बढ़ता हुआ शोधार्थी अपने विषय क्षेत्र में विशेषज्ञता और पुनः अति विशेषज्ञता (Super Specialization) प्राप्त करता है। शोध समस्या के समाधान के दृष्टि से यह अत्यन्त उपादेय है। भारतीय ज्ञान साहित्य की अविछिन्न परंपरा के प्रमाण से हम यह कह सकते हैं कि शोध की भारतीय परंपरा, जगत के अंतिम सत्य की ओर ले जाती है। अंतिम सत्य की ओर जाते ही तथ्य गौण होने लगते हैं और निष्कर्ष प्रमुख। तथ्य उसे समकालीन से जोड़तें है और निष्कर्ष, देश काल की सीमा को तोड़ते हुए समाज के अनुभव विवेक में जुड़ते जाते हैं। भारतीय वाङ्मय का सत्य एक ओर जहाँ विशिष्ट सत्य का प्रतिपादन करता है वहीं दूसरी ओर सामान्य सत्य को भी अभिव्यक्ति करता है। सामान्य सत्य का प्रतिपादन सर्वदा भाष्य की अपेक्षा रखता है। यही कारण है कि भारतीय वाड्मय में विवेचित अधिकांश तथ्यों की वस्तुगत सत्ता पर सदैव प्रश्नचिन्ह लगते हैं। वे अनुभव की एक थाती हैं। तथ्यों की वस्तुगत सत्ता से दूरी उसे थोड़ी रहस्यात्मक बनाती है, भ्रम की संभावना बनी रहती है। उसके निहितार्थ तक पहुँचने की लिए प्रज्ञा की आवश्यकता है। सम्पूर्णता का बोध कराने वाली यह व्यापक दृष्टि एक प्रकार की वैश्विक दृष्टि (Holistic Approach) है। यह सुखद है कि मानविकी एवं समाज विज्ञान के विषयों ही नहीं अपितु समाज विज्ञान एवं प्राकृतिक विज्ञानों के अन्तरावलम्बन से वर्तमान ज्ञान तन्त्र में एक प्रकार के वैश्विक दृष्टि का प्रादुर्भाव होने लगा है, जिसकी सम्प्रति आवश्यकता प्रतीत होती रही है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

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