घोसला

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
टोकरीनुमा घोसला

घोसला किसी जन्तु की शरणस्थली है जिसमें वह अपने अण्डे देती है एवं बच्चों का पालनपोषण करती है। जन्तु अपना घोसला घास, टहनियों एवं पत्ती आदि से बनाते हैं। घोसले मुख्यत: चिड़ियों द्वारा बनाये जाते हैं किन्तु कुछ अन्य जन्तु (जैसे गिलहरी, मछली, कीट आदि) भी घोसले बनाते हैं। प्राय: अलग-अलग जाति के प्राणि अलग-अलग प्रकार का घोसला बनाते हैं।

उद्देश्य[संपादित करें]

नीड़निर्माण का मुख्य उद्देश्य अंडे और बच्चों को सुरक्षा प्रदान करना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए दो बातें मुख्य हैं, प्रथम अंडों अथवा बच्चों का शत्रुओं की दृष्टि से ओझल रहना और दूसरे शत्रु की पहुँच के बाहर होना। इन दोनों बातों की पूर्ति बिल या किसी प्रकार के झोंझ में अंडे देने से सुगमता से हो जाती है। जो पक्षी ऊँचे पेड़ों, इमारतों या ढालू चट्टनों अथवा दलदली स्थानों में अंडे देते हैं, उनमें शत्रु की पहुँच के बाहर होनेवाली बात तो पूरी हो जाती है, किंतु जो चिड़ियाँ जमीन पर अंडे देती हैं, उनके अंडे और बच्चे छिपने के ही ऊपर निर्भर होते हैं। यह दो प्रकार से होता है :

  • अंडे और बच्चे किसी वनस्पति की झोंझ में दिए जाय अथवा
  • उनका रंग ऐसा हो जो इर्द गिर्द की अन्य वस्तुओं के रंग से मिलता जुलता हो।

नीड़ के प्रकार[संपादित करें]

घोसले में शिशु ब्लू जे (Blue Jay)

यदि हम मान लें कि चिड़ियों के पूर्वज वृक्षवासी थे, इसलिए उनका अंडा देने का स्थान पेड़ के किसी कोटर में अथवा डालियों पर था, तो अनेक चिड़ियों को आज भी यही पसंद है। किंतु फिर भी नीड़निर्माण में बहुत ही विकास हुआ है और विभिन्न पक्षियों के नीड़ में बहुत ही विविधता पाई जाती है। भारत मे पक्षियों के मुख्यत: निम्न प्रकार के घोंसले मिलते हैं :

साधारण घास पात के टुकड़ों (sniple scrapes) का घोंसला[संपादित करें]

तीतर, बनमुर्गी और अन्य शिकार की चिड़ियाँ मिट्टी में, गड्ढे बनाकर घास, फूस और पत्ते इत्यादि बिछा देती हैं और कुररी तथा टिटिभा (lapwing) तो केवल यों ही मिट्टी या बालू हटाकर गड्ढे में बिना कुछ बिछाए ही अंडे देती हैं। इनके अंडों को अभिलेपन रंग (obliterative colouration) द्वारा सुरक्षा प्राप्त होती हैं।

टहनियों के घोंसले[संपादित करें]

कौए, चील, पेडुकी, गिद्ध, जलकाग बगुले इत्यादि पेड़ों पर, मकान के ऊपर या चट्टानों में लकड़ी की, टहनियों का एक चबूतरानुमा घोंसला, जिसका मध्य भाग प्यालेनुमा होता है, बनाते हैं और इस प्याले में घास, फुस, चिथड़े, चिड़ियों के पर इत्यादि का मुलायाम बिस्तर बिछा देते हैं।

वृक्ष के कोटरों में घोंसले[संपादित करें]

कुछ चिड़ियों के घोंसले हरे या सूखे वृक्षों में छिद्र बनाकर बने होते हैं और उनमें या तो थोड़ा मुलायम अस्तर होता है या बिना किसी अस्तर (lining) के ही होते हैं। रामगंगरा, पीलक, जंगली चिरी (yellow throated sparrow) कठफोड़वा, वसंता (barbet), धनेश, उल्लू, कुछ मैना और अधिकांश स्थानीय बतख इस प्रकार के घोंसले बनाते हैं। कठफोड़वा, सुग्गे और वसंता पहले पेड़ों पर खोडर बनाते हैं और बाद में उसी में घोंसला बनाते हैं। आगे चलकर इन खोडरों का उपयोग अन्य चिड़ियाँ भी कर लेती है। स्थानीय बतखों में जल के किनारे पेड़ों के प्राकृतिक कोटरों में अंडे देने की आदत होती है। ये दक्षिणी - पश्चिमी मानसून के समय अंडे देती हैं। पेड़ों पर अंडे देने से इनके अंडों की सुरक्षा रहती है, क्योंकि बरसात में झील या तालाब में पानी बढ़ने पर भी ऊँचे पर पानी पहुँचने का खतरा नहीं रहता और बच्चे माँ बाप द्वारा केवल घोंसले से ढकेल दिए जाने मात्र से ही जल में पहुँच जाते हैं। जो चिड़ियाँ स्वयं कोंटर बनाती हैं उन्हें प्राकृतिक खोडर पर निर्भर नहीं रहना पड़ता और वे जहाँ भी उचित समझती हैं, वहाँ इच्छानुकूल छिद्र बना लेती हैं।

धनेश चिड़िया जब छिद्र में अंडा देती है, तब नर मादा को उसमें बिठाकर छिद्र का द्वार बंद कर देता है, केवल मादा की चोंच निकलने भर छिद्र खुला रहता है, जिसके द्वारा नर मादा को भोजन पहुँचाता रहता है।

मिट्टी के कगारों में बिल खोदकर निर्मित नीड़[संपादित करें]

जलवासी चिड़ियों में से कुछ नदी के किनारे के कगारों की मिट्टी में सुरंग बनाकर अथवा मकानों या चट्टानों की दरारों इत्यादि में धोंसला बनाती है। उदाहरणार्थ पतरींगा, किलकिला, हुदहुद (hoopoe) कगारों की मिट्टी में जलधारा के क्षितिज के समांतर सुरंग बनाकर घोंसला बनाती है। बिल खोदने में चिड़िया अपनी चोंच का सहारा लेती है। चिड़िया चोंच से मिट्टी खोदती है और निकले मिट्टी को पैरों से पीछे की ओर फेंकती जाती है। सुरंग की लंबाई कुछ सेंटीमीटर से लेकर कई मीटर तक होती है और बिल का अंतिम सिरा कुछ टेढ़ा और बिजली के बल्ब की भाँति फैला होता है। इसी लट्टूनुमा भाग में अंडे दिए जाते हैं।

कीचड़ के घोंसले या ऐसे घोंसले जिनमें कीचड़ का बाहूल्य होता है[संपादित करें]

कस्तुरिका (whistling thrust), कस्तूरा (black bird), अबाबलील, चटान अबाबील (martin) इसी प्रकार के घोंसले बनाती हैं।

घास के प्यालानुमा घोंसले तथा शाखाओं के फूटने के स्थान (forks) पर साधारणतया मकड़ी के जाले से प्लास्टर किया हुआ घोंसला[संपादित करें]

शाउबोगी (iora), चकदील (fanitail) और अन्य पतिरंग (flycatener), पीलक, मज्जिका, बुलाल चश्म (minivet), कूजिनी (reed warbler), कोकिल, लेढोरा या पचनक (shrikes) इत्यादि उपर्युक्त प्रकार के घोंसले बनाती हैं। चिड़ियाँ भवननिर्माण की सामग्री को आपस में कसकर बाँध रखने के लिए मकड़ी के जाले का प्रयोग करती हैं। नीड़निर्माण के इस साधन को ये चिड़ियाँ अपनी चोंच में लपेटकर इकट्ठा करती हैं और घोंसलें को ठीक स्थान पर दृढ़ बने रहने और इधर उधर डिगने और अव्यवस्थित होने से बचाने के लिए इसको घोंसले के चारों तरफ लपेट देती हैं।

टहनियों, घास अथवा मूलरोमों (root-lets) के गुंबदनुमा या गेंदाकार घोंसले[संपादित करें]

इनके पाश्र्व में प्रवेशद्वार होता है मुनिया, रक्तोदर गुपिल (rufous belied babbler) इसी प्रकार के घोंसले का निर्माण करती हैं और उसमें चिड़ियों के पर इत्यादि का मुलायम बिस्तर बिछा देती हैं।

लटकता हुआ घोंसला[संपादित करें]

बया, शकरखोरा, पुष्पान्वेषी (flower pecker) इसी प्रकार के घोंसले बनाती हैं।

आयताकार बटुआनुमा (Loofah-like) घोंसलता[संपादित करें]

ये घोंसले घास की लंबी डंठलों अथवा छोटी मोटी झाड़ियों से लटके होते हैं। फटकी (wrenwarbler) इसी प्रकार का घोंसला बनाती है।

पत्तियों के सिले हुए घोंसले[संपादित करें]

दर्जिन चिड़िया (tailor bird), चिकुरकूजिनी (Franklin's wren warbler) तथा काली फटकी या भस्म चिकुरकूजिनी (ashy wrenwarbler) पत्तियों को सीकर एक कीपनुमा (funnel shaped) घोंसला बना लेती हैं ।

उपर्युक्त प्रकार के घोंसलों के अतिरिक्त अन्य विविध प्रकार के घोंसले भी चिड़ियाँ बनाती हैं। भक्ष्य-नीड़ दुर्बलिका बतासी (edible nest swiftlet) सामूहिक रूप से एक बस्ती बनाकर अंडे देती है। इसका घोंसला अद्र्ध प्यालानुमा होता है जिसका आधा भाग चट्टान के अंधेरे कंदरे (grottos) अथवा समुद्री द्वीपों की गुफाओं की दीवार से चिपका होता है। इस प्रकार के घोंसले चिड़ियों को लार और परों के सम्मिश्रण से बने होते हैं।

आस्ट्रेलिया और मलय प्रायद्वीप एवं द्वीपसमूहों की दीर्घचरण (megapode) नामक चिड़िया जमीन को कुरेद कुरेदकर मिट्टी का एक ढेर लगा देती है, जो कुछ वर्षों में बहुत बड़ा टीला बन जाता है। कभी कभी इस टीले की ऊँचाई 4.5 मीटर और परिधि 27.28 मीटर तक पहुँच जाती है। दीर्घचरण चिड़िया इस टीले के केंद्र में एक गहरा बिल बनाकर, इसी में अंडे देती है और बिल को थोड़ी मिट्टी से ढँक देती है। इस चिड़िया की कुछ जातियाँ टीले नहीं बनातीं और केवल सतह पर ही गड्ढें बनाकर अंडे देती हैं।

कुछ चिड़ियाँ खुली सतह पर अंडे देती हैं और कुछ पौधों अथवा झाड़ियों के नीचे, जमीन पर। जमीन पर नीड़ बनानेवाली चिड़ियों की सूची में शिकार की चिड़ियाँ, जैसे बतख, गंगचिल्ली (gulls), कुररी और इसी प्रकार की अन्य चिड़ियाँ हैं। टिट्टिभ अपने अंडे बिल्कुल खुली जमीन पर देती हैं।

कुछ चिड़ियाँ सूखी जमीन पर अंडे देती हैं, तो कुछ ऐसी भी हैं जो दलदली स्थानों में, अथवा छिछले जलवाले पोखरे या जलधाराओं में उगे पौधों के ऊपर, अंडे देती हैं। पनडुब्बी (gerbes) चिड़िया जल में एसा नीड़ निर्माण करती है जो वास्तव में तैरता रहता है।

राजहंस चिड़िया का नीड़ कीचड़ का बना होता है। इस प्रकार का नीड़ निर्माण करनेवाली चिड़ियों में मुख्यत: जल चिड़ियाँ होती हैं।

किटीवेक धोमरा (kittiwake gull), शूलकाक (gannet), रेजरबिल (razorbill) और गिलमाट (guillmot) समुद्र के किनारे भृगुओं (cliffs) में नीड़निर्माण करती है और अंडे देती हैं। मादा जलकाग अपने अंडे समुद्र के किनारे के भृगुओं के आधार या छोटे द्वीपों की चट्टानों पर अंडे देती हैं। यहाँ भी कुछ तो गुफाओं में और कुछ जाति की चिड़ियाँ यों ही, खुली चट्टानों पर अंडे देती हैं।

गौरैया, अबाबील, चटान अबाबील (martin), तीलयक (starling), चोरकौवा (jackdaw), बतासी और करैल (barn owl) मनुष्य द्वारा निर्मित इमारतों में अंडे देती हैं।

कुछ पक्षी अपना अपना क्षेत्र स्थापित कर, जोड़े बाँधकर, अलग अलग घोंसले बनाते हैं, जैसे भुजंगा, किंतु कुछ पक्षी समूह में घोंसले बनाते हैं, जैसे बया (weaverbird), अबाबील (cliff swallows), साधारण और भक्ष्य-नीड़-दुर्बलिका और बगुले इत्यादि।

घोंसले का ढाँचा[संपादित करें]

प्रत्येक जाति की चिड़ियों के घोंसले का अपना विशेष ढाँचा होता है। घोंसला बनाने का यह कार्य पक्षियों में जनमजात गुण या सहज ज्ञान (instinctive) होता है, क्योंकि प्रयोगों द्वारा देखा गया है कि जो चिड़ियाँ किसी प्रयोगशाला में पैदा की गईं, वे भी निर्धारित समय पर अपनी जाति के परंपरानुसार ढाँचे का ही घोंसला बनाती हैं।

एक ही जाति की चिड़ियाँ कभी कभी विभिन्न प्रकार के स्थानों पर भी अंडे देती है। इस प्रकार उपर्युक्त स्थान का चुनाव स्थानीय परिस्थितियों पर एवं उस स्थान में नीड़निर्माड़ की उपलब्ध सामग्री पर निर्भर करता है।

कभी कभी कोई चिड़िया अपनी जाति की परंपरा के विपरीत बिल्कुल भिन्न स्थान पर नीड़निर्माण करती है, यथा नीलसिर (mallard) जाति की चिड़ियाँ लाक्षणिक रूप से जमीन पर ही अंडे देती हैं, किंतु कभी कभी ये पेड़ों पर भी अंडे दे देती हैं। फिर भी इतना अवश्य है कि प्रत्येक जाति की चिड़ियों के नीड़निर्माण का एक विशेष ढंग और विशेष स्थान होता है।

नीड़निर्माण का दायित्व[संपादित करें]

अधिकांश पक्षियों में नीड़निर्माण का संपूर्ण दायित्व नर पर ही होता है, किंतु कुछ ऐसे पक्षी भी है जिनमें नर थोड़ा भाग लेता है अथवा बिल्कुल ही भाग नहीं लेता। कुछ जाति के पक्षी एक ही घोंसले को दुबारा काम में नहीं लाते, किंतु कुछ अपने पुराने नीड़ की ही मरम्मत कर बार बार प्रयोग में लाते हैं। कुछ पक्षी दूसरे पक्षियों द्वारा त्यक्त नीड़ का उपयोग करते हैं।

पक्षियों में कुछ तो ऐसे होते हैं जिन्हें सफाई का बड़ा ध्यान रहता है, किंतु कुछ ऐसे हैं जिन्हें हुदहुद की तरह गंदगी ही अधिक प्रिय है। नीड़निर्माण के विषय में उनकी प्रकृति एक जैसी नहीं होती। कुछ बड़े बेढौल घोंसले बनाते हैं, जैसे कौवे, किंतु कुछ इनके बनाने में बड़ी कारीगरी प्रदर्शित करते हैं, जैसे जलमुर्गी।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]