सामाजिक अनुसंधान

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बहुत दिनों तक मनुष्य ने सामाजिक घटनाओं की व्याख्या, पारलौकिक शक्तियों, कोरी कल्पनाओं और तर्क-वाक्यों के श्कारगत सत्यों के आधार पर की है। सामाजिक अनुसंधान का बीजारोपण वहीं से होता है जहाँ वह अपनी व्याख्या के संबंध में संदेह प्रकट करना प्रारंभ करता है। अनुसंधान की जो विधियाँ प्राकृतिक विज्ञानों में सफल हुई है, उन्हीं के प्रयोग द्वारा सामाजिक घटनाओं की समझ उत्पन्न करना, घटनाओं में कारणता स्थापित करना और वैज्ञानिक तटस्थता बनाए रखना, सामाजिक अनुसंधान की मुख्य लक्षण हैं। ऐसी व्याख्या नहीं प्रस्तुत करनी है जो केवल अनुसंधानकर्ता को संतुष्ट करे, बल्कि ऐसी व्याख्या प्रस्तुत करनी होती है जो आलोचनात्मक दृष्टि वालों या विरोधियों का संदेह दूर कर सके। इसके लिए निरीक्षण की व्यवस्थित करना, तथ्य संकलन और तथ्य-निर्वचन के लिए विशिष्ट उपकरणों का प्रयोग करना और प्रयोग में आने वाले प्रत्ययों (Variables) को स्पष्ट करना आवश्यक है।

चरण[संपादित करें]

सामाजिक अनुसंधान एक शृंखलाबद्ध प्रक्रिया है जिसके मुख्य चरण हैं-

(1) समस्या के क्षेत्र का चुनाव।

(2) प्रचलित सिद्धांतों और ज्ञान से परिचय।

(3) अनुसंधानों की समस्या को परिभाषित करना और आवश्यकतानुसार प्रकल्पना का निर्माण करना।

(4) आँकड़ा संकलन की उपयुक्त विधियों का चुनाव, आँकड़ों का निर्वचन (अर्थ लगाना) और प्रदर्शन करना।

(5) सामान्यीकरण और निर्ष्कष निकालना।

अनुसंधानप्रक्रिया की पूर्वयोजना शोध प्रारूप (research design) में तैयार कर ली जाती है।

आँकड़ा संकलन की विधियाँ (Techniques of Data Collection)[संपादित करें]

अनुसंधान की समस्या के अनुसार आँकड़ा संकलन की विधियों का प्रयोग किया जाता है।

निरीक्षण के अंतर्गत वह सारा ज्ञान आता है जो इंद्रियों के माध्यम से प्राप्त होता है। प्रशिक्षित निरीक्षक, पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर, तटस्थ द्रष्टा होता है। वह सहभागी और असहभागी (Participant and Nonparticipant) दोनों ही प्रकार के निरीक्षण कर सकता है। नियंत्रित परिस्थिति में निरीक्षण करना परीक्षण होता है। परंतु नियंत्रण की शर्त भौतिकी के परीक्षण के समान कठोर नहीं होती। प्राकृतिक घटनाएँ, जैसे बाढ़, सूखा, भूकंप, राजकीय कानून आदि भी प्रयोगात्मक परिवर्त्य (Experimental Variable) के समान सामाजिक घटनाओं को प्रभावित करते हैं।

व्यक्ति के विचारों, इरादों, विश्वासों, इच्छाआ, आदर्शों, योजनाओं और अतीत के प्रभावों को जानने के लिए प्रश्नावली और साक्षात्कार विधियों का प्रयोग किया जाता है। प्रश्नावली विधि में उत्तरदाता के समक्ष अनुसंधानकर्ता उपस्थित नहीं होता। साक्षात्कार में वह उत्तरदाता के समक्ष रहता है और नियंत्रित (Structured) या अनियंत्रित (Unstructured) रीति से, उत्तरों द्वारा, आँकड़े प्राप्त करता है। व्यक्ति के प्रातीतिक्ष पक्ष का अन्वेषण करने के लिए अभिवृत्ति प्रमापन प्रत्यक्षेपण विधि और समाजमिति (Sociometry) का प्रयोग किया जाता है। व्यक्तिविषय अध्ययनप्रणाली (Case Study Method) आंकड़ा संकलन की वह विधि है जिसके द्वारा किसी भी इकाई (व्यक्ति, समूह, क्षेत्र आदि) का गहन अन्वेषण किया जाता है। सामाजिक अनुसंधान में प्रतिनिधि इकाइयों की प्राप्ति के लिये निदर्शन (Sampling) की विधियाँ, जो रेंडम विधि का ही विभिन्न रूप है, लगाई जाती हैं।

मानव व्यवहारों के गुणात्मक पक्ष (Qualitative Aspect) के प्रमापन के प्रति अब आशाजनक दृष्टिकोण अपनाया जाता है।

गुणात्मक आँकड़ों का मापन (Measurement of Qualitative Data)[संपादित करें]

गुणात्मक पक्ष को नापने की मुख्य रीतियों, व्यवस्थित शृंखला संबंध प्रमापन और संकेतकों (Indicators) के आधार पर वर्गीकरण करने से संभव होता है। बोगार्डस (Bogardus) का सामाजिक दूरी नापने में सात बंदुओं का पैमाना, अपनी कुछ त्रुटियों के बावजूद, महत्वपूर्ण पैमाना है। मोरेनो (Moreno) और जेनिंग्ज ने समाजमिति द्वारा किसी समूह में पाए जानेवाले सामाजिक अंत:संबंधों की सज्जाकारी (Configuration) को नापने की विधि बताई है। चैपिन (Chapin) ने सामाजिक स्तर नापने का पैमाना प्रस्तुत किया है। अभिवृत्तियों को नापने के अनेक पैमानों में थर्सटन (Thurston) तथा लिकर्ट (Likert) के पैमाने प्रसिद्ध हैं।

गणित का प्रयोग (Mathematical Models in Social Research)[संपादित करें]

'मानव व्यवहार गणित के सूत्रों में नहीं बाँधा जा सकता' इस मत के अनुसार, प्राकृतिक विज्ञानों के विकास में इतना महत्वपूर्ण योगदान देनेवाला गणित, सामाजिक अनुसंधान में आवश्यक भूमिका नहीं रखता। गणित के पक्ष में मत रखनेवालों का दावा है कि कोई भी गुणात्मक तथ्य ऐसा नहीं है जिसका मात्रात्मक अध्ययन संभव न हो। प्रत्येक व्यक्ति के लिये समान रूप से विश्वसनीय माप का गणित के पदों में व्यक्त करना आवश्यक है। वास्तव में गणित भाषा के समान है जिसके प्रतीकों द्वारा तर्कवाक्यों (Propositions) का निर्माण हो सकता है। समाजशास्त्रीय सिद्धांत के विकास में गणित प्रारूपों (Mathematical Models) का प्रयोग बढ़ता जा रहा है।

सामाजिक अनुसंधानों में, सामग्री के संग्रहण में स्पष्टीकरण के लिए, सांख्यकीय विधियों (Satistical Method) का प्रयोग प्रतिनिधित्व या माध्यम वृत्तियों (Average Tendency) को प्रकट करने के लिए किया जाता है। माध्यमिक, माध्य बहुलांक, सहसंबंध प्रमाण, मापक विचलन, अंतरंग परीचा आदि विधियों का प्रयोग किया जाता है। सामग्री का संकेतन (Codification) और वर्गीकरण (क्लासिफिकेशन) करके सारिणीयन (Tabulation) द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। सारणीयन के आँकड़ों को स्पष्ट करने के लिए तथा परिवर्त्यों (Variables) का सहसंबंध स्थापित करने के लिए, विभिन्न शीर्षकों, स्तंभों एवं रेखाचित्रों का प्रयोग किया जाता है।

प्रकार (Types of Social Research)[संपादित करें]

अनुसंधान का वर्गीकरण, उसकी प्रेरणा और उद्देश्य के आधार पर, किया जा सकता है। उपयोगिता और नीतिनिर्माण से रहित, वैज्ञानिक तटस्थता के साथ, किसी प्राक्कल्पना का समर्थन करना बुनियादी अनुसंधान (Fundamental Research) है परंतु उसका व्यावहारिक उपयोग दो तरह से किया जाता है-

परिचालन अनुसंधान (Operational Research)[संपादित करें]

प्रशासनिक समस्याओं के संबंध में होनेवाला अनुसंधान है। इसमें गणित और सांख्यकीय विधियों का प्रयोग संभावनासिद्धांत, (Probability Theory) के आधार पर किया जाता है। आँकड़ों का चयन, विश्लेषण, आमूर्तीकरण, भविष्यवाणी, सिद्धांत, निर्माण आदि इस अनुसंधान की प्रक्रिया होता हैं।

क्रियात्मक अनुसंधान (Action Research)[संपादित करें]

किसी समुदाय की विशेषताओं को ध्यान में रखकर, नियोजित प्रयास, जो सामुदायिक जीवन के अनेक पहलुओं को प्रभावित करते हैं और सामाजिक प्रयोजनों की पूर्ति के लिये किए जाते हैं, इस अनुसंधान के अंतर्गत आते हैं, जैसे आवास, खेती, सफाई, मनोरंजन से संबंधित कार्यक्रम। समुदाय के सदस्यों का सहयोग, आर्थिक स्थिति, संगठित विरोध आदि विशेषताओं का मूल्यांकन (Factor Analysis) करके कार्यक्रम को सफल बनाने का प्रयत्न किया जाता है। यह अनुसंधान भारत में चलनेवाले नियोजन का एक मुख्य उपकरण है।

पद्धतियाँ (Methodology of Social Research)[संपादित करें]

सामाजिक अनुसंधान की पद्धति का विकास विभिन्न परस्पर विरोधी धाराओं में हुआ है। मुख्य धारा रही है उन सिद्धांतों की जो सामाजिक विज्ञान या सांस्कृतिक विज्ञान को प्राकृतिक विज्ञान से भिन्न मानते हैं। प्राकृतिक घटनाओं में संबंध यांत्रिक और बाह्म होते हैं, जब कि सामाजिक घटनाओं में संबंध 'मूल्य' और 'उद्देश्य' पर आधारित होते हैं। 'विज्ञान पद्धति की एकता' के समर्थक 'प्राकृतिक तथ्य' और 'सामाजिक तथ्य' में समानता मानते हैं। प्रकृति और समाज पर लागू होनेवाले नियम भी समान होते हैं। इनके अनुसार, मनुष्य के प्रातीतिक पथ का अध्ययन केवल बह्य व्यवहारों के आधार पर ही किया जा सकता है। कारणता की खोज में धार्मिक रहस्यवाद का पुट पाया जाता है। ये केवल 'क्रियाओं' (Operations) को ही महत्व देते हैं। प्रकार्यवादी (Functionalism) पद्धति विकासावयद के विपरीत है। समाज के अवयवों में क्रम और अंतसंबंध पाया जाता है। शारीरिक संगठन के सादृश्य पर सामाजिक तथ्य, संस्था, समूह, मूल्य आदि की क्रिया से उत्पन्न संस्कृति का अन्वेषण किया जाता है। ऐतिहासिक सामूच्य (Historicism) में घटनाओं को समझने के विपरीत, व्यक्तिवादी पद्धति है (Individualistic Positivism) है जो तत्काल को ही श्रेय देती है, क्योंकि तत्काल में समुच्च के अंश विद्यमान होते ही हैं। इस प्रवृत्ति को लेकर सांकेतिक अध्ययन (Ideographic Studies) होने लगे हैं। इनके अतिरिक्त परिचालन और क्रियात्मक अनुसंधानों (Operational and Action Researches) की पद्धतियाँ प्रचलित हैं।