हिंदी साहित्य ज्ञानकोश

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हिंदी साहित्य ज्ञानकोश हिन्दी साहित्य एवं उससे सम्बन्धित विविध विषयों का विश्वकोश (encyclopedia) है। सात भागों में प्रकाशित इस कोश के प्रधान सम्पादक शम्भुनाथ हैं। इस ज्ञानकोश का प्रकाशन सन् 2019 में भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता के द्वारा हुआ है।

प्रकाशन, स्वरूप एवं उद्देश्य[संपादित करें]

हिंदी साहित्य ज्ञानकोश की रचना भारतीय भाषा परिषद के तत्वावधान में अनेक लेखकों के सहयोग से हुई है। अप्रैल 2014 से इस पर काम शुरू हुआ।[1] इसके प्रधान सम्पादक शंभुनाथ हैं। संपादक मंडल में राधावल्लभ त्रिपाठी, जवरीमल्ल पारख, अवधेश प्रधान, अवधेश कुमार सिंह, एवं अवधेश प्रसाद सिंह सम्मिलित हैं। इसके भाषा-संपादन का कार्य राजकिशोर ने किया है और संयोजक का काम कुसुम खेमानी के द्वारा हुआ है। 275 लेखकों के लेखकीय सहयोग से यह विशाल कार्य संपन्न हुआ है।[1] कुल तीन वर्षों में इसके लेखन एवं संपादन का कार्य संपन्न हुआ और प्रकाशन में दो वर्ष लगे। इस प्रकार 2019 ईस्वी में इसका प्रथम संस्करण प्रकाशित हो गया। इसका प्रकाशन व्यावहारिक रूप से वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली के सहयोग से हुआ है जिसका नाम इसमें एकमात्र वितरक के रूप में दिया गया है।

इस कोश का नाम 'हिंदी साहित्य ज्ञानकोश' होने के बावजूद यह केवल साहित्यिक विषयों तक सीमित नहीं है, बल्कि तुलनात्मक रूप से यह विशुद्ध साहित्यिक विषयों की अपेक्षा साहित्य से संबंधित अन्य विषयों पर अधिक केंद्रित है। इसके संपादक का मानना है कि "हर युग में साहित्य का अर्थ विस्तार हुआ है। वर्तमान समय में इसका संबंध जितना राष्ट्रीय संस्कृतियों से है, उतना ही वैश्विक चिंताओं और बहुआयामी मानव विकास से भी।... यह भी माना जाने लगा है कि साहित्य का ज्ञान अब एक व्यापक सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य और दुनिया की बहुत सारी चीजों को जाने बिना संभव नहीं है।"[2] इस परिप्रेक्ष्य में इस कोश की रचना हुई है। आज के युग के अनुसार ज्ञान के बदले और व्यापक रूप को ध्यान में रखते हुए इसमें धर्म, समाज विज्ञान, संस्कृति, मीडिया, कला-साहित्य, पर्यावरण, मानवाधिकार और विभिन्न मानव सभ्यताओं के प्रति उत्पन्न होने वाली स्वाभाविक जिज्ञासा को संतुष्ट कर सकने योग्य प्रविष्टियाँ भरपूर मात्रा में दी गयी हैं, क्योंकि ऐसी जिज्ञासा की संतुष्टि के लिए पाठक प्रायः इंटरनेट पर निर्भर होते हैं और इंटरनेट उन्हें पूरा संतोष नहीं दे पाता है। संपादक का मानना है कि "ऐसे भी इंटरनेट पर हिंदी में उपलब्ध सामग्री अपर्याप्त और अराजक बिंदु पर खड़ी है।"[2] अंग्रेजी विकिपीडिया पर्याप्त समृद्ध है। परंतु, अनेक शिक्षाविदों, इतिहासकारों और लेखकों ने इसे ज्ञान का विश्वसनीय स्रोत मानने से इन्कार कर दिया है और सिर्फ इस पर निर्भरता को घातक बताया है। कारण यह है कि वहाँ व्यवस्थित ज्ञान की अपेक्षा सूचनाओं की अनियंत्रित भीड़ ज्यादा है।[3] इन कारणों से हिंदी भाषा में हिंदी साहित्य से संबंधित एक विवेचनात्मक एवं प्रामाणिक ज्ञानकोश की आवश्यकता की पूर्ति हेतु 'हिंदी साहित्य ज्ञानकोश' की रचना की गयी है।

विषय-वैविध्य[संपादित करें]

इस ज्ञानकोश में हिन्दी साहित्य एवं उससे संबंधित विविध विषयों का समायोजन किया गया है। ऐसे विषयों की सूची[4] उससे सम्बद्ध प्रविष्टियों की संख्या सहित इस प्रकार है :-

  1. हिंदी भाषा, भाषाएं और जातीय क्षेत्र-50
  2. हिंदी-उर्दू : अंतःसंबंध-19
  3. भाषावैज्ञानिक अध्ययन-89
  4. भाषावैज्ञानिक-40
  5. हिंदी का अंतरराष्ट्रीय संदर्भ-26
  6. राजभाषा हिंदी-18
  7. अनुवाद सिद्धांत-36
  8. भारतीय सांस्कृतिक बहुलता-251
  9. मिथकीय-पौराणिक चरित्र-192
  10. राजनीतिक व्यक्तित्व-89
  11. सांस्कृतिक व्यक्तित्व-211
  12. कलाओं का संसार-33
  13. कलाकार-45
  14. हिंदीतर राष्ट्रीय भाषाएं-21
  15. उत्तर-पूर्व, संघ राज्य और तेलंगाना : भाषा-संस्कृति-15
  16. लोक ज्ञान और लोक कला परंपराएं-69
  17. हिंदी भाषी राज्य-10
  18. नवजागरण और सुधारवादी आंदोलन-29
  19. वैश्वीकरण और उपभोक्ता संस्कृति-102
  20. साहित्य सिद्धांत की प्राचीन भारतीय परंपरा-67
  21. भारतीय साहित्य सिद्धांतकार-33
  22. भारतीय दर्शन-41
  23. हिंदी साहित्य का इतिहास : राष्ट्रीय अंतर्धाराएं-128
  24. विश्वविचार संपदा-116
  25. पश्चिमी सिद्धांतकार तथा अन्य-124
  26. साहित्यिक विधाएं-63
  27. प्रकृति और पर्यावरण-29
  28. साहित्यिक तकनीक, लेखन कला और शिक्षण-62
  29. आलोचना के बीज शब्द-377
  30. राष्ट्र और उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श-87
  31. मीडिया और सूचना प्रौद्योगिकी-112
  32. मानव मूल्य और मानवाधिकार-76

इन विषयों को देखने के बाद यह स्पष्ट होता है कि इसमें अत्यधिक उपयोगी अनेकानेक विषय-क्षेत्रों के सन्निवेश के बावजूद प्रत्यक्ष रूप से हिन्दी साहित्य से सम्बद्ध प्रविष्टियाँ बहुत कम हैं। हिन्दी के साहित्यकार एवं उनकी रचनाओं तथा प्रमुख रचनाओं के पात्रों का विवरण तो बिल्कुल नहीं है। वस्तुतः यह हिन्दी साहित्य का ज्ञानकोश होने की अपेक्षा हिन्दी साहित्य से संबंधित 'सामान्यज्ञान-कोश' अधिक है जो कि अपनी प्रकृति से विवेचनात्मक और आकार में बृहत् है।

'हिन्दी साहित्य कोश' से तुलना[संपादित करें]

' हिंदी साहित्य ज्ञानकोश ' के अत्यधिक उपयोगी इन सात खण्डों के बावजूद धीरेन्द्र वर्मा एवं अन्य द्वारा संपादित 'हिन्दी साहित्य कोश' के दोनों भागों की उपयोगिता पूरी तरह बरकरार ही रहती है। उसके द्वितीय भाग (नामवाची शब्दावली) की प्रविष्टियाँ तो लगभग नहीं ही है इस ज्ञानकोश में। कबीर, जायसी, सूर, तुलसी और प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी जैसे शीर्षस्थ साहित्यकारों पर भी प्रविष्टियाँ नहीं हैं इसमें। केवल राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं भाषाविज्ञान के क्षेत्र से संबंधित कुछ व्यक्तियों का विवरण ही ज्ञानकोश में आ पाया है। 'हिन्दी साहित्य कोश' के प्रथम भाग (पारिभाषिक शब्दावली) की ही बहुत-कुछ प्रविष्टियाँ इस ज्ञानकोश में भी हैं। फिर भी उसमें बहुत-कुछ ऐसा है जो इसमें बिल्कुल नहीं है। उदाहरण के लिए यदि दोनों कोशों के आरंभिक कुछ पृष्ठों का भी अवलोकन किया जाय तो स्पष्ट परिलक्षित होता है कि इस ज्ञानकोश में 'हिन्दी साहित्य कोश' के प्रथम भाग में सम्मिलित अतियथार्थवाद, अति राष्ट्रीयता, अद्वैतवाद एवं अधिनायकवाद जैसी प्रविष्टियाँ तो दी गयी हैं[5], लेकिन 'अंक', अंतर्भावना, अंतःकरण, अंतश्चेतना, अंत्यानुप्रास, अंश, अंशावतार, अक़्ल (सूफी साहित्य में प्रयुक्त), अक्षरधाम (शुद्धाद्वैतवाद में प्रयुक्त), अगम, अगूढव्यंग्य, अग्निचक्र, अघोरपंथ, अचिंत्यभेदाभेदवाद, अचेतन, अजपाजाप, अज्ञातयौवना, अडिल्ल (आदिकालीन हिंदी साहित्य में प्रयुक्त), अतींद्रिय, अत्युक्ति, अद्भुत रस, अद्वय, अध्यात्मवाद आदि अनेकानेक प्रविष्टियाँ बिल्कुल छोड़ दी गयी हैं; जबकि ये सभी प्रविष्टियाँ 'हिन्दी साहित्य कोश' के प्रथम भाग में पर्याप्त विवेचन के साथ सन्निविष्ट हैं।[6] यह ज्ञानकोश मुख्यतः साहित्य के क्षेत्र में नवीन विकसित शब्दावली एवं समकालीन साहित्य में प्रयुक्त होने वाली साहित्येतर शब्दावली पर केन्द्रित है। प्रचलित शब्दावली उतनी ही ली गयी है जिनका स्वरूप आधुनिक संदर्भ में काफी नवीनता प्राप्त कर चुका है।

'समाज-विज्ञान विश्वकोश' से तुलना[संपादित करें]

' हिंदी साहित्य ज्ञानकोश ' और 'समाज-विज्ञान विश्वकोश' की सभी प्रविष्टियों को परस्पर मिलाने पर कुल 313 प्रविष्टियाँ दोनों में मिलती हैं। अर्थात् दोनों की अलग-अलग उपयोगिता बरकरार ही रहती है। जितनी मिलती हैं वे तुलना के लिए भी उपयोगी हो गयी हैं और भिन्न नजरिए के लिए भी।

'समाज-विज्ञान विश्वकोश ' से 'हिंदी साहित्य ज्ञानकोश ' की तुलना इसलिए उपयोगी है कि मुख्यतः समाजविज्ञान पर केन्द्रित होने के बावजूद 'समाज-विज्ञान विश्वकोश' में मानविकी से संबंधित प्रविष्टियाँ भी ली गयी हैं और मुख्यतः हिन्दी साहित्य से संबंधित होने के बावजूद 'हिंदी साहित्य ज्ञानकोश' में समाजविज्ञान से संबंधित प्रविष्टियाँ भी ली गयी हैं। दोनों में उपलब्ध प्रविष्टियों के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि इन प्रविष्टियों का विवेचन और विस्तार विषयानुसार है। अर्थात् 'हिंदी साहित्य ज्ञानकोश' में हिंदी साहित्य के अध्ययन के लिए स्तरीय सामान्यज्ञान की दृष्टि से वैसी प्रविष्टियों का विवेचन अपेक्षाकृत संक्षेप में किया गया है, जबकि 'समाज-विज्ञान विश्वकोश' में विस्तृत सैद्धान्तिक एवं आवश्यकतानुसार व्यावहारिक विवेचन की दृष्टि से गहराई एवं विस्तार को अपनाया गया है। उदाहरण के लिए इन दोनों कोशों में उपलब्ध 'मार्क्सवाद' शीर्षक प्रविष्टि में जहाँ 'हिंदी साहित्य ज्ञानकोश' में दो पृष्ठों से कुछ ही अधिक का विवेचन है[7], वहीं 'समाज-विज्ञान विश्वकोश' में 'मार्क्सवाद-1' (वैज्ञानिकता का दावा : प्रत्यक्षवाद का प्रभाव), 'मार्क्सवाद-2' (रीइफ़िकेशन बनाम ज्ञानमीमांसात्मक विच्छेद), 'मार्क्सवाद-3' (ऐतिहासिक भौतिकवाद : नियम से होनी तक का सफ़र), 'मार्क्सवाद-4' (नींव और ऊपरी ढाँचे का सवाल), 'मार्क्सवाद-5' (पुनर्रचना के तीन बिंदु) के रूप में लगभग 14 पृष्ठों में पर्याप्त विस्तृत पाँच प्रविष्टियाँ दी गयी हैं।[8] मार्क्सवाद से संबंधित चार प्रविष्टियाँ इनके अतिरिक्त और भी हैं। इसी प्रकार 'मोहनदास करमचंद गांधी' शीर्षक 'हिंदी साहित्य ज्ञानकोश' की प्रविष्टि में अहिंसा, चंपारण, उपवास, सत्याग्रह, असहयोग, डांडी यात्रा आदि के रूप में प्रायः सामान्यज्ञान की बातें बतायी गयी हैं[9]; जबकि 'समाज-विज्ञान विश्वकोश' में गाँधी की वैचारिकता को स्पष्ट करने हेतु मोहनदास कर्मचंद गाँधी-1 (इंद्रियानुभववादी ज्ञानमीमांसा की आलोचना), मोहनदास कर्मचंद गाँधी-2 (उदारतावाद और लोकतंत्र की गहन मीमांसा) तथा मोहनदास कर्मचंद गाँधी-3 (दक्षिण अफ्रीका, सत्याग्रह और असहयोग) शीर्षक तीन प्रविष्टियों में पर्याप्त विस्तार से विवेचन दिया गया है।[10]

इसके अतिरिक्त दोनों की पद्धति में एक बड़ा अंतर यह है कि 'समाज-विज्ञान विश्वकोश' में प्रत्येक प्रविष्टि के बाद उस विषय से संबंधित अन्य आवश्यक प्रविष्टियों की सूची नीचे दी गयी है ताकि विषय की पर्याप्त सान्दर्भिक जानकारी के लिए उनका सहज ही उपयोग किया जा सके। 'हिंदी साहित्य ज्ञानकोश' में ऐसा नहीं किया जा सका है। इसके अतिरिक्त 'समाज-विज्ञान विश्वकोश' में प्रत्येक प्रविष्टि के बाद संदर्भ ग्रंथों के नाम विवरण सहित दिये गये हैं, जबकि 'हिंदी साहित्य ज्ञानकोश' में कुछ प्रविष्टियों के बाद 'अधिक जानकारी के लिए' नाम से कुछ सूची दी गयी है और कुछ प्रविष्टियों में ऐसी भी कोई जानकारी नहीं दी गयी है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. हिंदी साहित्य ज्ञानकोश, खंड-1, संपादक-शंभुनाथ, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता, प्रथम संस्करण-2019, पृष्ठ-10.
  2. हिंदी साहित्य ज्ञानकोश, खंड-1, संपादक-शंभुनाथ, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता, प्रथम संस्करण-2019, पृष्ठ-9.
  3. हिंदी साहित्य ज्ञानकोश, खंड-1, संपादक-शंभुनाथ, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता, प्रथम संस्करण-2019, पृष्ठ-12.
  4. हिंदी साहित्य ज्ञानकोश, खंड-1, संपादक-शंभुनाथ, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता, प्रथम संस्करण-2019, पृष्ठ-57-97.
  5. हिंदी साहित्य ज्ञानकोश, खंड-1, संपादक-शंभुनाथ, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता, प्रथम संस्करण-2019, पृष्ठ-154-165.
  6. हिन्दी साहित्य कोश, भाग-१, संपादक- धीरेन्द्र वर्मा एवं अन्य, ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी, नवम (पुनर्मुद्रित) संस्करण-२०११, पृष्ठ-१-२०.
  7. हिंदी साहित्य ज्ञानकोश, खंड-5, संपादक-शंभुनाथ, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता, प्रथम संस्करण-2019, पृष्ठ-2839-2841.
  8. समाज-विज्ञान विश्वकोश, खण्ड-4, संपादक- अभय कुमार दुबे, राजकमल प्रकाशन, प्रा॰ लि॰, नयी दिल्ली, द्वितीय पेपरबैक संस्करण-2016, पृष्ठ-1401-1414.
  9. हिंदी साहित्य ज्ञानकोश, खंड-5, संपादक-शंभुनाथ, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता, प्रथम संस्करण-2019, पृष्ठ-2968-2973.
  10. समाज-विज्ञान विश्वकोश, खण्ड-4, संपादक- अभय कुमार दुबे, राजकमल प्रकाशन, प्रा॰ लि॰, नयी दिल्ली, द्वितीय पेपरबैक संस्करण-2016, पृष्ठ-1496-1504.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]