१ − २ + ३ − ४ + · · ·

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0 + 1 − 2 + 3 − 4 + ... के प्रथम 15,000 आंशिक योग

गणित में, 1 − 2 + 3 − 4 + ··· एक अनन्त श्रेणी है जिसके व्यंजक क्रमानुगत धनात्मक संख्याएं होती हैं जिसके एकांतर चिह्न होते हैं अर्थात प्रत्येक व्यंजक में इसके पूर्व चिह्न से विपरीत होते हैं। श्रेणी के प्रथम m पदों का योग सिग्मा योग निरूपण की सहायता से निम्न प्रकार से लिखा जा सकता है

Summation from n equals 1 to m of the series n * (-1)^(n-1)

अनन्त श्रेणी के अपसरण का मतलब यह है कि इसके आंशिक योग का अनुक्रम (1, −1, 2, −2, ...) किसी परिमित मान की और अग्रसर नहीं होता है। बहरहाल, 18वीं शताब्दी के मध्य में लियोनार्ड आयलर ने विरोधाभासी समीकरण में लिखा

1-2+3-4+...=1/4

लेकिन इस समीकरण की सार्थकता बहुत समय बाद तक स्पष्ट नहीं हो पाई। 1980 के पूर्वार्द्ध में अर्नेस्टो सिसैरा, एमिल बोरेल और अन्यों ने अपसारी श्रेणियों को व्यापक योग निर्दिष्ट करने के लिए सुपरिभाषित विधि प्रदान की—जिसमें नवीन आयलर विधियों का भी उल्लेख था। इनमें से विभिन्न संकलनीयता विधियों द्वारा 1 − 2 + 3 − 4 + ... का "योग" 14 लिखा जा सकता है। सिसैरा-संकलन उन विधियों में से एक है जो 1 − 2 + 3 − 4 + ... का योग प्राप्त नहीं कर सकती, अतः श्रेणी एक ऐसा उदाहरण है जिसमें थोड़ी प्रबल विधि यथा हाबिल संकलन विधि की आवश्यकता होती है।

श्रेणी 1 − 2 + 3 − 4 + ..., ग्रांडी श्रेणी 1 − 1 + 1 − 1 + ... से अतिसम्बद्ध है। आयलर ने इन दोनों श्रेणियों को श्रेणी 1 − 2n + 3n − 4n + ... जहाँ n यदृच्छ है, की विशेष अवस्था के रूप में अध्ययन किया और अपने शोध कार्य को बेसल समस्या तक विस्तारित किया। बाद में उनका ये कार्य बाद में फलनिक समीकरण के रूप में परिणत हुआ जिसे अब डीरिख्ले ईटा फलन और रीमान जीटा फलन के नाम से जाना जाता है।

अपसरण[संपादित करें]

श्रेणी के पद (1, −2, 3, −4, ...) 0 की ओर अग्रषर नहीं हैं; अतः 1 − 2 + 3 − 4 + ... पद परीक्षण विधि से अपसारी प्रतीत होती है। बाद में सन्दर्भ के तौर पर यह भी आवश्यक हो गया कि श्रेणी का अपसरण का मूलभूत स्तर क्या है। परिभाषा के अनुसार किसी अनन्त श्रेणी का अपसरण या अभिसरण को उस अनुक्रम के आशिंक योग के अपसरण या अभिसरण द्वारा ज्ञात किया जाता है[1]

1 = 1,
1 − 2 = −1,
1 − 2 + 3 = 2,
1 − 2 + 3 − 4 = −2,
1 − 2 + 3 − 4 + 5 = 3,
1 − 2 + 3 − 4 + 5 − 6 = −3,
...

इस अनुक्रम की विशिष्टता यह है कि इसमें प्रत्येक पूर्णांक ठीक एक बार आता है—जिसमें शून्य भी शामिल है यदि खाली आंशिक संकलन किया जाए—जिससे पूर्णांकों के समुच्चय \mathbb{Z} की गणनीयता की स्थापना की जाती है।[2] आंशिक योग से यह स्पष्ट होता है कि श्रेणी किसी विशिष्ट संख्या पर अभिसरण नहीं करती (किसी प्रस्तावित सीमा x के लिए एक ऐसा बिन्दु प्राप्त किया जा सकता है जिसके उत्तरवर्ती सभी संकलन अन्तराल [x-1, x+1] के बाहर होंगे।) अतः 1 − 2 + 3 − 4 + ... अपसारी है।

संकलन के लिए अन्वेषण[संपादित करें]

स्थिरता एवं रैखिकता[संपादित करें]

चूँकि पद 1, −2, 3, −4, 5, −6, ... एक सरल पद्धति के अनुरूप हैं, श्रेणी 1 − 2 + 3 − 4 + ... स्थान परिवर्तन कर पदवार संकलित करके एक संख्यातमक मान प्राप्त किया जा सकता है। यदि किस साधारण संख्या s के लिए s = 1 − 2 + 3 − 4 + ... लिखना सम्भव हो तो श्रेणी का योग s = 14:सिद्ध किया जा सकता है:[3]


\begin{array}{rclllll}
4s&=& &(1-2+3-4+\cdots) & {}+(1-2+3-4+\cdots) & {}+(1-2+3-4+\cdots) &{}+(1-2+3-4+\cdots) \\
 &=& &(1-2+3-4+\cdots) & {}+1+(-2+3-4+5+\cdots) & {}+1+(-2+3-4+5+\cdots) &{}+(1-2)+(3-4+5-6\cdots) \\
 &=& &(1-2+3-4+\cdots) & {}+1+(-2+3-4+5+\cdots) & {}+1+(-2+3-4+5+\cdots) &{}-1+(3-4+5-6\cdots) \\
 &=&1+&(1-2+3-4+\cdots) & {}+(-2+3-4+5+\cdots) & {}+(-2+3-4+5+\cdots) &{}+(3-4+5-6\cdots) \\
 &=&1+[&(1-2-2+3) & {}+(-2+3+3-4) & {}+(3-4-4+5) &{}+(-4+5+5-6)+\cdots] \\
 &=&1+[&0+0+0+0+\cdots] \\
4s&=&1
\end{array}
श्रेणी 1 − 2 + 3 − 4 + ..., की 4 प्रतियों का पदवार स्थानांतरण करके योग करने पर 1 प्राप्त होता है। वाम हस्थ और दक्षिण हस्त दिशा मे 1 − 2 + 3 − 4 + ... की दो प्रतियाँ प्रत्येक को 1 − 1 + 1 − 1 + .... से जोड़ते हुए दिखाया गया है।

अतः s=\frac{1}{4} का ज्यामितिय निरुपण दायीं ओर के चित्र में दर्शाया गया है।

यद्यपि 1 − 2 + 3 − 4 + ... सामान्य अर्थों में संकलनीय नहीं है, अतः समीकरण s = 1 − 2 + 3 − 4 + ... = 14 को कथन 'यदि इस तरह का योग परिभाषित किया जाता है' के साथ समर्थित किया जा सकता है। किसी अपसारी श्रेणी के "योग" की व्यापक परिभाषा को संकलन विधि या संकलनीयता विधि कहते हैं, जो सभी सम्भव श्रेणियों के कुछ उपसमुच्चयों का योग करती हैं। साधारण संकलनों को प्रदर्शित करने वाली विभिन्न विधियाँ (जिनमें से कुछ का विवरण नीचे दिया गया है।) हैं। उपरोक्त विवेचन से यह सिद्ध होता है कि किसी दी गई संकलनीयता विधि से जो स्थिरता एवं रैखिकता और श्रेणी 1 − 2 + 3 − 4 + ... को योग करे, तो इसका परिणामी मान 14 होगा।[4] इसके अतिरिक्त, चूँकि


\begin{array}{rcllll}
2s & = & &(1-2+3-4+\cdots) & + & (1-2+3-4+\cdots) \\
 & = & 1 + &(-2+3-4+\cdots) & {} + 1 - 2 & + (3-4+5\cdots) \\
 & = & 0 + &(-2+3)+(3-4)+ (-4+5)+\cdots \\
2s & = & &1-1+1-1\cdots
\end{array}

ऐसी पद्धतियों से ग्रांडी श्रेणी 1 − 1 + 1 − 1 + ... = 12 का भी योग किया जा सकता है।[5]

कोशी गुणनफल[संपादित करें]

सन् १८९१ में अर्नेस्टो सिसैरा ने यह लिखते हुये- "(1 − 1 + 1 − 1 + ...)2 = 1 − 2 + 3 − 4 + ... लिखा जा सकता है और इसका मान 14 के बराबर होता है" आशा व्यक्त की कि अपसारी श्रेणियों को भी कलन के उपयुक्त माना जा सकता है।[6] सिसौरा के लिए यह समीकरण उनके पूर्व प्रकाशित पत्र की प्रमेय का एक अनुप्रेयोग था जिसे अपसारी श्रेणियों के संकलन के इतिहास की प्रथम ज्ञात प्रमेय के रूप में पहचाना जा सकता है। उनकी संकलन विधि का वर्णन नीचे किया गया है; जिसकी मुख्य अवधारणा यह है कि श्रेणी 1 − 2 + 3 − 4 + ..., श्रेणी 1 − 1 + 1 − 1 + ... का श्रेणी 1 − 1 + 1 − 1 + ... के साथ कोशी गुणनफल है।

श्रेणी 1 − 2 + 3 − 4 + ..., श्रेणी 1 − 1 + 1 − 1 + ... के द्वि-वलित के रूप में।

दो अनन्त श्रेणिय्ं का कोशी गुणनफल तब भी परिभाषित है जब दोनों श्रेणियाँ अपसारी हों। इस अवस्था में, जहाँ Σan = Σbn = Σ(−1)n हो, कोशी गुणनफल के व्यंजक निश्चित विकर्ण योग द्वारा दिये जाते हैं

\begin{array}{rcl}
c_n & = &\displaystyle \sum_{k=0}^n a_k b_{n-k}=\sum_{k=0}^n (-1)^k (-1)^{n-k} \\[1em]
 & = &\displaystyle \sum_{k=0}^n (-1)^n = (-1)^n(n+1).
\end{array}

इस स्थिति में गुणनफल श्रेणी निम्न प्रकार होगी

\sum_{n=0}^\infty(-1)^n(n+1) = 1-2+3-4+\cdots.

अतः दो श्रेणियों का कोशी गुणनफल और योग 1 − 1 + 1 − 1 + ... = 12, का अनुसरण करने वाली संकलन विधि योग 1 − 2 + 3 − 4 + ... = 14 देगी। पूर्व अनुभाग के परिणाम के साथ विधियाँ जो रैखिक, स्थिरता और कोशी गुणनफल का अनुसरण करती हैं, श्रेणी 1 − 1 + 1 − 1 + ... और श्रेणी 1 − 2 + 3 − 4 + ... की संकलनीयता में समानार्थकता में अन्तर्निहित होती है।

सिसैरा प्रमेय एक सरल उदाहरण है। श्रेणी 1 − 1 + 1 − 1 + ... यदि दुर्बलतः सिसैरा-संकलनीय है जिसे (C, 1)-संकलनीय भी कहा जाता है, जबकि 1 − 2 + 3 − 4 + ... के लिए सिसैरा प्रमेय का प्रबलतम रूप होना अपेक्षित होता है[7] जिसे (C, 2)-संकलनीय लिखते हैं। चूँकि सिसैरा प्रमेय के सभी रूप रैखिक और स्थायी होते हैं, इसके योग की भी गणना की जा सकती है।


विशिष्ट पद्धतियाँ[संपादित करें]

सिसौरा और होल्डर[संपादित करें]

(H, 2) के आँकड़े जिनका योग 14 है।

श्रेणी 1 − 2 + 3 − 4 + ... का सिसौरा संकलन (C, 1) ज्ञात करने के लिए माना श्रेणी का सिसौरा संकलन विद्यमान है अतः सर्वप्रथम श्रेणी के आंशिक योग के समान्तर माध्य की गणना करते हैं। श्रेणी का आंशिक योग:

1, −1, 2, −2, 3, −3, ...,

और इन योगों का समान्तर माध्य निम्न प्रकार दिया जाता है:

1, 0, 23, 0, 35, 0, 47, ....

चूँकि माध्य का अनुक्रम अभिसारी नहीं है अतः श्रेणी 1 − 2 + 3 − 4 + ... सिसौरा संकलनीय नहीं है।

सिसौरा संकलन के मुख्यतः दो व्यापकीकरण काम में लिये जाते हैं: प्राकृत संख्या n के लिए (H, n) के अनुक्रम की विधि संकल्पनात्मक रूप से इन दोनो में से सरल है। (H, 1) योग को सिसौरा संकलन कहते हैं और उच्चतर विधियाँ माध्य के अभिकलन की पुनरावृत्ति करते हैं। उपरोक्त में सभी सम पदों का माध्य 12 प्राप्त होता है जबकि विषम पदों का माध्य 0 के बराबर होता है, अतः माध्यों का माध्य 0 और 12 के औसत पर अभिसरण करता है जिसका मान 14 प्राप्त होता है।[8] अतः 1 − 2 + 3 − 4 + ..., (H, 2) संकलनीय है जिसका मान 14 प्राप्त होता है।

यहाँ "H" ऑटो होल्डर के लिए प्रतीकत्व है, जिन्होंने सर्वप्रथम 1882 में हाबेल संकलन और (H, n) संकलन में सम्बंध को सिद्ध किया था; 1 − 2 + 3 − 4 + ... उनका प्रथम उदाहरण था।[9] 1 − 2 + 3 − 4 + ... का (H, 2) योग 14 होना इस तथ्य की प्रत्याभूति करता है कि यह हाबिल योज्य है; इसकी उपपत्ति नीचे की गई है।

सिसौरा संकलन का अन्य सूत्रबद्ध व्यापकीकरण (C, n) अनुक्रम विधि है। यह सिद्ध किया जा चुका है कि (C, n) संकलन और (H, n) संकलन हमेशा समान परिणाम देते हैं लेकिन दोनों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भिन्न है। सन् 1887 में, सिसौरा ने (C, n) संकलन को लगभग परिभाषित किया था लेकिन उन्होंने केवल कुछ उदाहरण ही दिये। विशेष रूप से उन्होंने 1 − 2 + 3 − 4 + ..., का योग किसी विधि से 14 प्राप्त किया जिसे (C, n) के रूप में कथित किया जा सकता है लेकिन वो उस समय पर उचित तरिके से समझा नहीं पाये। उन्होंने 1890 में औपचारिक रूप से (C, n) विधि परिभाषित की जिसके अनुसार (C, n)-संकलनीय श्रेणी और (C, m)-संकलनीय श्रेणी का कोशी गुणनफल (C, m + n + 1)-संकलनीय होता है।[10]

हाबिल संकलन[संपादित करें]

1−2x+3x2+...; 1/(1 + x)2 के कुछ गुणित पद; जहाँ सीमा 1 की ओर अग्रसर है।

सन् 1749 की एक रपट के अनुसार, लियोनार्ड आयलर ने स्वीकार किया था कि श्रेणी अपसारी है लेकिन किसी न किसी प्रकार से इसका योग ज्ञात किया जा सकता है:

...जब यह कहा गया कि इस तरह की श्रेणी जैसे 1−2+3−4+5−6 आदि का योग 14 है तो यह विरोधाभासी प्रतीत होना चाहिए। इस श्रेणी के प्रथम 100 पदों को जोड़ने पर हमें −50 प्राप्त होता है तथापि 101 पदों का योग +51 प्राप्त होता है जो 14 से बिलकुल भिन्न है और आगे भी यह मान इकाई से बढ़ता है जब हम एक पद ओर बढ़ाते हैं। लेकिन मैंने इससे पहले भी इसे देखा था कि शब्द योग को एक विस्तृत मतलब देना बहुत ही आवश्यक है....[11]

आयलर ने शब्द "योग" को लिए विभिन्न समयों पर एक व्यापकीकृत करने का प्रस्ताव रखा; इसे अनन्त श्रेणी पर आयलर (Euler on infinite series) में देखा जा सकता है। 1 − 2 + 3 − 4 + ..., की स्थिति में उनके विचार समरूप थे जिन्हें हाबिल संकलन के नाम से जाना जाता है:

...यह संदेहपूर्ण नहीं है कि श्रेणी 1−2+3−4+5 + आदि का योग 14 है; चूँकि यह श्रेणी सूत्र 1(1+1)2 के विस्तार से प्राप्त होती है जिसका मान निर्विवादित रूप से 14 है। यह विचार और अधिक स्पष्ट करने के लिए माना 1 − 2x + 3x2 − 4x3 + 5x4 − 6x5 + &c एक व्यापक श्रेणी है जो व्यंजक 1(1+x)2 का विस्तार करने पर प्राप्त होती है, यह श्रेणी x = 1 रखने पर भी समान रहेगी।[12]

यहाँ पर यह देखने की विभिन्न विधियाँ हैं जिनमें कम से कम निरपेक्ष मानों |x| < 1, के लिए आयलर के अनुसार

1-2x+3x^2-4x^3+\cdots = \frac{1}{(1+x)^2}.

दक्षिण-हस्थ दिशा में टेलर श्रेणी विस्तार करने पर और बहुपदों के लिए वृहत भाग प्रक्रिया लागू करने पर।[13]

आधुनिक विचारों के अनुसार श्रेणी 1 − 2x + 3x2 − 4x3 + ..., x = 1 पर कोई फलन परिभाषित नहीं करती अतः परिणामी व्यंजक में वह मान सीधे ही प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। चूँकि फलन सभी |x| < 1 के लिए परिभाषित है अतः x के 1 की ओर अग्रसर मान का सीमान्त मान प्राप्त कर सकता है और यही हाबिल योग की परिभाषा है:

\lim_{x\rightarrow 1^{-}}\sum_{n=1}^\infty n(-x)^{n-1} = \lim_{x\rightarrow 1^{-}}\frac{1}{(1+x)^2} = \frac14.

आयलर और बोरल[संपादित करें]

1214 का आयलर संकलन

आयलर ने श्रेणी पर अन्य प्रविधि प्रयुक्त की: आयलर रचनांतर, उनके आविष्कारों में से एक। आयलर रचनांतर की गणना करने के लिए सर्वप्रथम धनात्मक पदों के अनुक्रम से आरम्भ करते हैं जो एकांतर श्रेणी का निर्माण करता है—वर्तमान अवस्था में यह श्रेणी 1, 2, 3, 4, .... है। इस श्रेणी के प्रथम अवयव को a0 से अंकित किया जाता है।

इसके बाद 1, 2, 3, 4, ... में अग्र अन्तरालों का एक अनुक्रम परिभाषित किया जाता है; जो केवल 1, 1, 1, 1, .... प्राप्त होता है। इस अनुक्रम के प्रथम पद को Δa0 से अंकित किया जाता है। आयलर रचनांतर अंतरों के अंतर और उच्च पुनरावृत्तियों पर भी निर्भर करता है लेकिन 1, 1, 1, 1, ... के सभी अग्र अंतर 0 ही प्राप्त होते हैं। अतः 1 − 2 + 3 − 4 + ... के आयलर रचनांतर को निम्न प्रकार परिभाषित किया जाता है:

\frac12 a_0-\frac14\Delta a_0 +\frac18\Delta^2 a_0 -\cdots = \frac12-\frac14.

आधुनिक पारिभाषित शब्दावली में 1 − 2 + 3 − 4 + ... आयलर संकलनीय है जिसका मान 14 प्राप्त होता है।

आयलर संकलनीयता में अन्य प्रकार की संकलनीयता भी अंतर्निहित है। 1 − 2 + 3 − 4 + ... को निम्न प्रकार लिखा जा सकता है:

\sum_{k=0}^\infty a_k = \sum_{k=0}^\infty(-1)^k(k+1),

जिससे सर्वत्र-अभिसारी श्रेणी निम्न प्रकार सम्बंधित है:

a(x) = \sum_{k=0}^\infty\frac{(-1)^k(k+1)x^k}{k!} = e^{-x}(1-x).

अतः श्रेणी 1 − 2 + 3 − 4 + ... का बोरल योग निम्न होगा[14]

\int_0^\infty e^{-x}a(x)\,dx = \int_0^\infty e^{-2x}(1-x)\,dx = \frac12-\frac14.

मापक पृथक्करण[संपादित करें]

सैचेव और वय्कज़िनस्की दो भौतिक सिद्धान्तों: अत्यल्प विश्रांति और मापक पृथक्करण की सहायता से परिणाम 1 − 2 + 3 − 4 + ... = 14 पर पहुंचे। इन सिद्धान्तों को यथार्थ उन्होंने एक विस्तृत "φ-संकलन विधि" का परिवार जिसमें उन सभी श्रेणियों को रखा गया जिनका योग 14 प्राप्त होता है, परिभाषित किया:

  • यदि φ(x) एक फलन है जिसका प्रथम एवं द्वितीय अवकलज परास (0, ∞) में इस प्रकार सतत और समाकलनीय हैं कि φ(0) = 1 और φ(x) एवं xφ(x) का +∞ पर सीमान्त मान 0 होता है तब[15]
\lim_{\delta\rightarrow0}\sum_{m=0}^\infty (-1)^m(m+1)\varphi(\delta m) = \frac14.

यह हल हाबिल संकलन का व्यापकीकरण है जिसे φ(x) = exp(−x) लिखकर प्राप्त किया जा सकता है। व्यापक कथन श्रेणी के m पदों को युग्मित करके व्यंजकों को रीमान-समाकल में परिवर्तित करके प्राप्त किया जा सकता है। बाद वाले पद के लिए, श्रेणी 1 − 1 + 1 − 1 + ... का हल सिद्ध करने के लिए माध्यमान प्रमेय प्रयुक्त किया जाता है लेकिन टेलर प्रमेय की भांति कठीन भाषा की आवश्यकता होती है।

व्यापकीकरण[संपादित करें]

E212 — Institutiones calculi differentialis cum eius usu in analysi finitorum ac doctrina serierum के पृष्ठ संख्या 233 से लिया गया एक खण्ड। आयलर ने वैसी ही श्रेणी का योग किया, ca. 1755.

श्रेणी 1 − 1 + 1 − 1 + ... का तिहरा कोशी गुणनफल श्रेणी 1 − 3 + 6 − 10 + ... प्राप्त होती है जो त्रिकोण संख्याओं की श्रेणी है; इसका हाबिल और आयलर योग 18 है।[16] श्रेणी 1 − 1 + 1 − 1 + ... का चतुर्थ कोशी गुणनफल करने पर श्रेणी 1 − 4 + 10 − 20 + ... प्राप्त होती है जो चतुष्फलकीय संख्याओं की एकांतर श्रेणी है, इसका हाबिल योग 116 प्राप्त होता है।

श्रेणी 1 − 2 + 3 − 4 + ... का n के अन्य मानों के लिए श्रेणी 1 − 2n + 3n − 4n + ... में व्यापकीकरण किय जा सकता है। धनात्मक संख्याओं n के लिए श्रेणी का हाबिल योग निम्न प्रकार है:[17]

1-2^{n}+3^{n}-\cdots = \frac{2^{n+1}-1}{n+1}B_{n+1}

जहाँ Bn बर्नूली संख्याएँ हैं। n के सम मानों के लिए

1-2^{2k}+3^{2k}-\cdots = 0.

पिछला योग नील्स हेनरिक हाबिल द्वारा 1826 में विशेष उपहास का विषय बताया गया:

"अपसारी श्रेणियों पूर्णतया शैतानों के कार्य पर है और यह शर्म की बात है कि इस पर कई उपपत्तियाँ पाने की हिम्मत की जाती है। जब इससे बाहर आ सकता है जिसे कोई काम में लेना चाहता है और ये वो हैं जो अप्रसन्नता सूचक है तथा इसमें बहुत ही विरोधाभाष हैं। क्या यहाँ पर निम्न को लागू करने से अधिक कुछ सोचा जा सकता है

0 = 1 − 2n + 3n − 4n + etc.

जहाँ n एक धनात्मक संख्या है। यहाँ पर दोस्तों पर थोड़ा मुस्कराया जा सकता है।"[18]

सिसौरो के गुरु यूजीन चार्ल्स कैटलन ने भी अपसारी श्रेणियों की उपेक्षा की। कैटलन के प्रभाव से सिसैरो ने भी प्रारम्भ में श्रेणी 1 − 2n + 3n − 4n + ... के लिए "अर्थहीन समानता" के रूप में "परम्परागत सूत्रों" को उल्लिखित किया और 1883 में सिसैरो ने उस समय का प्रारूपिक दृष्टिकोण व्यक्त किया जिसके अनुसार वो सूत्र गलत थे लेकिन अभी भी औपचारिक रूप से उपयोगी हैं। अंततः 1890 में सिसैरा सुर ला मल्टीप्लिकेशन देज़ सिरीज़ (श्रेणी के गुणा पर) में परिभाषा से आरम्भ करते हुये एक आधुनिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।[19]

श्रेणियों का अध्ययन n के अपूर्णांक मानों के लिए भी किया गया; इससे ही डीरिख्ले ईटा फलन का निर्माण हुआ। श्रेणी 1 − 2 + 3 − 4 + ... से सम्बंधित श्रेणियाँ अध्ययन करना आयलर की प्रेरणा का भाग ईटा फलन का फलनिक समीकरण था, जो सीधे रीमान जीटा फलन की फलनिक समीकरण देती है। आयलर ने धनात्मक सम संख्याओं (बेसल समस्या सहित) पर इन फलनों के मान प्राप्त करने के लिए प्रसिद्धि प्राप्त की और उन्होंने धनात्मक विषम संख्याओं के लिए भी समान कोशिश की, जो वर्तमान में भी एक निवारणहीन समस्या बनी हुई है। विशेष रूप से ईटा फलन आयलर विधि से काम में लेना सरल है क्योंकि इसकी डीरिख्ले श्रेणी सर्वत्र हाबिल संकलनीय है; जीटा फलन का डीरिख्ले श्रेणियाँ अपसारी होने पर, उनका योग बहुत कठीन है।[20] उदाहरण के लिए, जीटा फलन में श्रेणी 1 − 2 + 3 − 4 + ... का प्रतिरूप अन्-एकांतर श्रेणी 1 + 2 + 3 + 4 + ... है, जिसके आधुनिक भौतिकी में गहरा अनुप्रयोग हैं लेकिन योग के लिए बहुत कठीन विधियों की आवश्यकता होगी।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. हार्डी पृ॰ 8
  2. बील्स पृ॰ 23
  3. हार्डी (पृ॰6) ने ग्रांडी श्रेणी 1 − 1 + 1 − 1 + ... के परिगणन के साथ संयोजन में इसकी व्युत्पति की है।
  4. हार्डी पृ॰6
  5. हार्डी पृ॰6
  6. Ferraro, p.130.
  7. Hardy, p.3; Weidlich, pp.52–55.
  8. हार्डी, पृष्ठ 9, गणनाओं की पूर्ण जानकारी के लिए देखें: वाइडलिच, पृष्ठ 17–18
  9. Ferraro, p.118; Tucciarone, p.10. Ferraro criticizes Tucciarone's explanation (p.7) of how Hölder himself thought of the general result, but the two authors' explanations of Hölder's treatment of 1 − 2 + 3 − 4 + ... are similar.
  10. Ferraro, pp.123–128.
  11. Euler et al., p.2. Although the paper was written in 1749, it was not published until 1768. [...when it is said that the sum of this series 1−2+3−4+5−6 etc. is 14, that must appear paradoxical. For by adding 100 terms of this series, we get −50, however, the sum of 101 terms gives +51, which is quite different from 14 and becomes still greater when one increases the number of terms. But I have already noticed at a previous time, that it is necessary to give to the word sum a more extended meaning....]
  12. Euler et al., pp.3, 25. [...it is no more doubtful that the sum of this series 1−2+3−4+5 + etc. is 14; since it arises from the expansion of the formula 1(1+1)2, whose value is incontestably 14. The idea becomes clearer by considering the general series 1 − 2x + 3x2 − 4x3 + 5x4 − 6x5 + &c. that arises while expanding the expression 1(1+x)2, which this series is indeed equal to after we set x = 1.]
  13. For example, Lavine (p.23) advocates long division but does not carry it out; Vretblad (p.231) calculates the Cauchy product. Euler's advice is vague; see Euler et al., pp.3, 26. John Baez even suggests a category-theoretic method involving multiply pointed sets and the quantum harmonic oscillator. Baez, John C. Euler's Proof That 1 + 2 + 3 + ... =-1/12 (PDF). math.ucr.edu (19 दिसम्बर 2003). अभिगमन तिथि: 28 मार्च 2014
  14. Weidlich p. 59
  15. Saichev and Woyczyński, pp.260–264.
  16. Kline, p.313.
  17. Knopp, p.491; there appears to be an error at this point in Hardy, p.3.
  18. Grattan-Guinness, p.80. See Markushevich, p.48, for a different translation from the original फ़्रांसीसी; the tone remains the same.
  19. Ferraro, pp.120–128.
  20. Euler et al., pp.20–25.

पादटिप्पणी[संपादित करें]