राग बसंत

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रागमाला के एक लघु चित्र में राग वसंत

राग बसंत या राग वसंत शास्त्रीय संगीत की हिंदुस्तानी पद्धति का राग है। वसंत का अर्थ वसंत ऋतु से है, अतः इसे विशेष रुप से वसंत ऋतु में गाया बजाया जाता है। इसके आरोह में पाँच तथा अवरोह में सात स्वर होते हैं। अतः यह औडव-संपूर्ण जाति का राग है। वसंत ऋतु में गाया जाने के कारण इस राग में होलियाँ बहुत मिलती हैं। यह प्रसन्नता तथा उत्फुल्लता का राग है। ऐसा माना जाता है कि इसके गाने व सुनने से मन प्रसन्न हो जाता है। इसका गायन समय रात का अंतिम प्रहर है किंतु यह दिन या रात में किसी समय भी गाया बजाया जा सकता है। रागमाला में इसे राग हिंडोल का पुत्र माना गया है। यह पूर्वी थाट का राग है। शास्त्रों में इससे मिलते जुलते एक राग वसंत हिंडोल का उल्लेख भी मिलता है। यह एक अत्यंत प्राचीन राग है जिसका उल्लेख अनेक प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।

संक्षिप्त परिचय राग बसंत-

"दो मध्यम कोमल ऋषभ चढ़त न पंचम कीन्ह।

स-म वादी संवादी ते, यह बसंत कह दीन्ह॥'

आरोह- सा ग, म॑ ध॒ रें॒ सां, नि सां।

अवरोह- रें॒ नि ध॒ प, म॑ ग म॑ ऽ ग, म॑ ध॒ ग म॑ ग, रे॒ सा।

पकड़- म॑ ध॒ रें॒ सां, नि ध॒ प, म॑ ग म॑ ऽ ग।

वादी स्वरः सा

संवादीः म

थाट- पूर्वी (प्रचलित)

इस राग के बारे में कुछ मतभेद भी हैं। पहले मतानुसार इस राग में केवल तीव्र मध्यम का प्रयोग होना चाहिये, मगर दूसरे मतानुसार दोनो म का प्रयोग होना चाहिये जो कि आज प्रचलन में है।

विशेषता- उत्तरांग प्रधान राग होने की वजह से इसमें तार सप्तक का सा ख़ूब चमकता है। शुद्ध म का प्रयोग केवल आरोह में एक विशेष तरह से होता है- सा म, म ग, म॑ ध॒ सां।

गायन समय- रात्रि का अंतिम प्रहर (मगर बसंत ऋतु में इसे हर समय गाया बजाया जा सकता है।

इसे परज राग से बचाने के लिये आरोह में नि का लंघन करते हैं-

सा ग म॑ ध॒ सां

या

सा ग म॑ ध॒ रें॒ सां

विशेष स्वर संगतियाँ-

१) प म॑ ग, म॑ ऽ ग

२) म॑ ध॒ रें सां

३) सा म ऽ म ग, म॑ ध॒ रें॒ सां

संदर्भ[संपादित करें]


Basant; Hath Ki Safai; Wadda Kar Le Saajna, Basant Bahar; Chhaya; Chham Chham Nachat Ayi Bahar