ऐन्द्र व्याकरण

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ऐंद्र व्याकरण (ऐन्द्र = इन्द्र का) को कुछ लोग पाणिनि के पूर्व का मानते हैं। किंतु यह मत असंदिग्ध नहीं है। बर्नल के अनुसार ऐंद्र व्याकरण का संबंध कातंत्र से और तमिल के प्राचीनतम व्याकरण तोल्काप्पियम से है। ऐंद्र व्याकरण के आधार पर सातवाहन युग में शर्व वर्मा ने कातंत्र व्याकरण की रचना की। इसके दूसरे नाम कालापक और कौमार भी हैं। इसपर दुर्गसिंह की टीका प्रसिद्ध है। बोपदेव के अनुसार व्याकरण के आठ सम्प्रदाय हैः--- "इन्द्रश्चन्द्रः काशकृत्स्नापिशली शाकटायनः। पाणिन्यमर जैनेन्द्राः जयन्त्यष्टादिशा ब्दिकाः।।" 1. इन्द्रः--ऐन्द्र-व्याकरण, 2. चन्द्रः--चान्द्र-व्याकरण, 3. काश्कृत्स्न-व्याकरण, 4. आपिशली-व्याकरण, 5. शाकटायन-व्याकरण, 6. पाणिनीय-व्याकरण, 7. जैनेन्द्र-व्याकरण, 8. जयन्ति-व्याकरण। "ऋक्तन्त्र" के कर्त्ता शाकटायन के अनुसार सर्वप्रथम ब्रह्मा ने बृहस्पति को व्याकरण का उपदेश दिया। बृहस्पति ने इन्द्र को, इन्द्र ने भरद्वाज को , भरद्वाज ने ऋषियों को और ऋषियों ने ब्राह्मणों को व्याकरण का उपदेश दिया। इस प्रकार उपरिलिखित व्याकरणों में "ऐन्द्र-व्याकरण" प्राचीनतम माना जाता है।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  • Trautmann, Thomas R. 2006. Languages and nations: the Dravidian proof in colonial Madras. Berkeley: University of California Press, pp. 52–54.
  • Burnell, Arthur Coke. 1875. On the Aindra school of Sanscrit Grammarians: their place in the Sanscrit and subordinate literatures.