ऋण

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ऋण वह है, जो किसी से माँगा या लिया जाता है; सामान्यतः यह ली गयी संपत्ति को व्यक्त करता है, लेकिन यह शब्द धन की आवश्यकता के परे नैतिक दायित्व एवं अन्य पारस्परिक क्रियाओं को भी व्यक्त करता है. परिसंपत्तियों के मामले में, ऋण कुल जोड़ अर्जित होने के पूर्व वर्तमान में भविष्य की क्रय शक्ति के प्रयोग का माध्यम है. कुछ कंपनियां एवं निगम ऋण का प्रयोग अपनी संपूर्ण संगठित (कॉरपोरेट) वित्तीय योजनाओं के भाग के रूप में करते हैं.[तथ्य वांछित]

ऋण तब सृजित होता है जब एक ऋणदाता एक ऋण प्राप्तकर्ता या ऋणी को कुछ परिसंपत्ति प्रदान करता है. आधुनिक समाज में, सामान्यतः ऋण को अपेक्षित पुनर्भुगतान के साथ प्रदान किया जाता है; ज़्यादातर मामलों में, ब्याज सहित. ऐतिहासिक रूप से, ऋण अनुबंधित नौकर के सृजन हेतु जिम्मेदार था.

शब्द उत्पत्ति इतिहास[संपादित करें]

इस शब्द की उत्पत्ति फ्रेंच शब्द dette एवं अंततः लैटिन शब्द de habere (रखना) से निकले शब्द debere (मांगना) से हुई है. Debt (ऋण) शब्द में बी अक्षर का प्रयोग 17वीं शताब्दी में संभवतः सैमुअल जॉन्सन द्वारा 1755 के अपने शब्दकोश में पुनः प्रयुक्त किया गया था - कुछ अन्य शब्द जो बी अक्षर के बिना अस्तित्व में थे, उनमें उसी समय के आसपास बी अक्षर सम्मिलित किया गया.

भुगतान[संपादित करें]

ऋण के पूर्व, ऋणदाता तथा ऋण प्राप्तकर्ता को ऋण के पुनर्भुगतान तरीके पर सहमत होना चाहिये, जिसे कि बिलंबित भुगतान के मानक के रूप में जाना जाता है. यह भुगतान सामान्यतः मुद्रा की इकाई में तय धनराशि के रूप में होता है लेकिन यह भी कभी-कभी वस्तु या सामग्री के रूप में भी हो सकता है. समय के साथ-साथ भुगतान नियमित किस्तों के रूप में अथवा ऋण अनुबंध की समाप्ति पर एक साथ किया जा सकता है.

ऋण के प्रकार[संपादित करें]

कोई भी कंपनी अपने कार्यकलापों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिये कई तरह के ऋणों का प्रयोग करती है. विभिन्न प्रकार के ऋणों को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है - 1) सुरक्षित एवं असुरक्षित ऋण 2) निजी एवं सार्वजनिक ऋण 3) संघीय एवं द्विपक्षीय ऋण, एवं 4) अन्य प्रकार के ऋण जो उपरोक्त वर्णित ऋणों के एक या अधिक लक्षणों को व्यक्त करता है.[1]

ऋण दायित्व को सुरक्षित माना जाता है यदि ऋणदाता को कंपनी की परिसंपत्तियों को बेचने का मालिकाना हक हो या अन्यथा कंपनी के विरुद्ध सामान्य दावों से आगे हो. असुरक्षित ऋण में वित्तीय दायित्व शामिल हैं, जहाँ ऋणदाता को उसके दावों को पूरा करने के लिये ऋणप्राप्तकर्ता की परिसंपत्ति पर अधिकार न हो.

निजी ऋण में बैंक ऋण प्रकार के दायित्व शामिल हैं, चाहे वरिष्ठ हों या बीच के. सार्वजनिक ऋण एक सामान्य परिभाषा है जिसमें सभी वित्तीय अधिकार शामिल हैं जो कि एक सार्वजनिक एक्सचेंज (बाज़ार) या पटल पर मुक्त रूप से व्यापार योग्य होते हैं, यदि कोई प्रतिबंध हो.

ऋण का संघीकरण एक जोखिम प्रबंधन तरीका है जो अग्रणी बैंकों को अपने जोखिम को कम करने एवं ऋण प्रदान क्षमता को मुक्त करने के लिये ऋण को अधोलिखित करने की अनुमति देता है.

आधारभूत ऋण सबसे सरल तरीके का ऋण है. इसमें एक अनुबंध के द्वारा एक नियत समय में पुनर्भुगतान के लिए रकम प्रदान करना सम्मिलित होता है. वाणिज्यिक ऋणों में, ऋण की मुख्य राशि पर प्रतिवर्ष प्रतिशत के रूप में किये गये ब्याज का भी उस तिथि तक भुगतान करना होता है.

कुछ ऋणों में, ऋण प्राप्तकर्ता को वास्तविक रूप से दी गयी राशि उसके द्वारा वापस की जाने वाली राशि से कम होती है; अतिरिक्त मुख्य राशि का उच्च ब्याज दर (देखें बिंदु (बंधक राशि)) की तरह ही आर्थिक प्रभाव होता है एवं इसे कभी-कभी बैंकर का दर्जन संदर्भित किया जाता है, "बैंकर्स डज़न" पर एक नाटक - मांगे गये बारह (एक दर्जन) पर ग्यारह का ऋण प्राप्त होता है (एक बैंकर का दर्जन). नोट करें कि प्रभावी ब्याज दर छूट के बराबर नहीं है : यदि कोई $10 प्राप्त करता एवं $11 पुनर्भुगतान करता है, तब यह ($11 - $10)/ $10 = 10% ब्याज है; हालाकि, यदि कोई $9 प्राप्त करता एवं $10 पुनर्भुगतान करता है, तब यह ($10 - $9)/ $9 = 11 1/0% ब्याज है.[2]

एक संघीय ऋण किसी कंपनी को दिये जाने वाला वह ऋण है जिसमें वह कंपनी उतनी धनराशि चाहती है जिसे कोई ऋणदाता एकल ऋण के रूप में जोखिम लेने को तैयार न हो, सामान्यतः यह राशि कई मिलियन डॉलर होती है. ऐसे मामलों में, बैंकों का संघ मुख्य धनराशि के एक अंश को प्रदान करने हेतु सहमति प्रदान करता है.

ऋण की सुरक्षा हेतु निश्चित संस्थानों जैसे कि कंपनियों एवं सरकारों द्वारा बांड जारी किये जाते हैं. बांड के द्वारा ऋण प्राप्तकर्ता को मुख्य राशि को ब्याज सहित वापस करने की बाध्यता होती है. धन प्राप्ति के इच्छुक संस्थान द्वारा भी बाज़ार में निवेशकों को बांड जारी किये जाते हैं. बांड की एक निश्चित अवधि होती है, सामान्यतः कुछ वर्ष ; दीर्घाविधि बांड सहित, जो 30 वर्ष तक चलते हैं, सामान्यतः कम प्रचलित हैं. बांड की अवधि की समाप्ति पर पूरी धनराशि वापस करनी चाहिये. अंतिम भुगतान के समय ब्याज को भी जोड़ना चाहिये या इसे बांड की जीवनावधि में नियमित किस्तों (कूपन के रूप में प्रचलित) द्वारा भुगतान किया जा सकता है. बांड का बांड बाज़ार में व्यवसाय किया जा सकता है एवं इसे इक्विटी की तुलना में सुरक्षित निवेश के रूप में विस्तृत रूप से प्रयोग किया जाता है.

ऋण संघीकरण[संपादित करें]

इन्हें भी देखें: Syndicated loan

निधि आधार[संपादित करें]

नकद साख

यह प्राथमिक तरीका है जिसमें बैंक सामग्रियों एवं ऋण की प्रतिभूति के विरुद्ध धनराशि प्रदान करते हैं. यह एक चालू खाते की तरह संचालित होता है बशर्ते कि इस खाते से आहरित की जा सकने वाली धनराशि इस खाते में जमा किये गये धन तक ही सीमित नहीं है. इसके स्थान पर, खाता धारक को "लिमिट (सीमा)", "जमा सुविधा" कही जाने वाली एक निश्चित धनराशि को आहरित करने की अनुमति होती है, जो कि खाते में साख राशि से अधिक होती है. नकद साख, सिद्धांततः, मांगे जाने पर भुगतान योग्य हैं. अतएव, ये बैंक की मांग जमाओं के प्रतिरूप हैं.

कार्यशील पूंजी:

फर्मों को उनकी रोजमर्रा की गतिविधियों हेतु भुगतान के लिये नकद की आवश्यकता होती है. उन्हें वेतन, कच्ची सामग्री, बिलों व कई अन्य मदों हेतु भुगतान करना होता है. इन कार्यों हेतु उपलब्ध धनराशि को फर्म की कार्यशील पूंजी कहा जाता है. कार्यशील पूंजी का मुख्य स्त्रोत वर्तमान परिसंपत्तियाँ हैं क्योंकि ये अल्पावधि परिसंपत्तियाँ हैं जिनका प्रयोग फर्म नकदी के सृजन हेतु कर सकता है. हालाकि, फर्म के वर्तमान उत्तरदायित्व भी होते हैं, अतएव फर्म की मौजूद कार्यशील पूंजी की गणना करते समय इन पर भी ध्यान दिया जाना चाहिये.

अतएव कार्यशील पूंजी:- कार्यशील पूंजी = वर्तमान परिसंपत्ति || भंडार + ऋणदाता + नकद - वर्तमान उत्तरदायित्व इस प्रकार कार्यशील पूंजी ही सकल वर्तमान परिसंपत्तियों की तरह है एवं यह फर्म के तुलन पत्र (बैलेन्स शीट) के शीर्षाद्ध का महत्त्वपूर्ण भाग है. एक व्यापार के लिये यह अत्यावश्यक है कि वह अपनी समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु पर्याप्त कार्यशील पूंजी रखे. कई व्यापार सिर्फ इसीलिये नहीं डूब गये क्योंकि वे अलाभदायक थे, बल्कि उनके पास कार्यशील पूंजी का अभाव था. कार्यशील पूंजी चक्र

बैंक ओवर ड्राफ्ट (जमा धन से अधिक राशि आहरण)

ओवरड्राफ्ट शब्द से तात्पर्य है किसी बैंक खाते से अधिक धन का आहरण. अन्य शब्दों में, कोई खाता धारक बैंक खाते से जमा धन की तुलना में अधिक धन आहरित करता है. ओवरड्राफ्ट तब घटित होता है जब बैंक खाते से आहरित धन उपलब्ध शेष धन से अधिक हो जाता है जो कि खाते को ऋणात्मक संतुलन प्रदान करता है - ऐसी स्थिति में व्यक्ति को "अति आहरित" कहा जा सकता है.

यदि खाता प्रदाता से ओवरड्राफ्ट संरक्षण योजना हेतु कोई पूर्व अनुबंध है एवं अतिरिक्त आहरित राशि प्राधिकृत ओवरड्राफ्ट सीमा के अंतर्गत है, तब सहमत दर पर ही ब्याज अधिरोपित किया जाता है. यदि यह शेष राशि सहमत शर्तों से अधिक हो जाती है तो शुल्क एवं उच्चतर ब्याज दर को अधिरोपित किया जा सकता है.

आवधिक ऋण

आवधिक ऋण बैंक में नियत जमा के प्रतिरूप हैं. बैंक इस तरीके से तब धन प्रदान करता है, जब पुनर्भुगतान नियत या तय, पूर्व निर्धारित किस्तों के द्वारा होना हो. इस तरह के ऋण, ऋण प्राप्तकर्ता को दीर्घावधि परिसंपत्तियों की प्राप्ति हेतु प्रदान किया जाता है, यानि ऐसी परिसंपत्तियाँ जो ऋण प्राप्तकर्ता को दीर्घावधि में लाभ प्रदान करें (कम से कम एक वर्ष से अधिक). इस श्रेणी में संयंत्र एवं मशीनरी का क्रय, कारखाने हेतु इमारत का निर्माण, नयी परियोजनाओं की स्थापना आदि आती हैं. इस श्रेणी के अंतर्गत ऑटोमोबाइल, उपभोक्ता सामग्रियों, अचल संपत्ति के क्रय हेतु वित्तीय सहायता एवं आधारभूत ढ़ाँचे का सृजन भी आता है.

बिल में छूट (रियायत):

कुछ छोटे बैंकों में बिल रियायत एक प्रमुख गतिविधि है. गतिविधि में बैंक ऋणप्राप्तकर्ता द्वारा अपने ग्राहक पर आहरित बिल को लेता है एवं छूट/ कमीशन के रूप में कुछ धनराशि की कटौती करके तत्काल भुगतान कर देता है. तत्पश्चात, बैंक इस बिल को देय तिथि को ऋण प्राप्तकर्ता के ग्राहक को प्रस्तुत करता है एवं कुल धनराशि एकत्र करता है. यदि बिल में विलम्ब हो जाता है तो ऋणप्राप्तकर्ता या उसका ग्राहक बैंक को लेनदेन की शर्तों के अधीन पूर्व-निर्धारित ब्याज का भुगतान करते हैं.

परियोजना हेतु वित्त प्रदान:

परियोजना हेतु वित्तीय सहायता प्रदान करना दीर्घावधि आधारभूत ढ़ांचे एवं औद्योगिक परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करना होता है, जो एक जटिल वित्तीय ढांचे पर आधारित है जिसमें परियोजना ऋण एवं इक्विटी का प्रयोग परियोजना को वित्तीय सहायता प्रदान करने में किया जाता है, न कि परियोजना प्रायोजकों का तुलन पत्र. सामान्यतः, एक परियोजना वित्त ढ़ाँचे में प्रायोजक के रूप में पहचाने जाने वाले कई इक्विटी निवेशकों के साथ-साथ बैंकों के संघ सम्मिलित होते हैं जो कार्य कलापों हेतु ऋण प्रदान करते हैं.

गैर निधि आधार[संपादित करें]

साख पत्र (लैटर ऑफ क्रेडिट)

लेन देन में साख पत्र भी भुगतान का स्त्रोत हो सकता है, इसका तात्पर्य है कि साख पत्र के मोचन (रिडीम) द्वारा निर्यातक को भुगतान प्राप्त होगा. साख पत्रों का प्रयोग प्राथमिक रूप से बड़ी कीमत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक लेनदेनों में होता है जहाँ यह लेनदेन एक देश के आपूर्तिकर्ता एवं दूसरे देश के ग्राहक के मध्य होता है. इनका प्रयोग भूमि विकास प्रक्रिया में भी होता है, यह सुनिश्चित करने के लिये कि अनुमोदित जन सुविधाओं (गलियां, फुटपाथ, वर्षा जल तालाब इत्यादि) का निर्माण किया जायेगा. साख पत्र के पक्ष सामान्यतः एक लाभ प्राप्तकर्ता, जिसे धन प्राप्त करना हो, जारीकर्ता बैंक जिसका आवेदक एक ग्राहक है एवं परामर्शक बैंक जिसका लाभप्राप्तकर्ता एक ग्राहक है, होते हैं. लगभग सभी साख पत्र अटल होते हैं, यानि इनमें लाभ प्राप्तकर्ता, जारीकर्ता बैंक एवं विनिश्चय करने वाले बैंक, यदि कोई हो, की पूर्व सहमति के बिना कोई संशोधन या निरस्तीकरण नहीं किया जा सकता. लेनदेन करते समय साख पत्र में गिरोज़ एवं यात्री चैकों की तरह ही कार्यकलाप होते हैं. सामान्यतः, भुगतान प्राप्त करने के लिये लाभ प्राप्तकर्ता को वाणिज्यक बीजक (इनबॉइस), माल लदाई का बिल एवं परिवहन में हानि या क्षति के प्रति सुरक्षा प्रदान करने हेतु इंश्योरेन्स दस्तावेज को प्रस्तुत करना होता है. हालाकि, सूची एवं दस्तावेजों के प्रकार कल्पना एवं बातचीत हेतु खुले हैं एवं भेजी गयी सामग्री की गुणवत्ता व उद्भव स्थान को प्रमाणित करते हुये निष्पक्ष तृतीय पक्ष द्वारा जारी दस्तावेजों को प्रस्तुत करने की आवश्यकता निहित हो सकती है.

Corporate finance

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Working capital

Cash conversion cycle
Return on capital
Economic value added
Just in time
Economic order quantity
Discounts and allowances
Factoring (finance)


Capital budgeting

Capital investment decisions
The investment decision
The financing decision


Sections

Managerial finance
Financial accounting
Management accounting
Mergers and acquisitions
Balance sheet analysis
Business plan
Corporate action


Societal components

Financial market
Financial market participants
Corporate finance
Personal finance
Public finance
Banks and Banking
Financial regulation
Clawback


लेखाकरण ऋण[संपादित करें]

राष्ट्रीय लेखाकरण में, ऋणियों के अनुसार ही ऋण को जोड़ा जाता है. गृहस्थी ऋण वह ऋण है जो गृहस्थों के ऊपर होता है. राष्ट्रीय" या सार्वजनिक ऋण वह ऋण है जो विभिन्न सरकारी संस्थानों (संघीय सरकार, राज्यों शहरों...) के ऊपर होता है. व्यापार ऋण वह ऋण है जो व्यापार के ऊपर होता है. वित्तीय ऋण वह ऋण है जो वित्तीय क्षेत्र (एक वित्तीय संस्थान से अन्य पर) के ऊपर होता है. कुल ऋण इन सभी प्रकार के ऋणों का योग होता है, सिवाए वित्तीय ऋण के, ताकि दुहरे लेखाकरण को रोका जा सके. इन विभिन्न प्रकार के ऋणों की गणना ऋण/ जीडीपी (GDP) अनुपात में की जा सकती है. ये अनुपात ऋणग्रस्तता में परिवर्तनों की गति एवं देय ऋण के आकार के आंकलन में सहायक होते हैं. उदाहरण के लिये, यू एस ए में उच्च उपभोक्ता ऋण एवं निम्न सार्वजनिक ऋण होते हैं, जबकि पूर्वी यूरोपीय देशों में इसके विपरीत होता है.

निजी एवं सार्वजनिक अभिकर्ताओं हेतु ऋण के लेखाकरण में अंतर है. यदि एक निजी अभिकर्ता कुछ समय बाद भुगतान का वचन देता है, तो वह ऋण होता है एवं यह ऋण सार्वजनिक अभिकर्ताओं द्वारा प्रवर्तन योग्य होते हैं. यदि एक सार्वजनिक निकाय यह कानून पारित करता है कि वह कुछ समय बाद कुछ भुगतान करेगा, तो उसे बाद में कानून में परिवर्तन (एवं भुगतान न करने) का अधिकार होता है. इसीलिये, उदाहरणत:, सरकार द्वारा सेवानिवृत्ति हेतु धन के भुगतान को सार्वजनिक ऋण आंकलन में प्रदर्शित नहीं किया जाता, जबकि निजी कंपनियों द्वारा सेवानिवृत्ति के समय दिये जाने वाले धन को प्रदर्शित किया जाता है.

प्रतिभूतिकरण[संपादित करें]

प्रतिभूतिकरण तब घटित होता है जब एक कंपनी परिसंपत्तियों एवं प्राप्ति योग्यों को एक समूह में रखती है तथा एक ट्रस्ट के माध्यम से बाज़ार में इकाईयों में बेचती है. नकदी प्रवाह सहित किसी भी परिसंपत्ति में प्रतिभूतिकरण हो सकता है. इन प्राप्तियों से प्रवाहित होने वाली नकदी का प्रयोग इन यूनिटों के धारकों को भुगतान हेतु किया जाता है. कंपनियां अक्सर यह कार्य इन परिसंपत्तियों को अपने तुलन पत्रों से हटाने एवं परिसंपत्ति के नकदीकरण में करती हैं. यद्यपि ये परिसंपत्तियां तुलन पत्र से "हटा" दी गयी है एवं ट्रस्ट की जिम्मेदारी मानी जाती है, इससे कंपनी की भागीदारी समाप्त नहीं होती. अक्सर कंपनी ट्रस्ट में अपनी रुचि बनाये रखती है जिसे "इंटरैस्ट ओनली स्ट्रिप" या "फर्स्ट लॉस पीस" कहा जाता है. ट्रस्ट द्वारा किया जाने वाला कोई भी भुगतान नियमित निवेशकों के लिए इस ब्याज से पूर्व किया जाना चाहिये. यह निवेशक को कुछ हद तक जोखिम से बचाता है तथा प्रतिभूतिकरण को और आकर्षक बनाता है. उपरोक्त वर्णित से यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या ये परिसंपत्तियाँ वास्तव में तुलन पत्र पर नहीं होती तथा इस ब्याज पर कंपनी को हानि पहुँचा रही हैं.

ऋण, मुद्रास्फीति एवं विनिमय दर[संपादित करें]

जैसाकि नीचे उल्लिखित है, ऋण को सामान्यतः एक विशेष आर्थिक मुद्रा में अंकित किया जाता है, एवं अतः उस मुद्रा के मूल्यांकन में परिवर्तन होने से ऋण का प्रभावी आकार भी परिवर्तित हो सकता है. यह मुद्रास्फीति या मुद्रा अपस्फीति के कारण हो सकता है अतः यह ऋण प्राप्तकर्ता और ऋणदाता द्वारा समान मुद्रा के प्रयोग किये जाने पर भी हो सकता है. अतएव यह आवश्यक है कि अग्रिम रूप से आस्थगित भुगतान के मानकों पर सहमति हो, ताकि उतार चढ़ाव की सीमा पर भी स्वीकारयोग्य सहमति होगी. अतः उदाहरणतः "यू एस डॉलर अंकित" ऋण पर सहमति सामान्य[तथ्य वांछित] है.

ज़्यादातर औद्योगीकृत राष्ट्रों में बैंक खातों में धन का एक बड़ा भाग ऋण के रूप में है (इस पर विचार विमर्श हेतु धन, विस्तृत धन, एवं मांग जमाएं देखें). अतएव, मुद्रास्फीति, मुद्रा अपस्फीति, धन आपूर्ति एवं ऋण के मध्य एक संबंध होता है. औद्योगीकृत राष्ट्र की संपूर्ण अर्थव्यवस्था द्वारा घोषित मूल्य का भंडार एवं इस पर कर रोपण की राज्य की क्षमता विदेशी ऋण प्राप्तकर्ता के लिये पुनर्भुगतान की गारंटी के रूप में कार्य करती है, चूंकि विश्वभर में कई जगहों पर औद्योगिक सामग्रियों की भारी मांग है.

मुद्रास्फीति सूचकांकित ऋण[संपादित करें]

खाते की मुद्रास्फीति सूचकांकित इकाईयों से संबद्ध ऋण प्राप्ति एवं पुनर्भुगतान व्यवस्थायें संभव हैं एवं कुछ देशों में प्रयोग होती हैं. उदाहरण के लिये, यू एस सरकार दो प्रकार के मुद्रास्फीति सूचकांकित बांडों को जारी करती है, कोषालय मुद्रास्फीति - संरक्षित प्रतिभूतियाँ (टीआईपीएस (TIPS)) एवं आई - बांड्स. ये सबसे सुरक्षित उपलब्ध निवेश तरीकों में से एक हैं, क्योंकि जोखिम का एकमात्र मुख्य स्त्रोत - जो कि मुद्रास्फीति है - का उन्मूलन हो गया है. कई अन्य सरकारें भी इसी तरह के बांडों को जारी करती हैं, एवं कुछ तो यू एस सरकार से भी पूर्व कई वर्षों से करती रही हैं.

लगातार उच्च मुद्रास्फीति वाले देशों में, बैंकों के सामान्य कर्ज को भी मुद्रास्फीति सूचकांकित किया जा सकता है.

ऋण वरीयता, जोखिम तथा निरस्तीकरण[संपादित करें]

जोखिम मुक्त ब्याज दर[संपादित करें]

बड़ी कंपनियों अथवा सरकार जैसी स्थिर वित्तीय संस्थाओं को ऋण देना प्रायः "जोखिम मुक्त" अथवा "निम्न जोखिम" का माना जाता है तथा यह "जोखिम मुक्त ब्याज दर" पर दिया जाता है. इसका कारण यह है कि ऋण तथा ब्याज में चूक होने की अत्यल्प संभावना होती है. इस तरह के जोखिम मुक्त ऋण का एक अच्छा उदाहरण यू एस कोषालय प्रतिभूति है, यह अर्थशास्त्र में उपलब्ध निम्नतम प्रतिफल का उत्पादन करता है, परन्तु निवेशकों को निश्चित प्रत्याशाओं का दिलासा (लगभग पूरी तरह से) होता है कि यू एस कोषालय अपने ऋण इन्स्ट्रूमेंट में चूक नहीं करेगा. जोखिम मुक्त दर का सामान्य रूप से भी प्लवमान ब्याज दरों को निर्धारित करने में भी प्रयोग होता है, जिसकी साधारणतया जोखिम मुक्त ब्याज दर तथा ऋण प्राप्तकर्ता की साख क्षमता पर आधारित ऋणदाता को बोनस में जोड़कर गणना की जाती है (अन्य शब्दों में, उसके द्वारा वापसी में चूक का जोखिम तथा ऋणदाता के ऋण का डूबना). वास्तव में, कोई भी ऋण सत्यता में "जोखिम मुक्त" नहीं होता, परन्तु "जोखिम मुक्त" दर के ऋणियों की वापसी में चूक बहुत कम प्रत्याशित होती है.

यद्यपि यदि ऋण की अवधि में मुद्रा की वास्तविक कीमत परिवर्तित होती है, तब वापस किये गये धन की क्रय शक्ति में ऋण के प्रारंभ की अपेक्षा काफी अन्तर होगा. इसलिये, व्यावहारिक निवेश के दृष्टिकोण से "जोखिम मुक्त" अथवा "निम्न जोखिम" ऋणों में अभी भी काफी जोखिम मौजूद है. मुद्रा की वास्तविक कीमत मुद्रास्फीति के कारण अथवा विदेशी निवेश के मामले में, विनिमय दर के उतार चढ़ाव के कारण परिवर्तित हो सकती है.

अन्तर्राष्ट्रीय समझौता बैंक केन्द्रीय बैंकों का एक संगठन है जो यह निर्धारित करता है, कि दिये गये ऋण के विरुद्ध बैंक को कितनी पूंजी अपने पास रखनी है.

वरीयता तथा साख योग्यता[संपादित करें]

मूडीज़, फिच रेटिंग इंक, ए.एम. बेस्ट तथा स्टेण्डर्ड तथा पूअर्स जैसी वरीयता संस्थाओं द्वारा सरकारों तथा निजी निगमों, दोनों के द्वारा उधार लिये गये विशिष्ट बॉन्ड ऋणों को वरीयता प्रदान की जाती है. सरकारी अथवा स्वयं कम्पनी को भी उनकी अलग वरीयता दी जायेगी. ये संस्थाऐं ऋणी के दायित्वों का सम्मान करने के लिये उसकी क्षमता का मूल्यांकन करती हैं तथा उसके अनुसार उसे साख वरीयता देती हैं. मूडीज़ एएए एए ए बीएए बीए बी सीएए सीए सी शब्दों का प्रयोग करती है जिसमें एए-सीएए वरीयता 1-3 संख्या के योग्य होता है. Munich Re, को उदाहरण के लिये, वर्तमान में एए3 2004 के अनुसार  का दर्जा प्राप्त है. एसएंडपी तथा अन्य मूल्यांकन संस्थायें बड़े अक्षर तथा +/- विशेषकों का प्रयोग करते हुये थोड़ी अलग प्रणाली अपनाती हैं.

वरीयता में परिवर्तन कम्पनी पर अत्यधिक प्रभाव डालता है, चूंकि उसके पुनर्वित्त की लागत उसकी साख योग्यता पर निर्भर करती है. बीएए/बीबीबी (मूडीज़/एसएंडपी (S&P)) से नीचे के बॉन्ड बेकार- अथवा अत्यधिक जोखिम बॉण्ड कहलाते हैं. उनमें चूक होने के अत्यधिक जोखिम (बीए के लिये लगभग 1.6 %) की क्षतिपूर्ति उच्चतर ब्याज भुगतानों से की जाती है. बुरा कर्ज वह ऋण होता है जो ऋणी द्वारा वापस (आंशिक अथवा पूर्ण रूप से) नहीं किया जा सकता. ऋणी को उसके कर्ज के लिये दोषी कहा जाता है. इस तरह के ऋणों को बारंबार पुनः पैकेज किया जाता है तथा अंकित मूल्य (फेस वैल्यु) से नीचे बेचा जाता है. बेकार बॉन्डों को खरीदना जोखिम भरा माना जाता है परन्तु निवेश का काफी लाभप्रद स्वरुप है.

निरस्तीकरण[संपादित करें]

दीवालियापन के बिना यह विरले ही होता है कि ऋण को पूरी तरह से अथवा आंशिक रूप से छोड़ दिया जाये. कुछ संस्कृतियों में परंपरा की यह मांग होती है कि समाज के समूहों के मध्य प्रणालीगत असमानताओं की रोकथाम के लिए इसे नियमित आधार पर (प्रायः वार्षिक) किया जाये या कोई भी जो ऋण को रखने में एवं जबरदस्ती पुनर्भुगतान में विशेषज्ञ बन रहा हो - देखें, ऋण राहत. इसका एक उदाहरण बुक ऑफ लेविटिकस में वर्णित बिब्लिकल जुबिली वर्ष है.

अंग्रेजी कानून के अन्तर्गत जब ऋणदाता को ऋण को त्यागने के लिये धोखा दिया जाता है, तो यह अपराध है- थेप्ट एक्ट 1978 देखें.

अन्तर्राष्ट्रीय तृतीय विश्व का ऋण ऐसे पैमाने पर पहुंच गया है कि कई अर्थशास्त्री इस बात से संतुष्ट है कि विकासशील राष्ट्रों के सम्बन्ध में वैश्विक इक्विटी को बहाल करने के लिये ऋण रद्दीकरण ही एक मात्र उपाय है.

ऋण के प्रभाव[संपादित करें]

ऋण व्यक्तियों तथा संगठनों को वह सब करने की अनुमति देते हैं जो वे अन्यथा करने में असमर्थ होते है अथवा उन्हें अनुमति नहीं होती. साधारणतः औद्योगीकृत राष्ट्रों में व्यक्ति इसका प्रयोग मकान, कारें तथा कई अन्य वस्तुऐं खरीदने में करते हैं जो अधिक मंहगी होने के कारण उपलब्ध नकद पैसे से नहीं खरीद पाते. कम्पनियां भी ऋण का प्रयोग कई तरह से अपनी परिसम्पत्ति में निवेश को प्रभावी करने के लिये करती हैं जिससे उनकी इक्विटी की वापसी प्रभावी हो. यह प्रभाव, इक्विटी के लिये ऋण का अनुपात, निवेश के जोखिम को निर्धारित करने के लिये महत्वपूर्ण समझा जाता है; प्रत्येक इक्विटी पर जितना ऋण होगा, उतना अधिक यह जोखिम भरा होगा. कंपनियों तथा व्यक्तियों दोनों के लिये यह बढ़ा हुआ जोखिम कमजोर परिणाम का कारण बन सकता है, क्योंकि ऋण की देखभाल की लागत बाहरी घटनाओं (आय की कमी) अथवा आन्तरिक कठिनाईयों (संसाधनों का कमजोर प्रबंधन) के कारण भुगतान की क्षमता से अधिक बढ़ सकती है.

ऋण संचयन की अधिकता को आर्थिक समस्याओं को बदतर बनाने हेतु दोषी ठहराया गया है.[3] उदाहरण के लिये अत्यधिक अवनमन ऋण के प्रारंभ से पूर्व/जीडीपी (GDP) अनुपात बहुत अधिक था. आर्थिक एजेन्ट भारी ऋणी थे. भविष्य की वापसियों पर अत्यधिक प्रत्याशा के समकक्ष, यह अत्यधिक ऋण, शेयर बाज़ार में परिसम्पत्ति बुलबुलों के साथ रहा. जब प्रत्याशा में सुधार किया गया, मुद्रा अपस्फीति तथा साख चरमराहट प्रारंभ हुई. मुद्रा अपस्फीति ने प्रभावी रूप से ऋण को अधिक मंहगा कर दिया तथा, जैसा कि फिशर ने स्पष्ट किया है, इससे मुद्रा अपस्फीति पुनः प्रभावी हुई क्योंकि अपने ऋण स्तर को कम करने के लिये, आर्थिक एजेन्टों ने उनके उपभोग तथा निवेश को कम कर दिया. मांग की कमी ने व्यापार गतिविधियों को कम कर दिया एवं और बेरोजगारी पैदा की. अधिक प्रत्यक्ष अर्थों में मुद्रा अपस्फीति के कारण बढ़ी हुई ऋण लागत तथा घटी हुई मांग, दोनों के कारण अधिक दिवालियापन भी पैदा हुआ.

कुछ संगठनों के लिये उधारी तथा पुनर्भुगतान व्यवस्थाओं के वैकल्पिक प्रकारों में प्रवेश करना संभव होता है जिससे दिवालियापन नहीं होगा. उदाहरण के लिये कम्पनियां कई बार ऋणों को उनके द्वारा उधार ली गई इक्विटी में बदल देती है. इस मामले में, ऋणदाता को ऋण के समकक्ष कुछ तथा ऋणी के डिविडेंड एवं कैपिटल गेन के रूप में ब्याज को प्राप्त करने की आशा रहती है. "पुनर्भुगतान", अतएव, ऋणी द्वारा की गयी आय के आनुपातिक होता है एवं इसलिये अपने आप में दीवालियापन का कारण नहीं बनता. इस तरह से एक बार ऋण के परिवर्तन हो जाने के बाद इसे ऋण नहीं कहा जायेगा.

ऋण के विरुद्ध तर्क[संपादित करें]

कुछ व्यक्ति व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, कार्पोरेट तथा शासकीय स्तर पर ऋण के विरुद्ध एक इंस्ट्रूमेंट तथा संस्था के रूप में तर्क करते हैं. इस्लाम में ब्याज के साथ उधार देना आज भी वर्जित है जबकि कैथोलिक चर्च ने इसे 1882 के बाद से ही अनुमति दी है, तथा टोरा ने कहा है कि सभी ऋणों को प्रत्येक सात सालों तथा प्रत्येक पचास सालों (जुबली वर्ष में, जैसा कि बुक ऑफ लेवीटिकस में लिखा गया है) में मिटा देना चाहिये.

यदि समय के साथ ऋण का पुनर्भुगतान नहीं किया गया तो ब्याज के साथ यह बढ़ता जायेगा. इस प्रभाव को सूदखोरी कहा जाता है, जबकि अन्य संदर्भो में सूदखोरी शब्द को स्वीकृत जोखिम के लिये वाजिब लाभ की अधिकता में, केवल ब्याज की अत्यधिक दर के रूप में संदर्भित किया जाता है.

अन्तर्राष्ट्रीय कानूनी विचार में, घृणित ऋण वह ऋण होता है जो शासन तंत्र द्वारा उन उद्देश्यों के लिये प्रयोग किया जाता है जो राज्य हित में न हो. इस तरह के ऋणों को इस सिद्धांत के द्वारा उस शासनतंत्र द्वारा लिये गये व्यक्तिगत ऋणों के रूप में समझा जाता है तथा न कि राज्य के ऋण के रूप में.

उच्च ब्याज दरों के साथ किसी अर्थ व्यवस्था में, इक्विटी निवेश पर अधिक लचीले डिविडेन्ड की तुलना में किसी व्यापार के लिये अधिक मंहगे होंगे. किसी संघर्षरत व्यापार के लिये इक्विटी निवेश के माध्यम से वित्त प्रदान करना अधिक आसान होता है क्योंकि कठिन परिस्थिति में डिविडेन्ड का भुगतान रोकना संभव होता है.

स्तर तथा बहाव[संपादित करें]

वैश्विक ऋण खरीद साल दर साल 4.3 % बढ़ी है जो 2004 के दौरान $ 5.19 ट्रिलीयन तक पहुंची है. यह अपेक्षा की जाती है कि आने वाले वर्षो में यह और बढेगी यदि विश्वव्यापी लाखों लोगों में खर्च करने की आदत ऐसी ही बनी रही, जैसी आज है.

यह भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. जोसेफ स्वानसन और पीटर मार्शल, हौलिहान लोकी व लींडन नोरले, किर्कलैंड और एलिस अंतर्राष्ट्रीय एलएलपी (LLP) (2008). अ प्रेकटिशनर'ज़ गाइड टू कोरपोरेट रीस्ट्रकचरिंग पृष्ठ 5. सिटी एंड फिनेंशिअल पब्लीशिंग, पहला संस्करण आईएसबीएन (ISBN): 9781905121311
  2. औपचारिक रूप से, डी % की छूट का परिणाम है, d/(1-d)%. का प्रभावी ब्याज.
  3. 5 Ways to Get Out of Debt Faster. Kiplinger. 2007. http://www.webcastr.com/videos/informational/5-ways-to-get-out-of-debt-faster.html. 

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]