गोविन्द ४

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राष्ट्रकूट वंश का राजा।

गोविंद चतुर्थ इंद्र तृतीय का द्वितीय पुत्र था और अपने बड़े भाई अमोघवर्ष द्वितीय को राजगद्दी से हटा एवं मारकर राष्ट्रकूट की राजगद्दी पर बैठा था। इस घटना के ठीक समय के बारे में कुछ निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। सिंहासनारोहण के समय वह लगभग २०-२५ वर्षों का नवजवान था। परंतु दुर्भाग्यवश उसकी प्रवृत्ति भोगविलास में अधिक थी। अपने सौंदर्य और जवानी को उसने नाच, गान और इंद्रियभोग में लगाया और राजकाज की चिंता बिलकुल ही छोड़ दी। जनता और राष्ट्रकूट साम्राज्य के शुभचितंक सांमतों को इस बात से बड़ी चिंता हुई और सबने उसके चचा अमोघवर्ष तृतीय से उससे मुक्ति दिलाने क आग्रह किया। अमोघवर्ष ने स्वयं उसके विरुद्ध योजनाओं का प्रारंभ किया हो, ऐसा नहीं लगता, परंतु अपने भतजे (गोविंद चतुर्थ) की बदनामी और अन्य सारी परिस्थितियों को अपने अनुरूप पाकर उसने गोविंद को गद्दी से हटा दिया। इस कार्य में उसे अपने संबंधी चेदिराज से सहायत मिली। उसका निजी व्यक्तित्व और सुचरित्र भी उसके पक्ष में था और ९३६ के आसपास गोविंद चतुर्थ को अपदस्थ कर उसने गद्दी ले ली।