होयसल राजवंश
होयसल राज्य | |||||||||
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| 950–1346 | |||||||||
अपने विस्तार के चरमोत्कर्ष के समय होय्सल राज्य, 1050–1355 ई० | |||||||||
| राजधानी |
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| प्रचलित भाषा(एँ) | कन्नड संस्कृत | ||||||||
| धर्म | जैन धर्म हिन्दू धर्म | ||||||||
| सरकार | राजतंत्र | ||||||||
| राजा | |||||||||
• 950–960 | अरेकल्ल | ||||||||
• 1343–1346 | वीर बल्लाल चतुर्थ | ||||||||
| इतिहास | |||||||||
• स्थापित | 950 | ||||||||
• अंत | 1346 | ||||||||
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होयसल प्राचीन दक्षिण भारत का एक यादव राजवंश था। यह देवगिरी के यादव राजवंश की एक शाखा थी। होयसल राजाओ के शिलालेखों में भी उनको 'यदुकुलतिलक' कहा गया है। इस राजवंश ने १०वीं से १४वीं शताब्दी तक राज किया।[1] उन्होने वर्तमान कर्नाटक के लगभग सम्पूर्ण भाग तथा तमिलनाडु के कावेरी नदी की उपजाऊ घाटी वाले भाग पर अपना अधिकार जमा लिया। इन्होंने ३१७ वर्ष राज किया। इनकी राजधानी पहले बेलूर थी पर बाद में स्थानांतरित होकर हालेबिदु हो गई।[2]
शासक
[संपादित करें]- नृप काम द्वितीय (1026 - 1047)
- होयसल विनयादित्य (1047 - 1098)
- एरयंग (1098 - 1102)
- वीर बल्लाल प्रथम (1102 -1108)
- विष्णुवर्धन (1108 - 1152)
- नरसिंह प्रथम (1152 – 1173)
- वीर बल्लाल द्वितीय (1173 – 1220)
- वीर नरसिंह द्वितीय (1220 – 1235)
- वीर सोमेश्वर (1235 – 1254)
- नृसिंह तृतीय (1254 – 1291)
- वीर बल्लाला तृतीय (1292 – 1343)
इसके पश्चात हरिहर राय प्रथम ने विजयनगर साम्राज्य स्थापित किया।
कला एवं स्थापत्य
[संपादित करें]होयसल राजाओं का काल कला एवं स्थापत्य की उन्नति के लिये विख्यात है।
होयसल काल में मंदिर निर्माण की एक नई शैली का विकास हुआ। इन मंदिरों का निर्माण भवन के समान ऊँचे ठोस चबूतरे पर किया जाता था। चबूतरों तथा दीवारों पर हाथियों, अश्वारोहियों, हंसों, राक्षसों तथा पौराणिक कथाओं से संबंधित अनेक मूर्तियाँ बनाई गयी हैं। उनके द्वारा बनवाये गये सुन्दर मंदिरों के कई उदाहरण आज भी हलेबिड, बेलूर तथा श्रवणबेलगोला में प्राप्त होते हैं। होयसलों की राजधानी द्वारसमुद्र का आधुनिक नाम हलेबिड है, जो इस समय कर्नाटक राज्य में स्थित है। वहाँ के वर्तमान मंदिरों में होयसलेश्वर का प्राचीन मंदिर सर्वाधिक प्रसिद्ध है, जिसका निर्माण विष्णुवर्धन के शासन काल में हुआ। यह 160 फुट लम्बा तथा 122 फुट चौड़ा है। इसमें शिखर नहीं मिलता। इसकी दीवारों पर अद्भुत मूर्तियाँ बनी हुई हैं, जिनमें देवताओं, मनुष्यों एवं पशु-पक्षियों आदि सबकी मूर्तियाँ हैं।
विष्णुवर्द्धन ने 1117 ई. में बेलूर में चेन्नाकेशव मंदिर का भी निर्माण करवाया था। वह 178 फुट लंबा तथा 156 फुट चौड़ा है। मंदिर के चारों ओर वेष्टिनी है, जिसमें तीन तोरण बने हैं। तोरण-द्वारों पर रामायण तथा महाभारत से लिये गये अनेक सुन्दर दृश्यों का अंकन हुआ है। मंदिर के भीतर भी कई मूर्तियाँ बनी हुयी हैं। इनमें सरस्वती देवी का नृत्य मुद्रा में बना मूर्ति-चित्र सर्वाधिक सुन्दर एवं चित्ताकर्षक है। होयसल मंदिर अपनी निर्माण-शैली, आकार-प्रकार एवं सुदृढता के लिये प्रसिद्ध हैं।
छबि दीर्घा
[संपादित करें]- वराहावतार
- जगति से नीचे देखने पर सोमनाथपुर का चेन्नाकेशव मन्दिर
- होय्सळ शिलाशिल्प
- होय्सळ लाञ्छन
- होय्सळ तालाब
- दर्पणसुन्दरी : यह बेलूर के चेन्नाकेशव मन्दिर में अलंकृत अनेकानेक मदनकै चित्रों में से एक है।