हाल-ए-दिल

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हाल-ए-दिल
निर्देशक अनिल देवगन
निर्माता कुमार मंगत पाठक
लेखक धीरज रतन
अभिनेता अध्ययन सुमन
अमिता पाठक
नकुल मेहता
संगीतकार आनन्द राज आनन्द
विशाल भारद्वाज
प्रीतम
छायाकार राजीव रवि
स्टूडियो बिग स्क्रीन एंटर्टेंमेंट
वितरक एरॉस इंटरनेशनल
प्रदर्शन तिथि(याँ)
  • 20 जून 2008 (2008-06-20)
देश भारत
भाषा हिन्दी

हाल-ए-दिल भारतीय हिन्दी फिल्म है, जिसका निर्देशन अनिल देवगन ने किया है। इस फिल्म में अध्ययन सुमन, अमिता पाठक और नकुल मेहता मुख्य किरदार निभा रहे हैं। ये फिल्म 20 जून 2008 को सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुआ। इसे मिली जुली समीक्षा मिली, पर इसे 2008 की पहली बड़ी फ्लॉप फिल्म के रूप में घोषित कर दिया गया।

कहानी[संपादित करें]

इसकी कहानी तब शुरू होती है, जब अंजाने में शेखर (नकुल मेहता) गलती से रोहित (अध्ययन सुमन) को टक्कर मार देता है, जिससे उसके हाथ में रखे सारे कागज उड़ने लगते हैं। शेखर जल्दी जल्दी में वहाँ से चले जाता है, और उन कागजों में से से एक कागज संजना (अमिता पाठक) के चेहरे में आ कर रुक जाता है। इस तरह रोहित और संजना की मुलाक़ात होती है और दोनों जल्द ही एक दूसरे से प्यार करने लगते हैं।

एक दिन ट्रेन में शेखर और संजना की मुलाक़ात होती है। इस बात से अंजान कि वो पहले से किसी और से प्यार करती है, वो उसे पटाने की कोशिश करते रहता है। बाद उसे पता चलता है कि वो रोहित से प्यार करती है। उसके बाद उसे पता चलता है कि रोहित की मौत हो चुकी है। संजना अपने घर लौट जाती है।

शेखर उसके घर का पता हासिल कर रात को जब उसके घर आता है तो दुःखी संजना को एक पल के लिए अंधेरे में लगता है कि रोहित वापस आ गया और वो दौड़ कर उसके गले लग जाती है, पर जैसे ही रोशनी वापस आ जाती है, तो वो शेखर को देख कर गुस्सा हो जाती है। शेखर उसका दिल जीतने के लिए सात दिनों तक भूखे पेट उसके घर के सामने रहने का फैसला करता है।

हर दिन वो उसे एक एक खत में उसके सात आश्चर्य (सच्चाई, प्यार, त्याग आदि) के बारे में बताने लगता है। लेकिन 6 दिन पूरे होने के बाद जब संजना 7वें दिन की सुबह बाहर देखती है तो वो वहाँ नहीं दिखता है। वो भागते हुए उसे ढूँढने लगती है और कुछ दूरी पर वो जाता हुआ दिखता है। वो उसके पास जा कर पुछती है तो कि वो एक दिन और इंतजार क्यों बिना किए जा रहा था, तो वो कहता है कि अब उसे सैनिक और राजकुमारी वाली कहानी में सैनिक के 100वें दिन पूरे होने से एक दिन पहले ही जाने का कारण समझ आ गया। वो इस कारण बस एक दिन पूरे होने से पहले ही चला गया था, क्योंकि अगर सौ दिन पूरे होने के बाद भी राजकुमारी उसे नहीं मिलती तो उसका दिल टूट जाता, और अगर वो उससे एक दिन पहले ही चले जाता है तो उसे ऐसा लगते रहेगा कि एक दिन और रुक जाता तो वो आ जाती। उसके बाद संजना कहती है कि क्या तुमने उस राजकुमारी के बारे में सोचा है कि "उसके एक दिन पहले बिना बताए जाने के बाद वो क्या करती? वो सारी जिंदगी उस सैनिक के बारे में सोचते रहती और उसका इंतजार करते रहती है। चाहे उस कहानी का अंत कुछ भी हो, पर मैं वो राजकुमारी नहीं बनना चाहती।" बाद में दोनों गले मिलते हैं और कहानी समाप्त हो जाती है।

कलाकार[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]