वहन क्षमता

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मानव जनसंख्या वृद्धि का ग्राफीय निरूपण, 10,000 ई॰ पू॰ - 2000 ई॰

वहन क्षमता अथवा जनसंख्या वहन क्षमता (अंग्रेज़ी:Carrying capacity) किसी भौगोलिक क्षेत्र के पारितंत्र में किसी जीवधारी प्रजाति की उस अधिकतम जनसंख्या के रूप में परिभाषित की जाती है जिसे उस पारितंत्र के संसाधन पोषण प्रदान कर सकते हों।[1][2]स्पष्ट है कि वहन क्षमता से अधिक जनसंख्या वृद्धि उस पारितंत्र पर दबाव डालेगी और अत्यधिक वृद्धि उस तंत्र के विफल होजाने का कारण भी बन सकती है।[3]

पारितंत्र की वहन क्षमता से अधिक जनसंख्या वृद्धि हो जाना जनसंख्या उत्क्षेप (Population overshoot) कहा जाता है।

यह एक पारिस्थितिकीय संकल्पना है जिसका वर्तमान मानव जनाधिक्य को पृथ्वी के पर्यावरण रुपी पारितंत्र के संसाधनों और सेवाओं की सीमा से जोड़कर देखा जा रहा है। मानव जनाधिक्य एक ऐसी स्थिति है जब मानव जनसंख्या किसी क्षेत्र की पारिस्थितिकीय वहन क्षमता से अधिक हो जाए।[4] यह शब्दावली पूरी मानव जाति की जनसंख्या और वैश्विक पर्यावरण (जो एक पारितंत्र भी है) की वहन क्षमता के बीच संबंधों को व्यक्त करने के लिये भी इस्तेमाल होती है।[5]

विद्वानों का मानना है कि मनुष्य जनसंख्या वृद्धि द्वारा पृथ्वी के पर्यावरण (वैश्विक पारितंत्र) पर दबाव डाल रहा है क्योंकि मानव जनसंख्या पहले ही अधिकतम वहन क्षमता का स्तर पार कर चुकी है।[6][7]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. दया शंकर त्रिपाठी, पर्यावरण अध्ययन, गूगल पुस्तक, (अभिगमन तिथि 27-07-2014)
  2. Z Hui, C. (2006) Carrying capacity, population equilibrium, and envrionment's maximal load. Ecological Modelling, 192, 317–320. http://dx.doi.org/10.1016/j.ecolmodel.2005.07.001
  3. मधु अस्थाना पर्यावरण: एक संक्षिप्त अध्ययन, गूगल पुस्तक, (अभिगमन तिथि 27-07-2014)
  4. Ehrlich, Paul R. Ehrlich & Anne H. (1990). The population explosion. London: Hutchinson. pp. 39–40. ISBN 0091745519. Retrieved 27 July 2014. "When is an area overpopulated? When its population can't be maintained without rapidly depleting nonrenewable resources [39] (or converting renewable resources into nonrenewable ones) and without degrading the capacity of the environment to support the population. In short, if the long-term carrying capacity of an area is clearly being degraded by its current human occupants, that area is overpopulated."
  5. "Global food crisis looms as climate change and population growth strip fertile land". Guardian.co.uk (2007-08-31).
  6. Zimmerer, K.S., "Human Geography and the "New Ecology": The Prospect of Promise and Integration", Annals of the Assoc. of American Geo., 84(1), 108–125, (1994)
  7. मानव के भार को वहन करने की पृथ्वी की क्षमता की परीक्षा ली जा रही है: बोकोवा बिजनेस स्टैण्डर्ड (हिंदी) November 09, 2012, (अभिगमन तिथि 27-07-2014)