हिल्बर्ट समस्या

हिल्बर्ट की समस्याएं गणित की 23 प्रसिद्ध समस्याओं का एक समूह हैं, जिन्हें जर्मन गणितज्ञ डेविड हिल्बर्ट ने 1900 ई॰ में प्रस्तुत किया था। ये सभी उस समय अनसुलझी थीं और 20वीं सदी के गणित के विकास पर गहरा प्रभाव डाला। हिल्बर्ट ने इनमें से दस समस्याएं (1, 2, 6, 7, 8, 13, 16, 19, 21 और 22) 8 अगस्त 1900 में पेरिस में हुए गणितज्ञों की अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत कीं। सन् 1902 ई॰ में इन 23 समस्याओं की सूची "मैरी फ्रांसेस विंस्टन न्यूसन" द्वारा "अमेरिकी गणितीय समाज की सूचना-पत्रिका"।[1] में अंग्रेज़ी में अनुवाद करके प्रकाशित की गई थी। इससे पहले यह प्रकाशन मूल जर्मन भाषा में "गणित और भौतिकी का अभिलेखागार" नामक पत्रिका में प्रकाशित की गई।[2]इन समस्याओं ने गणितीय शोध की दिशा तय की और कई महत्वपूर्ण खोजों का आधार बनीं। हिल्बर्ट की स्पष्ट रूप से सूत्रबद्ध समस्याओं में से 3, 7, 10, 14, 17, 18, 19, 20 और 21 के समाधान गणितीय समुदाय द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकार किए गए हैं। और समस्याएं 1, 2, 5, 6, 9, 11, 12, 15 तथा 22 आंशिक रूप से हल मानी जाती हैं, लेकिन उनके समाधानों पर कुछ विवाद है। इनमें से 8वीं (रीमान परिकल्पना), 13वीं और 16वीं समस्या अब तक अनसुलझी हैं। तो वहीं समस्या 4 और 23 को इतना अस्पष्ट माना जाता है कि उन्हें हल किया ही नहीं जा सकता। हिल्बर्ट द्वारा बाद में वापस ली गई समस्या 24 भी इसी श्रेणी में आती है। ये समस्याएं आधुनिक गणितीय शोध की दिशा निर्धारित करने में अत्यंत प्रभावशाली रही हैं।
हिल्बर्ट की समस्याओं की सूची
[संपादित करें]निम्नलिखित 23 समस्याओं के शीर्षक क्रमवार तरीके से दिया गया हैं जिसे 1902 ई॰ में अमेरिकी गणितीय समाज की सूचना-पत्रिका" में अनुवाद करके प्रकाशित किये गये थे।[1]
- सातत्य की 'मौलिक संख्याओं' और जार्ज कैंटर की समस्याएँ।
- अंकगणितीय स्वयंसिद्धों की संगति।
- समान आयतन वाले बहुपर्तों की समरूपता।
- दो बिंदुओं के बीच सबसे छोटी दूरी के लिए सीधी रेखा की खोज।
- सतत परिवर्तन समूहों की अवधारणा और ली का कार्य।
- भौतिकी के स्वयंसिद्धों का गणितीय रूपांतरण।
- कुछ संख्याओं की अपरिमेयता और श्रेष्ठता।
- अभाज्य संख्याओं की समस्याएँ (रीमान परिकल्पना)।
- संख्या क्षेत्रों में पारस्परिकता के सामान्य नियम का प्रमाण।
- डायोफैंटाइन समीकरणों के हल योग्य होने का निर्धारण।
- बीजीय गुणांक वाले द्विघात रूपों का विश्लेषण।
- एबेलियन समुह पर क्रोनकर प्रमेय का सामान्यीकरण।
- सिर्फ दो तर्कों वाले कार्यों से 7वीं डिग्री समीकरण का हल असंभवता।
- कुछ कार्य प्रणालियों की पूर्णता और सीमा।
- शुबर्ट के गणनात्मक कलन की ठोस नींव।
- बीजीय वक्र और सतहों की गुणात्मक आकृति विज्ञान की समस्या।
- वर्गों द्वारा संख्याओं के रूप का प्रतिनिधित्व।
- सर्वांगसम बहुपर्तों से स्थान निर्माण।
- विविधताओं के कलन में नियमित हल हमेशा विश्लेषणात्मक हैं?
- सीमा मानों की सामान्य समस्या (आंशिक अंतर समीकरणों में सीमा मान)।
- निर्धारित "एकात्मक गतिशीलता" के समूह वाले रैखिक अंतर समीकरणों का अस्तित्व
- स्वरूपात्मक कार्यों द्वारा विश्लेषणात्मक संबंधों का एकरूपता।
- विविधताओं की गणना के तरीकों का आगे विकास।
इन्हें भी देखें
[संपादित करें]संदर्भ
[संपादित करें]- 1 2 हिल्बर्ट, डेविड (1902). "गणितीय समस्याएँ।". "अमेरिकी गणितीय समाज की सूचना-पत्रिका"।. 8 (10): 437–479. डीओआई:10.1090/S0002-9904-1902-00923-3.
- ↑ हिल्बर्ट, डेविड (1900). "गणितीय समस्याएँ". गॉटिंगेन स्थित विज्ञान सोसायटी की खबर, गणितीय-भौतिक कक्षा (जर्मन भिषा में): 253–297. and हिल्बर्ट, डेविड (1901). "गणितीय समस्याएँ". "गणित और भौतिकी का अभिलेखागार". तृतीय संस्करण. 1: 44–63, 213–237.