हरिहर वैष्णव

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हरिहर वैष्णव (जन्म 19 जनवरी 1955) एक हिन्दी साहित्यकार एवं बस्तर की कला एवं संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर अनुसन्धान कर्ता हैं। आप मूलतः कथाकार एवं कवि हैं साथ ही आपने साहित्य की अनेकों विधाओं में लेखनी चलाई है। आपने न केवल बस्तर की पवित्र माटी में जन्म लिया बल्कि इसे जिया, इस पर गहरा शोध भी किया। बस्तर की साहित्यिक सांस्कृतिक परम्पराओं पर आपके आलेख प्रामाणिक और अंतिम हैं।

जीवन परिचय[संपादित करें]

हरिहर वैष्णव का जन्म बस्तर के दन्तेवाड़ा में १९ जनवरी १९५५ को कोंडागांव में श्यामदास वैष्णव और जयमणि वैष्णव के घर हुआ। आप हिन्दी साहित्य में स्नात्कोत्तर हैं। आप वर्तमान में सरगीपारा, कोंडागाँव (बस्तर) में अवस्थित हैं।

बस्तर के बारे में जितना उन्होंने खोजा-जाना और लिखा, उतना किसी शोधकर्ता ने नहीं किया। मूलत: तो वे कवि हैं, लेकिन साहित्य की हर विधा पर उनकी कलम बड़ी बेबाकी से चली है। वैष्णव की साहित्य साधना किशोरावस्था में ही आरम्भ हो चुकी थी। बस्तर के लोक साहित्य के संकलन में वे किशोरावस्था से ही संलग्न रहे। अपनी माटी से जितना जुड़ाव हरिहर का है, उतना शायद ही किसी अन्य साहित्यकार का अपनी जन्मभूमि से रहा हो। बस्तर की परम्पराओं और संस्कृति को अपने काव्य और गद्य में उतारने वाले हरिहर का हर लिखा एक प्रामाणिक दस्तावेज माना जाता है। बस्तर के परम्परागत लोकसंगीत पर उनका कार्य अभूतपूर्व है। बस्तर की जनजातियों में सदियों से गाये-बजाये जाने वाले गीतों को एकत्रित करने और उनका अनुवाद करने में उन्होंने अपने जीवन का बड़ा काल लगा दिया है।

हरिहर वैष्णव वन विभाग में लेखाकार के पद पर कार्यरत थे, लेकिन शोध कार्य के लिए पर्याप्त समय न मिल पाने के कारण उन्होंने सेवानिवृत्ति से चार साल पहले ही स्वेच्छा से सेवानिवृत्ति ले ली और खुद को पूरी तरह बस्तर की सेवा में झोंक दिया। हरिहर ने बस्तर की माटी में जन्म लिया, तो उसे जिया भी, पूजा भी और उस पर गहरा शोध भी किया।

कृतियाँ[संपादित करें]

आप मूलतः कथाकार एवं कवि हैं साथ ही आपने साहित्य की अनेकों विधाओं में लेखनी चलाई है। आपने कहानी एवं बालसाहित्य रचा है। वैष्णव का सम्पूर्ण लेखन-कर्म बस्तर पर केन्द्रित है। अब तक कुल २४ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं हैं और कुछ प्रकाशनाधीन हैं। हिन्दी के साथ-साथ बस्तर की भाषाओं - हल्बी, भतरी, बस्तरी और छत्तीसगढ़ी में भी समान लेखन-प्रकाशन।

आपकी प्रमुख कृतियाँ हैं –

मोहभंग (कहानी संग्रह), लछमी जगार (बस्तर का लोक महाकाव्य), बस्तर का लोक साहित्य (लोक साहित्य), चलो चलें बस्तर (बाल साहित्य), बस्तर के तीज त्यौहार (बाल साहित्य), राजा और बेल कन्या (लोक साहित्य), बस्तर की गीति कथाएँ (लोक साहित्य), धनकुल (बस्तर का लोक महाकाव्य), बस्तर के धनकुल गीत (शोध विनिबन्ध)। इतना ही नहीं आपने बस्तर की मौखिक कथाए (लोक साहित्य) के अलावा घूमर (हल्बी साहित्यिक पत्रिका), प्रस्तुति, (लघुपत्रिका), एवं ककसाड (लघु पत्रिका) का सम्पदन भी किया है।

पुरस्कार एवं सम्मान[संपादित करें]

हरिहर वैष्णव को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। उल्लेखनीय सम्मानों में छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद् का 'उमेश शर्मा साहित्य सम्मान, 2009', दुष्यन्त कुमार स्मारक संग्रहालय का 'आंचलिक साहित्यकार सम्मान, 2009', छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण 'पं. सुन्दरलाल शर्मा साहित्य सम्मान, 2015, 'वेरियर एल्विन प्रतिष्ठा अलंकरण, 2015', 'साहित्य अकादेमी का भाषा सम्मान; 2015'।