साहित्यिक चोरी

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किसी दूसरे की भाषा, विचार, उपाय, शैली आदि का अधिकांशतः नकल करते हुए अपने मौलिक कृति के रूप में प्रकाशन करना साहित्यिक चोरी (Plagiarism) कहलाती है। यूरोप में अट्ठारहवीं शती के बाद ही इस तरह का व्यवहार अनैतिक व्यवहार माना जाने लगा। इसके पूर्व की शताब्दियों में लेखक एवं कलाकार अपने क्षेत्र के महारथियों (मास्टर्स) की हूबहू नकल करने के लिये प्रोत्साहित किये जाते थे। साहित्यिक चोरी तब मानी जाती है जब हम किसी के द्वारा लिखे गए साहित्य को बिना उसका सन्दर्भ दिए अपने नाम से प्रकाशित कर लेते हैं. इस प्रकार से लिया गया साहित्य अनैतिक मन जाता है और इसे साहित्यिक चोरी कहा जाता है. आज जब सूचना प्रोद्योगिकी का विस्तार तेजी से हुआ है ऐसे में पूरा विश्व एक ग्लोबल विलेज में तब्दील हो गया है और ऐसे अनैतिक कार्य आसानी से पकड़ में आ जाते हैं.

वर्तमान में 'प्लेगारिज्म' अकादमिक बेइमानी समझी जाती है। प्लेगरिज्म कोई अपराध नहीं है बल्कि नैतिक आधार पर अमान्य है।

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