हरगीतिका

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हरगीतिका एक मात्रिक छन्द है।[1] इस छन्द में चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में १६ और १२ के विराम से कुल २८ मात्राएँ होती हैं।

उदाहरण
जिस देश का गुणगान करते देव भी थकते नहीं,
समतुल्य इसके देश कोई और हैं मिलते नहीं।
प्ररभु ने लिया अवतार आकर भू अतीव विशेष है,
यह सर झुका जिसके लिए वह मंजु भारत देश है॥
है सभ्यता-संस्कृति अमर गौरवमयी इतिहास भी,
सबसे प्ररथम हमको हुआ सद्ज्ञान का आभास भी।
नदियाँ बहातीं गाय थन से दुग्ध का भण्डार था,
खुशहाल जीवन का यही सुन्दर सरल आधार था॥

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. भगवतीचरण वर्मा (२००४). धुप्पल. राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड. पृ॰ २४. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788126705788.