कामलिप्सा

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कामलिप्सा या कामवासना या लिबिडो (Libido) का अर्थ है- 'मैथुन की तीव्र इच्छा'। कामवासना व्यक्ति की जैविक, मानसिक तथा सामाजिक कारकों पर निर्भर होता है। जैविक रूप से ऐसा माना जाता है कि टेस्टोस्टेरोन आदि हार्मोनों का स्तर कामेच्छा को प्रभावित करता है। कामेच्छा, शरीर के स्वास्थ्य की स्थिति पर भी निर्भर है। इसके अलावा दवा, जीवनशैली तथा सम्बन्धों (रिलेशनशिप) आदि का भी कामेच्छा पर प्रभाव पड़ता है।

कामवासना ओर प्रेम[संपादित करें]

कामवासना अंश है प्रेम का, अधिक बड़ी संपूर्णता का। प्रेम उसे सौंदर्य देता है। अन्‍यथा तो यह सबसे अधिक असुंदर क्रियाओं में से एक है। इसलिए लोग अंधकार में कामवासना की और बढ़ते है। वे स्‍वयं भी इस क्रिया का प्रकाश में संपन्‍न किया जाना पसंद नहीं करते है। तुम देखते हो कि मनुष्‍य के अतिरिक्‍त सभी पशु संभोग करते है दिन में। कोई पशु रात में कष्‍ट नहीं उठाता; रात विश्राम के लिए होती है। सभी पशु दिन में संभोग करते है; केवल आदमी संभोग करता है रात्रि में। एक तरह का भय होता है कि संभोग की क्रिया थोड़ी असुंदर है। और कोई स्‍त्री अपनी खुली आंखों सहित कभी संभोग नहीं करती है। क्‍योंकि उनमें पुरूष की अपेक्षा ज्‍यादा सुरुचि-संवेदना होती है। वे हमेशा मूंदी आंखों सहित संभोग करती है। जिससे कि कोई चीज दिखाई नहीं देती। स्‍त्रियां अश्‍लील नहीं होती है, केवल पुरूष होते है ऐसे।

इसीलिए स्‍त्रियों के इतने ज्‍यादा नग्‍न चित्र विद्यमान रहते है। केवल पुरूषों का रस है देह देखने में; स्‍त्रियों की रूचि नहीं होती इसमें। उनके पास ज्‍यादा सुरुचि संवेदना होती है। क्‍योंकि देह पशु की है। जब तक कि वह दिव्‍य नहीं होती, उसमें देखने को कुछ है नहीं। प्रेम सेक्‍स को एक नयी आत्‍मा दे सकता है। तब सेक्‍स रूपांतरित हो जाता है—वह सुंदर बन जाता है। वह अब कामवासना का भाव न रहा, उसमें कहीं पार का कुछ होता है। वह सेतु बन जाता है।

तुम किसी व्‍यक्‍ति को प्रेम कर सकते हो। इसलिए क्‍योंकि वह तुम्‍हारी कामवासना की तृप्‍ति करता है। यह प्रेम नहीं, मात्र एक सौदा है। तुम किसी व्‍यक्‍ति के साथ कामवासना की पूर्ति कर सकते हो इसलिए क्‍योंकि तुम प्रेम करते हो। तब काम भाव अनुसरण करता है छाया की भांति, प्रेम के अंश की भांति। तब वह सुंदर होता है; तब वह पशु-संसार का नहीं रहता। तब पार की कोई चीज पहले से ही प्रविष्‍ट हो चुकी होती है। और यदि तुम किसी व्‍यक्‍ति से बहुत गहराई से प्रेम किए चले जाते हो, तो धीरे-धीरे कामवासना तिरोहित हो जाती है। आत्‍मीयता इतनी संपूर्ण हो जाती है कि कामवासना की कोई आवश्‍यकता नहीं रहती। प्रेम स्‍वयं में पर्याप्‍त होता है। जब वह घड़ी आती है तब प्रार्थना की संभावना तुम पर उतरती है।

ऐसा नहीं है कि उसे गिरा दिया गया होता है। ऐसा नहीं है कि उसका दमन किया गया, नहीं। वह तो बस तिरोहित हो जाती है। जब दो प्रेमी इतने गहने प्रेम में होते है कि प्रेम पर्याप्‍त होता है। और कामवासना बिलकुल गिर जाती है। तब दो प्रेमी समग्र एकत्‍व में होते है। क्‍योंकि कामवासना, विभक्‍त करती है। अंग्रेजी का शब्‍द ‘सेक्‍स’ तो आता ही उस मूल से है जिसका अर्थ होता है, विभेद। प्रेम जोड़ता है; कामवासना भेद बनाती है। कामवासना विभेद का मूल कारण है।

जब तुम किसी व्‍यक्‍ति के साथ कामवासना की पूर्ति करते हो, स्‍त्री या पुरूष के साथ, तो तुम सोचते हो कि सेक्‍स तुम्‍हें जोड़ता है। क्षण भर को तुम्‍हें भ्रम होता है एकत्‍व का और फिर एक विशाल विभेद अचानक बन आता है। इसीलिए प्रत्‍येक काम क्रिया के पश्‍चात एक हताशा, एक निराशा आ घेरती है। व्‍यक्‍ति अनुभव करता है कि वह प्रिय से बहुत दुर है। कामवासना भेद बना देती है। और जब प्रेम ज्‍यादा और ज्‍यादा गहरे में उतर जाता है तो और ज्‍यादा जोड़ देता है तो कामवासना की आवश्‍यकता नहीं रहती। तुम इतने एकत्‍व में रहते हो कि तुम्‍हारी आंतरिक ऊर्जाऐं बिना कामवासना के मिल सकती है।

जब दो प्रेमियों की कामवासना तिरोहित हो जाती है तो जो आभा उतरती है तुम देख सकते हो उसे। वह दो शरीरों की भांति एक आत्‍मा में रहते है। आत्‍मा उन्‍हें घेरे रहती है। वह उनके शरीर के चारों और एक प्रदीप्‍ति बन जाती है। लेकिन ऐसा बहुत कम घटता है।

लोग कामवासना पर समाप्‍त हो जाते है। ज्‍यादा से ज्‍यादा जब इकट्ठे रहते है; तो वे एक दूसरे के प्रति स्‍नेहपूर्ण होने लगते है—ज्‍यादा से ज्‍यादा यही होता है। लेकिन प्रेम कोई स्‍नेह का भाव नहीं है, वह आत्‍माओं की एकमायता है—दो ऊर्जाऐं मिलती है। और संपूर्ण इकाई हो जाती है। जब ऐसा घटता है। केवल तभी प्रार्थना। संभव होती है। तब दोनों प्रेमी अपनी एकमायता में बहुत परितृप्‍त अनुभव करते है। बहुत संपूर्ण कि एक अनुग्रह का भाव उदित होता है। वे गुनगुनाना शुरू कर देते है प्रार्थना को।

प्रेम इस संपूर्ण अस्‍तित्‍व की सबसे बड़ी चीज है। वास्‍तवमें, हर चीज हर दूसरी चीज के प्रेम में होती है। जब तुम पहुंचते हो शिखर पर, तुम देख पाओगे कि हर चीज हर दूसरी चीज को प्रेम करती है। जब कि तुम प्रेम की तरह की भी कोई चीज नहीं देख पाते। जब तुम धृणा अनुभव करते हो—धृणा का अर्थ ही इतना होता है कि प्रेम गलत पड़ गया है। और कुछ नहीं। जब तुम उदासीनता अनुभव करते हो, इसका केवल यही अर्थ होता है कि प्रेम प्रस्‍फुटित होने के लिए पर्याप्‍त रूप से साहसी नहीं रहा है। जब तुम्‍हें किसी बंद व्‍यक्‍ति का अनुभव होता है, उसका केवल इतना अर्थ होता है कि वह बहुत ज्‍यादा भय अनुभव करता है। बहुत ज्‍यादा असुरक्षा—वह पहला कदम नहीं उठा पाया। लेकिन प्रत्‍येक चीज प्रेम है।

सारा अस्‍तित्‍व प्रेममय है। वृक्ष प्रेम करते है पृथ्‍वी को। वरना कैसे वे साथ-साथ अस्‍तित्‍व रख सकते थे। कौन सी चीज उन्‍हें साथ-साथ पकड़े हुए होगी? कोई तो एक जुड़ाव होना चाहिए। केवल जड़ों की ही बात नहीं है, क्‍योंकि यदि पृथ्‍वी वृक्ष के साथ गहरे प्रेम में न पड़ी हो तो जड़ें भी मदद न देंगी। एक गहन अदृष्‍य प्रेम अस्‍तित्‍व रखता है। संपूर्ण अस्‍तित्‍व, संपूर्ण ब्रह्मांड घूमता है प्रेम के चारों और। प्रेम ऋतम्‍भरा है। इस लिए कल कहा था मैंने सत्‍य और प्रेम का जोड़ है ऋतम्भरा। अकेला सत्‍य बहुत रूखा-रूखा होता है।

केवल एक प्रेमपूर्ण आलिंगन में पहली बार देह एक आकार लेती है। प्रेमी का तुम्‍हें तुम्‍हारी देह का आकार देती है। वह तुम्‍हें एक रूप देती है। वह तुम्‍हें एक आकार देती है। वह चारों और तुम्‍हें घेरे रहती है। तुम्‍हें तुम्‍हारी देह की पहचान देती है। प्रेमिका के बगैर तुम नहीं जानते तुम्‍हारा शरीर किस प्रकार का है। तुम्‍हारे शरीर के मरुस्थल में मरू धान कहां है, फूल कहां है? कहां तुम्‍हारी देह सबसे अधिक जीवंत है और कहां मृत है? तुम नहीं जानते। तुम अपरिचित बने रहते हो। कौन देगा तुम्‍हें वह परिचय? वास्‍तव में जब तुम प्रेम में पड़ते हो और कोई तुम्‍हारे शरीर से प्रेम करता है तो पहली बार तुम सजग होते हो। अपनी देह के प्रति कि तुम्‍हारे पास देह है।

प्रेमी एक दूसरे की मदद करते है अपने शरीरों को जानने में। काम तुम्‍हारी मदद करता है दूसरे की देह को समझने में—और दूसरे के द्वारा तुम्‍हारे अपने शरीर की पहचान और अनुभूति पाने में। कामवासना तुम्‍हें देहधारी बनाती है। शरीर में बद्धमूल करती है। और फिर प्रेम तुम्‍हें स्‍वयं का, आत्‍मा का स्‍वय का अनुभव देता है—वह है दूसरा वर्तुल। और फिर प्रार्थना तुम्‍हारी मदद करती है अनात्‍म को अनुभव करने में, या ब्रह्म को, या परमात्‍मा को अनुभव करने में।

ये तीन चरण है: कामवासना से प्रेम तक, प्रेम से प्रार्थना तक। और प्रेम के कई आयाम होते है। क्‍योंकि यदि सारी ऊर्जा प्रेम है तो फिर प्रेम के कई आयाम होने ही चाहिए। जब तुम किसी स्‍त्री से या किसी पुरूष से प्रेम करते हो तो तुम परिचित हो जाते हो अपनी देह के साथ। जब तुम प्रेम करते हो गुरु से, तब तुम परिचित हो जाते हो अपने साथ। अपनी सत्‍ता के साथ और उस परिचित द्वारा, अकस्‍मात तुम संपूर्ण के प्रेम में पड़ जाते हो।


कामवासना! दबाएं नहीं[संपादित करें]

कामवासना का दमन नहीं काबू करना सिखाता है योग। योग और धर्म-अध्यात्म में अक्सर यह पढऩे और सुनने को मिलता कि मनुष्य को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये। यानी काम-वासना और भोग-विलास से यथा संभव दूर रहना चाहिये। लेकिन कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि जबरन काम की भावना को दबा दिया जाए। योग के क्षेत्र में अष्टांग योग को सबसे ज्यादा प्रामाणिक माना जाता है। अष्टांग योग की सिद्धियां प्राप्त करने के लिए यह अति आवश्यक है कि यम में बताए गए सभी चरणों का कड़ा पालन करें। यम का चतुर्थ चरण है ब्रह्मचर्य का पालन करना।

अष्टांग योग में यह चरण काफी महत्वपूर्ण है। क्योंकि जो व्यक्ति ब्रह्मचर्य व्रत का पालन नहीं कर पाता वह कुण्डलिनी जागरण की अवस्था तक कतई नहीं पहुंच सकता। ब्रह्मचर्य का पालन करना सर्वाधिक कठिन माना गया है। काम भाव की उत्पत्ति के संबंध में विद्वानों का कहना है कि विपरित लिंग के आकर्षण की वजह से ही ब्रह्मचर्य व्रत का पालन नहीं हो पाता।

कुण्डलिनी जागरण की अवस्था प्राप्त करने के लिए यह अतिआवश्यक है कि हम हमारे मन में विपरिंग लिंग का स्मरण तक ना लाएं। क्योंकि यदि पुरुष किसी स्त्री का स्मरण काम की दृष्टि से करेगा या स्त्री किसी पुरुष का वैसा ही स्मरण करती है तो ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर पाना असंभव सा ही है। अष्टांग योग में यह सबसे अहम चरण है इसका पालन करना अति आवश्यक है।


काम शास्त्र की एक तकनीक[संपादित करें]

काम शास्त्र की एक तकनीक है उसको अगर सही तरह से रति क्रिया करते समय इस्तेमाल किया जे तो औरत और मर्द दोनों को असीम आनंद की प्राप्ति हो सकती है। यह जादुई तकनीक बहुत कठिन नहीं है। बस एक चीज़ की ज़रूरत है वो है धैर्य जल्दबाजी में करने और जल्दी चरम उत्कर्ष तक पहुँचने के चक्कर में पुरूष न तो ख़ुद संतुष्ट हो पाता है और न ही अपनी प्रेयसी को संतुष्ट कर पाता है।

इस क्रिया में पुरूष अपने लिंग को स्त्री की क्लिटोरिस या भागनाशा (अंकुर, दाने) पर धीरे धीरे रगड़ता है। ऐसा करने से पहले लिंग और क्लिटोरिस पर खूब सारा थूक लगा लेना चाहिए। कुछ लोग जेली का भी प्रयोग करते हैं पर थूक और लार प्राकृतिक रूप से शिशन को गीला कर देते हैं और लार में एक प्रकार की गर्मी भी होती है जो अपना अलग ही आनंद देती है।

जब स्त्री का क्लिटोरिस पूरी तरह से भीग जाए तो अपने लिंग का मुंड उस पर रगडें। हो सकता है शुरू शुरू में ज्यादा मजा न आए पर अगर थोड़ा धैर्य रखेंगे तो मस्ती की लहरें महसूस करेंगे। बहुत से लोग ऐसा करने पर उत्तेजना में पागल हो जाते हैं और लिंग सीधा योनी में प्रवेश करा देते हैं। ऐसा न करें। स्त्री को भी आनंद लेने दें।

दाने पर लिंग की रगड़ से स्त्री इतना उत्तेजित हो सकती है की शायद वो आपसे लिंग को योनी में डालने की जिद करने लगे। हो सकता है काम उत्तेजना में पागल होकर अपने नितम्ब उछालने लगे। पर उसको भी रोक दें। थोड़ा इंतज़ार करें। करीब दस मिनट तक केवल यही क्रिया करें।

जब आपको और आपकी प्रेमिका को यह लगने लगे की बस अब पानी झाड़ जाएगा तो योनी को फैलाएं और करेब एक इंच लिंग उसमें घुसा दें। और थोड़ा रुक कर उत्तेजना शांत होने का इंतज़ार करें। जब लगे की आप कंट्रोल में हैं तब फिर से रति क्रिया शुरू कर सकते हैं।

इस तकनीक से पहली बात तो शीघ्र पतन नहीं होता और दूसरी बात उत्तेजना की एक नई ऊँचाई का एकसास होता है। एक खास बात और। अगर पन्द्रह बीस मिनट तक इस तकनीक को जारी रखें तो वीर्य स्खलित करने की इच्छा कम हो जाती है क्योंकि आप आनंद पहले ही महसूस कर चुके होते हैं। इस तरह बार बार वीर्य भी नहीं निकलता। और आप काम क्रिया के बाद तरोताजा महसूस करते हैं न की थके हुए।

दूध से कामवासना[संपादित करें]

दूध असल में अत्‍यधिक कामोत्तेजक आहार है और मनुष्‍य को छोड़कर पृथ्‍वी पर कोई पशु इतना कामवासना से भरा हुआ नहीं है। और उसका एक कारण दूध है। क्‍योंकि कोई पशु बचपन के कुछ समय के बाद दूध नहीं पीता, सिर्फ आदमी को छोड़ कर। पशु को जरूरत भी नहीं है। शरीर का काम पूरा हो जाता है। सभी पशु दूध पीते है अपनी मां का, लेकिन दूसरों की माताओं का दूध सिर्फ आदमी पीता है और वह भी आदमी की माताओं का नहीं जानवरों की माताओं का भी पीता है।

दूध बड़ी अदभुत बात है और आदमी की संस्‍कृति में दूध ने न मालूम क्‍या-क्‍या किया है, इसका हिसाब लगाना कठिन है। बच्‍चा एक उम्र तक दूध पिये, ये नैसर्गिक है। इसके बाद दूध समाप्‍त हो जाना चाहिए। सच तो यह है, जब तक मां का स्‍तन से बच्‍चे को दूध मिल सके, बस तब तक ठीक हे। उसके बाद दूध की आवश्‍यकता नैसर्गिक नहीं है। बच्‍चे का शरीर बन गया। निर्माण हो गया—दूध की जरूरत थी, हड्डी थी, खून था, मांस बनाने के लिए—स्‍ट्रक्‍चर पूरा हो गया, ढांचा तैयार हो गया। अब सामान्‍य भोजन काफी है। अब भी अगर दूध दिया जाता है तो यह सार दूध कामवासना का निर्माण करता है। अतिरिक्‍त है। इसलिए वात्‍सायन ने काम सूत्र में कहा है कि हर संभोग के बाद पत्‍नी को अपने पति को दूध पिलाना चाहिए। ठीक कहा है।

दूध जिस बड़ी मात्रा में वीर्य बनाता है और कोई चीज नहीं बनाती। क्‍योंकि दूध जिस बड़ी मात्रा में खून बनाता है और कोई चीज नहीं बनाती। खून बनता है, फिर खून से वीर्य बनता है। तो दूध से निर्मित जो भी है, वह कामोतेजक है। इसलिए महावीर ने कहा है, वह उपयोगी नहीं है। खतरनाक है, कम से कम ब्रह्मचर्य के साधक के लिए खतरनाक है। ठीक से, काम सुत्र में और महावीर की बात में कोई विरोध नहीं है। भोग के साधक के लिए सहयोगी है, तो योग के साधक के लिए अवरोध है। फिर पशुओं का दूध है वह, निश्‍चित ही पशुओं के लिए, उनके शरीर के लिए, उनकी वीर्य ऊर्जा के लिए जितना शक्‍ति शाली दूध चाहिए। उतना पशु मादाएं पैदा करती है।

जब एक गाए दूध पैदा करती है तो आदमी के बच्‍चे के लिए पैदा नहीं करती, सांड के लिए पैदा करती है। ओर जब आदमी का बच्‍चा पिये उस दूध को और उसके भीतर सांड जैसी कामवासना पैदा हो जाए, तो इसमें कुछ आश्‍चर्य नहीं है। वह आदमी का आहार नहीं है। इस पर अब वैज्ञानिक भी काम करते है। और आज नहीं कल हमें समझना पड़ेगा कि अगर आदमी में बहुत सी पशु प्रवृतियां है तो कहीं उनका कारण पशुओं का दूध तो नहीं है। अगर उसकी पशु प्रवृतियों को बहुत बल मिलता है तो उसका करण पशुओं का आहार तो नहीं है।

आदमी का क्‍या आहार है, यह अभी तक ठीक से तय नहीं हो पाया है, लेकिन वैज्ञानिक हिसाब से अगर आदमी के पेट की हम जांच करें, जैसाकि वैज्ञानिक किये है। तो वह कहते है, आदमी का आहार शाकाहारी ही हो सकता है। क्‍योंकि शाकाहारी पशुओं के पेट में जितना बड़ा इंटेस्‍टाइन की जरूरत होती है, उतनी बड़ी इंटेस्टाइन आदमी के भीतर है। मांसाहारी जानवरों की इंटेस्‍टाइन छोटी और मोटी होती है। जैसे शेर, बहुत छोटी होती है। क्‍योंकि मांस पचा हुआ आहार है, अब बड़ी इंटेस्‍टाइन की जरूरत नहीं है। पचा-पचाया है, तैयार है। भोजन। उसने ले लिया, वह सीधा का सीधा शरीर में लीन हो जायेगा। बहुत छोटी पाचन यंत्र की जरूरत है।

इसलिए बड़े मजे की बात है कि शेर चौबीस घंटे में एक बार भोजन करता है। काफी है। बंदर शाकाहारी है, देखा आपने उसको। दिन भर चबाता रहता है। उसका इंटेस्‍टाइन बहुत लंबी है। और उसको दिन भर भोजन चाहिए। इसलिए वह दिन भर चबाता रहता है।

आदमी की भी बहुत मात्रा में एक बार एक बार खाने की बजाएं, छोटी-छोटी मात्रा में बहुत बार खाना उचित है। वह बंदर का वंशज है। और जितना शाकाहारी हो भोजन उतना कम उतना कम कामोतेजक हे। जितना मांसाहारी हो उतना कामोतेजक होता जाएगा।

दूध मांसाहार का हिस्‍सा है। दूध मांसाहारी है, क्‍योंकि मां के खून और मांस से निर्मित होता है। शुद्धतम मांसाहार है। इसलिए जैनी, जो अपने को कहते है हम गैर-मांसाहारी है, कहना नहीं चाहिए, जब तक वे दूध न छोड़ दे।

केव्‍कर ज्‍यादा शुद्ध शाकाहारी है क्‍योंकि वे दूध नहीं लेते। वे कहते है, दूध एनिमल फूड हे। वह नहीं लिया जा सकता। लेकिन दूध तो हमारे लिए पवित्रतम है, पूर्ण आहार है। सब उससे मिल जाता है, लेकिन बच्‍चे के लिए और वह भी उसकी अपनी मां का। दूसरे की मां का दूध खतरनाक है। और बाद की उम्र में तो फिर दूध-मलाई और धी और ये सब और उपद्रव है। दूध से निकले हुए। मतलब दूध को हम और भी कठिन करते चले जाते है, जब मलाई बना लेते है। फिर मक्खन बना लेते है। फिर घी बना लेते है। तो घी शुद्धतम कामवासना हो जाती है। और यह सब अप्राकृतिक है और इनको आदमी लिए चला जाता है। निश्‍चित ही, उसका आहार फिर उसके आचरण को प्रभावित करता है।

तो महावीर ने कहा है, सम्‍यक आहार, शाकाहारी, बहुत पौष्‍टिक नहीं केवल उतना जितना शरीर को चलाता है। ये सम्‍यक रूप से सहयोगी है उस साधक के लिए, जो अपनी तरफ आना शुरू हुआ। शक्‍ति की जरूरत है, दूसरे की तरफ जाने के लिए शांति की जरूरत है, स्‍वयं की तरफ आने के लिए। अब्रह्मचारी, कामुक शक्‍ति के उपाय खोजेगा। कैसे शक्‍ति बढ़ जाये। शक्‍ति वर्द्धक दवाइयां लेता रहेगा। कैसे शक्‍ति बढ़ जाये। ब्रह्मचारी का साधक कैसे शक्‍ति शांत बन जाए, इसकी चेष्‍टा करता रहेगा।


कामवासना का विरोध[संपादित करें]

यह जीवन के सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है, क्योंकि यह मूल जीवन-ऊर्जा से संबंधित है। कामवासना...यह शब्द ही अत्यंत निंदित हो गया है। क्योंकि समस्त धर्म उन सब चीजों के दुश्मन हैं, जिनसे मनुष्य आनंदित हो सकता है, इसलिए काम इतना निंदित किया गया है। उनका न्यस्त स्वार्थ इसमें था कि लोग दुखी रहें, उन्हें किसी तरह की शांति, थोड़ी सी भी सांत्वना और इस रूखे-सूखे मरुस्थल में क्षण भर को भी मरूद्यान की हरियाली पाने की संभावना शेष न रहे। धर्मों के लिए यह परम आवश्यक था कि मनुष्य के सुखी होने की पूरी संभावना नष्ट कर दी जाए।


यह उनके लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों था? यह महत्वपूर्ण था क्योंकि वे तुम्हें, तुम्हारे मन को किसी और दिशा में मोड़ना चाहते थे-परलोक की ओर। यदि तुम सच में ही यहां आनंदित हो-इसी लोक में, तो भला तुम क्यों किसी परलोक की चिंता करोगे? परलोक के अस्तित्व के लिए तुम्हारा दुखी होना अत्यंत आवश्यक है। उसका स्वयं अपने आप में कोई अस्तित्व नहीं है, उसका अस्तित्व है तुम्हारे दुख में, तुम्हारी पीड़ा में, तुम्हारे विषाद में।


दुनिया के सारे धर्म तुम्हारे अहित करते रहे हैं। वे ईश्वर के नाम पर, सुंदर और अच्छे शब्दों की आड़ में तुममें और अधिक पीड़ा और अधिक संताप और अधिक घृणा और अधिक क"ोध और अधिक घाव पैदा करते रहे हैं। वे प्रेम की बातचीत करते हैं, मगर तुम्हारे प्रेमपूर्ण हो सकने की सारी संभावनाओं को मिटा देते हैं।


मैं काम का शत्रु नहीं हूं। मेरी दृष्टि में काम उतना ही पवित्र है, जितना जीवन में शेष सब पवित्र है। असल में न कुछ पवित्र है, न कुछ अपवित्र है; जीवन एक है-सब विभाजन झूठे हैं और काम जीवन का केंद्र बिंदु है।


इसलिए तुम्हें समझना पड़ेगा कि सदियों-सदियों से क्या होता आ रहा है। जैसे ही तुम काम को दबाते हो, तुम्हारी ऊर्जा स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए नये-नये मार्ग खोजना प्रारंभ कर देती है। ऊर्जा स्थिर नहीं रह सकती। जीवन के आधारभूत नियमों में से एक है कि ऊर्जा सदैव गत्यात्मक होती है, गतिशीलता का नाम ही ऊर्जा है। वह रुक नहीं सकती, ठहर नहीं सकती। यदि उसके साथ जबरदस्ती की गई, एक द्वार बंद किया गया, तो वह दूसरे द्वारों को खोल लेगी, लेकिन उसे बांधकर नहीं रखा जा सकता। यदि ऊर्जा का स्वाभाविक प्रवाह अवरुद्ध किया गया, तो वह किसी अप्राकृतिक मार्ग से बहने लगेगी। यही कारण है कि जिन समाजों ने काम का दमन किया, वे अधिक संपन्न और समृद्ध हो गए। जब तुम काम का दमन करते हो, तो तुम्हें अपने प्रेम-पात्र को बदलना होगा। अब स्त्री से प्रेम करना तो खतरनाक है, वह तो नरक का द्वार है। चूंकि सारे शास्त्र पुरुषों ने लिखे हैं, इसलिए सिर्फ स्त्री ही नरक का मार्ग है। पुरुषों के बारे में क्या खयाल है?


मैं हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों से कहता रहा हूं कि अगर स्त्री नरक का मार्ग है, तब तो फिर केवल पुरुष ही नरक जा सकते हैं, स्त्री तो जा ही नहीं सकती। मार्ग तो सदा अपनी जगह रहता है, वह तो कहीं आवागमन नहीं करता। लोग ही उस पर आवागमन करते हैं। यूं कहने को तो हम कहते हैं कि यह रास्ता फलां जगह जाता है, लेकिन इसमें भाषा की भूल है। रास्ता तो कहीं आता-जाता नहीं, अपनी जगह आराम से पड़ा रहता है, लोग ही उस पर आते-जाते हैं। यदि स्त्रियां नरक का मार्ग हैं, तब तो निश्चित ही नरक में केवल पुरुष ही पुरुष भरे होंगे। नरक “सिर्फ पुरुषों का क्लब” होगा।


स्त्री नरक का मार्ग नहीं है। लेकिन एक बार तुम्हारे दिमाग में यह गलत संस्कार बैठ जाए, तो तुम किसी और वस्तु में स्त्री को प्रक्षेपित करने लगोगे; फिर तुम्हें कोई और प्रेम-पात्र चाहिए। धन तुम्हारा प्रेम-पात्र बन सकता है। लोग पागलों की तरह धन-दौलत से चिपके हैं, जोरों से पकड़े हैं, क्यों? इतना लोभ और लालच क्यों है? क्योंकि दौलत ही उनकी प्रेमिका बन गई। उन्होंने अपनी सारी जीवन ऊर्जा धन की ओर मोड़ ली।


अब यदि कोई उनसे धन त्यागने को कहे, तो वे बड़ी मुसीबत में पड़ जाएंगे। फिर राजनीति से उनका प्रेम-संबंध जुड़ जाएगा। राजनीति में सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर चढ़ते जाना ही उनका एकमात्र लक्ष्य हो जाएगा। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पद की ओर, राजनीतिज्ञ ठीक उसी लालसा से देखता है, जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका की ओर देखता है। यह विकृति है।


कोई व्यक्ति किन्हीं और दिशाओं में जा सकता है, जैसे शिक्षा; तब पुस्तकें उसकी प्रेम की वस्तुएं हो जाती हैं। कोई आदमी धार्मिक बन सकता है, तब परमात्मा उसका प्रेम-पात्र बन जाता है।..तुम अपने प्रेम को किसी भी काल्पनिक चीज पर प्रक्षेपित कर सकते हो, लेकिन स्मरण रहे, उससे तुम्हें परितृप्ति नहीं मिल सकती।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]