ऐतिहासिक भौतिकवाद

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ऐतिहासिक भौतिकवाद (Historical materialism) समाज और उसके इतिहास के अध्ययन में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical materialism) के सिद्धांतों का प्रसारण है। आधुनिक काल में चूँकि इतिहास को मात्र विवरणात्मक न मानकर व्याख्यात्मक अधिक माना जाता है और वह अब केवल आकस्मिक घटनाओं का पुंज मात्र नहीं रह गया है, ऐतिहासिक भौतिकवाद ने ऐतिहासिक विचारधारा को अत्यधिक प्रभावित किया है।

17 मार्च, 1883 को कार्ल मार्क्स की समाधि के पास उनके मित्र और सहयोगी एंजिल ने कहा था, ""ठीक जिस तरह जीव जगत् में डार्विन ने विकास के नियम का अनुसंधान किया, उसी तरह मानव इतिहास में मार्क्स ने विकास के नियम का अनुसंधान किया। उन्होंने इस सामान्य तथ्य को खोज निकाला (जो अभी तक आदर्शवादिता के मलबे के नीचे दबा था) कि इसके पहले कि वह राजनीति, विज्ञान, कला, धर्म और इस प्रकार की बातों में रुचि ले सके, मानव को सबसे पहले खाना पीना, वस्त्र और आवास मिलना चाहिए। इसका अभिप्राय यह है कि जीवन धारण के लिए आसन्न आवश्यक भौतिक साधनों के साथ-साथ राष्ट्र अथवा युगविशेष के तत्कालीन आर्थिक विकास की प्रावस्था उस आधार का निर्माण करती है जिसपर राज्य संस्थाएँ, विधिमूलक दृष्टिकोण और संबंधित व्यक्तियों के कलात्मक और धार्मिक विचार तक निर्मित हुए हैं। तात्पर्य यह है कि इन उत्तरवर्ती परिस्थितियों को जिन्हें पूर्वगामी परिस्थितियों की जननी समझा जाता है, वस्तुत: स्वयं उनसे प्रसूत समझा जाना चाहिए।

यह ऐसी धारणा है जिसका मौलिक महत्व है और जो तत्वत: सरल है। इतिहास में (वैसे ही मानव विचार में भी) परिवर्तनों के लिए आदि प्रेरक शक्ति युगविशेष की आर्थिक उत्पादन की व्यवस्था और तज्जनित संबंधों में निहित होती है। यह धारणा उन सारी व्याख्याओं का विरोध करती है जो इतिहास के प्रारंभिक तत्वों को दैव, जगदात्मा, प्राकृतिक विवेक स्वातंत्र्य आदि जैसी भावात्मक वस्तुओं में ढूँढती हैं। इसकी उत्पत्ति वास्तविक सक्रिय मानव से होती है और उसके सही सही और महत्वपूर्ण अंत: संबंध सैद्धांतिक प्रत्यावर्तन के विकास और उनकी सजीव प्रक्रिया की प्रतिध्वनियों को प्रदर्शित करती है। संक्षेप में, चेतनता जीवन को नहीं निर्धारित करती किंतु जीवन चेतनता को निर्धारित करता है।

मार्क्स ने "दर्शन की दरिद्रता" (पावर्टी ऑव फ़िलासफ़ी) में लिखा, ""हम कल्पना करें कि अपने भौतिक उत्तराधिकार में वास्तविक इतिहास, अपने पार्थिव उत्तराधिकार में, ऐसा ऐतिहासिक उत्तराधिकार है जिसमें मत, प्रवर्ग, सिद्धांतों ने अपने को अभिव्यक्त किया है। प्रत्येक सिद्धांत की अपनी निजी शताब्दी रही है जिसमें उसने अपने को उद्घाटित किया है। उदाहरण के लिए सत्ता के सिद्धांत की अपनी शताब्दी 11वीं रही है, उसी तरह जिस तरह 18वीं शताब्दी व्यक्तिवाद के सिद्धांत की प्रधानता की रही है। अत:, तर्कत: शताब्दी सिद्धांत की अनुवर्तिनी होती है, सिद्धांत शताब्दी का अनुवर्ती नहीं होता। दूसरे शब्दों में, सिद्धांत इतिहास को बनाता है, इतिहास सिद्धांत को नहीं बनाता। अब यदि हम इतिहास और सिद्धांत दोनों की रक्षा की आशा के लिए पूछें कि आखिर सत्ता का सिद्धांत 11वीं शताब्दी में ही क्यों प्रादुर्भूत हुआ और व्यक्तिवाद 18वीं में क्यों, और सत्ता सिद्धांत 18वीं में या व्यक्तिवाद 11वीं में, अथवा दोनों एक ही शताब्दी में क्यों नहीं हुए, तो हमें अनिवार्य रूप से तत्कालीन परिस्थितियों के विस्तार में जाने पर बाध्य होना पड़ेगा। हमें जानना पड़ेगा कि 11वीं और 18वीं शताब्दी के लोग कैसे थे, उनकी क्रमागत आवश्यकताएँ क्या थीं। उनके उत्पादन की शक्तियाँ, उनके उत्पादन के तरीके, वे कच्चे माल जिनसे वे उत्पादन करते थे, और अंत में मानव मानव के बीच क्या संबंध थे, संबंध जो अस्तित्व की इन समस्त परिस्थितियों से उत्पन्न होते थे। किंतु ज्योंही हम मानवों को अपने इतिहास के पात्र और उनके निर्माता मान लेते हैं त्योंही थोड़े चक्कर के बाद, हमें उस वास्तविक आदि स्थान का पता लग जाता है जहाँ से यात्रा आरंभ हुई थी, क्योंकि हमने उन शाश्वत सिद्धांतों को छोड़ दिया है, जहाँ से हमने आरंभ किया था।""

भोंड़े पत्थर के औजारों से धनुषबाण तक और शिकारी जीवन से आदिम पशुपालन पशुचारण तक, पत्थर के औजारों से धातु के औजारों तक (लोहे की कुल्हाड़ी, लोहे के फालवाले लकड़ी के हल आदि) कृषि के संक्रमण के साथ, सामग्री के उपयोग के लिए धातु के औजारों का आगे को विकास (लोहार की धौंकनी और बर्तनों का आरंभ), दस्तकारी के विकास और उसका कृषि से प्रारंभिक औद्योगिक निर्माण के रूप में पृथक्करण, मशीनों की ओर संक्रमण, और तब आधुनिक बड़े पैमाने के उद्योगों का औद्योगिक क्रांति के आधार पर उदय–प्राचीन काल से हमारे युग तक की उत्पादक शक्तियों के क्रमिक विकास की यह एक मोटी रूपरेखा है। परिवर्तनों के इस क्रम के साथ-साथ मनुष्य के आर्थिक संबंध भी बदलते गए हैं और उनका विकास होता गया है। इतिहास को उत्पादन संबंधों के पाँच मुख्य प्रकार ज्ञात हैं–आदिम जातिवादी, दासप्रधान, सामंती, पूँजीवादी और समाजवादी। इन व्यवस्थाओं के विचार और प्रकार, यथा पूँजीवाद में मुनाफा, मजदूरी और लगान, शाश्वत नहीं बल्कि उत्पादन के सामाजिक संबंधों की सैद्धांतिक अभिव्यक्ति मात्र हैं। भौतिक परिवेश में विकसित होनेवाली ठोस आवश्यकताएँ एक व्यवस्था से दूसरी व्यवस्था के परिवर्तन के ऐतिहासिक क्रम को जन्म देती हैं। जब भीतरी अंतर्विरोधों के कारण आर्थिक आच्छादन फट जाता है, जैसा कि समाजवादी विश्लेषण का दावा है कि पूँजीवाद में घटित हो रहा है, तब इतिहास का एक नया अध्याय आरंभ हो जाता है।

इस धारणा के अनुसार मनुष्य की भूमिका किसी भी प्रकार निष्क्रियता की नहीं सक्रियता की है। एंजिल्स के कथानानुसार स्वतंत्रता आवश्यकता की स्वीकृति है। व्यक्ति प्राकृतिक नियमों से कहाँ तक बँधा है, यह जान लेना अपनी स्वतंत्रता की सीमाओं को जान लेना है। इच्छा मात्र से आदमी अपनी ऊँचाई हाथ भर भी नहीं बढ़ा सकता। किंतु मनुष्य ने उन भौतिक नियमों का राज समझकर उड़ना सीख लिया है जिनके बिना उसका उड़ना असंभव होता है। नि:संदेह मानव इतिहास का निर्माण करता है किंतु अपनी मनचाही रीति से नहीं। यह कहना कि यह विचारधारा मनुष्य पर स्वार्थ के उद्देश्यों को आरोपित करती है, इस विचार को फूहड़ बनाना है। यह हास्यास्पद होता, यदि सिद्धांत यह कहता कि आदमी सदा भौतिक स्वार्थ के लिए काम करता है। किंतु उसका मात्र इतना आग्रह है कि आदर्श स्वर्ग से बने बनाए नहीं टपक पड़ते किंतु प्रस्तुत परिस्थितियों द्वारा विकसित होते हैं। इसलिए इसका कारण खोजना होगा कि युगविशेष में आदर्शविशेष ही क्यों प्रचलित थे, दूसरे नहीं।

1890 में एंजिल्स ने लिखा, ""अंततोगत्वा इतिहास के रूप को निश्चित करनेवाले तत्व वास्तविक जीवन में उत्पादन और पुनरुत्पादन है। इससे अधिक का न तो मार्क्स ने और न मैंने ही कभी दावा किया है। इसलिए अगर कोई इसको इस वक्तव्य में तोड़ मरोड़कर रखता है कि आर्थिक तत्व ही एकमात्र निर्णायक है, तो वह उसे अर्थहीन, विमूर्त और तर्करहित वक्तव्य बना देता है। आर्थिक परिस्थिति आधार निश्चय है, किंतु ऊपरी ढाँचे के विभिन्न सफल संग्राम के बाद विजयी वर्ग द्वारा स्थापित संविधान आदि–कानून के रूप–फिर संघर्ष करनेवालों के दिमाग में इन वास्तविक संघर्षो के परावर्तन, राजनीतिक, कानूनी, दार्शनिक सिद्धांत, धार्मिक विचार और हठधर्मी सिद्धांत के रूप में उनका विकास–यह भी ऐतिहासिक संघर्षो की गति पर अपना प्रभाव डालते हैं और अधिकतर अवस्थाओं में उनका रूप स्थित करने में प्रधानता: सफल होते हैं। इन तत्वों की एक दूसरे के प्रति एक क्रिया भी होती है–अन्यथा इस सिद्धांत को इतिहास के किसी युग पर आरोपित करना अनन्य-साधारण-समीकरण को हल करने से भी सरल होता।"" वास्तव में यह विचार इस बात को स्वीकार करता है कि ""सिद्धांत ज्योंही जनता पर अपना अधिकार स्थापित कर लेते हैं, वे भौतिक शक्ति बन जाते हैं।"" बुनियादी तौर पर तो नि:संदेह इसका आग्रह है कि सामाजिक परिवर्तनों के अंतिम कारणों को ""दर्शन में नहीं प्रत्येक विशिष्ट युग के अर्थशास्त्र"" में ढूँढ़ना होगा। सत्य तो यह है कि आरंभ में "कार्य" थे, शब्द नहीं।

इस विचारधारा का एक गत्यात्मक पक्ष भी है जो इस बात पर जोर देता है कि प्रतयेक सजीव समाज में उत्पादन की विकासशील शक्तियों और प्रतिगत्यात्मक संस्थाओं में, उन लोगों में जो स्थितियों को जैसी की तैसी रहने देना चाहते हैं और जो उन्हें बदलना चाहते हैं, विरोध उत्पन्न होता है। यह विरोध जब इस मात्रा तक पहुँच जाता है कि उत्पादन संबंध समाज की "बेड़ियाँ बन जाते हैं" तब क्रांति हो जाती है। इस विश्लेषण के अनुसार पूँजी का एकाधिपत्य उत्पादन पर बेड़ी बनकर बैठ गया है और यही कारण है कि समाजवादी क्रांतियाँ हुई, और जहाँ अभी तक नहीं हुई हैं वहाँ पूँजीवाद स्थायी रूप से संकट में पड़ गया है। यह समय समय में युद्धों और उसकी निरंतर तैयारियों से ही दूर हो सकता है। समाजवादी समाज में जो अंतविरोध पैदा होंगे, वे, वास्तव में, अभी तो निश्चय से अधिक कल्पना की वस्तु हैं।


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