श्यामाचरण दूबे

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श्यामाचरण दूबे (25 जुलाई 1922 - 1996) भारतीय समाजशास्त्री एवं साहित्यकार हैं। उन्हें एक कुशल प्रशासक और विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के सलाहकार के रूप में भी याद किया जाता है। वे साहसिक और मानवीय गुणों से संपन्न व्यक्ति थे।

जीवन वृत्त[संपादित करें]

उनका जन्म 25 जुलाई 1922 को हुआ। उनकी माता राष्ट्रवादी थी और पिता कोर्ट ऑफ वॉर्ड्स के प्रबंधक थे। वे केवल 7-8 वर्ष के थे जब उनकी माँ का निधन हो गया। पिता के संरक्षण में उनका समय पढ़ने में बीतने लगा। इसका प्रारंभ हिंदी की पत्रिकाओं और पुस्तकों से हुआ जो आगे चलकर अंग्रेजी के ग्रंथों तक पहुँच गया।। सन् 1996 में उनका निधन हो गया।

शिक्षा[संपादित करें]

उनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव के ही प्राथमिक विद्यालय में हुई। वहाँ विद्यार्थियों को टाट पट्टी पर बैठना पड़ता था। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से राजनीतिक विज्ञान में ऑनर्स प्रथम श्रेणी में कर उच्च शिक्षा प्राप्त की। मानव विज्ञान को अपने शोध का विषय चुनकर उन्होंने विशेष रूप से छत्तीसगढ़ की कमार जनजाति को अपने अध्ययन का केंद्र बनाया।

कार्यक्षेत्र[संपादित करें]

पहले उन्होंने राष्ट्रीय सामुदायिक संस्थान को अपने प्रयासों से अनुसंधान केंद्र बनाया। इंडियन इंस्टिच्युट ऑफ एडवांस स्टडिज शिमला के निदेशक के रूप में भी उन्होंने अपनी क्षमताओं का परिचय दिया। बाद में वे जम्मू विश्वविद्यालय के कुलपति के पद पर नियुक्त हुए। मध्य प्रदेश उच्च शिक्षा अनुदान आयोग के सदस्य रहकर उन्होंने विश्वविद्यालय के स्तर पर पाठ्यक्रमों का आधुनिकीकरण करवाया।

सृजन[संपादित करें]

वे जब हाई स्कूल में थे तभी उन्होंने पत्रिकाओं में लिखना शुरु कर दिया था। कुछ ही वर्षों बाद हंस, विशाल भारत, मॉडर्न रिव्यु जैसे प्रतिष्ठित पत्रों के लिए उन्होंने गंभीर लेख लिखने शुरु कर दिए। अपने शोध कार्य को और अधिक विस्तार देने के लिए उन्होंने अंग्रेजी में इंडियन विलेज लिखी जिसका कई भारतीय भाषआओं में अनुवाद हुआ। उनकी अंग्रेजी की अन्य रचनाएँ हैं- इंडियाज चैलेंजेज विलेजेज, मॉरडनाइजेशन ऐंड डेवलपमेंट, सर्च फोर अलटरनेटिव पैराडाइम्स, इंडियन सोसायटि। इनमें आर्थिक और सामाजिक विकास का गंभीर अध्ययन हुआ है। उन्होंने हिंदी में मानव और संस्कृति, परंपरा इतिहास बोध और संस्कृति, शिक्षा समाज और भविष्य में संक्रमण की पीड़ा आदि रचनाएँ लिखी।

पुरस्कार / सम्मान[संपादित करें]

परंपरा इतिहासबोध और संस्कृति के लिए उन्हें भारतीय ज्ञआनपीठ ने मूर्तिदेवी पुरस्कार से सम्मानित किया।

बाह्य सूत्र[संपादित करें]