हृदेयशाह लोधी

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हृदेशाह लोधी मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड के राजा थे। इन्होंने 1842 में अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया।

विद्रोह का इतिहास[संपादित करें]

ईस्ट इंडिया कंपनी ने पहली बार नागपुर में पैर जमाते ही दमोह, सागर और मंडला के किलों पर अधिकार कर लिया था। 1820 तक क्षेत्र के अधिकांश किलो पर अधिकार के बाद अंग्रेजों ने गवर्नर जनरल के अधीन सागर नर्मदा क्षेत्र का गठन कर क्षेत्र को अपने एक एजेंट के अधीन कर दिया था। इस दौरान सागर के जवाहरसिंह बुंदेला और नरहुत के मधुकरशाह ने अपनी संपत्ति कुर्क होने का विरोध सैन्य विद्रोह के जरिए किया था।

यह विद्रोह नरसिंहपुर, सागर के बाद हीरापुर के राजा हृदयशाह के नेतृत्व में जबलपुर में भी फैला। हृदयशाह ने क्षेत्र के सभी ठाकुरों को संगठित कर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया। 22 नवंबर 1842 को राजा हृदयशाह को बंदी बना लिया गया। इसके बाद इस पूरे क्षेत्र में आजादी के विद्रोह 1843 तक जारी रहा।

संबंधित चिट्ठियाँ[संपादित करें]

हृदय शाह लोधी से संबंधित कुछ ऐतिहासिक चिट्ठियाँ मध्यप्रदेश संग्रहालय में सुरक्षित हैं। चिट्ठियां ईस्ट इंडिया कंपनी के तत्कालीन गवर्नर जनरल ने सागर डिवीजन के सैनिक प्रमुख समेत तत्कालीन जनरल को स्टीमेन को लिखी थी।

9 नवंबर 1842 को लिखी पहली चिट्ठी में जनरल ने बुंदेला विद्रोही नेताओं के चरित्र और गतिविधियों के संबंध में जानकारी मंगवाई थी, दूसरी चिट्ठी में राजा हिरदेशाह के सहयोगियों की गिरफ्तारी पर इनाम घोषित किया गया है। - एक अन्य चिट्ठी में सागर, नर्मदा क्षेत्र और बुंदेलखंड के सैनिक प्रमुख से अनुरोध किया गया है कि वे हीरापुर के राजा हृदय शाह की खोज करें।

सन्दर्भ[संपादित करें]