नव अफलातूनवाद

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नव अफलातूनवाद (Neoplatonism yaa Neo-Platonism) यूनानी दर्शन का अंतिम संप्रदाय, जिसने ईसा की तीसरी शताब्दी में विकसित होकर, पतनोन्मुख यूनानी दर्शन को, लगभग पौने तीन सौ वर्ष, अथवा 529 ई. में रोमन सम्राट् जस्टिन की आज्ञा से एथेंस की अकादमी के बंद किए जाने तक, जीवित रखा। संस्थापकों ने इस संप्रदाय का नाम अफलातून से जोड़कर, एक ओर तो सर्वश्रेष्ठ समझे जानेवाले यूनानी दार्शनिक के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की; दूसरी ओर, विषम परिस्थितियों में अपने मत की प्रामाणिकता सिद्ध करने का इससे अच्छा कोई उपाय न था। इसके नाम से यह अनुमान करना कि यह अफलातून के मत का अनुवर्तन मात्र था, समीचीन नहीं। यूनानी दर्शन का प्रारंभ पाश्चात्य सभ्यता के शैशव काल में हुआ था। अफलातून तथा उसके शिष्य, अरस्तू, के दर्शन तक उक्त दर्शन अपने विकास की चरम सीमा पर पहुँच गया था। किंतु, विश्व तथा मानव की मौलिक समस्याओं का काई संतोषप्रद समाधान नहीं दिया जा सका था। अफलातून के दर्शन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही हैं कि उसमें उन सभी विचारसूत्रों को सहेजकर रखा गया है, जो प्रारंभ से लेकर अफलातून के समय तक के संपूर्ण सांस्कृतिक विकास का चित्र प्रस्तुत कर देते हैं। यह प्रवृत्ति प्लेटो के बाद के अन्य संप्रदायों में भी पाई जाती है। किंतु अंतिम संप्रदाय, नवअफलातूनवाद में, अफलातून के मौलिक विचरों से शिक्षा प्राप्त करने के साथ साथ, परवर्ती दर्शनसंप्रदायों के मतों से भी लाभ प्राप्त किया गया है। इस प्रकार, यह दर्शन यूनानी दर्शन के क्रमिक विकास का फल कहा जा सकता है। इसके संबंध में सबसे आवश्यक तथ्य यह है कि बदलती हुई परिस्थितियों में, इसने धर्मनिरपेक्ष यूनानी दर्शन को रोमन साम्राज्य के मनोनुकूल बनाने का प्रयत्न किया। इसकी गतिविधि समझने के लिए, अफलातून से लेकर ईसा की तीसरी शताब्दी तक बिखरे हुए विचारसूत्रों पर निगाह डालने की आवश्यकता है।

यूनान के जीवन तथा दर्शन में क्रांति की लहर दौड़ाने का श्रेय सुकरात (469-399 ई.पू.) को प्राप्त है। उस संत ने आजीवन अपने समय के तथाकथित ज्ञान की आलोचना की और नैतिक चिंतन तथा धार्मिक अनुभव के अभाव पर खीझ प्रकट की। सुकरात से प्रभावित होकर, अफलातून (437-347 ई.पू.) ने पूर्ववर्ती विचारों को व्यवस्थित दर्शन का रूप देने का प्रयत्न किया। उसने पार्मेनाइडिज़ (540-470 ई.पू.) की प्रत्ययात्मक सत्ता को दृष्ट जगत्‌ का मूल कारण मानकर, सूक्ष्म तथा स्थूल, एक एवं अनेक का तथा हेराक्लाइटस (मृत्यु. 475 ई.पू.) के अनुसार चेतन एवं अचेतन का समन्वय करना चाहा था। किंतु, सूक्ष्म प्रत्यय एवं स्थूल वस्तु में यौक्तिक विरोध होने के कारण, उसे दोनों को संबद्ध करने के लिए किसी बीच की कड़ी की जरूरत थी। पूर्ववर्ती भौतिकवादियों के समने यह प्रश्न प्रस्तुत ही नहीं हुआ था, क्योंकि वे विश्व में किसी द्वैत की कल्पना ही नहीं करते थे। पार्मेनाइडिज़ तथा उसके अनुयायी, इलिया के दूसरे सत्तावादियों के सामने भी द्वैत का प्रश्न न था। वे सभी तो अद्वैतवादी थे। हेराक्लाइटस में द्वैत का प्रश्न न था। वे सभी तो अद्वैतवादी थे। हेराक्लाइटस में द्वैत की थोड़ी झलक थी, क्योंकि उसने एक और अनेक का प्रश्न उठाया था। पर, अपने रूपांतर के सिद्धांत से हल भी कर लिया था। यद्यपि रूपांतर के सिद्धांत से हल होता नहीं था, क्योंकि एक और अनेक का रूपांतर मान लेने पर गति, जिसे उसने विश्व का व्यापक नियम माना था, मात्र भ्रम ठहरती थी। अफलातून समन्वय कर रहा था। वह व्यवहार की सार्थकता की दृष्टि से इंद्रियसंवेद्य जगत्‌ को असत्‌ मानना नहीं चाहता था। प्रत्यय भी असत्‌ नहीं हो सकता था, क्योंकि यदि वह प्रत्यय को असत्‌ मान लेता तो सत्‌ की उत्पत्ति असत्‌ से माननी पड़ती। दोनों को कायम रखने के प्रयत्न में, उसने दो संसारों की, प्रत्यय जगत्‌ और वस्तु जगत्‌ की कल्पना की। किंतु दोनों में तारतम्य बनाए रखने के लिए प्रत्ययों को वस्तुओं का सार स्वीकार किया।

अरस्तू ने अफलातून द्वारा स्थापित द्वैत को मिटाने का बहुत प्रयत्न किया। पर, वह भी आकार और पदार्थ के द्वैत की ही स्थापना कर सका।

अफलातून को नैतिक समस्या सुलझाने में भी कोई बड़ी सफलता न मिल सकी, क्योंकि उसने उच्चतम प्रत्यय में, जिसे उसने संसार का मूल कारण माना था, सत्य, शुभ और सुंदर का समन्वय कर, अपने उत्तरदायित्व से मुक्ति ले ली। र्ध्म की समस्या भी वहीं रह गई थी, जहाँ उसे सुकरात और पाइथागोरस ने छोड़ दिया था। दोनों दार्शनिकों ने मानसिक तन्मयता में उच्चतम सत्य की अनुभूति के साक्ष्य प्रस्तुत किए थे, किंतु उस अनुभूति का कोई सैद्धांतिक विवेचन नहीं किया था।

अरस्तू के जीवन (384-323 ई.पू.) के साथ ही साथ यूनानी राजसत्ता का लोप हो गया और एथेंस के दार्शनिकों को समीपवर्ती पूर्वी देशों में शरण लेनी पड़ी। वहाँ, खासकर, अलेक्ज़ेंड्रिया में वे नवोदित ईसाई धर्म के संपर्क में आए। तब उन्हें पता चला कि उस धर्म में भी, अफलातून के दर्शन की भाँति, द्वैत सत्ताओं की कल्पना विद्यमान थी। मध्यस्थ की कल्पना भी उसी प्रकार थी अंतर इतना ही था कि ईसाई धर्म के ईश्वर में व्यक्तित्व था। पर, यह तो काफ़ी जँचनेवाली बात थी। उचचतम प्रत्यय की अपेक्षा ईश्वर व्यक्ति से जगत्‌ के कारण, नियंता एवं पोषक बनने की आकांक्षा करना मानव बुद्धि के लिए अधिक रुचिकर था। अतएव अलेक्ज़ेंड्रिया के दार्शनिकों ने अफलातून की मौलिक सत्ता और ईसाई धर्म के ईश्वर की एकता का प्रतिपादन किया। फ़िलो (20/30 ई.पू.- 40 ई.) के दर्शन में यूनानी दर्शन ओर ईसाई धर्म के मिश्रण के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं। कठिनाई यह थी कि ईसाई धर्म में मध्यस्थ की कल्पना समुचित न थी। इसके लिए स्टोइक दार्शनिकों का स्मरण किया गया।

स्टोइक भौतिक अद्वैतवादी होने के नाते जगत्‌ तथा ईश्वर दोनों को परस्पर संबद्ध रखने के लिए उन्हें भी किसी मध्यस्थ की कल्पना करनी थी। हेराक्लाइटस ने अग्नि को प्रथम तत्व कहा था। स्टोइकों ने अग्नि तथा बुद्धि में कोई अंतर न पाया। अतएव उन्होंने यह मान लिया कि जैसे अग्नि भौतिक पदार्थ होते हुए भी चारों ओर अपना ताप वितरित करती है, उसी प्रकार ईश्वर बुद्धि का प्रसार करता है, जो संसार और मनुष्य दोनों में व्याप्त हो जाती है। इसी संकेत के आधार पर, फिलो ने 'लोगस' को ईश्वर और जगत्‌ के बीच की कड़ी मान लिया। किंतु फिलो का 'लागस' पदार्थ न था। वह ईश्वर की शक्ति है, विचार है, जो प्रति शरीर भिन्न होकर 'लोगाई' (बहुवचन) भी बन सकता है। पदार्थ को फिलो ने आत्मा का बंधन माना था। इसलिए उसे ईश्वर और लोगस से अलग रखा था।

इसी फिलो की विचारधारा ने तीसरी शताब्दी तक नव अफलातूनवाद का रूप लिया। संस्थापक के स्थान पर अमोनियस सैक्कस का नाम लिया जाता है, किंतु वह हमारे लिए केवल एक नाम है। संभवत:, 242 ई. के आसपास उसकी मृत्यु हुई थी। उसके दर्शन का ज्ञान हमें उसके शिष्य, प्लाटिनस, के ग्रंथों से होता है। उसका जन्म मिस्र देश के लाइकोपोलिस नामक स्थान में, 204 ई. के आसपास अनुमित है। 245 ई. में वह रोम चला गया था। वहीं अपने दर्शन की शिक्षा देते हुए 270 ई. में उसकी मृत्यु हुई। अरस्तू के तर्कशास्त्र के व्याख्याकार पॉर्फिरी (232-304) ने प्लाटिनस के ग्रंथों का छह खंडों, में जिनमें से प्रत्येक में नौ ग्रंथ हैं, संपादन किया था, जो उपलब्ध हैं। इसलिए प्लाटिनस ही हमारे लिए नवअफलातूनवाद का संस्थापक है।

प्लाटिनस ने अलेक्ज़ेंड्रिया के ईसाई दार्शनिकों के मत में एक बहुत बड़ा परिवर्तन किया था। वे ईश्वर को सर्वोपरि मानते थे, इतना दूर, इतना पृथक्‌ कि अंत में, उन्हें ईश्वर को अज्ञेय कहना पड़ता था। प्लाटिनस ने सुकरात और पाइथागोरस के तन्मयता के विचार से शिक्षा लेकर, तन्मयता की अवस्था में उसे आत्मा का प्राप्य बताया। इसी सिद्धांत के कारण नवअफलातूनवाद को पाश्चात्य दर्शन के रहस्यवाद का जन्मदाता समझा जाता है। इस प्रकार इस दर्शन में सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक दोनों पक्ष सम्मिलित हैं।

प्लाटिनस के दर्शन के सैद्धांतिक पक्ष में तीन मुख्य भाग माने जा सकते हैं - (1) प्राथमिक सत्ता, (2) विचारजगत्‌ एवं आत्मा तथा (3) भौतिक जगत्‌।

प्लाटिनस की प्राथमिक सत्ता ईश्वर है। वह एक, असीम तथा अपरिमित है। वही सभी सीमित एवं परिमित वस्तुओं का स्रोत तथा उनकी कारणता है। वह शुभ है, क्योंकि सभी वस्तुओं के प्रयोजन उसी में है। पर ईश्वर पर नैतिक गुणों का आरोप नहीं किया जा सकता, क्योंकि गुण सीमा हैं। वह अगुण है। जीवन एवं विचार का आरोप भी संभव नहीं, क्योंकि वह तो सभी सत्ताओं से परे हैं। वह एक सक्रिय शक्ति है, जो बिना किसी गति के, बिना परिवर्तन एवं ह्रास के, निरंतर अपने से भिन्न सत्ताओं को उत्पन्न करता रहता है। उसका उत्पादनकार्य भौतिक नहीं बल्कि प्रसारण (एमिशन) है।

प्राथमिक सत्ता, अथवा, प्रथम सत्‌ सबसे पहले 'नाउस' को प्रकट करता है। 'नाउस' सत्‌ का प्रतिरूप एवं सभी वस्तुओं का सार है। वह सत्ता और विचार दोनों है। सत्‌ का प्रतिरूप होने से वह उसी के स्वभाव का है। भिन्न भी है, क्योंकि सत्ता से उत्पन्न हुआ है। इसीलिए, वह ईश्वर और जगत्‌ के बीच मध्यस्थ है।

आत्मा इसी 'नाउस' का प्रतिरूप है। अतएव, नाउस से आत्मा के वही संबंध है, जो नाउस के ईश्वर से। स्पष्टतया, आत्मा अपदार्थ है। वह नाउस और व्यवहारजगत्‌ के बीच कीं कड़ी है। किंतु एक अंतर भी है। नाउस अविभाज्य है; किंतु आत्मा विभाज्य है। तभी तो वह शारीर जगत्‌ से संबंध रख सकती है। एक रहते हुए जगत्‌ से संबद्ध होकर वह जगदात्मा बनती है; प्रति शरीर भिन्न होकर वही जीवात्मा बनती है। ये आत्माएँ नाउस के नियमों का पालन कर, पवित्र दैवी जीवन बिता सकती हैं। पर, ऐसा नहीं होता। स्वतंत्र होने की इच्छा से वे नाउस से विमुख होकर जगत्‌ के ऐंद्रिक सुखों में लिप्त हो जाती हैं। तभी बंधन में पड़ती हैं। पर आत्मा का यह बंधन इच्छाकृत होने से स्थायी नहीं है। संसार से विमुख होकर, आत्मा अपना मूल स्वभाव प्राप्त कर सकती है।

यहीं प्लाटिनस को अपने दर्शन का व्यावहारिक पक्ष विकसित करने का अवसर मिल जाता है। वह बताता है कि संसार में भटकी हुई आत्मा को पहले अपने आपमें वापस आना पड़ता है। फिर, वह नाउस में स्थित होती है। तब वह ईश्वरमिलन की कामना कर सकती है। इस प्रक्रिया को पूरा करने का प्रयास तीन स्तरों में किया जा सकता है। ये स्तर नैतिक आचरण के अभ्यास के तीन स्तर हैं - नारिक, शोधक तथा दैवी आचरण। पहले, पारस्परिक प्रेम एवं सद्भावना का अभ्यास, फिर पवित्र जीवन और तब ईश्वरोन्मुख होना। इस प्रकार, आत्मा पहले अपने आपमें आती है, फिर नाउस में स्थित होती है और तब ईश्वर, प्रथम सत्‌ या अपने कारण से मिलने की इच्छा करती है। मिलन की कोई अवधि नहीं। सतत ईश्वरचिंतन और मिलने की कामना करते-करते, तन्मयता के वे क्षण कभी भी आ सकते हैं, जिनमें वह कारण में लीन हो जाएगी। प्लाटिनस के अनुसार, तन्मयता के क्षणों में अनिर्वचनीय आनंद प्राप्त होता है और आत्मा नित्य प्रकाश में स्नान करती है।

पार्फिरी ने बताया है कि अपने छह वर्ष के अध्ययनकाल में, उसने अपने गुरु को चार बार उस अवस्था में पाया था, जिसका उन्होंने अपने ग्रंथों में उपदेश किया हो। यह कथन सत्य हो या न हो, पार्फिरी अपने गुरु की साधना से बहुत प्रभावित था और जीवन भर उसने उनकी शिक्षाओं का प्रचार किया। आयम्ब्लिकस ने प्लाटिनस के मत का सीरिया में प्रचार किया। आयम्ब्लिकस ने प्लाटिनस के मत का सीरिया में प्रचार किया। आयम्ब्लिकस ने प्लाटिनस के मत का सीरिया में प्रचार किया। छोटे प्लूटार्क (350-433) और प्रोक्लस (411-85) ने एथेंस की अकादमी में उन्हीं शिक्षाओं का उपदेश किया। प्रोक्लस के बाद तो अकादमी बंद ही हो गई। इस प्रकार, प्लाटिनस का नव अफलातूनवाद ही यूनानी दर्शन का अंतिम रूप था।

किंतु जीवित संप्रदाय का रूप न रहने पर भी नवअफलातूनवाद पाश्चात्य दर्शन से लुप्त न हुआ। पाइथागोरस और सुकरात ने अपनी रहस्यवादी पद्धति की कोई व्याख्या नहीं की थी। यह पहला अवसर था, जब सत्य के साक्षात्कार की बात व्यवस्थित ढंग से कही गई थी। इसलिए, यह सोचने का पूरा मौका है कि बाद के दर्शन में जहाँ कहीं भी सत्य के साक्षात्कार की बात आती है, वह नव अफलातूनवाद का प्रभाव है। इस प्रकार मध्यकालीन ईसाई संतों में से अनेक को, जैसे टॉमस एक्वीनस, एरिजेना, ब्रूनो आदि को, उक्त मत से प्रभावित समझा जा सकता। यह प्रभाव आधुनिक काल में भी पाया जाता है। अंतर्दृष्टिवादी सभी रहस्यवादी थे। हेनरी बर्गसाँ की मृत्यु 1941 में हुई। उसने तो सभी वस्तुओं के सत्य ज्ञान के लिए बुद्धि को अपर्याप्त बताकर, अंतर्दृष्टि के द्वारा उनके अंतर में घुसकर देखने की सम्मति दी थी। अतएव, यह कहना अयुक्त न होगा कि पाश्चात्य देशों में अब तक प्लाटिनस की पद्धति में विश्वास करनेवाले मौजूद हैं। इतना व्यापक था यह संप्रदाय।

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