हयवदन (नाटक)

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हयवदन (Hayavadana) १९७२ में गिरीश कर्नाड के द्वारा कन्नड़ भाषा में लिखा गया एक बहुत प्रसिद्ध नाटक हैI[1] यह नाटक जर्मनी के लेखक थॉमस मान के द्वारा लिखे गये नावेल ट्रांसपोज़ड हेड्स (Transposed Heads, original German title Die vertauschten Köpfe) पर आधारित हैI

मुख्य पात्र[संपादित करें]

  • भगवत - नाटक का मुख्य कथावाचक
  • देवदत्त - एक ज्ञानी व्यक्ति
  • कपिल - शारीरिक रूप से शक्तिशाली व्यक्ति और देवदत्त का घनिष्ठ मित्र
  • पदमिनी - एक सुंदर स्त्री जो देवदत्त से विवाह करती है I
  • हयवदन - एक प्राणी जो सिर से तो घोड़ा है और धड़ से इंसान
  • अभिनेता (एक्टर-1) - भगवत का सहयोगी जो हयवदन को लेकर मंच पर आता है I
  • देवी काली - देवी जो चमत्कारी शक्ति से देवदत्त, कपिल को पुन: जीवित करती है I
  • ब्राह्मण विद्यासागर - देवदत्त के पिता
  • एक लड़का - देवदत्त और पदमिनी का पुत्र

कथानक[संपादित करें]

एक्ट - I[संपादित करें]

नाटक की शुरुआत में भगवत नाम का एक पात्र मंच पर आता है जो कि इस नाटक का कथावाचक भी है , वह गणेश पूजा के माध्यम से इस नाटक के सफल मंचन की कामना करता है I भगवत दर्शकों को नाटक के स्थान धर्मपुर और वहां के राजा धर्मशील से अवगत करवाता है I दर्शकों के सामने कुछ सवाल खड़े करता है मनुष्य और ईश्वर की अपूर्णता के बारे में , मनुष्य के सर्व गुण सम्पूर्ण होने के बारे में I अपने सम्बोधन के दौरान वह दो नायकों का परिचय देता है जो कि परस्पर मित्र भी हैं I पहला - देवदत्त जो कि एक तेज़ मस्तिष्क और बुद्धि का व्यक्ति है जिसने अपने ज्ञान से राज्य के कवियों और पंडितों को भी पीछे छोड़ दिया है I और दूसरा - कपिल जो कि शारीरिक रूप से काफी शक्तिशाली है I देवदत्त एक ब्राह्मण का पुत्र है और कपिल एक लौहार का पुत्र है I देवदत्त में शारीरिक बल की कमी है तो कपिल में ज्ञान की कमी है I लेखक के अनुसार देवदत्त का सिर ( मस्तिष्क का ज्ञान ) और कपिल का धड़ ( शारीरिक बल ) मिलकर एक सम्पूर्ण पुरुष की कल्पना की जा सकती है I देवदत्त और कपिल की तुलना राम-लक्ष्मण , लव-कुश तथा कृष्ण-बलराम की जोड़ी से करता हैI

इसके बाद एक अभिनेता ( एक्टर-1 ) चीखते हुए दौड़कर भगवत की तरफ आता है और उसे बताता है कि उसने एक अजीब प्राणी को देखा है जो इन्सान की तरह बातें करता है लेकिन उसका का सिर एक घोड़े का है और धड़ एक इंसान का I भगवत उसे नाटक के लिए तैयार होने को कहता है I वह अभिनेता मंच से चला जाता है परन्तु कुछ देर में वह मंच पर चीखता हुआ वापस आता है और उसके पीछे वह अजीब प्राणी भी आता है I एक बार तो भगवत को लगता है कि शायद किसी ने घोड़े का नकाब पहना हुआ है , वह इसे हटाने का प्रयास करता है और फिर उसे एहसास होता है कि उसका सिर असली है I वह सच में आधा घोड़ा है और आधा इंसान I इसके बाद वह प्राणी स्वयं का परिचय हयवदन के रूप में करता है I

हयवदन अपने जन्म की कहानी सुनाने लगता है I वह बताता है कि एक बार कर्नाटक राज्य की एक राजकुमारी को अपने लिए वर (पति ) चुनना होता है और उसे देखने के लिए दूर-दूर से राजकुमार आते है I उसे एक अरबी राजकुमार के घोड़े से प्यार हो जाता है और वह घोड़े से विवाह करने के लिए जिद करती है और उसका विवाह कर दिया जाता है I वह घोडा १५ साल बाद आकाशीय प्राणी ( Celestial Being ) का रूप धारण कर लेता है लेकिन अब राजकुमारी उसे स्वीकार नहीं करती I वह आदमी ( घोड़ा ) राजकुमारी को घोड़ी बनने का शाप दे देता है और वो एक घोड़ी के रूप में बदल जाती है I वह घोड़ी (राजकुमारी) हयवदन को जन्म देती है जो कि आधा आदमी है ( धड़ ) और आधा घोड़ा ( सिर ) I अब हयवदन इस रूप से मुक्ति प्राप्त करना चाहता है I भगवत उसे चित्रकूट के माता (देवी) काली के मंदिर में जाने के लिए कहता है और अभनेता को भी उसके साथ जाने के लिए कहता है I दोनों चले जाते हैं I

भगवत नाटक की कहानी के साथ आगे बढ़ता है I मंच पर देवदत्त और कपिल आते है I देवदत्त एक पदमिनी नाम की स्त्री से विवाह करना चाहता है और वह इस बारे में कपिल को बताता है I देवदत्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर मन ही मन अपना सिर देवी काली को और बाहें रूद्र को न्योछावर करने की सोचता है I कपिल पदमिनी के पास जाकर देवदत्त से विवाह का प्रस्ताव रखता हैI देवदत्त और पदमिनी का विवाह हो जाता है I समय बीतने पर देवदत्त को ये महसूस होने लगता है कि कपिल और पदमिनी परस्पर एक दूसरे की तरफ आकर्षित हो रहे है I इस समय पदमिनी गर्भवती है I देवदत्त जान बूझकर तीनो के उज्जैन जाने के कार्यक्रम को टालने का प्रयास करता है I वह कपिल से कहता है कि पदमिनी बीमार है I लेकिन पदमिनी उसकी इच्छाओं के विपरीत कपिल के सामने यात्रा पर जाने की सहमति दे देती है I तीनो यात्रा पर निकल पड़ते हैं I पदमिनी बार बार देवदत्त के सामने कपिल की प्रशंसा करती है I कपिल पदमिनी के लिए फूल तोड़ कर लाता है I कपिल और पदमिनी दोनों रूद्र मंदिर में चले जाते हैं जबकि देवदत्त साथ जाने से मना कर देता है I वह ईर्ष्या अनुभव करता है लेकिन इसके लिए पदमिनी को दोष नहीं देता I क्यूंकि कपिल का शारीरिक बल और सौन्दर्य ऐसा है कि कोई भी स्त्री उसकी और आकर्षित हो सकती है I देवदत्त देवी काली के मंदिर में चला जाता है I उसे अपना प्रण याद आ जाता है I वह पदमिनी और कपिल की सदा खुश होने की कामना करते हुए तलवार से अपना सिर काटकर देवी काली के चरणों में चढ़ा देता है I

इतने में कपिल और पदमिनी मंदिर से बाहर आते हैं I देवदत्त को वह न देखकर कपिल काफी चिंतित हो जाता है और पदमिनी को वहीं छोड़कर देवदत्नत की तलाश में निकल जाता है I पदमिनी को इस बात से हैरानी होती है कि कपिल को उसकी बजाय देवदत्त की ज्यादा चिंता है I कपिल को देवी काली के मंदिर में देवदत्त का सिर और धड़ मिलता है I कपिल स्वयं द्वारा पदमिनी की तरफ आकर्षित होने को देवदत्त की मौत का कारण महसूस करता है I वह देवदत्त को अपना मित्र, भाई , गुरु और अपना सब कुछ मानता हैI उसी तलवार से कपिल खुद का सिर धड़ से अलग कर देता है I कुछ देर बाद पदमिनी भी वहां पहुँचती है I उसे कोई अंदाज़ा नहीं है कि दोनों की मौत कैसे हुई I वो स्वयं एक ऐसी स्त्री के रूप में देखती है जिसकी वजह से दो दोस्तों के बीच आपसी द्वंद हुआ और दोनों ने एक दुसरे की जान ले ली I वह भी आत्म हत्या करने का प्रयास करने लगती है तभी देवी काली प्रकट होती है और उसे ऐसा करने से रोकती है I काली उसे दोनों के सिर उनके धड़ के साथ रखकर जोड़ने के लिए कहती है ताकि वह उन्हें पुन: जीवित कर सके I काली दोनों की प्रशंसा भी करती है I जैसे ही पदमिनी उनके सिर और धड़ को जोडती है , काली ओझल हो जाती है I थोड़ी देर बाद जब पदमिनी को कुछ होश आता है तो उसे अपनी गलती का एहसास होता है कि जल्दबाजी में उसने देवदत्त और कपिल के सिरों को एक दूसरे के धड़ के साथ जोड़ दिया था I

जब कपिल और देवदत्त को होश आता है तो वो भी हैरान होते हैं I अब उन दोनों की तरफ से पदमिनी पर अपना हक़ जताया जाता है I देवदत्त ( सिर ) जिसके साथ कपिल का धड़ है वह कहता है कि मस्तिष्क पूरे शरीर का स्वामी है, अत: पदमिनी उसी की होनी चाहिए I कपिल (सिर ) जिसके साथ देवदत्त का धड़ जुड़ा हुआ है कहता है कि उसके शरीर (देवदत्त के धड़) के साथ पदमिनी रही है I अत: पदमिनी पर उसी का हक़ है I

इतने में कथावाचक भगवत मंच पर आता है , सभी पात्र वहीं पर बुत बन जाते हैं और वह दर्शकों से सवाल करता है कि अब इस समस्या का क्या हल हो सकता है , पदमिनी पर किस का अधिकार होना चाहिए I मंच पर पर्दा गिर जाता है I

एक्ट - II[संपादित करें]

पर्दा हटता है I दूसरे एक्ट के आरम्भ में ही कथावाचक भगवत फिर से दर्शकों से वही प्रश्न करता हैI वह विक्रम और बेताल की उस कहानी का जिक्र भी करता है जहाँ राजा विक्रम भी बेताल को इस प्रश्न के उत्तर में यही कहता है कि मस्तिष्क (सिर) से ही पूरे एक व्यक्तितव की पहचान होती है I भगवत बताता है कि तीनो एक ऋषि के पास समस्या के समाधान के लिए जाते हैं I ऋषि के शब्द मंच पर सुनाई देते हैं कि देवदत्त का सिर ही पदमिनी का असली स्वामी है I देवदत्त और पदमिनी ख़ुशी से ये निर्णय स्वीकार करते हैं और कपिल को अलविदा कहते हैं I कपिल जंगल की तरफ चला जाता है I

समय बीतता है I देवदत्त कुछ गुड़ियाँ लेकर आता है I ये गुड़ियाँ भी एक तरह से कथावाचक की भूमिका निभाती हैं I देवदत्त और पदमिनी की मनोस्थिति को दर्शकों के सामने रखती हैं I वह एक कुश्ती का मुकाबला जीतने की खुश खबरी भी पदमिनी को देता है I पदमिनी एक बच्चे को जन्म देती है I देवदत्त भी धीरे धीरे अपनी शक्ति खोने लगता है I पदमिनी भी देवदत्त में रूचि खोने लगती है I पदमिनी के कहने पर देवदत्त उज्जैन के मेले से नई गुड़ियाँ लेने के लिए चला जाता है I भगवत फिर से मंच पर आकर कपिल के बारे बताता है कि उसने समय के साथ पहले की तरह अपनी शारीरिक शक्ति प्राप्त कर ली है I पदमिनी जंगल में कपिल से मिलती है I जब कपिल आने का कारण पूछता है तो वह कहती है कि वह अपने बच्चे को प्रकृति का अनुभव करवाने के लिए लाई है I और यह बच्चा कपिल का भी है क्यूंकि इसने कपिल के शरीर से जन्म लिया है I लेकिन कपिल उसे स्वीकार नहीं करता I थोड़े संकोच और हिचकिचाहट के बाद कपिल अपनी शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए तैयार हो जाता है I

देवदत्त पदमिनी को ढूंढता हुआ वहीं जंगल में आ जाता है I फिर से वही समस्या को देख और एक अंतिम हल के रूप में देवदत्त कपिल को तलवार के साथ ललकारता है और दोनों मारे जाते हैं I पदमिनी फिर से खुद को अकेला अनुभव करती है I तभी वहां भगवत आ जाता है , पदमिनी उसे बच्चा सौंप देती है और कहती है कि ५ साल बाद इसे देवदत्त के पिता ब्राह्मण विद्यासागर को सौंप देना I वह उसे देवदत्त द्वारा लाई हुई गुड़ियाँ भी पकड़ा देती है और देवदत्त व् कपिल के साथ सती होने की घोषणा करके चली जाती है I भगवत पदमिनी के सन्दर्भ में अपने भाषण के साथ नाटक को खत्म करने की सोचता है, तभी मंच पर एक चीख सुनाई देती हैI वही अभनेता आकर कहता है कि उसने घोड़े को राष्ट्रीय गान और देश भक्ति के गीत गाते हुए सुना है I तभी वहां एक और अभिनेता आता है जिसके साथ एक लड़का है और उस लडके के पास दो गुड़ियाँ हैं I

हयवदन मंच पर आता है I और भगवत का अभिवादन करता है I अभिनेता और भगवत हंसी मजाक में बातें करते हैं और जोर जोर से हंसने लगते हैं I वो लड़का भी हंसता है और उसके हाथ से वो गुड़ियाँ नीचे गिर जाती हैं I भगवत कहता है कि इस लडके ने पिछले 5 साल में किसी प्रकार के सुख, दुःख या हंसी को महसूस नहीं किया I सिर्फ उसकी (हयवदन) वजह से ही उसके चेहरे पर मुस्कान है I

अब हयवदन अपनी कहानी सुनाने लगता है कि जब वह देवी काली के मंदिर में पहुंचा तो उसने तलवार उठा कर अपना सिर भेंट चढाने का फैसला किया I तभी देवी काली ने प्रकट होकर कहा कि तुम लोग कहीं और जाकर अपना सिर क्यूँ नहीं काटते I यदि सिर ही काटना है तो मेरे पास क्यूँ आते हो ?? देवी काली ने उस से उसकी इच्छा के बारे में पूछा और उसे पूरा कर दिया I लेकिन देवी काली ने उसकी पूरी इच्छा को नहीं सुना और उसे पूरी तरह इंसान बनाने की बजाय पूरी तरह से घोड़ा बना दिया I लेकिन फिर वो खुश है I लेकिन उसे अफ़सोस है कि अभी भी उसके पास इंसान की आवाज़ हैI जिस कारण वह अभी भी पूरी तरह से घोड़ा नहीं बना I हयवदन कहता है कि जो लोग राष्ट्रिय गान गाते हैं उनकी आवाज़ जल्दी खत्म हो जाती है I इसीलिए वह राष्ट्रीय गान गा रहा था ताकि वह अपनी आवाज़ खो सकेI हयवदन सिसकने लगता है और वो लड़का उसे सांत्वना देता है I

हयवदन उसे अपने साथ राष्ट्रीय गान गाने के लिए कहता है लेकिन उस लड़के को इसके बारे में कुछ भी नहीं पता I वह अपनी माँ पदमिनी द्वारा गाया जाने वाला गीत ही गाने लगता है जोकि थोडा त्रासदिक है I हयवदन हंसने की कोशिश करता है और उसकी हंसी घोड़े की आवाज़ में बदल जाती है और अब हयवदन पूरी तरह से घोड़ा बन जाता है I

भगवत अभनेता को कहता है कि वो ब्राह्मण विद्यासागर के पास जाये और कहे कि उनका पोता एक महान घोड़े पर सवार होकर आ रहा है I भगवत देवता गणेश का नाटक के सुखद अंत के लिए धन्यवाद करता है I [2]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. "Hayvadan - हिन्दीतर नाटक | Other Indian Writing - नाटक | Play - All Publications". www.rajkamalprakashan.com. मूल से 11 अक्तूबर 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2019-10-11.
  2. "हयवदन - गिरीश कारनाड Hayvadan - Hindi book by - Girish Karnad". www.pustak.org. मूल से 11 अक्तूबर 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2019-10-11.