आईन-ए-अकबरी

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आईन-ए-अकबरी (अकबर के विधान; समाप्तिकाल 1598 ई.) अबुलफ़ज्ल-ए-अल्लामी द्वारा फारसी भाषा में प्रणीत, बृहत् इतिहासपुस्तक अकबरनामा का तृतीय तथा अधिक प्रसिद्ध भाग है। यह एक बृहत्, पृथक् तथा स्वतंत्र पुस्तक है। सम्राट अकबर की प्रेरणा, प्रोत्साहन तथा आज्ञा से, असाधारण परिश्रम के फलस्वरूप पाँच बार शुद्ध कर इस ग्रंथ की रचना हुई थी।

यद्यपि अबुलफ़ज्ल ने अन्य पुस्तकें भी लिखी हैं, किंतु उसे स्थायी और विश्वव्यापी कीर्ति आईन-ए-अकबरी के आधार पर ही उपलब्ध हो सकी। स्वयं अबुलफ़ज्ल के कथानानुसार उसका ध्येय महान सम्राट् की स्मृति को सुरक्षित रखना तथा जिज्ञासु का पथप्रदर्शन करना था। मुगल काल के इस्लामी जगत् में इसका यथेष्ट आदर हुआ; किंतु पाश्चात्य विद्धानों को और उनके द्वारा भारतीयों को, इस अमूल्य निधि की चेतना तब हुई जब सर्वप्रथम वारेन हेस्टिंग्स के काल में ग्लैडविन ने इसका आँशिक अनुवाद किया; तत्पश्चात् ब्लाकमैन (1873) और जैरेट (1891,1894) ने इसका संपूर्ण अनुवाद किया।

ग्रंथ पाँच भागों में विभाजित है तथा सात वर्षो में समाप्त हुआ था। प्रथम भाग में सम्राट् की प्रशस्ति तथा महली और दरबारी विवरण है। दूसरे भाग में राज्यकर्मचारी, सैनिक तथा नागरिक (सिविल) पद, वैवाहिक तथा शिक्षा संबंधी नियम, विविध मनोविनोद तथा राजदरबार के आश्रित प्रमुख साहित्यकार और संगीतज्ञ वर्णित हैं। तीसरे भाग में न्याय तथा प्रबंधक (एक्ज़ोक्यूटिव) विभागों के कानून, कृषिशासन संबंधी विवरण तथा बारह सूबों की ज्ञातव्य सूचनाएँ और आँकड़े संकलित हैं। चौथे विभाग में हिंदुओं की सामाजिक दशा और उनके धर्म, दर्शन, साहित्य और विज्ञान का (संस्कृत से अनभिज्ञ होने के कारण इनका संकलन अबुलफ़ज्ल ने पंडितों के मौखिक कथनों का अनुवाद कराकर किया था), विदेशी आक्रमणकारियों और प्रमुख यात्रियों का तथा प्रसिद्ध मुस्लिम संतों का वर्णन है और पाँचवें भाग में अकबर के सुभाष्य संकलित हैं एवं लेखक का उपसंहार है। अंत में लेखक ने स्वयं अपना जिक्र किया है। इस प्रकार सम्राट्, साम्राज्यशासन तथा शासित वर्ग का आईन-ए-अकबरी में अत्यंत सूक्ष्म दिग्दर्शन है।

इसकी प्रमुख विशेषता यह है कि युद्धों, षड्यंत्रों तथा वंशपरिवर्तनों के पचड़ों को प्राधान्य देने की अपेक्षा शासित वर्ग को समुचित स्थान प्रदान किया गया है। एक प्रकार से यह आधुनिक भारत का प्रथम गज़ेटियर है। इसकी सर्वाधिक महत्ता यह है कि कट्टरता और धर्मोन्माद के विरोध में हिंदू समाज, धर्म और दर्शन को विशद् गुणग्राही स्थान देकर प्रगतिशील और उदात्त दृष्टिकोण की स्थापना की गई है। अबुलफ़ज्ल ऐसे प्रकांड विद्वान् अन्य काल में भी संभव था, किंतु आईन-ए-अकबरी जैसा ग्रंथ अकबर के काल में ही संभव था, क्योंकि असाधारण विद्वान् (इसलिए वह अल्लामी के विभूषण से प्रतिष्ठित हुआ) और असाधारण सम्राट् का बौद्धिक स्तर पर उदात्त भावनाओं की प्रेरणा से पूर्ण समन्वय संभव हो सका था। आईन-ए-अकबरी पर सम्राट् की प्रशस्ति में मुख्यत: अतिशयोक्ति का दोष लगाया जाता है, किंतु ब्लाकमैन के कथनानुसार "... वह (अबुलफ़ज्ल) प्रशंसा करता है, क्योंकि उसे एक सच्चा नायक मिल गया है।" और यह निर्विवाद है कि अकबर कालीन राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक इतिहास के अध्ययन के लिए आईन-ए-अकबरी एक कोश का महत्व रखता है। अकबर के व्यक्तित्व और इतिहास को तौलने के लिए वह तराजू में बाट के समान है। लेकिन आईने अकबरी के बारे मे ये भी कहा जाता है की अबुल फजल ने इसमे वही बाते लीखी है, जो अकबर चाहता था!

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