चुल्लवग्ग

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चुल्लवग्ग (पालि) खंधक का दूसरा भाग है जबकि पहले भाग का नाम महावग्ग है।

चुल्लवग्ग के बारह खंधक अर्थात् अध्याय हैं-

1 कम्म खंधक, 2 पारिवासिक, 3 समुच्चय, 4 समथ, 5 खुद्दकवत्थु, 6 सेनासन्,
7 संधभेदक, 8 वत्त, 9 पातिमोक्खट्ठपन, 10 भिक्खुगी, 11 पंचसतिक और 12 सत्तसतिक खंधक।

प्रथम अध्याय[संपादित करें]

पहले अध्याय में पाँच प्रकार के दंडविधानों की व्यवस्था पूरे इतिहास के साथ दी गई है। वे इस प्रकार हैं :

  • (अ) तर्जनीय कर्म,
  • (आ) नियस्सकर्म,
  • (इ) प्रब्राजनीय कर्म,
  • (ई) प्रतिसारणीय कर्म और
  • (उ) उत्क्षेपणीय कर्म।

तर्जनीय कर्म (दोषदर्शन द्वारा अप्रसन्नता प्रकट करना)। कलह विवादों में प्रवृत्त व्यक्ति, इस कर्म से दंडनीय है।

नियस्स कर्म (उचित समय तक योग्य व्यक्ति की देखरेख में रहना)। अननुकूल गृहस्थों की संगति के लिये विशेष रूप यह दंड दिया जाता है

प्रब्राजनीय कर्म (वासस्थान से निष्कासन)। कुलाचार के विरुद्ध आचरण करनेवाले और नृत्य, गीत, वाद्य में भा लेनेवाले इस दंड के भागी हाते हैं।

प्रतिसारणीय कर्म (क्षमायाचना द्वारा पुन: संबंध स्थापित करना)। अकारण किसी गृहस्थ को कटु वचन द्वारा खेद पहुँचाने पर यह कर्म किया जाता है।

उत्क्षेपणीय कर्म (संघ से बहिष्कार)। जो अपराध करके उसे स्वीकार नहीं करते, जो अपराध का प्रतिकार नहीं करते और जो समझाने पर भी मिथ्या धारणाओं को नहीं छोड़ते, उन्हें यह दंड दिया जाता है। जो इन अपराधों के दोषी हैं, वे संघ के अधिकारों से वंचित हो जाते हैं। दंड पाने के बाद जिसका आचरण सुधर जाता है, उसे समय से पहले भी क्षमा मिल सकती है।

दूसरा और तीसरा अध्याय[संपादित करें]

दूसरे और तीसरे अध्यायों में संघादि शेष आपत्तियों के लिये विहित "मानत्त" और "परिवास" कर्मो की विस्तृत व्याख्या है। सामान्यत: मानत्त का पालन छह दिन के लिये होता है। उसके बाद शुद्धि प्राप्त होती है।

परिवास तीन प्रकार के हैं। प्रतिच्छन्न, शुद्धांत और समवधान। जो अपराध करके जितने दिन छिपाता है उतने दिन के लिये उसे परिवास पूरा करना पड़ता है- यह प्रतिच्छन्न है। जो अपराध की तिथि भूल जाता है, उसे उपसंपदा दीक्षा से लेकर उस दिन तक जितने दिन बीत चुके हैं उतने दिन के लिये परिवास पूरा करना पड़ता है- यह शुद्धांत है। जो परिवास के समय अपराध करता है उसे फिर प्रारंभ से परिवास पूरा करना पड़ता है- यह समवधान परिवास है। जो मानत्त या परिवास ग्रहण कर तत्संबंधी प्रतिज्ञाओं का पालन नहीं करता, उसे भी प्रारंभ से उसे पूरा करना पड़ता है- यह भूल से प्रतिकर्षण कहलाता है।

चौथा अध्याय[संपादित करें]

चौथे अध्याय में अधिकरणों (मामलों) के समाधान की कई विधियाँ बताई गई हैं :

  • (अ) स्मृतिविनय,
  • (आ) समूढ़ विनय,
  • (इ) प्रतिज्ञातकरण,
  • (ई) यद्भूयसिक,
  • (उ) तत्पापीयसिक और
  • (ऊ) तिणवत्थारक।

संमुख् विनय के साथ ये सात अधिकरण शमथ धर्म कहलाते हैं।

  • (अ) यदि किसी निर्दोष व्यक्ति पर अभियोग लगाया जाय स्मृतिविनय द्वारा संघ उसे निर्दोष घोषित करता है।
  • (आ) यदि कोई उन्मत्त अवस्था में अपराध करे संघ परीक्षा के बाद अमूढ़ विनय द्वारा उसे निर्दोष घोषित करता है।
  • (इ) अभियुक्त द्वारा अभियोग के स्वीकरण के बाद ही दंड देना चाहिए। यदि वह कई अपराधों का दोषी हो, जो सबसे गंभीर है, उसके लिये दंड देना चाहिए- यह "प्रतिज्ञातकरण" है।
  • (इ) यदि किसी अधिकरण का समाधान एकमत से संभव न हो तो बहुमत से करना चाहिए- यह "यद्भूयसिक" है।
  • (उ) यदि कोई दंडमुक्त होने की चेतना से अपराध को स्वीकार नहीं करता पूछताछ के बाद उसका निर्णय करना चाहिए- यह तत्पापीयसिक है।
  • (ऊ) यदि प्रकट रूप से किसी अधिकरण के समाधान से संघभेद की आशंका हो उसे अप्रकट रूप से तय करना चाहिए- यह "तिणवत्थारक" है।

अधिकरण चार प्रकार के हैं :

  • विवादाधिकरण अर्थात् विवादों से उत्पन्न अधिकरण,
  • अनुवादाधिकरण अर्थात् किसी के अभियोग से उत्पन्न अधिकरण,
  • आपत्ति अधिकरण अर्थात् सात प्रकार के आपत्ति स्कंधों से उत्पन्न अधिकरण और
  • कृत्याधिकरण अर्थात् संघ कर्मो की अनियमितता से उत्पन्न अधिकरण।

पांचवाँ अध्याय[संपादित करें]

पाँचवें अध्याय में खानपान, स्नान, उठना बैठना, पहनना ओढ़ना आदि बातों का उचित अनुचित ढंग बताया गया है। इस सिलसिले में दैनिक प्रयोग में आनेवाली वस्तुओं की एक लंबी तालिका दी गई है। इस प्रकार इस अध्याय से उसे समय के शिष्टाचार, वेश भूषा, शिल्पकला इत्यादि बातों पर प्रकाश पड़ता है। किसी गृहस्थ के अनुचित व्यवहार के लिये भिक्षा इनकार कर अप्रसन्नता प्रकट करने की अनुमति है। अपनी अपनी भाषा में बुद्धवचन सीखने का विधान है। बोधिराज कुमार की कथा भी इसी अध्याय में दी गई है।

छठा अध्याय[संपादित करें]

छठे अध्याय में विहारों और उनकी व्यवस्था का वर्णन आया है। राजगृह श्रेष्ठी ने 60 विहार बनवाकर भगवान् और भिक्षुसंघ को दान किए थे। अनाथपिंडिक श्रेष्ठी ने भी राजगृह में हो भगवान् के प्रथम दर्शन पाए थे। उसने श्रावस्ती में भी जेतवनाराम का दान किया था। इस प्रसंग में यह बतलाया गया है कि विहार किस प्रकार बनने चाहिए, उनके सामान क्या क्या होने चाहिए और उनका सदुपयोग क्या है। तित्तिर जातक का उदाहण देकर यह बताया गया है कि बड़ों का आदर किस प्रकार करना चाहिए। संख्या में संघ की वृद्धि के साथ साथ संघरामों की सुव्यवस्था के लिये कर्तव्यों का विभाजन होने लगा और तदनुसार कर्मचारी भी नियुक्त होने लगे।

सातवाँ अध्याय[संपादित करें]

सातवें अध्याय में संघभेद का वृत्तांत दिया गया है। देवदत्त ने पदलोलुपतावश किस प्रकार संघ में फूट डाली, उसकी दुर्गति कैसे हुई, किन किन परिस्थितियों में संघभेद हो सकता है और संघ की सामग्री (एकता) कैसे हो सकती है- इन बातों का वर्णन है। देवदत्त के साथ अनुरुद्ध आदि शाक्य कुमारों और उपालि की प्रव्रज्याकथा भी आई है।

आठवाँ अध्याय[संपादित करें]

आठवें अध्याय में आंगतुक, आवासिक और गमिक के कर्तव्य; भोजन संबंधी नियम, भिक्षाचारी और अरण्यवासी के कर्तव्य; आसनगृह, स्नानगृह और शौचालय के नियम; और शिष्य-उपाध्याय एवं शिष्यआचार्य के कर्तव्य बताए गए हैं।

नौवाँ अध्याय[संपादित करें]

नवें अध्याय के आरंभ में बताया गया है कि किन किन परिस्थितियों में प्रातिमोक्ष का पाठ स्थगित करना चाहिए। इसमें अपराध स्वीकरण और दोषारोपण की विधि भी बताई गई है। समुद्र संबंधी आठ सुंदर उपमाओं द्वारा बुद्धशासन के गुण बताए गए हैं।

दसवाँ अध्याय[संपादित करें]

दसवें अधयाय में भिक्षुणी संघ की स्थापना और संघटन का विस्तृत वर्णन आया है। भिक्षुओं और भिक्षुणियों के बीच कैसा संबंध रहना चाहिए, इसके नियम भी इसी में दिए गए हैं।

ग्यारहवाँ अध्याय[संपादित करें]

11वें अध्याय में प्रथम बौद्ध संगीति का विवरण है, जिसमें 500 अर्हत शामिल हुए थे।

बारहवाँ अध्याय[संपादित करें]

12वें अध्याय में द्वितीय संगीति का वर्णन है, जिसमें 700 अर्हत शामिल हुए थे।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]