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हिमलिया समूह

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हिमलिया समूह (अंग्रेज़ी: Himalia group) बृहस्पति के 'पुरोगामी अनियमित उपग्रहों' का एक प्रमुख खगोलीय समूह है। 'पुरोगामी' होने का अर्थ है कि इस समूह के सभी उपग्रह बृहस्पति की परिक्रमा उसी दिशा में करते हैं जिस दिशा में बृहस्पति स्वयं अपनी धुरी पर घूमता है (जो कि अनान्के समूह के 'प्रतिगामी' उपग्रहों के ठीक विपरीत है)। इस समूह का नाम इसके सबसे बड़े और सबसे पहले खोजे गए सदस्य, हिमलिया उपग्रह के नाम पर रखा गया है, जिसकी खोज 1904 में अमेरिकी खगोलशास्त्री चार्ल्स डिलन पेरिन ने 'लिक वेधशाला' में की थी।[1][2]

खगोलविदों का मानना है कि हिमलिया समूह के उपग्रह बृहस्पति के निर्माण के समय उसके साथ नहीं बने थे। इसके बजाय, कक्षीय और स्पेक्ट्रोस्कोपिक साक्ष्यों के आधार पर यह सिद्धांत सबसे अधिक स्वीकृत है कि ये उपग्रह मुख्य क्षुद्रग्रह बेल्ट से भटक कर आए एक विशाल क्षुद्रग्रह के अवशेष हैं।[3]

अरबों वर्ष पूर्व, एक 'सी-प्रकार' या 'डी-प्रकार' का क्षुद्रग्रह बृहस्पति के विशाल गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र द्वारा पकड़ लिया गया था। बाद में, यह क्षुद्रग्रह किसी अन्य खगोलीय पिंड या धूमकेतु से टकराकर कई टुकड़ों में टूट गया। इस भयंकर टक्कर में बचा हुआ सबसे बड़ा मुख्य टुकड़ा 'हिमलिया' बन गया, और अंतरिक्ष में छिटके हुए अन्य छोटे टुकड़े इसकी कक्षा के आस-पास स्थापित होकर इस समूह के अन्य छोटे उपग्रह (जैसे एलारा और लिसीथिया) बन गए। इन सभी उपग्रहों का रंग (हल्का लाल/भूरा) और उनका प्रकाश स्पेक्ट्रम एक-दूसरे से काफी मिलता-जुलता है, जो उनके एक ही मूल पिंड से टूटने के सिद्धांत को मजबूत करता है।[4]

हिमलिया समूह के उपग्रहों की कक्षाएं बहुत ही संकीर्ण और विशिष्ट हैं:

  • दूरी: इन उपग्रहों का 'अर्ध-दीर्घ अक्ष' बृहस्पति से लगभग 1.115 करोड़ (11.15 मिलियन) से 1.175 करोड़ किलोमीटर के बीच है। इन्हें बृहस्पति की एक परिक्रमा पूरी करने में औसतन 250 पृथ्वी-दिन का समय लगता है।
  • झुकाव: बृहस्पति के भूमध्यरेखीय तल के सापेक्ष इनकी कक्षा का झुकाव 26.6° और 28.3° के बीच होता है। 90° से कम का यह झुकाव ही इनकी 'पुरोगामी' प्रकृति को सिद्ध करता है।
  • उत्केंद्रता: इन उपग्रहों की कक्षाएँ थोड़ी अंडाकार हैं। इनकी 'उत्केंद्रता' 0.11 से 0.25 के बीच पाई जाती है।[5]

अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ की परंपरा के अनुसार, बृहस्पति के पुरोगामी अनियमित उपग्रहों के नाम के अंत में आमतौर पर "a" (आ) अक्षर आता है। हिमलिया समूह के प्रमुख सदस्य इस प्रकार हैं:

  1. हिमलिया: यह इस समूह का सबसे बड़ा (व्यास लगभग 170 किमी) और सबसे चमकीला सदस्य है। यह बृहस्पति का छठा सबसे बड़ा उपग्रह है (गैलीलियन उपग्रहों और अमाल्थिया के बाद)।
  2. एलारा: इसका व्यास लगभग 86 किमी है और यह समूह का दूसरा सबसे बड़ा उपग्रह है।
  3. लिसीथिया: लगभग 36 किमी के व्यास के साथ यह एक मध्यम आकार का सदस्य है।
  4. लेडा: इसकी खोज 1974 में हुई थी और इसका व्यास मात्र 20 किमी है।
  5. हाल के वर्षों में डिय, पेंडिया और एर्सा जैसे कुछ अन्य बहुत छोटे (1 से 3 किमी वाले) उपग्रह भी इस समूह में जोड़े गए हैं।[6]

सन्दर्भ

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  1. Bagenal, Fran; Dowling, Timothy E.; McKinnon, William B. (2004). Jupiter: The Planet, Satellites and Magnetosphere. Cambridge University Press. pp. 263-266. ISBN 978-0521818087.
  2. "Clues to the Origin of Jovian Outer Irregular Satellites from Reflectance Spectra"
  3. "New Jupiter and Saturn Satellites Reveal New Moon Dynamical Families"
  4. Grav, Tommy; Holman, Matthew J. (2004). "Near-Infrared Photometry of the Irregular Satellites of Jupiter and Saturn". The Astrophysical Journal Letters. 605 (2): L141 – L144. डीओआई:10.1086/420881.
  5. "Collisional Origin of Families of Irregular Satellites"
  6. "Jupiter Moons - NASA Science". NASA. अभिगमन तिथि: 25 जून 2026.

बाहरी कड़ियाँ

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