हुर्रियत काँफ़्रेंस

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ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंसजम्मू और कश्मीर के विभिन्नराजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक संगठनों का गठबंधन ह कॉन्फ्रेंस ने एलान किया है कि वह जम्मू और कश्मीर राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों में हिस्सा नहीं लेगी।

हालांकि कई प्रमुख मुद्दों पर इस गठबंधन के सदस्यों के भीतर आम राय नहीं है और समय-समय पर इनके मतभेद खुलकर सामने आते हैं। बरसों तक अलग-थलग रहने के बाद हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने नवंबर 2000 में भारत सरकार के एक तरफ़ा युद्ध विराम के एलान के बाद भारत सरकार से संपर्क स्थापित करने के संकेत दिए थे। लेकिन दोनों पक्षों के अपने-अपने रुख़ पर अड़े रहने से ऐसा नहीं हो सका।

स्थापना[संपादित करें]

अलगाववादी गठबंधन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की स्थापना का मक़सद राजनीतिक जरिए से कश्मीर के अलगाव के लक्ष्य को हासिल करना है। इसकी स्थापना 9 मार्च 1993 को की गई थी। भारतीय अधिकारियों का मानना है कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस जम्मू-कश्मीर में सक्रिय चरमपंथी संगठनों का प्रतिनिधित्व करती है।इसे बनाने की ज़रूरत इसलिए महसूस हुई क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंसक गतिविधियों को मान्यता नहीं दी जाती है। लिहाज़ा हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के ज़रिए कश्मीर समस्या के अंतरराष्ट्रीकरण और राजनीतिक समाधान के रास्ते ढूंढे जाएं।

गतिविधियाँ[संपादित करें]

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस मुख्यत: जम्मू-कश्मीर में चरमपंथी संगठनों से संघर्ष कर रही भारतीय सेना की भूमिका पर सवाल उठाने के अलावा मानवाधिकार की बात करती है। भारतीय सेना की कार्रवाई को सरकारी आतंकवाद का नाम देती है और कश्मीर पर भारत के शासन के ख़िलाफ़ हड़ताल और प्रदर्शन करती है। 15 अगस्त को भारत के स्वतंत्रता दिवस और 26 जनवरी को भारत के गणतंत्र दिवस के समारोहों का बहिष्कार भी करती आई है। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने अभी तक एक भी विधानसभा या लोकसभा चुनाव में हिस्सा नहीं लिया है। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ख़ुद को कश्मीरी जनता का असली प्रतिनिधि बताती है।

बातचीत[संपादित करें]

नवंबर 2000 में भारत सरकार के एक तरफ़ा युद्ध विराम और शांति प्रक्रिया शुरु करने के एलान के बाद हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने पाकिस्तान को भी बातचीत में शामिल करने की मांग की। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने अपना एक दल पाकिस्तान भेजकर चरमपंथी संगठनों से बातचीत करने की मांग भी की। लेकिन भारत सरकार ने इसे ठुकरा दिया।

केंद्र सरकार ने केसी पंत को कश्मीरी चरमपंथियों से बातचीत करने के लिए नियुक्त किया। कई दिनों के विचार-विमर्श के बाद हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने बातचीत की पेशकश को ठुकरा दिया।

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता अब्दुल गनी बट ने कहा कि क्योंकि केंद्र सरकार ने हुर्रियत के एक दल को पाकिस्तान जाने की अनुमति नहीं दी है इसलिए वे इस पेशकश को ठुकरा रहे हैं।


अंदरुनी मतभेद[संपादित करें]

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की कार्यकारिणी में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर मतभेद हैं। सैयद अली शाह गिलानी जैसे नेता के बारे में बताया जाता है कि वे चरमपंथी संगठनों की वकालत करते हैं। कश्मीर के अलगाव को लेकर भी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के प्रमुख नेताओं में आम राय नहीं है। कुछ नेता कश्मीर के पाकिस्तान में विलय की मांग करते हैं वहीं जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ़्रंट कश्मीर की स्वतंत्रता की बात करती है। अब्दुल गनी भट कश्मीर को राजनीतिक मुद्दा बताते हैं जबकि सैयद अली शाह गिलानी इसे एक धार्मिक मुद्दा मानते हैं। कश्मीर में विदेशी चरमपंथियों की भूमिका को लेकर भी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस में मतभेद हैं।

सन्दर्भ[संपादित करें]