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हाथीगुम्फा शिलालेख

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हाथीगुफा
हाथीगुफा में खाववेल का शिलालेख

मौर्य वंश की शक्ति के शिथिल होने पर जब मगध साम्राज्य के अनेक सुदूरवर्ती प्रदेश मौर्य सम्राटों की अधीनता से मुक्त होने लगे, तो कलिंग भी स्वतंत्र हो गया। उड़ीसा के भुवनेश्वर नामक स्थान से तीन मील दूर उदयगिरि नाम की पहाड़ी है, जिसकी एक गुफा में एक शिलालेख उपलब्ध हुआ है, जो 'हाथीगुम्फा शिलालेख' के नाम से प्रसिद्ध है। इसे कलिंगराज खारवेल ने उत्कीर्ण कराया था। यह लेख प्राकृत भाषा एवं ब्राह्मी लिपि में है और प्राचीन भारतीय इतिहास के लिए इसका बहुत अधिक महत्त्व है। इसके अनुसार कलिंग के स्वतंत्र राज्य के राजा प्राचीन 'ऐल वंश' के चेति या चेदि क्षत्रिय थे। चेदि वंश में 'महामेघवाहन' नाम का प्रतापी राजा हुआ, जिसने मौर्यों की निर्बलता से लाभ उठाकर कलिंग में अपना स्वतंत्र शासन स्थापित किया। महामेघवाहन की तीसरी पीढ़ी में खारवेल हुआ, जिसका वृत्तान्त हाथीगुम्फा शिलालेख में विशद के रूप से उल्लिखित है। खारवेल जैन धर्म का अनुयायी था और सम्भवतः उसके समय में कलिंग की बहुसंख्यक जनता भी वर्धमान महावीर के धर्म को अपना चुकी थी।

हाथीगुम्फा के शिलालेख (प्रशस्ति) के अनुसार खारवेल के जीवन के पहले पन्द्रह वर्ष विद्या के अध्ययन में व्यतीत हुए। इस काल में उसने धर्म, अर्थ, शासन, मुद्रापद्धति, क़ानून, शस्त्रसंचालन आदि की शिक्षा प्राप्त की। पन्द्रह साल की आयु में वह युवराज के पद पर नियुक्त हुआ और नौ वर्ष तक इस पद पर रहने के उपरान्त चौबीस वर्ष की आयु में वह कलिंग के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ। राजा बनने पर उसने 'कलिंगाधिपति' और 'कलिंग चक्रवर्ती' की उपाधियाँ धारण कीं। राज्याभिषेक के दूसरे वर्ष उसने पश्चिम की ओर आक्रमण किया और राजा सातकर्णि की उपेक्षा कर कंहवेना (कृष्णा नदी) के तट पर स्थित मूसिक नगर को उसने त्रस्त किया। सातकर्णि सातवाहन राजा था और आंध्र प्रदेश में उसका स्वतंत्र राज्य विद्यमान था। मौर्यों की अधीनता से मुक्त होकर जो प्रदेश स्वतंत्र हो गए थे, आंध्र भी उनमें से एक था। अपने शासनकाल के चौथे वर्ष में खारवेल ने एक बार फिर पश्चिम की ओर आक्रमण किया और भोजकों तथा रठिकों (राष्ट्रिकों) को अपने अधीन किया। भोजकों की स्थिति बरार के क्षेत्र में थी और रठिकों की पूर्वी ख़ानदेशअहमदनगर में। रठिक-भोजक सम्भवतः ऐसे क्षत्रिय कुल थे, प्राचीन अन्धक-वृष्णियों के समान जिनके अपने गणराज्य थे। ये गणराज्य सम्भवतः सातवाहनों की अधीनता स्वीकृत करते थे।

खारवेल की विजय यात्रा

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अपने शासनकाल के आठवें वर्ष में खारवेल ने उत्तर दिशा की ओर विजय यात्रा की। उत्तरापथ में आगे बढ़ती हुई उसकी सेना ने बराबर पहाड़ियों (गया जिले) में स्थित गोरथगिरि के दुर्ग पर आक्रमण किया और उसे जीतकर वे राजगृह पहुँच गई। जिस समय खारवेल इन युद्धों में व्यस्त था, बैक्ट्रिया के यवन भी भारत पर आक्रमण कर रहे थे। भारत के पश्चिम चक्र को अपने अधीन कर वे मध्य देश में पहुँच गए थे। हाथीगुम्फा के लेख के अनुसार यवनराज खारवेल की विजयों के समाचार से भयभीत हो गया और उसने मध्यदेश पर आक्रमण करने का विचार छोड़कर मथुरा की ओर प्रस्थान कर दिया। अनेक ऐतिहासिकों ने यह प्रतिपादित किया है, कि खारवेल से भयभीत होकर मध्यदेश से वापस चले जाने वाले इस यवनराजा का नाम दिमित (डेमेट्रियस) था। अपने शासनकाल के ग्यारहवें वर्ष में खारवेल ने दक्षिण दिशा को आक्रांत किया और विजययात्रा करता हुआ वह तमिल देश तक पहुँच गया। वहाँ पर उसने पिथुण्ड (पितुन्द्र) को जीता और उसके राजा को भेंट उपहार प्रदान करने के लिए विवश किया।

हाथीगुम्फा के शिलालेख में खारवेल द्वारा परास्त किए गए तमिल देश संघात (राज्य संघ) का उल्लेख है। अपने शासनकाल के ग्यारहवें वर्ष में खारवेल ने एक बार फिर उत्तरापथ पर आक्रमण किया और अपनी सेना के घोड़ों और हाथियों को गंगाजल स्नान कराया। मगध के राजा को उसने अपने पैरों पर गिरने के लिए विवश किया और राजा नन्द कलिंग से इस युग के प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव https://en.wikipedia.org/wiki/Rishabhanatha की मूर्ति (जोकि कलिंगजिन नाम से प्रसिद्ध थी) जो मूर्ति वह पाटलिपुत्र ले गया था, उसे सम्राट खारवेल फिर से कलिंग वापस ले आये। इस मूर्ति के अतिरिक्त अन्य भी बहुत—सी लूट खारवेल मगध से अपने राज्य में ले गया और उसका उपयोग उसने भुवनेश्वर में एक विशाल मन्दिर के निर्माण के लिए किया, जिसका उल्लेख ब्रह्माण्ड पुराण की उड़ीसा में प्राप्त एक हस्तलिखित प्रति में भी विद्यमान है।

मगध के जिस राजा को खारवेल ने अपने चरणों पर गिरने के लिए विवश किया था, अनेक इतिहासकारों के अनुसार उसका नाम बहसतिमित (बृहस्पतिमित्र) था। उन्होंने हाथीगुम्फा शिलालेख में इस राजा के नाम को पढ़ने का प्रयत्न भी किया है। पर सब विद्वान इस पाठ से सहमत नहीं हैं। श्री जायसवाल ने हाथीगुम्फा शिलालेख में उल्लिखित मगध के राजा के नाम को बहसतिमित (बृहस्पतिमित्र) मानकर उसे पुष्यमित्र शुंग का पर्यायवाची प्रतिपादित किया है और यह माना है कि कलिंगराज खारवेल ने शुंगवंशी पुष्यमित्र पर आक्रमण कर उसे परास्त किया था। पर अनेक ऐतिहासिक हाथीगुम्फा में आये नाम को न बहसतिमित स्वीकार करने को उद्यत हैं और न ही पुष्यमित्र के साथ मिलाने को। पर इसमें सन्देह नहीं कि हाथीगुम्फा शिलालेख के अनुसार खारवेल ने उत्तरापथ पर आक्रमण करते हुए मगध की भी विजय की थी और वहाँ के राजा को अपने सम्मुख झुकने के लिए विवश किया था।

खारवेल की शक्ति के उत्कर्ष और दिग्विजय का यह वृत्तान्त निस्सन्देह बहुत महत्त्व का है।

देवनागरी लिपि में शिलालेख

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मूल लेख (देवनागरी में परिवर्तित)हिन्दी अर्थ

पंक्ति 1 - नमो अरहंतानं [।।] णमो सवसिधानं [।।] ऐरेण महाराजेन महामेघवाहनेन चेतराज वस वधनेन पसथ सुभलखलेन चतुरंतलुठन गुणउपेनेत कलिंगाधिपतिना सिरि खारवेलेन

पंक्ति 2 - पंदरस वसानि सिरि कड़ार सरीरवता कीड़िता कुमार कीड़िका [।।] ततो लेख रूप गणना ववहार विधि विसारदेन सवविजावदातेन नव वसानि योवराजं पसासितं [।।] संपुणं चतुविसति वसो तदानी वधमान सेसयो वेनाभि विजयो ततिये

पंक्ति 3 - कलिंग राजवसे पुरिस युगे महाराजभिसेचनं पापुनाति [।।] अभिसित मतो च पधमेवसे वात विहत गोपुर पाकार निवेसनं पटिसंखारयति कलिंगनगरि खिवीर सितल तड़ाग पाड़ियो च वंधापयति संवुयान पटि संटपनं च

पंक्ति 4 - कारयति पनतिसाहि सतसहसेहि पकतियो च रंजयति [।।] दुतिये च वसे अचितयिता सातकनिं पछिमदिसं हय गज नर रध बहुलं दंडं पठापयति [।।] कन्हवेंणां गताय च सेनाय वितासिति असिक नगरं [।।] ततिये पुन वसे

पंक्ति 5 - गंधव वेद बुधो दप नत गीत वादित संदसनाहि उसव समाज कारापनाहि च कीड़ापयति नगरिं [।।] तथा चवुथे वसे विजाधराधिवासं अहत पुवं कलिंग पुवराज निवेसितं ..... वितध मकुट स .... निखित छत

पंक्ति 6 - भिंगारे हित रतन सापतेये सव रठिक भोजके पादे वंदा पयति [।।]पंचमे च दानी वसे नंदराज तिवस सत ओघाटितं तनसुलिय वाटा पनाडि नगरि पवेस [य] ति ... [।।] अभिसितो च [छठे] वसे राजसेयं संदंसयं तो सवकरण

पंक्ति 7 - अनुगह अनेकानि सतसहसानि विसजति पोरं जानपदं [।।] सतमं च वसे पसासतो वजिरघरवति ... स मतुक पद [पुनां] स [कुमार] ...[।।] अठमे च वसे महति सेनाय महत गोरधगिरिं

पंक्ति 8 - घाता पयिता राजगहं उपपिड़ापयति [।।] एतिनं च कंम पदान संनादेन सबत सेन वाहने विपमुचितुं मधुरं अपायातो यवनराध ... म... यछति पलव भार

पंक्ति 9 - कपरूखे हय गज रध सह यति सवधरावास परिवेसने ... सव गहणं च कारयितुं बम्हणानं जय परिहार ददाति [।।] अरंहत [पसादाय] नवमे च वसे

पंक्ति 10 - [नगरिय कलिंग] राजनिवासं महाविजय पासादं कारयति अठतिसाय सतसहसेहि [।।] दसमे च वसे दंड संधि साम [मयो] भरधवस पठानं मही जयनं ... कारापयति [।।] एकादसमे च वसे [सतुनं] पायातानं च मणि रतनानि उपलभते [।।]

पंक्ति 11 - कलिंग पुवराज निवेसितं पिथुडं गधवनंगलेन कासयति [।।] जनपद भावनं च तेरसवस सत कतं भिदति तमिर देह संघातं [।।] बारसमे च वसे ..... वितासयति उतरापध राजनो [ततो]

पंक्ति 12 - मागधानं च विपुल भयं जनेतो हथसं गंगाय पाययति [।।] मागधं च राजान बहसतिमितं पादे वंदापयति [।।] नंदराज नीतं कालिंगजिन संनिवेसं [कलिंग] [राज] गह रतन परिहारे हि अंग मगध वसुं च नयति [।।]

पंक्ति 13 - ...तुं जठर लखिल गोपुरानि सिहरानि निवेसयति सत विसिकनं परिहारे हि [।।] अभुत मछरियं च हथीनाव तं परिहर [उपलभते] हय हथी रतन मानिकं [।।] पंडराजा एदानि अनेकानि मुत मनिरतनानि आहारापयति इध सतस [हसानि]

पंक्ति 14 - [दखिणापथ] वासिनो वसीकरोति [।।] तेरसमे च वसे सुपवत कुमारी पवते अरहते (हि) पखिन संसितहि कायनिसीदियाय (...) राजभितिनं चिनवतानं वासासितानं पूजानुरत उवासग (खा) रवेल सिरिना जीवदेह सायिका परिखाता [।।]

पंक्ति 15 - सकत समण सुविहितानं च सवदिसानं यतिनं तपस इसिनं संघायनं अरहत निसीदिया समीपे पभारे वराकर समुथापिताहि अनेक योजनाहि ताहि पनतिसाहि सतसहसेहि सिलाहि सिहपथ रानि स [भिलासेहि]

पंक्ति 16 - पटलिक चतरे च वेड्डरिय गभे थंभे पटिथापयति पानतरिय सतसहसेहि [।।] मुरियकाल वोछिनं च चोयठि अंग संतिकं तुरियं उपादयति [।।] खेमराजा स वधराजा स भिखुराजा स धमराजा पसं तो सुनं तो अनुभवंतो कलणानि

पंक्ति 17 -... गुण विसेस कुसलो सव पासंड पूजको सवदेवायतन संकार कारको अपतिहत चक वाहन बलो चकधरो गुतचको पवत चको राजसि वसुकुल विनिसितो महाविजयो राजा खारवेल सिरि[1]

मंगलाचरण एवं परिचय (पंक्ति १) "अर्हन्तों (जिनों) को नमस्कार है। समस्त सिद्धों को नमस्कार है। ऐर (ऐल) महाराज श्री खारवेल द्वारा, जो महामेघवाहन के वंशज, चेति (चेदि) राजवंश के गौरव-वर्धक, उत्तम एवं शुभ लक्षणों से युक्त, चारों दिशाओं तक व्याप्त गुणों के स्वामी और कलिंग के अधिपति हैं—"

कुमार अवस्था और शिक्षा (पंक्ति २) "पंद्रह वर्षों तक, सुंदर और गौरवर्ण शरीर वाले (खारवेल) द्वारा कुमार-क्रीड़ाएं की गईं। तदनन्तर, जिन्होंने लेख (लिपि), रूप (मुद्रा), गणना (अंकशास्त्र), व्यवहार (नागरिक विधि) और विधि (नियमों) में महारत हासिल की और जो समस्त विद्याओं में निष्णात हुए, उन्होंने नौ वर्षों तक 'युवराज' के पद का कार्यभार संभाला।"

राज्याभिषेक और प्रथम वर्ष (पंक्ति ३) "चौबीस वर्ष की आयु पूर्ण होने पर, कलिंग राजवंश में उनका 'महाराज' के रूप में राज्याभिषेक हुआ। राज्य संभालते ही प्रथम वर्ष में, उन्होंने झंझावात (तूफान) से क्षतिग्रस्त नगर के गोपुरों (द्वारों), प्राचीरों (दीवारों) और भवनों की मरम्मत करवाई। कलिंग नगर में उन्होंने 'खिबिरा ऋषि' के नाम पर बने सरोवर के तटबंधों, अन्य कुंडों और जलाशयों का निर्माण करवाया तथा उद्यानों का जीर्णोद्धार किया।"

लोक कल्याण और सैन्य अभियान (पंक्ति ४-५) "इन कार्यों पर पैंतीस लाख (मुद्राएँ) व्यय कर उन्होंने प्रजा को हर्षित किया। द्वितीय वर्ष में, सातकर्णी की उपेक्षा करते हुए, उन्होंने अश्व, गज, पदाति (पैदल सेना) और रथों से सुसज्जित एक विशाल सेना पश्चिम की ओर भेजी। कन्हा-बेम्ना (कृष्णा नदी) तक पहुँचकर उनकी सेना ने 'मुसिक' नगर में भय उत्पन्न कर दिया। तृतीय वर्ष में, गंधर्व-विद्या (संगीत) के ज्ञाता खारवेल ने नृत्य, गायन, वादन और उत्सवों के माध्यम से राजधानी का मनोरंजन किया।"

तनसुलिय नहर और कर मुक्ति (पंक्ति ६-७) "पाँचवें वर्ष में, उन्होंने उस नहर को तनसुलिय मार्ग से राजधानी तक पहुँचाया, जिसे ३०० वर्ष पूर्व नन्द राज द्वारा खुदवाया गया था। उन्होंने राजसूय (या राजकीय उत्सव) मनाते हुए सभी करों और उपकरों (Cesses) को माफ कर दिया। उन्होंने नगर-निगम और जनपद-निगम को लाखों की सहायता प्रदान की। सातवें वर्ष में, उनकी पत्नी (वजिराघर की राजकुमारी) ने मातृत्व का गौरव प्राप्त किया।"

यवन आक्रमण और धार्मिक दान (पंक्ति ८-९) "आठवें वर्ष में, एक विशाल सेना के साथ उन्होंने 'गोरधगिरि' को ध्वस्त कर राजगृह पर दबाव बनाया। उनके शौर्य की गाथा सुनकर यवन (यूनानी) राजा दिमित (डेमेट्रियस) अपनी हतोत्साहित सेना के साथ मथुरा की ओर पीछे हट गया। उन्होंने ब्राह्मणों को दान दिए और कर-मुक्ति प्रदान की तथा अर्हन्तों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की।"

विजय अभियान और मगध विजय (पंक्ति १०-१२) "दसवें वर्ष में, उन्होंने 'भारतवर्ष' (उत्तरी भारत) के विरुद्ध अभियान चलाया और विजय प्राप्त की। ग्यारहवें वर्ष में, उन्होंने 'पिथुंड' नगर को गधों के हल से जुतवा दिया और ११३ वर्षों पुराने तमिल (द्रमिड़) संघ को छिन्न-भिन्न कर दिया। बारहवें वर्ष में, उन्होंने मगध के लोगों में आतंक उत्पन्न कर दिया और अपने हाथियों को 'सुगंगिय प्रासाद' में प्रविष्ट कराया। उन्होंने मगध नरेश बहसतिभित (बृहस्पति मित्र) को अपने चरणों में झुकने पर विवश किया। वे 'कलिंग जिन' की वह प्रतिमा वापस ले आए, जिसे नन्द राज कलिंग से ले गया था।"

शिल्प और पांड्य राजा (पंक्ति १३) "उन्होंने नक्काशीदार मीनारें बनवाईं और सौ राजमिस्त्रियों की एक बस्ती बसाई, जिन्हें भू-राजस्व से मुक्ति दी गई। उन्होंने पांड्य राजा से रत्न, माणिक्य, मोती, हाथी और घोड़े भेंट स्वरूप प्राप्त किए।"

जैन धर्म और कुमारी पर्वत (पंक्ति १४-१५) "तेरहवें वर्ष में, कुमारी पर्वत (उदयगिरि) पर, जहाँ 'विजय चक्र' प्रवर्तित किया गया था (जैन धर्म का प्रचार हुआ था), उन्होंने जैन मुनियों को रेशमी वस्त्र और पूजा सामग्री अर्पित की। एक उपासक के रूप में खारवेल ने जीव और देह (आत्मा और शरीर) के स्वरूप को समझा। उन्होंने विभिन्न दिशाओं से आए तपस्वियों और मुनियों की एक परिषद (संगठन) का आयोजन किया।"

उपसंहार और विरुदावली (पंक्ति १६-१७) "उन्होंने अर्हन्त के स्मृति-स्मारक के पास पहाड़ी की चोटी पर शिलाओं से आश्रय स्थल बनवाए। उन्होंने चौसठ अक्षरों वाली लिपि और सात अंगों के ग्रंथों का संकलन करवाया। वे क्षेमराज (शांति के राजा), वृद्धराज (समृद्धि के राजा), भिक्षुराज (मुनियों के राजा) और धर्मराज हैं। वे समस्त संप्रदायों के सम्मानकर्ता, सभी मंदिरों के जीर्णोद्धारकर्ता और राजर्षि वसु के वंशज महाविजेता महाराज श्री खारवेल हैं।"

सन्दर्भ

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बाहरी कड़ियाँ

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