जिहाद

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जिहाद एक अरबी भाषा का शब्द है और इस्लाम से सम्बन्धित है। यह मुसलमानों का एक मजहबी कर्तव्य है। अरबी में इसके दो अर्थ हैं - सेवा और संघर्ष। जिहाद शब्द कुरान में बार-बार आता है। वह व्यक्ति जो जिहाद करता है उसे मुजाहिद (बहुबचन मुजाहिदीन) कहते हैं। आरम्भ से ही जिहाद का कांसेप्ट दुनिया में विवाद का विषय रहा है।

उदाहरण के लिये महान शिक्षाविद जॉन एस्पोसितो का विचार है कि :

Jihad requires Muslims to "struggle in the way of God" or "to struggle to improve one's self and/or society." Jihad is directed against Satan's inducements, aspects of one's own self, or against a visible enemy.The four major categories of jihad that are recognized are Jihad against one's own self (Jihad al-Nafs), Jihad of the tongue (Jihad al-lisan), Jihad of the hand (Jihad al-yad), and Jihad of the sword (Jihad as-sayf).Islamic jurisprudence focuses on regulating the conditions and practice of Jihad as-sayf, the only form of warfare permissible under Islamic law, and thus the term Jihad is usually used in fiqh manuals in reference to military combat.

इस्लाम में इसकी बड़ी अहमियत है। दो तरह के जेहाद बताए गए हैं। एक है जेहाद अल अकबर यानी बड़ा जेहाद और दूसरा है जेहाद अल असग़र यानी छोटा जेहाद.

वैधता[संपादित करें]

जेहाद में हर वह कम वैध बन जाता हैं जिसे इंसान अपराध या गलत मानता हैं इस लिये जेहादियो के मन में कोई डर या संकोच नहीं होता।

जेहाद अल अकबर[संपादित करें]

जेहाद अल अकबर अहिंसात्मक संघर्ष है जिसमें आदमी अपने सुधार के लिए प्रयास करता है। इसका उद्देश्य है बुरी सोच या बुरी ख़्वाहिशों को दबाना और कुचलना.

जेहाद अल असग़र[संपादित करें]

जेहाद अल असग़र का उद्देश्य इस्लाम के संरक्षण के लिए संघर्ष करना होता है। जब इस्लाम के अनुपालन की आज़ादी न दी जाए, उसमें रुकावट डाली जाए, या किसी मुस्लिम देश पर हमला हो, मुसलमानों का शोषण किया जाए, उनपर अत्याचार किया जाए तो उसको रोकने की कोशिश करना और उसके लिए बलिदान देना जेहाद अल असग़र है। इसी जेहाद का गैर-मुसलमानों पर बहुत बुरा असर पडा है।


इन्हें भी देखें[संपादित करें]

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