चल निधि

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व्यवसाय, अर्थशास्त्र अथवा निवेश में बाज़ार चल निधि (market liquidity या मार्केट लिक्विडिटी) कीमत में उल्लेखनीय उतार-चढ़ाव के बिना तथा मूल्य में न्यूनतम हानि के साथ परिसंपत्ति की विक्रय-क्षमता है. मुद्रा, या हाथ में नकदी, सबसे अधिक चल निधि परिसंपत्ति है.[1] कम चल निधि परिसंपत्ति का अधिक चल निधि परिसंपत्ति के साथ विनिमय परिसमापन (liquidation या लिक्विडेशन) कहलाता है. भुगतान की बाध्यताओं को अर्थ सुलभ परिसंपत्तियों के सन्दर्भ में एवं स्वयं ऐसी परिसंपत्तियों के लिए भुगतान की बाध्यताओं से निपटने की व्यावसायिक क्षमता को भी चल निधि (liquidity या लिक्विडिटी) मानते हैं.

विहंगावलोकन[संपादित करें]

एक चल निधि परिसंपत्ति की थोड़ी-बहुत निम्नलिखित विशेषताएं हैं. बाज़ार में लेन-देन की समय-सीमा के अन्दर ही किसी भी समय इसे कम से कम मूल्य की हानि पर तेज़ी से बेचा जा सकता है. अर्थ सुलभ बाज़ार की आवश्यक विशेषता यह भी है कि इसमें इच्छुक क्रेता और विक्रेता दोनों ही यहां सर्वदा तैयार मिलते हैं. चल निधि की एक और सुन्दर परिभाषा वह संभाव्यता है कि अगले कारोबार का निष्पादन अंतिम कारोबार के बराबर कीमत पर होता है. एक बाजार को पूरी तरह अर्थसुलभ माना जा सकता है अगर उसमे बड़ी संख्या में इच्छुक क्रेता और विक्रेता तैयार हैं. इसका सीधा सम्बन्ध बाज़ार की गहराई की अवधारणा के साथ है, जिसे ऐसी इकाइयों के रूप में मापा जा सकता है जो दी गई कीमत के प्रभाव के लिए बेचा अथवा ख़रीदा जा सकता है. विपरीत अवधारणा बाज़ार का विस्तार है जिसे प्रति यूनिट चल निधि की कीमत के प्रभाव से मापा जाता है.

एक अनकदी परिसंपत्ति वह परिसंपत्ति है जो अपनी मूल्य की अनिश्चियता अथवा जिस बाज़ार में इसका नियमित कारोबार किया जाता है ऐसे बाज़ार की कमी के कारण बिक्री लायक तैयार नहीं है.[2] बंधक से संबंधित परिसंपत्तियां जिसके फलस्वरूप उपप्रधान बंधक संकट पैदा हो गया था, वे अनकदी परिसंपत्तियों के उदाहरण हैं, क्योंकि वास्तविक संपत्ति के द्वारा सुरक्षित होने के बावजूद उनकी कीमत सरलता अवधार्य नहीं है. अन्य उदाहरण शेयर के एक बड़े ब्लॉक के रूप में एक परिसंपत्ति है, जिसकी बिक्री बाज़ार मूल्य को प्रभावित करती है.

किसी उत्पाद की चल निधि इस बिना पर मापी जा सकती है कि कितनी बार इसे ख़रीदा और बेचा गया; यह परिमाण या खंड के रूप में जाना जाता है. अक्सर नकदी बाज़ार में, जैसे कि शेयर बाज़ार में अथवा वायदा सट्टा बाज़ार में निवेश को निवेश से अधिक नकदी समझा जाता है, उदाहरण के लिए स्थावर सम्पदा (भूमि भवन), जो शीघ्रता से उनकी परिवर्तित होने की क्षमता पर आधारित है. दूसरे दर्जे के नकदी बाज़ार वाली कुछ परिसंपत्तियों का स्वामित्व अधिक लाभप्रद हो सकता है, इसीलिए दूसरे दर्जे के नकदी बाज़ार के बिना परिसंपत्तियों की तुलना में क्रेता ऐसी परिसंपत्ति के लिए ऊंची कीमत अदा करने को तैयार हैं. चल निधि (नकदी) बट्टा ऐसी परिसंपत्तियों के लिए करार की गई घटी हुई आय अथवा ऐसी परिसंपत्तियों पर अपेक्षित प्रतिलाभ है, परिपक्वता तक ठीक एक समान शेष अवधि के लिए जो चलन में नहीं हैं ऐसे राजकोषों की तुलना में नए निर्गमित अमेरिकी राजकोषी बॉन्ड के बीच अंतर जैसा ही. क्रेता यह जानते हैं कि दूसरे निवेशक अप्रचलित बॉन्डों को खरीदने को इच्छुक नहीं हैं अतः नए-नए निर्गमित बॉन्डों पर कम प्रतिलाभ तथा ऊंची कीमत मिलती है.[तथ्य वांछित]

बाज़ार की चल निधि अथवा परिसंपत्ति के लिए सट्टेबाज़ एवं शेयर संतुलनकर्ता प्रधान अंशदाता हैं. सट्टेबाज़ एवं शेयर संतुलनकर्ता ऐसे व्यक्ति विशेष अथवा संस्थान हो सकते हैं जो किसी खास बाज़ार मूल्य में प्रत्याशित वृद्धि या कमी से लाभ उठाने की ताक में रहते हैं. ऐसा करते हुए वे चल निधि को सुविधाजनक बनाने के लिए आवश्यक पूंजी प्रदान करते हैं. अनकदी के जोखिम को जरूरी नहीं कि केवल व्यक्तिगत निवेशों पर ही लागू किया जाए: सम्पूर्ण निवेश सूची ही बाजार के जोखिम के अधीन है. वित्तीय संस्थाएं एवं परिसंपत्ति प्रबंधक जो निवेश सूची का निरीक्षण और प्रबंधन करते हैं वे "संरचनात्मक" और "आकस्मिक" चल निधि जोखिम के अधीन हैं. संरचनात्मक चल निधि जोखिम, जिसे कभी-कभी निधीयन चल निधि जोखिम भी कहते हैं, व्यापार की सामान्य प्रक्रिया में परिसंपत्ति की निवेश सूचियों के निधीयन के साथ जुड़ा है. आकस्मिक चल निधि जोखिम अतिरिक्त निधियों की तलाश से अथवा संभाव्यता के अंतर्गत वायदा सट्टा बाज़ार की स्थितियों के अनुरूप परिपक्वता वाली देयताओं के प्रतिस्थापन से जुड़ा है. जब एक केन्द्रीय बैंक मुद्रा की चल निधि (आपूर्ति) को प्रभावित करना चाहता है, यह प्रक्रिया मुक्त बाज़ार परिचालन कहलाती है.

भावी सौदे[संपादित करें]

बाज़ारों के भावी सौदों में ऐसा कोई आश्वासन नहीं होता कि अनुबंधित वस्तु की कमी पूरी करने के लिए चल निधि बाज़ार हर बार मौजूद ही रहेगा. कुछ भावी सौदों के अनुबंध तथा विशिष्ट वितरण के महीनों का रूख तेज़ी से बढ़ती हुई व्यापारिक गतिविधि की ओर हो जाता है तथा दूसरों की तुलना में इसके पास उच्चतर चल निधि होती है. इन चल निधि अनुबंधों के सर्वाधिक उपयोगी संकेतक व्यापार की विस्तार तथा मुक्त ब्याज है.

काली चल निधि भी है, जो ऐसे लेन-देनों से संदर्भित है जो गैर-विनिमय की अवस्था में होती हैं और इसीलिए जब तक कि लेनदेन पूरी तरह सम्पादित नहीं हो जाता है तब तक निवेशकों को दिखाई नहीं देती है. सार्वजानिक मूल्य की खोज में इसका कोई योगदान नहीं होता है.[2]

बैंकिंग[संपादित करें]

बैंकिंग में बंधनों (दायित्वों) को पूरा करने की क्षमता को चल निधि कहते हैं जब वे अस्वीकार्य नुकसान हुए बिना देय हो जाते हैं. चल निधि का प्रबंधन एक दैनिक प्रक्रिया है जिसमें बैंकरों को निगरानी करने तथा नकदी के प्रवाह की परियोजना तैयार करने की जरूरत पड़ती है ताकि पर्याप्त चल निधि को बनाए रखना सुनिश्चित किया जा सके. अल्पकालिक परिसंपत्तियों और अल्पकालिक देयताओं के बीच संतुलन बनाए रखना नाजुक है. किसी एक बैंक के लिए ग्राहकों की जमा राशियां इसकी प्राथमिक देयताएं हैं (इस अर्थ में कि बैंक का मतलब अपने सभी ग्राहकों को उनकी मांग के अनुसार उनकी जमा राशियां लौटानी हैं) जबकि आरक्षित निधियां और ऋण इसकी प्राथमिक परिसंपत्तियां हैं (इस अर्थ में कि ये ऋण बैंक के प्रति देनदारियां हैं न कि बैंक के द्वारा लिया गया क़र्ज़). निवेश सूची परिसंपत्तियों के केवल एक छोटे से हिस्से का ही प्रतिनिधित्व करती है, तथा चल निधि के प्राथमिक स्रोत के रूप में कार्य करती है. जमा आहरणों एवं बढ़ी हुई ऋण की मांग को पूरा करने के लिए निवेश प्रतिभूतियों को परिनिर्धारित किया जा सकता है. चल निधि (नकदी) जुटाने के लिए बैंकों के पास कई अतिरिक्त विकल्प हैं, जैसे कि ऋणों की बिक्री, अन्य बैंकों से उधार, केन्द्रीय बैंक से उधार, उदाहरणार्थ संयुक्त राज्य संघीय रिज़र्व बैंक, एवं अतिरिक्त पूंजी में वृद्धि करना. एक बुरी स्थिति तब पैदा होती है, जब जमाकर्ता उनके धन की मांग तब कर सकता है जब बैंक पर्याप्त वित्तीय नुकसान किये बिना पर्याप्त नकदी उत्पन्न करने में असमर्थ हो जाता है. संगीन मामलों में, यह बैंक को जोखिम में डाल सकता है. चल निधि के संकट से बचने में सहायता करने के लिए अधिकांश बैंक कानूनन-अनिवार्य शर्तों के अधीन हैं.

आमतौर पर बैंक जितनी चाहिए उतनी चल निधि बनाए रख सकते हैं, क्योंकि अधिकतर विकसित देशों में बैंक जमा सरकार द्वारा बीमाकृत होते हैं. जमा दर में वृद्धि कर एवं प्रभावी ढंग से जमा उत्पादों का विपणन कर चल निधि की कमी का इलाज़ किया जा सकता है. हालांकि बैंक के मूल्य और साफल्य का एक महत्वपूर्ण उपाय चल निधि की लागत है. एक बैंक महत्वपूर्ण चल निधि कोष को आकर्षित तो कर सकता है, किन्तु किस कीमत पर? कम लागतें मजबूत मुनाफे अधिक स्थिरता एवं जमाकर्ताओं, निवेशकों, और नियामकों के मध्य अधिक विश्वास पैदा कर सकती हैं.

व्यवसाय[संपादित करें]

व्यवसाय में यह शब्दावली दायित्वों के देय हो जाने की स्थिति में पूरा करने की कंपनी की क्षमता के सन्दर्भ में भी व्यवहृत होती है. अगर कोई फर्म ठीक समय पर अपने दायित्वों को पूरा करने में असमर्थ है तो कंपनी दिवालियापन के खतरे में हैं. इसीलिए कर्मचारियों को नियंत्रित कर वित्तीय योजना बनाने पर विशेष बल दिया जाता है, ताकि वे निधि (कोष) की संभी संभावित कमी को दर्ज (रजिस्टर) करते रहें. अगर किसी प्रकार की कोई कमी है, तो ट्रेजरी (कोषागार) को इसकी सूचना दे दी जाएगी ताकि आगामी व्यवसाय अवधि के लिए पूंजी जुटाने के लिए तत्पर रहना होगा. अगर धन (निधि) की कमी बहुत देर से पंजीकृत होती है और धनराशि अपर्याप्त होती है तो बैंक कंपनी की पूंजी पर उधार को नकार सकते हैं, और इसके फलस्वरूप दिवालियापन अपरिहार्य हो सकता है.

व्यवसाय में व्यापारी वर्ग अक्सर परिसमापन बिक्री किया करते हैं, जिसमें नकदी जुटाने के लिए अथवा माल (स्टॉक) से जल्द छुटकारा पाने के लिए माल को बट्टे पर बेच दिया जाता है.

सन्दर्भ[संपादित करें]